बिहार विधानसभा चुनाव : 2020: महागठबंधन की ढीली होती गांठ

    दिनांक 14-अक्तूबर-2020   
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संजीव कुमार एवं पाञ्चजन्य ब्यूरो

बिहार में विधानसभा चुनाव के लिए राजग (जदयू, भाजपा, हम और वीआईपी) के सामने महागठबंधन (राजद, कांग्रेस और वामपंथी दल) बन तो गया है, पर उसकी गांठ बहुत ढीली है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मुकाबले महागठबंधन में कोई दमदार चेहरा नहीं है। इसका फायदा जदयू और भाजपा गठबंधन को मिलता दिख रहा है
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6 अक्तूबर को पटना में संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते नीतीश कुमार, साथ में सुशील कुमार मोदी (बाएं)

बिहार पूरी तरह चुनावी रंग में रंग चुका है। मुकाबला सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और महागठबंधन के बीच है। राजग में जदयू और भाजपा बड़े दल हैं, जबकि महागठबंधन में राजद, कांग्रेस और कुछ वामपंथी दल शामिल हैं। दोनों गठबंधनों के द्वारा प्रत्याशियों के नामों की घोषणा कर दी गई है। सीटों पर भी सहमति बन गई है। जिन्हें टिकट नहीं मिला है, उनके समर्थक मायूस हैं। कई प्रत्याशी अपनी सीट खोने से नाराज चल रहे हैं। गठबंधन धर्म को निभाने के कारण कई संभावित प्रत्याशियों की सीटें दूसरे दलों को दे दी गई हैं।
9 अक्तूबर को पटना में राजग ने यह भी तय कर लिया कि कौन कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा। तय हुआ कि जदयू 122 और भाजपा 121 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी। जदयू अपने हिस्से से सात सीट हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) को देगा, वहीं भाजपा अपने हिस्से से 11 सीट विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) को देगी। उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पहले ही वीआईपी के संस्थापक मुकेश साहनी महागठबंधन से बिदक कर राजग के पाले में आए हैं। हम के अध्यक्ष जीतन राम मांझी भी राजग का हिस्सा बन चुके हैं। मुकेश साहनी और मांझी पहले महागठबंधन के मजबूत स्तंभ हुआ करते थे, लेकिन सीट बंटवारे में अहमियत नहीं मिलने से दोनों नाराज होकर राजग में आ गए हैं। यह महागठबंधन के लिए तगड़ा झटका है। महागठबंधन को एक और झटका झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने दिया है। झामुमो ने महागठबंधन के प्रत्याशियों के विरुद्ध अपने उम्मीदवार उतारने का फैसला लिया है। बता दें कि झारखंड में राजद और झामुमो के बीच गठबंधन है। राजद का एक मात्र विधायक झारखंड सरकार में मंत्री भी है। इसलिए झामुमो को उम्मीद थी कि बिहार में राजद उसको महत्व देगा और झामुमो को अच्छी-खासी सीटें मिल जाएंगी। हालांकि बिहार में झामुमो का कोई खास प्रभाव नहीं है, लेकिन झारखंड और बिहार की सीमा से सटे कुछ क्षेत्रों में झामुमो के समर्थक हैं। अब ये समर्थक राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन को शायद ही वोट करें। इसलिए जानकार कह रहे हैं कि महागठबंधन बन तो गया है, पर उसकी गांठ बहुत ही कमजोर है।   
महागठबंधन में शामिल राजद के प्रत्याशी 144 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे, जबकि कांग्रेस 70 एवं वामदल 29 स्थानों से चुनाव लड़ेंगे। 29 स्थानों में सबसे ज्यादा 19 स्थानों से भाकपा (माले लिबरेशन) चुनाव लड़ेगी। जबकि, भाकपा 6 और माकपा 4 स्थानों से चुनाव लड़ेगी। महागठबंधन से बिदके रालोसपा का गठबंधन असद्दुदीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम से हुआ है। वहीं जन अधिकार पार्टी के पप्पू यादव भीम आर्मी के चंद्रशेखर रावण के साथ गलबहियां कर रहे हैं।
इस चुनाव को लेकर सबसे मजेदार पहलू लोजपा के रुख को लेकर है। लोजपा केंद्र में राजग का हिस्सा है, लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में वह राजग से हटकर चुनाव लड़ रही है। लोजपा ने नारा दिया है, ‘‘नरेंद्र मोदी से बैर नहीं, नीतीश तेरी खैर नहीं।’’ लोजपा का सारा गुस्सा नीतीश कुमार के निरंकुश रवैये को लेकर है। जमुई से सांसद और लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान ने स्पष्ट कहा है, ‘‘नीतीश कुमार के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच बिहार में सही ढंग से कार्यान्वित नहीं हो पा रही है। नीतीश कुमार के सात निश्चय भ्रष्टाचार के केंद्र बन चुके हैं। अत: ऐसे मुख्यमंत्री को जनता बदलना चाहती है।’’ इसके साथ ही चिराग ने  143 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। राजनीतिक पंडित मान रहे हैं कि चिराग का यह कहीं कदम उन्हें ही महंगा न पड़ जाए। उल्लेखनीय है कि लोजपा राजग में रहकर ही मजबूत हुई है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में लोजपा को जो सफलता मिली थी, उसके पीछे राजग ही था। लोजपा राजग में नहीं होती तो उसका भी वही हश्र होता, जो राजद, कांग्रेस या अन्य राजग विरोधी दलों का हुआ था। लोग कह रहे हैं कि लोजपा अकेले दम पर कोई उल्लेखनीय परिणाम नहीं ला सकती। चिराग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ना चाहते थे। अब वे ऐसा नहीं कर पाएंगे। भाजपा ने स्पष्ट कर दिया है कि वे चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री की तस्वीर का इस्तेमाल नहीं कर सकते।

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बिहार की 243 विधानसभा सीटों पर तीन चरण में चुनाव होना है। पहला चरण 28 अक्तूबर को, दूसरा चरण 3 नवंबर को और अंतिम चरण का चुनाव 7 नवंबर को होगा। पहले चरण में 71 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव होगा। इस चरण में पटना और गया प्रमंडल के ज्यादातर क्षेत्र हैं। मुंगेर और भागलपुर प्रमंडल के कुछ क्षेत्रों में भी इस चरण में चुनाव होंगे। इस चरण में राज्य के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित क्षेत्र हैं, लेकिन रणवीर सेना के उभार ने नक्सलियों को पीछे हटने पर विवश कर दिया है।
दूसरे चरण में 94 सीटों पर चुनाव होंगे। इसमें अधिकांश सीटें उत्तर बिहार की हैं। उत्तर बिहार में भी तिरहुत और सारण प्रमंडल की सीटें हैं। दक्षिण बिहार में नालंदा और पटना जिले की भी सीटें हैं। इस चरण के बाद पटना, बेगूसराय और खगड़िया जिले की सभी सीटों का चुनाव संपन्न होगा।
तीसरे चरण में 78 सीटों के लिए 9 नवंबर को मतदान होगा। इस चरण की अधिकांश सीटें बाढ़ प्रभावित हैं। कोसी और गंडक का कहर में सबसे ज्यादा पड़ता है। नेपाल द्वारा पानी छोड़े जाने पर इन क्षेत्रों में बाढ़ आना सामान्य बात है। ये क्षेत्र अपने बाहुबल के लिए भी कुख्यात रहे हैं। राज्य के सर्वाधिक मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्र किशनगंज, ठाकुरगंज, बहादुरगंज इसी इलाके में हैं। ओवैसी की पार्टी को राज्य में पहली बार जीत इसी क्षेत्र से मिली थी। यह पूरा क्षेत्र बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों से प्रभावित है। कटिहार, पूर्णिया और किशनगंज जिले में अक्सर गो तस्करी और घुसपैठियों की समस्या छाई रहती है। इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा पलायन होता है। पूर्णिया प्रमंडल कभी जूट उत्पादन के लिए जाना जाता था। विदेशी प्रवासी पक्षी इस क्षेत्र में खूब आते थे। अंग्रेज पूर्णिया को ‘मिनी कश्मीर’ कहते थे। यह हिन्दी के बहुचर्चित लेखक फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ और रामकथा मर्मज्ञ फादर कामिल बुल्के की यह साधना स्थली रहा है। मक्का उत्पादकों की सबसे बड़ी मंडी गुलाबबाग (पूर्णिया) अब अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही है। इस बार ओवैसी की पार्टी सबसे ज्यादा अपने उम्मीदवार इसी क्षेत्र में उतारेगी, ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है। पटना स्थित वीरचंद पटेल पथ बिहार की राजनैतिक गतिविधियों का केंद्र है। यहां कई प्रमुख दलों के कार्यालय हैं। भाजपा, जदयू और राजद के अलावा राष्टÑीय कांग्रेस पार्टी का कार्यालय भी यहीं स्थित है।
2015 में जदयू ने भाजपा से अपना बरसों पुराना नाता तोड़कर राजद के साथ चुनाव लड़ा था। उस समय जदयू और राजद के गठबंधन को जीत तो मिली थी, लेकिन नीतीश कुमार राजद के नेताओं के व्यवहार से इतने परेशान होने लगे कि उन्होंने कुछ समय बाद ही फिर से भाजपा से नाता जोड़ा और वे अब तक भाजपा के सहारे ही सरकार चला रहे हैं।
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गत विधानसभा चुनाव में राजद को सबसे अधिक सीटें मिली थीं। महागठबंधन में तीन घटक दल थे— राजद, जदयू और कांग्रेस। राजद और जदयू ने 100-100 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जबकि कांग्रेस ने 45 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। राजद को 80, जदयू को 71 तथा कांग्रेस को 27 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। राजग में भाजपा, लोजपा, रालोसपा और हम जैसी पार्टियां शामिल थीं। भाजपा को 53 और रालोसपा तथा लोजपा को 2-2 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। हम के जीतनराम मांझी इमामगंज सीट से जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। भाकपा (माले) को   तीन स्थानों पर सिमटना पड़ा था। जबकि निर्दलीय चार सीट जीतने में कामयाब रहे थे।
नीतीश कुमार भाजपा के सहयोग और समर्थन से गत 15 वर्ष से मुख्यमंत्री हैं। भाजपा के सहयोग से ही वे 2005 में लालू-राबड़ी के जंगलराज को उखाड़ फेंकने में सफल हुए थे। 1990 से लेकर 2005 तक यानी 15 साल के लालू-राबड़ी राज में बिहार बहुत पीछे चला गया था। सत्ता की शह पर अपराधी इतने बेलगाम हो गए थे कि राजधानी पटना में भी सूरज ढलते ही लोग अपने-अपने घरों में दुबक जाते थे। स्थिति ऐसी थी कि कोई व्यक्ति रात में पटना रेलवे स्टेशन पहुंचता था तो सूर्योदय होने तक स्टेशन से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं करता था। बाहर निकलते ही लोगों को लूट लिया जाता था। इस हालत में राज्य से कारोबारियों का पलायन तो हुआ ही, साथ ही पढ़े-लिखे युवा भी बिहार छोड़कर दिल्ली, मुम्बई, बेंगलूरु जैसी जगहों पर चले गए। 2005 में भाजपा और जदयू ने कानून-व्यवस्था और लोगों के पलायन को ही चुनावी मुद्दा बनाया था। इसमें कोई शक नहीं कि राजग के काल में बिहार में कानून-व्यवस्था सुधरी है। हां, छोटी-मोटी घटनाएं तो होती हैं, पर वैसी स्थिति कभी नहीं बनी जैसी लालू-राबड़ी राज में होती थी। इसलिए मतदाता राजग के पक्ष में दिख रहे हैं। शिक्षाविद् अर्जुन प्रसाद सिंह कहते हैं, ‘‘लोग लालू-राबड़ी राज को याद कर सिहर उठते हैं। भगवान से प्रार्थना है कि बिहार के मतदाताओं की सद्बुद्धि बनी रहे और वे फिर से नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाने के लिए मतदान करें। यदि ऐसा नहीं हुआ तो बिहार के लिए बहुत बुरा होगा।’’ 
इस वर्ष 14 नवंबर को दीपावली है। उससे पहले 10 नवंबर को चुनाव परिणाम आ जाएंगे। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि किस गठबंधन के यहां दीपावली मनती है और किसके यहां अंधेरा छाएगा?