अ-क्षर साधना

    दिनांक 12-अक्तूबर-2020   
Total Views |
मामाजी के कृतित्व पर केंद्रित संग्रहणीय अंक फिलहाल सीमित संख्या में उपलब्ध हैं। शीघ्र ही यह आनलाइन भी उपलब्ध होगा। सामयिक विषयों से इतर ऐसे अंक वैचारिक क्षुधा को तृप्त करने के लिए आवश्यक हैं।
pj_1  H x W: 0

अक्षर का अर्थ ही है जिसका क्षरण नहीं हो। पत्रकारिता और कुछ नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक क्षेत्रों में क्षरण-पतन के विरुद्ध सतत साधना ही है। लेकिन यह अक्षर साधना तो विषयों के प्रति पूरी संवेदनशीलता और विघ्नों के समक्ष अविचल भाव से डटे रहकर ही हो सकती है। स्व. माणिक चंद्र वाजपेयी (उपाख्य मामाजी) का जीवन इसी साधना का साकार रूप है।
मामाजी की जन्मशती समापन कार्यक्रम (7 अक्तूबर) के अवसर पर पाञ्चजन्य के संग्रहणीय अंक का विमोचन (देखें पेज 5) हुआ तो इस साधना को पूर्ण करने वाले जीवन के संदर्भ-उदाहरण ताजा हो आए।

पत्रकार कैसा होता है? यह प्रश्न आज पत्रकारिता के विद्यार्थियों से भी पूछें तो संभव है कि अवचेतन में बैठी ‘प्राइम टाइम’ की चकाचौंध झलकियां इस उत्तर पर चढ़ बैठें। किन्तु जिस तरह वास्तविक जीवन में कोई गुप्तचर ‘जेम्स बॉण्ड’ की तरह दिखने पर ‘गुप्त’ नहीं रह सकता, उसी तरह चमक-दमक पत्रकारिता को जमीन से काटती है। दीमक लगाती है। यह बात कितनी महत्वपूर्ण है, इसे रेखांकित करता उज्ज्वल उदाहरण है मामाजी की पत्रकारिता।
प्रचारक, पत्रकार और साहित्यकार होने की त्रयी विधा को साधते हुए मामाजी मानो तीन भिन्न जीवनों को एक सूत्र में गूंथते चले। इसे कुछ यूं समझें- देखने में सादा, तथ्यों में अन्वेषी और विश्लेषण में गहरे...।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विचार कोई थोपा हुआ विचार नहीं, बल्कि इस समाज के मन की बात है, मामाजी ने अपनी पत्रकारिता में अलग-अलग मुद्दों के माध्यम से इस बात को दोहराया ही नहीं, बल्कि स्थापित किया।

सहज स्वाभाविक संस्कारगत समभाव की भारतीय जीवन शैली पर कथित सेकुलरिज्म के ग्रहण की बात हो, राम जन्मभूमि पर विकृत दृष्टिकोण को फैलाकर समाज की इंद्रधनुषी छटा को कलुषित करने के प्रयास हों या वामपंथ के रूमानी चोले में लंगड़ी बौद्धिकता को आगे कर परस्पर स्नेह-सरोकार आधारित सामाजिक भाव को हाशिए पर भेजने का कुचक्र...मुद्दे कोई भी हों, माणिक चंद्र जी का जीवन और उनकी वृत्ति वृहत्तर सामाजिक सरोकारों की चिंताओं से निर्देशित रही।

‘आपातकालीन संघर्ष गाथा’, ‘प्रथम अग्नि परीक्षा’, ‘ज्योति जला निज प्राण की’, ‘मध्य भारत की संघ गाथा’ जैसी उनकी पुस्तकें साहित्य से ज्यादा पत्रकारिता, इतिहास और समाजशास्त्र की थाती हैं। ये पुस्तकें उनके सहज व्यक्तित्व की गहन शोधवृत्ति से परिचय कराती हैं। अनगिनत यात्राएं कर जुटाए गए विभाजन की त्रासदी से जुड़े सूक्ष्मतम ब्यौरे। आपातकाल की अकथनीय कष्ट कथाएं... सब कुछ तार्किक, तथ्यात्मक और अकादमिक ढंग से संजोई हुई।

व्यवस्थागत ढिलाइयों को डपटते हुए, सुप्त समाज को झकझोरते हुए और भ्रांतियों को तोड़ते हुए भी वह आक्रोशी नहीं, प्रेमिल रहते हैं। यह ऐसा सन्तुलन है जो पत्रकार उनके लेखन-जीवन से सीख सकते हैं। यह सरल नहीं था। किंतु खुद सरल रहने पर, कठिन भी सरल हो सकता है, इसका प्रमाण उनका जीवन है।

खुद सहज रहने का ही परिणाम है कि सुदीर्घ पत्रकारीय जीवन में भी मामाजी के लेखन में किसी कुंठा और द्वेष के दर्शन नहीं होते। एक आक्रोश, एक उद्विग्नता जरूर है जिसकी झलक उनकी लेखिनी में बार-बार फूट पड़ती, किंतु देखने वाली बात यह है कि ऐसी अभिव्यक्ति सरोकारों को लेकर थी, सरकारों को लेकर नहीं। आज के पत्रकारों के लिए यह भी बड़ा सबक है। किसी के हित में झूलते हुए या फिर विरोध की गांठ बांधकर पत्रकारिता नहीं हो सकती!
कभी व्यंग्योक्ति कभी सीधे तीखे-मारक तो कभी झकझोरने, रुलाने की सीमा तक मार्मिक... किसी एक शैली में न बंधना ही उनकी शैली है। यूं तो मामाजी और उनके लेखकीय सन्दर्भों का स्मरण पत्रकारिता के लिए सदैव ही प्रेरणादायी है। किंतु उनके जन्मशताब्दी वर्ष में यह और महत्वपूर्ण हो जाता है। पाञ्चजन्य के पुराने सुधी पाठकों के लिए उनका नाम अपरिचित नहीं है। किंतु, फिर भी आज सबको शब्दों के इस अनन्य साधक की विचार वीथिकाओं में ले जाने का अवसर बनता ही है। मामाजी के कृतित्व पर केंद्रित संग्रहणीय अंक फिलहाल सीमित संख्या में उपलब्ध हैं। शीघ्र ही आपको यह आनलाइन भी उपलब्ध होगा।

सामयिक विषयों से इतर ऐसे अंक वैचारिक क्षुधा को तृप्त करने के लिए आवश्यक हैं। इसलिए पत्रकारिता में क्षरण के विरुद्ध अक्षर साधना करते शब्दपुरुष का साक्षात्कार केवल रस्मपूर्ति नहीं, बल्कि समय की आवश्यकता है।
@hiteshshankar