पाकिस्तान डायरी : मानवाधिकार ठेंगे पर

    दिनांक 13-अक्तूबर-2020   
Total Views |

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा तो दूर, उनके मानवाधिकार तक सुरक्षित नहीं हैं। हाल ही में मानवाधिकार आयोग ने देश में अल्पसंख्यक महिलाओं की स्थिति पर 25 पन्नों की रिपोर्ट जारी की थी, लेकिन इमरान खान सरकार पर कोई असर नहीं हुआ। प्रस्तुत है पाकिस्तान में अल्पसंख्यक महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों की तीसरी कड़ी

p40_1  H x W: 0

हिंदू लड़कियों के अपहरण और जबरन कन्वर्जन की बढ़ती घटनाओं के विरुद्ध बड़ी संख्या में हिंदू समुदाय के लोगों ने प्रदर्शन किया (फाइल चित्र)

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक व उनके मानवाधिकार बिल्कुल सुरक्षित नहीं हैं? प्रधानमंत्री इमरान खान अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के चाहे जितने दावे करें, पर वास्तविकता इसके विपरीत है। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग ने हाल ही में ‘अ मीनिंगफुल डेमाके्रसी’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की थी, जो देश में अल्पसंख्यकों की बदहाली को बयान करती है।

25 पन्नों की यह रिपोर्ट खासतौर से पाकिस्तान की अल्पसंख्यक महिलाओं के मानवाधिकार पर तैयार की गई है। रिपोर्ट तैयार करने से पहले आयोग ने बीते वर्ष 26 अप्रैल से 19 नवंबर तक लाहौर, इस्लामाबाद, क्वेटा, हैदराबाद, कराची एवं मुलतान में मानवाधिकार से जुड़े विभिन्न विषयों पर संगोष्ठियां आयोजित की थीं, जिसमें चौंकाने वाली बातें सामने आई थीं। इस रिपोर्ट को तैयार करने के पीछे आयोग का उद्देश्य प्रधानमंत्री इमरान खान को समस्या से रू-ब-रू कराना एवं नए पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को संविधान के अनुसार सुरक्षा एवं सुविधाएं दिलाना था। यह अलग बात है कि रिपोर्ट के प्रकाशन के बाद भी पाकिस्तान में कुछ नहीं बदला। इमरान खान की कार्यशैली और नीति पूर्ववर्ती सरकारों जैसी है। कौमी असेंबली में अल्पसंख्यक लड़कियों का अपहरण कर जबरन कन्वर्जन एवं निकाह रोकने के लिए विधेयक लाया गया था, जिस पर कोई अमल नहीं हो रहा। मौजूदा सरकार अल्पसंख्यकों के अधिकारों एवं सुरक्षा का ढिंढोरा तो पीटती है, पर करती कुछ नहीं। किसी मुद्दे पर बाहरी-भीतरी दबाव पड़ने पर सरकार कुछ समय के लिए सक्रिय होती है, फिर पुराने ढर्रे पर आ जाती है।

आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, देश के विभिन्न प्रांतों में अल्पसंख्यक महिलाओं को अलग-अलग तरह से प्रताड़ित किया जाता है। सिंध में यदि नाबालिग हिंदू लड़कियां अपहरण, कन्वर्जन व जबरन निकाह का सामना कर रही हैं तो खैबर-पख्तूनख्वा, गिलगित-बाल्टिस्तान, बलूचिस्तान, दक्षिण पंजाब एवं केंद्र शासित जनजातीय क्षेत्र फाटा के अल्पसंख्यकों व उनकी महिलाओं को दूसरी तरह से प्रताड़ित किया जाता है। दरअसल, पाकिस्तान में कबीलाई रीति-रिवाज, रूढ़िवादिता, कट्टरता और पिछड़ेपन के चलते अल्पसंख्यक महिलाओं का जीवन नरक से कम नहीं है। दक्षिण पंजाब में उन्हें ‘वट्टा-सट्टा’, ‘करो-करी’ और ‘वानी’ जैसी दकियानूसी परंपराओं की आड़ में मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। उन्हें ‘एक्सचेंज रेप’ यानी बलात्कार के बदले बलात्कार जैसी यातना झेलनी पड़ती हैं। रिपोर्ट में 14वें पृष्ठ पर जिक्र किया गया है कि दक्षिण पंजाब में ‘आॅनर किलिंग’ और बहु-विवाह प्रथा की जड़ें अधिक गहरी हैं। ‘वट्टा-सट्टा’ प्रथा के तहत यदि एक कबीले का व्यक्ति विरोधी कबीले की लड़की से निकाह करता है तो बदले में वह परिवार की किसी महिला या बच्ची को उस लड़की के परिजनों को भेंट करता है। इसी तरह कोई लड़की या महिला विरोधी कबीले के पुरुष से प्रेम विवाह करती है तो ‘वानी प्रथा’ के तहत लड़की के परिवार वाले लड़के के परिवार से किसी लड़की को उठा लाते हैं। फिर उसके साथ बलात शारीरिक संबंध बनाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण पंजाब में 2018 में इज्जत के नाम पर 1,000 से अधिक वारदातें हुर्इं। बीते एक साल में करीब 1,000 नाबालिग हिंदू लड़कियों को अगवा कर जबरन कन्वर्जन और निकाह कराया गया। सिंध प्रांत में तो अल्पसंख्यक महिलाओं को बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। सिंध के बदिन, मीठी एवं उमरकोट में भीषण जल संकट है। कहीं थोड़ा-बहुत पानी है भी तो उसमें फ्लोराइड की मात्रा अधिक है जिससे उन्हें हड्डी रोग हो रहे हैं। सिंध के अधिकांश क्षेत्र में हर वर्ष सूखा पड़ता है, इसलिए क्षेत्र की हिंदू महिलाएं व बच्चियां घरेलू काम व पढ़ाई छोड़कर दिनभर पानी की तलाश में भटकती हैं।

फाटा, खैबर पखतूनख्वा एवं गिलगित-बाल्टिस्तान की अल्पसंख्यक महिलाओं की समस्या कुछ अलग है। इस क्षेत्र में 15 लाख अफगानी विस्थापित रहते हैं। उन्हें सरकार ने मान्यता दी हुई है। इन इलाकों में सैन्य गतिविधियां अधिक होने के कारण विस्थापितों को शक की निगाह से देखा जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, इन विस्थापित परिवारों की महिलाओं एवं बच्चियों के प्रति सेना का रवैया ठीक नहीं है। उन्हें सामान्य पाकिस्तानियों की तरह सारे अधिकार नहीं दिए गए हैं। पूर्वी खैबर पख्तूनख्वा में मानवाधिकार का खुला उल्लंघन हो रहा है। 2008 में वहां से 53 लाख लोगों को इलाका छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। अभी स्थिति ऐसी है कि आम नागरिक, मानवाधिकार कार्यकर्ता या कोई मीडिया कर्मी भी वहां नहीं जा सकता। सीमावर्ती क्षेत्र गिलगित-बाल्टिस्तान में स्थिति ज्यादा खराब है। यहां अधिकांश ‘लैंडमाइन’ बिछे हैं और आए दिन कोई न कोई इसकी चपेट में आता है। वहीं, बलूचिस्तान में शिया व ईसाई प्रताड़ना के शिकार हैं। इस इलाके में सुन्नी-शिया हिंसा की आड़ में खासतौर से अल्पसंख्यक महिलाओं को निशाना बनाया जाता है। उन्हें ईशनिंदा के नाम पर यातनाएं दी जाती हैं और देश छोड़ने के लिए मजबूर किया जाता है। ऐसे मामलों में पुलिस और निचली अदालतें भी पीड़ितों का साथ नहीं देतीं। बलूचिस्तान में विदेशी धन से बड़ी संख्या में मदरसे स्थापित किए गए हैं। इसलिए क्षेत्र में कट्टरता चरम पर है और आतंकी संगठन में क्षेत्र में सक्रिय हैं। अल्पसंख्यकों के बच्चों को मदरसे में पढ़ने के लिए विवश किया जाता है। देश में अल्पसंख्यकों के लिए नौकरी व शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की सुविधा है, पर बलूचिस्तान में इसका खुला उल्लंघन हो रहा है।

सिंध हिंदू बहुल है, फिर भी वे प्रताड़ित हैं। यहां इस्लामी कायदे और संविधान का प्रयोग हिंदुओं को प्रताड़ित करने के लिए किया जाता है। हिंदू बच्चियों से बलात्कार, जबरन निकाह और कन्वर्जन तो आम है। ऐसे मामलों की प्राथमिकी दर्ज करने में भी आना-कानी की जाती है। अगर प्राथमिकी दर्ज भी हो गई तो दबाव डाल कर मामले को रफा-दफा करा दिया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, सिंध में हर साल औसतन 1,000 गैर-मुस्लिम लड़कियों के अपहरण, बलात्कार और कन्वर्जन के मामले दर्ज होते हैं। हर माह ऐसी 20-25 घटनाएं रिकॉर्ड में आती हैं। ज्यादातर मामलों में 16 वर्ष की बच्चियां शिकार बनती हैं। सिंध में हिंदू विवाह अधिनियम-2017 के तहत 18 वर्ष से कम उम्र में शादी प्रतिबंधित है, फिर भी घटनाओं में कमी नहीं आई है। बीते साल होली के दिन दो हिंदू बच्चियों को अगवा कर जबरन निकाह और कन्वर्जन किया गया। कोरोना काल मेंं भी ऐसे करीब 100 मामले सामने आए हैं। इससे परेशान होकर सिंध प्रांत के लोगों को सोशल मीडिया पर हैशटैग अभियान चलाना पड़ा।

 पाकिस्तान दंड संहिता की धारा 498बी, गार्जियन वार्ड एक्ट, बाल विवाह कानून और कुरान मजीद में कन्वर्जन व शादी की व्याख्या से उत्पन्न भ्रम के चलते भी सरकार ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाने में नाकाम है। इसके अलावा, सरकार कराची में बड़ी संख्या में बसे अफगानियों, बंगालियों, बिहारियों, बर्मीज, कश्मीरियों और ईरानियों के मानवाधिकारों की सुरक्षा में भी असफल रही है। कराची प्रेस क्लब के पास जोगी समुदाय के लोग बड़ी संख्या में पिछले कई वर्षों से फुटपाथ पर रह रहे हैं। उनके बच्चों को बुनियादी सुविधाएं तक नसीब नहीं हैं।
    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)