पत्रकारों की आड़ में टुकड़े-टुकड़े गैंग की पैरोकारी

    दिनांक 14-अक्तूबर-2020
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अजय सेतिया

पत्रकारिता में घुस आए वामपंथी, पत्रकार बाद में हैं, वामपंथी पहले हैं। चीन के लिए जासूसी करने के मामले में पत्रकार राजीव शर्मा और दिल्ली दंगों को भड़काने में आरोपित खालिद जैसों के समर्थन में प्रेस क्लब की ओर से बयान जारी किया गया, लेकिन अब उसकी किरकिरी हो रही है

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चीन के लिए जासूसी करने में गिरफ्तार हुआ स्वतंत्र पत्रकार राजीव शर्मा

चीन के लिए जासूसी करने के मामले में पत्रकार राजीव शर्मा की गिरफ्तारी ने पत्रकारिता में हडकंप मचा दिया है। ज्यादातर पत्रकारों को विश्वास नहीं हो रहा कि कि तीस साल से मुख्य धारा मीडिया में काम करने वाला कोई पत्रकार पैसे के लालच में ऐसा कर सकता है।  वैसे भी भारतीय न्याय व्यवस्था में किसी को तब तक अपराधी नहीं माना जा सकता, जब तक उस का अपराध साबित न हो।

इसलिए अगर प्रेस क्लब जैसी संस्थाएं राजीव शर्मा के पक्ष में बयान जारी करती हैं तो उसे शक की निगाह से नहीं देखा जाना चाहिए। इसके बावजूद तथ्य यह है कि कुछ साल पहले प्रेस क्लब पर काबिज एक खास विचारधारा के पदाधिकारियों ने चीन की वेबसाईट यूसी ब्राउजर के साथ साझेदारी का एमओयू साईन  किया था। प्रेस क्लब की ओर से राजीव शर्मा के पक्ष में बयान जारी करने पर शायद ही किसी पत्रकार को एतराज हो, लेकिन कुछ पत्रकारों का यह भी मत है कि पत्रकारों की संस्थाओं को राजीव शर्मा के पक्ष में किसी तरह का बयान जारी करने की बजाए इन्तजार करना चाहिए था।

पत्रकारिता में घुस आए वामपंथी, पत्रकार बाद में हैं, वामपंथी पहले हैं और यह उन के कृतित्व और व्यक्तित्व से झलक जाता है। प्रेस क्लब के बयान का इससे भी वीभत्स रूप देखिए , बयान में आगे कहा गया है कि दिल्ली पुलिस और इस की विशेष शाखा ने एक अवैध कानून यूएपीए के अंतर्गत निरर्थक गिरफ्तारियां की हैं।

इन्तजार इसलिए क्योंकि अगर पुलिस आरोप साबित करने में कामयाब हो गई तो पत्रकारों की संस्थाएं समाज को क्या मुंह दिखाएंगी। लेकिन राजीव शर्मा के पक्ष में बयान से ज्यादा आपत्तिजनक प्रेस क्लब के बयान में वामपंथी नेताओं कन्हैया और खालिद का समर्थन करना और संसद से पारित और सुप्रीम कोर्ट में खरे उतरे यूएपीए कानून पर सवाल उठाना है। प्रेस क्लब के बयान में कहा गया कि जेएनयू और जामिया यूनिवर्सिटी के कन्हैया, उमर खालिद और अन्य की गिरफ्तारी ‘राजनीतिक पूर्वाग्रह पर कार्रवाई’ की गई और कन्हैया कुमार को तिहाड़ जेल में डाला गया। क्या यह उस किसी संस्था का बयान हो सकता है जिस का कर्तव्य निष्पक्ष बने रहना है। यह पूरी तरह राजनैतिक बयान है और प्रेस क्लब तो क्या किसी पत्रकार को भी व्यक्तिगत तौर पर इस तरह का बयान नहीं देना चाहिए, क्योंकि यह बयान राजनीतिक प्रतिबद्धता दिखाता है। कन्हैया और अब खालिद को भी सरकार ने जेल में नहीं डाला, अलबत्ता अदालत ने जमानत न देकर जेल में डाला है। खालिद तो दिल्ली में दंगे भड़काने का आरोपी है। बिना उस की बेगुनाही साबित हुए कोई निष्पक्ष समझे जाने वाली संस्था उस की पैरवी कैसे कर सकती है और वह भी पत्रकारों की संस्था, जिस का गिरफ्तारी से कुछ लेना-देना ही नहीं है।

समस्या यही है कि पत्रकारिता में घुस आए वामपंथी, पत्रकार बाद में हैं, वामपंथी पहले हैं और यह उन के कृतित्व और व्यक्तित्व से झलक जाता है। प्रेस क्लब के बयान का इससे भी वीभत्स रूप देखिए , बयान में आगे कहा गया है कि दिल्ली पुलिस और इस की विशेष शाखा ने एक अवैध कानून यूएपीए के अंतर्गत निरर्थक गिरफ्तारियां की हैं। यह एक ऐसा कानून है, जिस में सरकार किसी भी बेगुनाह को लम्बे समय के लिए जेल में डाल सकती है। नागरिकता संशोधन कानून विरोधी आन्दोलन और बाद में पूर्वी दिल्ली में हुए तथाकथित दंगों में ‘सावधानीपूर्वक बनाई गई साम्प्रदायिक हत्याओं’ की रणनीति के समय भी इस कानून का बेजा इस्तेमाल हुआ।

प्रेस क्लब का यह बयान उसे अदालत के कठघरे में खड़ा करने लायक है, क्योंकि इसमें कहा गया है कि साम्प्रदायिक हत्याओं की साजिश रची गई थी, साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुए थे। प्रेस क्लब के इस बयान से साबित होता है कि मीडिया के एक खास लेकिन मीडिया पर काबिज वर्ग ने पिछले तीन दशक तक निष्पक्ष पत्रकारिता करने की बजाए वामपंथी विचारधारा का पोषण किया है और अब वे अपनी विचारधारा के लिए पत्रकारों की संस्थाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं।