जातीय अस्मिता और संस्कृति के प्रश्न

    दिनांक 13-अक्तूबर-2020
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  डॉ. राधेश्याम सिंह
डॉ. रामविलास शर्मा के चिंतन का उद्देश्य हिन्दी पट्टी में जातिवाद और संप्रदायवाद के विभाज्यवाादी  जहर को कम करना था। भाषा विज्ञान के सहारे उन्होंने यह साबित करने का प्रयास किया कि आर्य और द्रविड़ भारत से पश्चिम की ओर गए
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रामविलास जी ने यह कह कर आर्य-द्रविड़ विवाद को खत्म कर एकीकृत संस्कृति की विचारधारात्मक स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया कि आर्य पश्चिम से नहीं आए थे


डॉ. रामविलास हिन्दी के उन गिने-चुने आलोचकों में हैं, जिन्होंने आलोचना विधा को जनसंस्कृति के सृजन में हथियार की तरह इस्तेमाल किया। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने अपना सारा जीवन खपाया। उनकी स्थापनाओं से असहमत होने वालों की एक लंबी-चौड़ी सूची है, पर वे अपनी दृष्टि के प्रति अडिग और आश्वस्त रहे। प्रगतिशील आंदोलन से संगठनात्मक तौर पर सक्रिय रूप से जुड़े होने के बावजूद उन्होंने मार्क्सवाद को भारतीय संस्कृति की अनुरूपता में व्याख्यायित किया। उनकी इस दृष्टि का प्रगतिशील रूढ़ खेमे ने तीव्र विरोध किया और ‘महाबली का पतन’ जैसे फतवे उकेरे गये, पर वह चुपचाप अपना कार्य करते रहे। ऐसा नहीं था कि उन्हें जवाब देना नहीं आता था, पर वे इसे अपनी ऊर्जा का अपव्यय ही समझते थे। डॉ. रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी को दिया गया जवाब डॉ. शर्मा के पाठकों के जेहन में आज भी मौजूद है। उन्होंने सोच-समझकर हिन्दी पट्टी में आयोजित होने वाली तथाकथित वैचारिक गोष्ठियों से किनारा कर लिया था, ताकि अबाध लेखन कार्य संपन्न किया जा सके। उनका स्पष्ट मानना था कि लिखे गए शब्दों में ही व्यक्ति बच सकता है, अन्यथा शरीर तो नश्वर है ही।

डॉ. शर्मा की समग्र आलोचनात्मक कृतियां इस तथ्य की गवाही देती हैं कि केवल रचना ही संस्कृति को समृद्ध नहीं करती, आलोचना से भी यह कार्य भली तरह किया जा सकता है। परंपरा की रट लगाने वाले आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्यों ने परंपरा के प्रगतिशील तत्वों का सर्जनात्मक उपयोग उतना तो नहीं ही किया, जितना डॉ. शर्मा ने किया। इतिहास को देखने की पाश्चात्य दृष्टि उनका प्रेय कभी नहीं रही, वरन् उन्होंने इतिहास दर्शन की एक शुद्ध भारतीय दृष्टि विकसित की, जिसका भारी विरोध भी उन्हें झेलना पड़ा। उन्होंने औपनिवेशिक मानसिकता से पूरी हिन्दी पट्टी को उबारने के लिए जातीयता का फलसफा गढ़ा। इसका संबंध वर्ण व्यवस्था से संबद्ध जाति व्यवस्था से न होकर हिन्दी भाषा बोलने व हिन्दी भाषी क्षेत्र में बसने वाली जनता से है। इस तरह उन्होंने बेहद संवेदनशील, पर कारगर हथियार भाषा को अपना मोर्चा बनाया। हिन्दी जाति के फलसफे को परंपरा से जोड़ते हुए उन्होंने रवीन्द्रनाथ ठाकुर, भारतेंदु हरिश्चंद्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन, निराला का संदर्भ देते हुए बताया कि इस जातीयता की बात न तो नई है और न ही उन्होंने प्रस्तावित किया है। राष्ट्रवाद, राष्ट्रीयता व देशभक्ति का प्रश्न, इस देश का सर्वाधिक ज्वलंत प्रश्न रहा है। हजारों वर्ष की गुलामी से जूझते हुए भारत ने हर स्तर पर विभाजन को अपनी नियति के रूप में स्वीकार कर लिया था। डॉ. शर्मा इस सूत्र की तलाश करते हैं कि कैसे और किन तत्वों के सहारे जनता को एक सूत्र में पिरोया जाए। उन्हें भाषा सर्वाधिक कारगर हथियार के रूप में दिखी। एक विभाजित समुदाय खंडित अस्मिता के सहारे जीवन के ज्वलंत प्रश्नों का समाधान नहीं पा सकता। इसलिए सर्वाधिक जरूरी तत्व है कि ऐसे एकीकृत व एकजुट होने वाले तत्वों की पहचान हो, जिसे जनता आसानी से अपनी स्वीकृति दे सके। भाषा से जनता की संवेदना जुड़ी होती है, इसलिए इस सिद्धांत को जनता की आसानी से स्वीकृति मिल सकती है, यह उनका विश्वास था।

किसी भी राष्ट की संस्कृति के निर्माण में हजारों साल लगते हैं। संस्कृति के विकासमान होने के साथ विकृति की भी समानांतरता जारी रहती है। उस संस्कृति के प्रगतिशील तत्व, विकृतियों को समाप्त करते रहते हैं। इस तरह संस्कृति परिशोधित व परिवर्द्धित होती रहती है। डॉ. शर्मा के चिंतन का केंद्र यही रहा कि वे कैसे हिन्दीभाषी क्षेत्र के भीतर के जातिवाद व संप्रदायवाद के विभाज्यवादी दंश का जहर कम करें। उन्हें इसकी चिंता सालती है कि बंगाली, उड़िया, तमिल, तेलुगु आदि भाषा-भाषियों के भीतर जातीयता की अवधारणा जितनी प्रबल है, वह हिन्दी जाति के भीतर सृजित नहीं हो सकी है। जनता राजनैतिक तौर पर बुरी तरह बंटी हुई है। इस विभाजन का ही परिणाम है कि इस क्षेत्र के लोग जातिवाद-संप्रदायवाद जैसी विकृतियां झेलने को अभिशप्त हैं। यदि हिन्दी जाति अन्य भाषा-भाषियों की तरह अविभाज्य मानसिकता के साथ चिंतन और कर्म करे तो राष्टÑवाद, संप्रदायवाद और जातिवाद जैसे प्रश्नों का आसानी से समाधान हो सकता है। डॉ. शर्मा के इस समीकरण का उर्दू के पक्षधर कुछ लोगों ने विरोध भी किया कि यह नए तरह का भाषायी साम्राज्यवाद कायम करने की कोशिश है। सत्य यह है कि डॉ. शर्मा ने उर्दू या किसी जनपदीय बोली के अस्तित्व को नकारा नहीं। वे उन भाषाओं के साथ सामंजस्य स्थापित करके भारतीय राष्टÑवाद की भावना को बलवान बनाना चाहते थे।

डॉ. रामविलास शर्मा का समूचा लेखन साम्राज्यवादी ताकतों के उपनिवेशवाद से उत्पन्न उस हीन भावना को समूल समाप्त करने का प्रयास है जो भारतीयों में तमाम कुतर्कों से भरा गया था। उपनिवेशवाद को सुरक्षित और संरक्षित करने के प्रयास में अंग्रेज विद्वानों ने यह प्रचारित किया कि उनके आने से पहले भारत में इतिहास लेखन जैसी कोई परंपरा थी ही नहीं। डॉ. शर्मा ने इसका जोरदार खंडन किया और कहा, ‘‘अंगे्रजी राज ने यहां की शिक्षण व्यवस्था को मिटाया। हिंदुस्तानियों से एक रुपया ऐंठा और उसमें से छद्म शिक्षा पर खर्च किया। इस पर भी अनेक इतिहासकार अंग्रेजों पर बलि-बलि जाते हैं।’’ उन्होंने एकीकृत रूप में कोई इतिहास ग्रंथ तो नहीं लिखा, परंतु उनकी इतिहास दृष्टि प्राच्यवादी रही है। इतिहास लेखन के मूल स्रोतों की तलाश में वे वेदों-पुराणों तक जाकर अपने इतिहास, साहित्य व संस्कृति की जड़ों को तलाशते रहे। वे ग्रंथों व उनमें निहित विश्वासों की जांच भी अपने उस पैमाने पर करते रहे जो उनके समकालीन वामपंथियों के लिए वैचारिक तौर पर अछूत की श्रेणी में रखकर छोड़ दी गई थी।

अंग्रेज उपनिवेशवादी विचारकों ने हिंदुस्तानी जनता को हीन भावना से ग्रस्त करने के लिए एक और शिगूफा छोड़ा कि आर्य बाहर से आकर यहां बसे और इसमें तमाम विद्वान, इतिहासकार उलझकर रह गए। जिसे सिरे से खारिज किया जाना था, उस पर देशव्यापी बहस हुई और लोगों ने पक्ष-विपक्ष में अपने तर्क प्रस्तुत किए। आज भी ‘मूल निवासी’ का शिगूफा छेड़कर उत्तर-दक्षिण, सवर्ण-अवर्ण को बांटने की कोशिश चली आ रही है। डॉ. शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश’ भाग-2 में लिखा है- ‘‘दूसरी सहस्राब्दी ई.पू. में जब बहुत से भारतीय जन पश्चिमी एशिया में फैल गए, तब ऐसा लगता है उनमें द्रविड़ भी थे। इस कारण ग्रीक आदि यूरोप की भाषाओं में द्रविड़ भाषा तत्व मिलते हैं।’’ यहां भी उन्होंने भाषा विज्ञान के सहारे यह सिद्ध करने की कोशिश की कि आर्य और द्रविड़ भारत से पश्चिम की ओर फैले न कि आर्य यहां आए। इस तरह के तर्क से उन्होंने आर्य-द्रविड़ विवाद को खत्म कर एकीकृत संस्कृति की विचारधारात्मक स्थापना में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने इतिहास को नए सिरे से पूर्वाग्रह मुक्त होकर लिखने की वकालत की। उनका मानना था कि इतिहास लेखन इस आलोक में होना चाहिए कि अंग्रेजी राज का सही चेहरा भारतीयों के समक्ष उपस्थित हो। उनका लुटेरापन तो सामने आए ही, भारत की सांस्कृतिक उपलब्धि को उकेरना भी जरूरी है ताकि नए व आधुनिक भारत का निर्माण हो सके। उन्होंने इतिहास से भी अधिक अपने देश की संस्कृति व परंपरा पर जोर दिया है। उनका मानना है कि कोई भी समाज अपनी परंपरा से कटकर आधुनिक नहीं हो सकता। परंपरा में नए समाज को गढ़ने व उसे नई दिशा देने की ताकत है। भूत के भूतत्व का अहसास तभी हो सकता है, जब परंपरा का अवगाहन कर उसमें से अपने समय के अनुरूप प्रासंगिक तत्वों को निकालकर समाज के समक्ष रखा जाए। इसलिए परंपरा, प्रगति के लिए आवश्यक उपदान है। इस क्रम में वह देश के प्राचीन साहित्य व शास्त्र तक की वैचारिक यात्रा करते हैं।

हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर डॉ. शर्मा अपनी कृतियों में ‘कंपोजिट कल्चर’ के नियामक तत्वों को बार-बार सामने लाने की कोशिश करते हैं। साथ ही, उनकी विसंगतियों पर भी प्रहार किया है। लार्ड मेयो की हत्या पर भारतेंदु हरिश्चंद्र ने एक लेख में लिखा था, ‘‘श्रीमान लार्ड मेयो के मरने का शोक जैसा विद्वानों की मंडली में हुआ, वैसा जनसाधारण में नहीं हुआ। ़नि:संदेह किसी समय में हिन्दुस्तान के लोग ऐसे राजभक्त थे कि राजा को ईश्वर की भांति मानते व पूजते थे, परन्तु मुसलमानों के अत्याचार से यह राजभक्ति हिन्दुओं से निकल गई। राजभक्ति क्या, इन दुष्टों के पीछे सभी कुछ निकल गया; विद्या को ही वैसा आदर न रहा।’’ इस पूरे पैराग्राफ को उन्होंने अपनी पुस्तक ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिन्दी नवजागरण की समस्याएं’ के पृष्ठ-79 पर उद्धृत किया है। विश्लेषण के क्रम में वे बताते हैं कि उस समय भी मुसलमानों में राजभक्त विद्वानों व वफादार रईसों की कमी न थी। हिन्दू-मुस्लिम का भेदभाव इन्हीं की देन थी। सर्वसाधारण, राजनीति और धर्म के विद्वेषों से अलग सहज जीवन जी रहा था। ध्यान से देखा जाए तो राजतंत्र की राजभक्ति और जनतंत्र का राष्टÑवाद एक ही प्रकृति की संवेदनाएं हैं। आज भी जिस समुदाय को राष्टÑवाद के मुद्दे पर प्रश्नांकित किया जाता है, उसके जिम्मेदार वही विद्वान व रईस हैं जो रह-रहकर हिंदू-मुस्लिम विद्वेष की भट्ठी में अपने निहित स्वार्थों के चलते कुटिलता की समिधा झोंकते रहते हैं। इस प्रवृत्ति को भारतेंदु हरिश्चंद्र ने बहुत पहले लक्ष्य किया था और लक्षित की तरफ डॉ. शर्मा ने इशारा कर ऐसे विद्वानों को तथाकथित रईसों से बचने का परामर्श भी दिया है।

डॉ. शर्मा ने जिस हिन्दी जातीयता का प्रस्ताव किया था, उस पर तमाम विरोध भी हुए और उसे अप्रासंगिक, अव्यावहारिक आदि भी कहा गया। इन सभी मुद्दों पर जवाब देते हुए उन्होंने अपनी पुस्तक ‘परंपरा का मूल्यांकन’ के पृष्ठ 28 पर लिखा है, ‘‘हिन्दी जाति की संस्कृति, भारतीय संस्कृति का ही एक अंग है व उसके संदर्भ में ही उसका विकास और महत्व समझा जा सकता है। जब वेदमंत्र रचे गए, तब उस युग के आस-पास सिंधु घाटी की महान सभ्यता विकसित हुई थी। संस्कृत के विशाल वाड्मय के इस छोर पर तक्षशिला में पाणिनि हैं और दूसरे छोर पर केरल में शंकराचार्य हैं। आधुनिक भाषाओं के लगभग चौथी शताब्दी से अब तक तमिल साहित्य की अटूट गौरवशाली परंपरा है। जातीय चेतना का प्रसार महाराष्ट में संतों के द्वारा हुआ और समर्थ गुरु रामदास ने समस्त मराठीभाषियों से एक झंडे के नीचे संगठित होने को कहा। जनसाधारण को अपना आधार बनाकर शिवाजी ने भारतीय युद्ध कौशल में क्रांतिकारी परिवर्तन किया और संसार में सबसे पहले छापामार लड़ाई का विकास किया और महाराष्टÑ में मराठीभाषी जनता की जातीय राजसत्ता स्थापित की। रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद और रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बंगाल के भारतीय नवजागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। खजुराहो के मंदिरों के साथ एलोरा और अजंता की शिल्पचित्र स्थापत्य कलाएं स्मरणीय हैं।’’ इससे डॉ. शर्मा के एकीकृत सांस्कृतिक बोध के साथ यह भी पता चलता है कि उन्हें अपनी परंपरा से कितना लगाव है, जिसके आधार पर वह नए आधुनिक भारत की सोच विकसित करना चाहते हैं।
(लेखक के.एन.आई.पी.एस.एस.,  सुलतानपुर (उ.प्र.) के प्राचार्य हैं)