भारतीय श्रम संस्कृति का आर्थिक महत्व

    दिनांक 13-अक्तूबर-2020
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दुर्गेश कुमार दीक्षित

वैदिक काल में श्रम को सर्वश्रेष्ठ माना जाता था। ऋग्वेद में लिखा है कि श्रमनिष्ठ व्यक्ति के जीवन में पाप कर्म का कभी प्रवेश नहीं होता। उस समय आर्थिक, शारीरिक और मानसिक कर्म के आधार पर भेद नहीं किया जाता था। डॉ. रामविलास शर्मा ने प्रमाणपूर्वक प्राचीन भारतीय श्रम व्यवस्था की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया
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प्राचीन काल में दुनिया के कई देशों में भारत की व्यापारिक पहुंच थी

भारतीय संस्कृति की बहुआयामी चिंतन धाराओं में एक धारा साहित्यानुशीलन की रही है। हमारे यहां साहित्य समाज सापेक्ष चिंतन के लिए जाना जाता है। साहित्य की इसी चिंतनधर्मिता को हमारे आर्षग्रंथों- वैदिक साहित्य और औपनिषदिक साहित्य में प्रमुख स्थान दिया गया है। साहित्य की आलोचना धारा भी उत्कृष्ट कोटि के साहित्य का निकष उसमें सन्निहित समाज-चिंतन को ही मानती रही है। भारतीय साहित्य व समाज चिंतन की इसी परंपरा को 20वीं सदी में महामनीषी डॉ. रामविलास शर्मा ने पुनर्स्थापित, परिमार्जित और संवर्धित किया। भारतीय ज्ञान परंपरा की बहुआयामात्मकता के समान उनका ज्ञान चिंतन भी बहुआयामी है। उन्होंने इतिहास, दर्शन, साहित्य, भाषा विज्ञान, पाश्चात्य ज्ञान चिंतन, कलानुशीलन तथा साहित्यालोचन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवेश किया व इन सभी क्षेत्रों में अपने तत्व से अनेकानेक अपूर्व ग्रंथ रत्नों का सृजन किया। इस प्रक्रिया में उन्होंने ऋग्वेद से लेकर आधुनिक भारतीय साहित्य का अनुशीलन किया तथा पाश्चात्य ज्ञान परंपरा को अधीत करते हुए सुकरात से लेकर कार्ल मार्क्स तक के सामाजिक चिंतन का अध्ययन किया। अंतत: उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि भारतीय ज्ञान परंपरा में विश्व शिक्षा के स्वाभाविक गुण धर्म विद्यमान हैं। अत: हमें पश्चिम से कुछ सीखने की आवश्यकता नहीं, बल्कि वहां की भौतिकवादी संस्कृति को भारतीय अध्यात्मवाद और दर्शन की शिक्षा प्रदान करने की आवश्यकता है। उनके इस विचार चिंतन को स्पष्टता से समझने के लिए हमें उनके उत्तरकालिक तत्व का अध्ययन करना होगा, जहां उन्होंने ऋग्वेद पर अत्यंत गंभीरता से विचार किया है। ऋग्वेद पर विचार करते हुए उन्होंने आर्य संस्कृति की श्रेष्ठता, भारतीय राष्टÑ की परिकल्पना व भारतीय समाज में श्रम संस्कृति की महत्ता पर महत्वपूर्ण स्थापनाएं प्रदान कीं। प्राचीन भारत में आर्थिक वैषम्य का कोई स्थान नहीं था, इसे रेखांकित करते हुए डॉ. शर्मा ने प्रमाणपूर्वक प्राचीन भारतीय श्रम व्यवस्था की ओर हमारा ध्यानाकर्षण कराया। प्राचीनकाल में हमारे समाज में श्रम व्यवस्था का अत्यंत सुगठित रूप देखने को मिलता है। उस समय प्रत्येक व्यक्ति को उसके कौशल के आधार पर काम मिलता था। कुशल कारीगर अपने कार्य में सिद्धहस्त होने के साथ वनवोन्मेषी होते थे। इसी कारण यहां कलाओं का इतना विकास संभव हो सका। कर्म को ही देवाराधन का प्रमुख साधन माना जाता था। कर्मशीलता की इसी सामाजिक प्रतिष्ठा ने श्रम-संस्कृति की आधारशिला रखी। व्यक्ति को श्रमधर्मी जीवन जीने के संस्कार प्रदान किए जाते थे। साथ ही, व्यक्ति के श्रमिक जीवन को उच्च या निम्न दृष्टि से नहीं देखा जाता था, बल्कि श्रम को सबसे बड़ी संपत्ति माना जाता था। ऋग्वेद में स्पष्ट लिखा है कि श्रमनिष्ठ व्यक्ति के जीवन में कभी भी पाप कर्मों का प्रवेश नहीं होता। यानी व्यक्ति श्रमाराधन के द्वारा पाप मुक्त हो सकते थे। ऋग्वेद में श्रम करने वाले मनुष्य के अंगों और यंत्रों का विशेष महत्व है। शायद इसी कारण 10वें मंडल में व्यक्ति के हाथों और पैरों की प्रशंसा की गई है। कुशल कारीगर के हाथों में देवत्व की प्रतिष्ठा की गई है। व्यक्ति को संबोधित करते हुए वैदिक ऋषि कहते हैं कि श्रम करने में कुशल अपने हाथों की प्रतिष्ठा करो, उनको सामर्थ्यवान बनाओ।

ऋग्वेद में श्रम कुशल कारीगरों द्वारा किए गए निर्माण कार्यों का भी सुंदर वर्णन मिलता है। 10वें मंडल के एक सूक्त का उल्लेख करते हुए डॉ. रामविलास शर्मा लिखते हैं, ‘‘अपने हाथों और पदों से द्यावा भूमि को एक साथ ही निर्माण करता हुआ सम्यक् रीति से चलता है। (बाहुभ्यांपतत्रै: द्यावाभूमिसंजनयन्संधमति) धमति क्रिया में धौकने का भाव स्पष्ट रूप में विद्यमान है। जलाना, धौकना और निर्माण करना— ये सृजनशीलता और निर्माणधर्मिता के विभिन्न चरण हैं। हमारे समाज में श्रम कौशल व सृजनधर्मिता की इसी महत्ता के कारण शिल्पकला, वाणिज्य और गो-पालन की संस्कृति का समुन्नत रूप में विकास संभव हो सका। सहभावी व समावेशी कार्य संस्कृति की आधारशिला का निर्माण उसी वैदिक काल में हुआ था, जिसका प्रवर्तन आज तक चलता रहा है। आज की अनेक आर्थिक व्यवस्थाओं, अर्वाचीन अर्थ मान्यताओं पर प्राचीन वैदिक कालीन श्रम संस्कृति का प्रभाव परिलक्षित होता है। वैयक्तिक उद्योग शीलता तथा कौशल आधारित कार्य संस्कृति का विकास वैदिक काल में हुआ था। आज की आर्थिक विषमता इस बात की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करती है कि हम कार्य करने की सहकारिता व सहभाविता का विकास आज तक बनाए रखने में विफल रहे हैं। हमने अपनी इन समस्याओं के समाधान अपने अतीत में खोजने की बजाय पश्चिम में खोजने का प्रयत्न किया, फलत: हम और विषमताओं में घिरते चले गए। डॉ. शर्मा ने पश्चिमी ज्ञान परंपरा का अध्ययन कर उसकी भारतीय प्रासंगिकता को प्रश्नांकित किया।

आज के समय में मार्क्सवाद, हीगलवाद, आधुनिकतावाद, भौतिकवाद, पदार्थवाद जैसी यूरोपीय परिभाषाएं भारतीय परिप्रेक्ष्य में बुरी तरह विफल साबित हुई हैं। डॉ. शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘इतिहास दर्शन’ में इन परिभाषाओं और ज्ञान पद्घतियों की सम्यक् आलोचना करते हुए भारतीय ज्ञान-चिंतन को भारतीय परिप्रेक्ष्य में अधिक प्रासंगिक और उपादेय बताया है। ‘मार्क्स और पिछड़े हुए समाज’ पुस्तक में पूंजीवाद के उद्भव के विषय में मार्क्स की अवधारणाओं का उन्होंने जोरदार तर्कों के साथ खंडन करते हुए भारतीय परिप्रेक्ष्य में उसे अनुपादेय बताया है। आजादी के बाद से भारतीय अकादमिक संस्थानों में एकांकी ज्ञान परोसने की जो परंपरा रही, उसके विरोध में उनका लेखन बहुत महत्वपूर्ण है। मार्क्सवाद का अध्ययन करने के बावजूद उन्होंने कभी कार्ल मार्क्स का अंध समर्थन नहीं किया। उन्होंने भारतीय संस्कृति और भारतीय जीवन मूल्यों की लगातार प्रशंसा की। मार्क्स की वैश्विक अप्रासंगिकता को उन्होंने सदैव रेखांकित किया। इस कारण वे भारतीय वामपंथियों की आंख की किरकिरी बन गए। जातिपंथी कम्युनिस्टों ने उन्हें इतिहासकार और साधक, हिन्दूवादी, प्रतिक्रियावादी, सांप्रदायिक लेखक तथा न जाने क्या-क्या कहा, लेकिन वह अविचल भाव से अपना कार्य करते रहे।

डॉ. शर्मा के अनुसार, भारत में श्रमिकों के कोई वर्ग नहीं रहे, क्योंकि यहां श्रम एक प्रकार का जीवन संस्कार है। व्यक्ति के जीवन में श्रम का अत्यंत गौरवपूर्ण स्थान है। भारतीय समाज में कभी भी कोई श्रम कार्य हीनता की विषयवस्तु नहीं माना गया।  अत: उन्होंने ऋग्वेद से उदाहरण देकर अत्यंत महत्वपूर्ण स्थापना दी कि ऋग्वैदिक समाजों में शारीरिक श्रम और मानसिक श्रम में कोई भेद नहीं है। अर्थात् जो मंत्र दृष्टा ऋषि है, वही शिल्पकार और कारीगर भी है। स्वकर्म करते हुए उसे कभी ग्लानि नहीं होती।  वह लगातार अपना काम करते हुए ज्ञान की आराधना करता है इसीलिए ऋग्वेद में कृषिकार्य, वृष्टि, बीजवपन, कर्षण आदि से जुड़े सैकड़ों शब्दों के प्रयोग मिलते हैं। उन्होंने इन सभी वैदिक उदाहरणों से यह सिद्ध करने का प्रयल किया है कि हमारे समाज में व्यक्ति जीवन सत्य के प्रति कभी उपेक्षणीय भाव नहीं रखता। वह वस्तु सत्य को स्वीकार करते हुए इसी लोक में परिश्रम द्वारा आत्म कल्याण की कामना किया करता था। अपने श्रम कौशल व कला मूल्यों के प्रचार-प्रसार के लिए वह समुद्र का भी उल्लंघन करता था- संनिष्यव: संचरणेसमुद्रन:।

ऋग्वेद में उत्पादन और विनिमय के ढेरों नियमों का उल्लेख मिलता है। भूमि के विनिमय हेतु भूमि अथवा गौ प्रदान करने का नियम मिलता है। वाणिज्य कर्म की इस सशक्त व्यवस्था के कारण ही हम ऋग्वेदकालीन समाज को अत्यंत संपन्न समाज कह सकते हैं। तब कतिपय पड़ोसी देशों से भी व्यापार होता था और विदेशों से वाणिज्य कर्म करते हुए सुवर्ण का विनिमय के लिए प्रयोग किया जाता था। समाज में आलसी लोगों की कठोर भर्त्सना की जाती थी। न ॠतेश्रान्तस्य सख्यायदेवा:अर्थात् परिश्रम न करने वाले लोगों की देवता भी सहायता नहीं करते हैं। वहीं, श्रम करने वाले लोग अर्थात् श्रमयुव:, अग्ने: चारू परमेपदेतिष्ठ: अग्निमंडल के परम पवित्र पद पर स्थित हो जाते हैं। इस प्रसंग में रामविलासजी की दूसरी सबसे महत्वपूर्ण स्थापना है कि उस काल में शारीरिक और मानसिक श्रम में कोई भेद नहीं था यानी श्रमिकों की लोक प्रतिष्ठा विद्यमान थी। व्यक्ति श्रम करते हुए आत्म गौरव का बोध प्राप्त करता था। अपने श्रमजन्य अनुभवों को शब्दबद्ध करके ऋचाओं का गान करता था। अत: वैदिक साहित्य जन जागरण और लोक सत्य के अधिक निकट है। समाज में कौशल के आधार पर कार्य विभाजन किया गया था, जिससे वास्तुशिल्प व विभिन्न रचनात्मक कलाओं का विकास संभव सका। फलत: भारत की अर्थव्यवस्था समुन्नत हो सकी और हमारा व्यापार संसार के कई देशों के साथ संभव हो हो सका। आज के समय में कार्यों के अनुसार व्यक्ति को उच्च या निम्न समझने की पश्चिमी प्रवृत्ति समाज में घर कर गई है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने प्राचीन आर्थिक तंत्र से शिक्षा ग्रहण करें और प्राचीन भारतीय श्रम व्यवस्था द्वारा आर्थिक उन्नति का प्रयास करें। रामविलासजी का उत्तरकालिक सामाजिक-सांस्कृतिक चिंतन इसमें हमारी मदद करता है। वैश्वीकरण की इस भयानक आपाधापी, अंध भौतिकवादी दौर में मशीनी जीवनशैली के बीच उनके द्वारा प्रतिपादित वैदिक जीवन दर्शन हमें नई दिशा दृष्टि दे सकता है।

भारतीय चिंतनधर्मिता की यह विशेषता रही है कि इसने कभी भी अपनी प्रासंगिकता नहीं खोई। अतीत में भी अनेकानेक महापुरुषों ने इसी के अंतर्गत अपनी स्थापनाओं की व्याख्या प्रस्तुत की है। आचार्य शंकर से लेकर राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, दयानंद सरस्वती और बाल गंगाधर तिलक ने अपने समस्त विचार-चिंतन की शिक्षा अतीतकाल की ज्ञान परंपरा से ही प्राप्त की है। अंग्रेजी ज्ञान-विज्ञान के प्रचार-प्रसार दौर में जब हमें अपने विभिन्न जीवन मूल्यों का पुनरान्वेषण और पाश्चात्य आधुनिकता के समानांतर अपने जीवन दर्शन की स्थापना करनी थी तो उस समय के समाज सुधारकों ने भी विचार की प्राचीन परंपरा से ही शिक्षा ग्रहण की। 20वीं शताब्दी में विशेषकर स्वातंत्र्योत्तर भारत में जब सत्ता संरक्षित अकादमिक घरानों में मार्क्स के विचारों को जबरन देश पर थोपने का षड्यंत्र चल रहा था, तब केवल रामविलास शर्मा ही थे जिन्होंने इस अन्यायपूर्ण वैचारिक षड्यंत्र का विरोध किया। उन्होंने वेदांत का गहन अध्ययन करके वामपंथियों को अपने अकाट्य तर्कों से निरुत्तर किया तथा भारतीय चेतना की पूरी परंपरा को आधुनिक कसौटी पर कस कर सबके सामने प्रस्तुत किया। उनके कार्यों की सूची बहुत लंबी है। उनके समान विराट मनीषा को कोई स्थापित या विस्थापित नहीं कर सकता। हम उनके द्वारा लिखे गये को पढ़कर और अधिक से अधिक लोगों तक संप्रेषित करके उनका स्मरण कर सकते हैं। मार्क्सवादी षड्यंत्रों के शत घूर्णावतर्तों के बीच केवल रामविलासजी ही हैं, जिनके विषय में निरालाजी की पंक्तियां सटीक बैठती हैं-
तोड़ता बन्ध प्रतिसन्ध धराहोस्फीतवक्ष।
दिग्विजय अर्थप्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष॥
संदर्भ ग्रंथ-
भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश, डॉ़ रामविलास शर्मा
भारतीय साहित्य की भूमिका, डॉ़ रामविलास शर्मा
इतिहास दर्शन, ड़ॉ. रामविलास शर्मा
पश्चिमी एशिया और ऋग्वेद, डॉ़ रामविलास शर्मा
सत्यार्थ प्रकाश, स्वामी दयानंद सरस्वती