पुण्यतिथि (13 अक्तूबर) पर विशेष :भारत को निवेदित भगिनी!

    दिनांक 13-अक्तूबर-2020
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पूनम नेगी

भगिनी निवेदिता। जन्मना विदेशी होते हुए भी अपनी बौद्धिक तेजस्विता के बल पर उन्होंने न केवल भारत में स्त्री शिक्षा की दिशा में महती भूमिका निभायी, अपितु भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन और राष्ट्रीय पुनर्जागरण की विचारधारा को आगे बढ़ाया। विदेशी दासता की बेड़ियों में जकड़ी भारत भूमि के पुनरुद्धार के स्वामी विवेकानंद के स्वप्न को पूरा करने वाले सहयोगियों में निवेदिता की गणना प्रमुखता से होती है

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जिस प्रकार स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रसारित वेदान्त दर्शन ने सम्पूर्ण विश्व में भारतवर्ष को एक उदारमना सनातन राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठा दिलायी; उसी प्रकार उस सार्वजनीन वेदान्त धर्म व दर्शन के उत्स को अपने जीवन में चरितार्थ कर भगिनी निवेदिता ने भारत की शीर्ष आध्यात्मिक विभूतियों में अपना स्थान सुनिश्चित किया। विदेशी दासता की बेड़ियों में जकड़ी भारतभूमि के पुनरुद्धार के स्वामी के स्वप्न को पूरा करने वाले सहयोगियों में भगिनी निवेदिता की गणना प्रमुखता से होती है। जन्मना विदेशी होते हुए भी अपनी बौद्धिक तेजस्विता व अद्भुत वाग्मिता के बल पर इस विदुषी महिला ने न केवल भारत में स्त्री शिक्षा की दिशा में महती भूमिका निभायी अपितु इन्हें भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन और राष्ट्रीय पुनर्जागरण व राष्ट्रीय स्वाधीनता की नयी विचारधारा; जो 1947 में भारत की स्वतंत्रता में फलीभूत हुई, को बढ़ावा देने वाले प्रखर वक्ताओं में से एक माना जाता है।

भगिनी निवेदिता जिनका मूल नाम मार्गरेट एलिजाबेथ नोबेल था, का जन्म 28 अक्टूबर, 1867 को आयरलैंड के डंगनॉन टायरान में हुआ था। उनके पिता का नाम सैमुअल रिचमंड नोबेल और माता का नाम मैरी इसाबेल था। चूंकि उनके पिता सेमुअल रिचमंड नोबल एक पादरी थे, अत: बालिका मार्गरेट पर अपने पिता की पांथिक आस्थाओं  एवं संस्कारों का विशेष प्रभाव पड़ा। उन्होंने लन्दन के चर्च बोर्डिंग स्कूल से अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी कर आगे की पढ़ाई वहां के हैलिफैक्स कॉलेज से की। प्रखर मेधा व करुणाशील ह्रदय वाली यह किशोरी महज 17 साल की उम्र से ही निर्धन व असहाय बच्चों को शिक्षित करने के पुनीत कार्य में जुट गयी थी। कुछ समय बाद उन्होंने एक स्कूल की स्थापना की जिसका मुख्य उद्देश्य गरीब बच्चों को सुशिक्षित व संस्कारित कर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ना था। वे एक प्रभावशाली वक्ता व लेखिका भी थीं और समाचार पत्र के लिए विचारोत्तेजक लेख लिखा करती थी। पंथ में रुचि होने के कारण वे चर्च की गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेती थीं तथा उनका अधिकांश समय अध्ययन, मनन एवं सत्य की खोज में व्यतीत होता था। किंतु ‘धर्म’ को शाश्वत सत्य की खोज का माध्यम मानने वाली उस नवयुवती के मन में अपने पांथिक ग्रंथों के गहन अध्ययन व विश्लेषण के दौरान के ईसाई मत के कुछ सिद्धांतों के प्रति संदेह पैदा होने लगा तथा अपने पांथिक  गुरुओं से उन जिज्ञासाओं का समाधान न पाकर वे मानसिक रूप से कुछ उद्विग्न व अशांत रहने लगीं। इसी बीच 1893 में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन के उपरांत स्वामी विवेकानन्द से उनकी प्रथम भेंट 1895  में उनकी इंग्लैण्ड यात्रा के दौरान अपनी एक मित्र लेडी ईजाबेल के निवास पर हुई। स्वामी जी वहां उपस्थित जन समूह को ‘वेदांत दर्शन’ समझा रहे थे। धार्मिक प्रवृत्ति की मार्गरेट नोबेल ने उस हिंदू योगी को पहली बार सुना और पहली बार में ही उनके व्यक्तित्व व विद्वता से अत्यंत प्रभावित हुर्इं। उसके बाद वे नियमित रूप से उनके व्याख्यानों में जाने लगीं। उन्होंने स्वामी विवेकानंद से ढेरों प्रश्न किये और अपनी प्रत्येक शंका का पूर्ण समाधान पाकर उन्होंने मन ही मन स्वामी जी को अपना गुरु मान लिया। स्वामी जी की प्रेरणा से उन्होंने बौद्ध साहित्य का विषद अध्ययन किया और विवेकानंद के सिद्धांतों से उसकी तुलना की। आध्यात्मिक उत्कर्ष की इस नयी दिशाधारा ने मार्गरेट नोबेल के जीवन को आमूल-चूल बदल डाला।

गौरतलब है कि मार्गरेट की आध्यात्मिक ज्ञान पिपासा, गहन विद्वता, नेतृत्व क्षमता और उनके अंतस की सेवा भावना आदि गुणों ने स्वामी विवेकानंद को गहरे प्रभावित किया और उन्होंने उनकी इन योग्यताओं का उपयोग भारतीय महिलाओं के शैक्षणिक उत्थान के लिए करने की योजना बनाई। इस बात की पुष्टि स्वामी जी का वह पत्र करता है, जो उन्होंने अपने गुरुभ्राता व अन्तरंग मित्र स्वामी अभेदानन्द को लिखा था। वे लिखते हैं, ‘‘काली (स्वामी अभेदानन्द का पूर्व नाम)! मार्गरेट के सेवा-कर्म में निष्ठा तथा आचार-व्यवहार से मैं मंत्रमुग्ध हूं। मैंने मन में ठान लिया है  कि भारतवर्ष में नारी-शिक्षा का स्तर उन्नत करने के लिए मिस मार्गरेट नोबेल जैसी महिला को उत्तरदायित्व सौंपना सर्वाधिक प्रयोजनीय है।’’ अभेदानन्द जी ने इस बात का अनुभव भी किया था कि मिस मार्गरेट के भीतर उन्नत शिक्षा-दीक्षा जनित, ज्ञानदीप्त प्रतिभा भरी हुई है एवं उनके व्यक्तित्व में जो शुद्ध भक्ति-भाव है, वह आत्मशक्ति के बल पर अटल है।


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 स्वामी विवेकानंद जी के साथ भगिनी निवेदिता

कलकत्ता में प्लेग जैसी भयंकर महामारी तथा1906 में आई भयंकर बाढ़ ने कहर ढाया तब भगिनी निवेदिता ने अपनी जान जोखिम में डालकर गांव-गांव की पैदल यात्रा कर पीड़ितों की  दिन-रात सेवा-सुश्रूषा के साथ-साथ उनके उपचार हेतु हर सम्भव प्रयास किया

 बताते चलें कि स्वामी विवेकानंद ने मार्गरेट नोबल नामक उस विदेशी युवती को अध्यात्म पथ पर दीक्षित करने के उपरांत नया नाम दिया- निवेदिता। निवेदिता अर्थात् ईश्वर को अर्पित। उस सत्यान्वेषी विदुषी ने भी अपने गुरु के आह्वान पर अपना समूचा जीवन सदा-सदा के लिए भारत भूमि के उत्थान को समर्पित कर दिया। वे जनवरी, 1898 में भारत आ गयीं और कलकत्ता के बेलूर मठ में रहने लगीं। यहां उन्होंने स्वामी जी से भारतवासियों की जीवनशैली, उनकी संस्कृति, परंपरा आदि के बारे में विस्तार से जाना-समझा था कि वे भारतीय महिलाओं में शिक्षा की अलख जगाने की गुरुइच्छा को मूर्त दे सकें। कलकत्ता में उन्होंने देखा कि इन स्त्रियों में, शालीनता, विनम्रता, लज्जाशीलता और स्वाभिमान जैसे सद्गुण तो खूब हैं किंतु अशिक्षा के कारण वे रूढ़ियों में  जकड़ी हैं। इन महिलाओं को शिक्षित करने के लिए उन्होंने भारतीय परम्परा के अनुसार वसंत पंचमी के शुभ दिन सरस्वती पूजन का आयोजन कर कलकत्ता के बागबाजार मुहल्ले में एक एक छोटे से विद्यालय का शुभारंभ किया। इस विद्यालय में वे लड़कियों को न केवल पढ़ाई-लिखाई बल्कि सिलाई, कढ़ाई, चित्रकला आदि में भी दक्ष बनाने की शिक्षा देती थीं। उनके  चुम्बकीय व्यक्तित्व व स्नेह में वह जादू था कि लोग अपनी कन्याओं को निवेदिता के पास पूरे विश्वास के साथ शिक्षित होने के लिए भेजने लगे। आज यह विद्यालय 'रामकृष्ण शारदा मिशन भगिनी निवेदिता बालिका विद्यालय' के नाम से जाना जाता है।

यहां यह जानना दिलचस्प है कि स्वामी जी ने अपने चिराकांक्षित नारी-शिक्षा के कार्य में भगिनी निवेदिता के इस प्रयास की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए अमेरिका में मिशन के कार्यों में संलग्न स्वामी अभेदानन्द जी को पत्र लिखा था-‘‘भाई काली! तुम्हें जान कर प्रसन्नता होगी कि श्री श्रीठाकुरानी माँ के आशीर्वाद से 21 न० बागबाजार में निवेदिता का विद्यालय स्थापित हो गया है। इस समारोह में बेलूर मठ से मेरे साथ राखाल (ब्रह्मानन्द) और शरत (शारदानन्द) भी उपस्थित थे। मैं दिव्य चक्षुओं से देख रहा हूं कि उनका यह प्रयास अवश्य सफल होगा।’’ भगिनी निवेदिता ने अपने शिक्षा के कार्य-क्षेत्र की परिधि को देखते-देखते इतना विस्तृत कर लिया था कि उन्होंने सम्पूर्ण बंगाल के हृदय को ही जीत लिया। उनका कार्य-क्षेत्र केवल रामकृष्ण-संघ तक ही सीमाबद्ध नहीं था अपितु समस्त भारतवर्ष को अपने घेरे में लपेटे हुए था। स्वामी अभेदानन्द जी का कहना था कि भगिनी निवेदिता को केन्द्र में रख कर बंगाल के नवजागरण ने अपने शिखर को छू लिया था एवं वे उस राष्ट्रीय आन्दोलन की केन्द्र बिन्दु बन चुकीं थीं। निवेदिता ने देशवासियों में राष्ट्रीयता की भावना को गहराई से जाग्रत किया। बागबाजार में उनका घर उस समय के प्रतिष्ठित भारतीयों जैसे रवींद्रनाथ टैगोर, जगदीश चंद्र बोस, गोपाल कृष्ण गोखले और अरविंद घोष के लिए विचार-विमर्श का स्थान बन गया था। उनके युवा प्रशंसकों में क्रांतिकारियों के साथ-साथ उभरते कलाकार और बुद्धिजीवी भी शामिल थे। उन्होंने रमेशचन्द्र दत्त और सर यदुनाथ सरकार को भारतीय नजरिए से इतिहास लिखने की प्रेरणा दी। उन्होंने गोखले से कहा था कि उनसे मिलना ‘प्रकृति की कुछ महान शक्ति के संपर्क में आने जैसा था।’ इसी तरह महान तमिल राष्ट्रवादी कवि सुब्रमण्य भारती, जिन्होंने केवल एक बार निवेदिता से मुलाकात की। उन्होंने अपने गुरु के रूप में माना। उन्होंने लिखा, ‘‘उन्होंने मुझे भारत माता की पूर्णता को दिखाया और मुझे अपने देश से प्यार करना सिखाया है।’’ निवेदिता ने न केवल स्वदेशी अभियान का समर्थन किया बल्कि उन्होंने लोगों को भी इसके प्रति जागरूक किया। यहां तक कि जब ब्रिटिश सरकार ने ‘वन्दे मातरम्’ के गायन पर रोक लगा दी, तब भी उन्होंने इसे अपने स्कूल में जारी रखा।

भगिनी निवेदिता, वह महिला थीं, जिन्होंने पहचाना कि भारत की सबसे बड़ी ताकत इसकी एकता में है और उन्होंने हमेशा इस दिशा में काम किया। 1905 में भारत के लिए प्रतीक और ध्वज की कल्पना व डिजाइन करने वाली वे पहली व्यक्ति थीं। इस ध्वज को 1906 में कलकत्ता में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा आयोजित एक प्रदर्शनी में प्रदर्शित भी किया गया था। जे.सी. बोस जैसे प्रतिष्ठित भारतीयों (जिन्होंने बाद में इसे कलकत्ता में अपने बोस संस्थान का प्रतीक बना दिया) ने इसका उपयोग शुरू किया और बाद में इसे भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान, परम वीर चक्र के डिजाइन में अपनाया गया। यही नहीं, भगिनी निवेदिता ने ही भारतीय कलाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए बंगाल स्कूल आॅफ आर्ट की स्थापना की थी।

भगिनी निवेदिता के व्यक्तित्व का एक अन्य आकर्षक गुण उनकी साहित्यिक अभिरुचि था। ‘मास्टर एज आई सॉ हिम’ जैसी श्रेष्ठतम कृति उनकी अद्भुत लेखकीय क्षमता को दर्शाती हंै। इसमें उन्होंने स्वामी विवेकानन्द के सम्बन्ध में अपने संस्मरण लिखे हैं। उनके अन्य ग्रन्थों में ‘ए पिलग्रिम्स डायरी’, ‘काली द मदर’, ‘केदारनाथ एण्ड बदरीनाथ’ हैं। इन ग्रन्थों के माध्यम से उन्होंने भारत तथा भारत दर्शन की महानता को पाश्चात्य देशों तक पहुंचाया। उन्होंने भारतीय इतिहास, भारतीय महिलाओं, शिक्षा, राष्ट्रवाद, कला और पौराणिक कथाओं के विषयों पर अपने छोटे से जीवनकाल में आधा दर्जन से अधिक किताबें व लेख भारत तथा ब्रिटिश प्रेस से भी प्रकाशित किये।

 परतंत्र भारत में 1899 में जब कलकत्ता में प्लेग जैसी भयंकर महामारी तथा 1906 में आर्इं भयंकर बाढ़ ने कहर ढाया तब भगिनी निवेदिता ने अपनी जान जोखिम में डालकर गांव-गांव की पैदल यात्रा कर पीड़ितों की जी-जान से सेवा की। भारतीय परिधान साड़ी को धारण कर उन्होंने बाढ़ से भरे हुए गांवों के कीचड़-पानी, गन्दगी की भी परवाह नहीं की। पीड़ितों की दिन-रात सेवा-सुश्रूषा के साथ-साथ उनके उपचार हेतु हर सम्भव प्रयास किया। दिन में 18 घण्टे कार्य करते हुए भी वे थकती नहीं थीं। हालांकि इसके बाद वे स्वयं मलेरिया की चपेट में आ गयीं, जिस वजह से उनकी हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती गयी और इसी बीमारी ने उनकी जान ले ली। 13 अक्टूबर, 1911 ई० में जब दार्जलिंग में उनका निधन हुआ तो सम्पूर्ण भारतवर्ष ही भगिनी-विहीन हो कर शोकग्रस्त हो गया था। उनका अन्तिम संस्कार हिन्दू शास्त्रीय विधि से किया गया था। दार्जिलिंग में निर्मित उनका स्मारक आज भी मां भारती के प्रति उनकी महान सेवाओं की याद दिलाता है। भारत को प्यार करते-करते वे स्वयं भारतमयी बन गयीं और भारत की बलिवेदी पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर अपने ‘निवेदिता’ नाम को सार्थक करदिखाया।