मानवीयता का पर्याय है भारतीय किसान

    दिनांक 12-अक्तूबर-2020
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मनीष वाजपेयी की फेसबुक वॉल से 
पुराना भारत इतना शिक्षित और धनाढ्य था कि अपने जीवन व्यवहार में ही जीवन रस खोज लेता था। वह करोड़ों वर्ष पुरानी संस्कृति वाला वैभवशाली भारत था   
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हल खींचते समय यदि कोई बैल गोबर या मूत्र करने की स्थिति में होता था तो किसान कुछ देर के लिए हल चलाना बन्द करके बैल के मल-मूत्र त्यागने तक खड़ा रहता था, ताकि बैल आराम से नित्यकर्म कर सकें, यह आम चलन था। हमने यह सब बचपन में स्वयं अपनी आंखों से देखा है। जीवों के प्रति यह गहरी संवेदना उन महान पुरखों में जन्मजात होती थी, जिन्हें आजकल हम अशिक्षित कहते हैं। यह सब अभी 25-30 वर्ष पूर्व तक होता रहा।

उस जमाने का देसी घी यदि आजकल के हिसाब से मूल्य लगाएं तो इतना शुद्ध होता था कि  2 हजार रुपये किलो. तक बिक सकता है। उस देसी घी को किसान विशेष कार्य के दिनों में हर दो दिन बाद आधा-आधा किलो घी अपने बैलों को पिलाता था।

टिटहरी नामक पक्षी अपने अंडे खुले खेत की मिट्टी पर देती है और उनको सेती है। हल चलाते समय यदि सामने कहीं कोई टिटहरी चिल्लाती मिलती थी, तो किसान इशारा समझ जाता था और उस अंडे वाली जगह को बिना हल जोते खाली छोड़ देता था। उस जमाने में आधुनिक शिक्षा नहीं थी।

सब आस्तिक थे। दोपहर को जब किसान के आराम करने का समय होता तो सबसे पहले वह  बैलों को पानी पिलाकर चारा डालता और फिर खुद भोजन करता था। यह एक सामान्य नियम था।

बैल जब बूढ़े हो जाते थे तो उसे कसाइयों को बेचना शर्मनाक सामाजिक अपराध की श्रेणी में आता था। बूढ़े बैल कई सालों तक खाली बैठकर चारा खाते रहते थे, मरने तक उनकी सेवा होती थी। उस जमाने के तथाकथित अशिक्षित किसान का मानवीय तर्क था कि इतने सालों तक इसकी मां का दूध पिया और इसकी कमाई खाई है, अब बुढ़ापे में इसे कैसे छोड़ दें, कैसे कसाइयों को दे दें ?

जब बैल की मृत्यु हो जाती थी तो किसान फफक-फफक कर रोता था। उन भरी दुपहरियों को याद करता था, जब उसका यह वफादार मित्र हर कष्ट में उसके साथ होता था। माता-पिता को रोता देख किसान के बच्चे भी अपने बूढ़े बैल की मृत्यु पर रोने लगते थे। पूरा जीवनकाल तक बैल अपने स्वामी किसान की मूक भाषा को समझता था कि वह क्या कहना चाह रहा है।

वह पुराना भारत इतना शिक्षित और धनाढ्य था कि अपने जीवन व्यवहार में ही जीवन रस खोज लेता था। वह करोड़ों वर्ष पुरानी संस्कृति वाला वैभवशाली भारत था