अंतत: मलखंभ को मिला सम्मान मलखंभ

    दिनांक 14-अक्तूबर-2020
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महेश शर्मा  

भारत का पारंपरिक खेल है, पर इस देसी खेल के प्रति पूर्ववर्ती सरकारों का रवैया उपेक्षापूण ही रहा। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने देश के पारंपरिक खेलों पर ध्यान देने के साथ पुरस्कारों की पात्रता शर्तों में भी बदलाव किया है। यही कारण है कि पहली बार मलखंभ प्रशिक्षक को प्रतिष्ठित द्रोणाचार्य पुरस्कार मिला
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मलखंब योग और जिम्नास्टिक का मिला-जुला रूप है

म. प्र. की भाजपा सरकार मलखंभ को लेकर सकारात्मक रही है। खेल एवं युवा कल्याण मंत्री यशोधराराजे सिंधिया ने 2006 में इसे प्रदेश का राजकीय खेल घोषित करने की बात कही थी। अंतत: अप्रैल 2013 में अध्यादेश जारी हुआ। 2006 से ही 13 जिला स्तरीय केंद्र शुरू हुए जहां संविदा पर मलखंभ प्रशिक्षक नियुक्त किए गए

उज्जैन के मलखंभ प्रशिक्षक योगेश मालवीय को गत माह खेल जगत का प्रतिष्ठित द्रोणाचार्य पुरस्कार मिलना इस पारंपरिक खेल के इतिहास में महत्वपूर्ण घटना रही। इससे इस देसी खेल को वह सम्मान और मान्यता मिली, जिससे यह अब तक वंचित था।

आम तौर पर इस देसी खेल के प्रति पूर्ववर्ती सरकारों का रवैया उपेक्षापूर्ण ही रहा। 1994 में राष्ट्रीय खेलों में इसे प्रदर्शनकारी खेल के रूप में शामिल किया गया, किन्तु बाद में इसे जारी नहीं रखा गया। मलखंभ को आज भी भारतीय ओलम्पिक महासंघ से मान्यता नहीं मिली है। और तो और, इसे राष्ट्रीय खेलों में भी शामिल नहीं किया जाता। इसलिए मलखंभ प्रशिक्षक को न तो द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए पात्र समझा जाता था और न ही मलखंभ खिलाड़ी को अर्जुन पुरस्कार के योग्य। लेकिन केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने भारत के पारंपरिक खेलों की ओर ध्यान दिया और ‘खेलो इंडिया’ में इन्हें शामिल करने के साथ पुरस्कारों के लिए पात्रता शर्तों में भी बदलाव किया।

2018 में गणतंत्र दिवस परेड में मलखंभ झांकी के रूप में शामिल हुआ तथा प्रथम स्थान पर रहा। अब मालवीय के माध्यम से मलखंभ को पहली बार द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए चुना गया। हालांकि मध्य प्रदेश में खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों को दिए जाने वाले एकलव्य पुरस्कार, विक्रम पुरस्कार और विश्वामित्र पुरस्कार मलखंभ में भी दिए जाते रहे हैं। मालवीय कहते हैं, ‘‘उम्मीद की जानी चाहिए कि द्रोणाचार्य पुरस्कार राष्ट्रीय स्तर पर मलखंभ को आगे बढ़ाने में सहायक होगा।’’
मलखंभ योग और जिम्नास्टिक का ऐसा मिला-जुला रूप है जो अनादि काल से देश में प्रचलित है। वास्तव में यह शारीरिक व्यायाम ही है, जिसमें लकड़ी के एक स्तम्भ को आधार बनाकर भिन्न-भिन्न मुद्राएं प्रदर्शित की जाती हैं और संतुलन साधा जाता है। इसके लिए चपलता, दमखम तो आवश्यक है ही, शरीर का लचीलापन भी आवश्यक है।

बताया जाता है कि 19वीं सदी में पुणे से बालमभट्ट दादा देवधर ने इसके प्रसार की शुरुआत की। कालांतर में उनके शिष्य दामोदर मोघे, जो बाद में अच्युतानन्द गुरु महाराज के नाम से प्रसिद्घ हुए, ने देशभर में अनेक व्यायामशालाएं स्थापित कीं और मलखंभ को बढ़ावा दिया। इस तरह, महाराष्ट्र के बाद मध्य प्रदेश इस खेल का गढ़ बनता चला गया।

उज्जैन में मलखंभ की परंपरा एक शती से भी अधिक पुरानी है। 1917 में उज्जैन में व्यायामशाला की स्थापना ने इस खेल के प्रति रूझान बढ़ाया। महादेव प्रसाद भारद्वाज, दिगंबर रानाडे, सदाशिव राव पुजारी और शेखर बनाफर जैसे खिलाड़ी और प्रशिक्षक इसे बढ़ावा देते रहे। इस खेल को उज्जैन के योगदान का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1960 तक प्रति वर्ष स्थानीय अच्युतानन्द प्रासादिक जीवाजीराव व्यायामशाला मलखंभ की राष्ट्रीय स्पर्धा आयोजित कराती रही। 1977-78 तक तो राष्ट्रीय स्तर पर जिम्नास्टिक फेडरेशन का ही हिस्सा बनकर मलखंभ आगे बढ़ता रहा और इसकी पृथक स्पर्धाएं होती रहीं, लेकिन इसके पश्चात फेडरेशन ने इसे अलग कर दिया। इसके बाद उज्जैन के ख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और खेलप्रेमी डॉ़ बमशंकर जोशी ने कुछ मलखंभ खिलाड़ियों को साथ लेकर भारतीय मलखंभ महासंघ की स्थापना की तथा लगातार दो वर्षों तक राष्ट्रीय स्पर्धा आयोजित कराई। इससे मलखंभ को नया जीवन मिला और फिर निरन्तर राष्ट्रीय स्पर्धा का सिलसिला जारी रहा, जिसका फल था कि इस वर्ष 34वीं सीनियर मलखंभ स्पर्धा का आयोजन भीमावरम में प्रस्तावित था, जो कोविड-19 के कारण नहीं हो सका। हालांकि 33वीं जूनियर और 32वीं सबजूनियर स्पर्धा संपन्न हुई।

 मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार मलखंभ को लेकर सकारात्मक रही है। खेल एवं युवा कल्याण मंत्री यशोधराराजे सिंधिया ने इसका महत्व समझते हुए 2006 में इसे प्रदेश का राजकीय खेल घोषित करने की बात कही थी। अंतत: अप्रैल 2013 में इस बाबत अध्यादेश जारी हुआ। 2006 से ही प्रदेश में 13 जिला स्तरीय केंद्र शुरू किए गए, जहां संविदा पर मलख्ांभ प्रशिक्षक नियुक्त किए गए। उसी समय उज्जैन में मलखंभ अकादमी की स्थापना का संकल्प भी लिया गया जो अब पूरा होने जा रहा है। प्रदेश के खेल संचालक और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी पवन जैन कहते हैं, ‘‘उज्जैन में मलखंभ अकादमी के लिए जमीन का चुनाव कर लिया गया है। जल्दी ही काम शुरू हो जाएगा। इस बीच, अकादमी का निर्माण पूरा होने तक अस्थायी अकादमी शुरू कर दी जाएगी।’’

दरअसल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस पारंपरिक खेल को बढ़ावा देने के लिए पुरजोर प्रयास किए हैं। मालवीय रा.स्व. संघ से संबद्ध लोकमान्य तिलक शैक्षणिक न्यास द्वारा संचालित मलखंभ प्रशिक्षण केंद्र में मार्गदर्शन देते हैं। इस केंद्र के दल ने टीवी पर अनेक कार्यक्रमों में मध्य प्रदेश और मलखंभ का नाम रोशन किया है। वहीं, माधव सेवा न्यास ने मलखंभ अकादमी के लिए अपना परिसर उपलब्ध कराने का प्रस्ताव दिया है। न्यास के अध्यक्ष विजय केवलिया कहते हैं, ‘‘स्थायी मलखंभ अकादमी के निर्माण में समय लगेगा, इसलिए माधव सेवा न्यास महाकाल के समीप निर्मित ‘भक्त निवास’ अस्थायी अकादमी के लिए देने को तैयार है ताकि खिलाड़ियों को ठहरने का स्थान मिल सके।’’

म.प्र. मलखंभ एसोसिएशन के अध्यक्ष सोनू गहलोत कहते हैं ‘‘म.प्र. मलखंभ एसोसिएशन ने 2017 में प्रदेश के खेल एवं युवा कल्याण विभाग, उज्जैन नगर निगम और माधव सेवा न्यास के सहयोग से राष्ट्रीय स्पर्धा का सफल आयोजन कराया था।’’ ऐसे समर्पण का ही परिणाम है कि कई दशकों से मलखंभ में उज्जैन ने प्रदेश ही नहीं, देशभर में अपना वर्चस्व कायम रखा हौ प्रदेश की टीम में 70 प्रतिशत से अधिक खिलाड़ी उज्जैन के रहते हैं। 1973-74 में मलखंभ के लिए राज्य का सर्वोच्च खेल पुरस्कार ‘विक्रम पुरस्कार’ पाने वाले और मध्य प्रदेश मलखंभ एसोसिएशन के सचिव के.एस. श्रीवास्तव कहते हैं, ‘‘राष्ट्रीय स्पर्धाओं में महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश, विशेषकर उज्जैन का बेहतर प्रदर्शन रहा है। अकादमी बनने से इस खेल में आमूलचूल परिवर्तन आने की आशा है।’’ अकादमी की स्थापना से राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों व प्रशिक्षकों को प्रोत्साहन मिलेगा। चूंकि उज्जैन में अधिक संख्या में खिलाड़ी हैं, इसलिए प्रदेश के अन्य स्थानों के खिलाड़ियों को भी इसका फायदा मिलेगा। यही नहीं, पेशेवर फिजियोथेरेपिस्ट भी मिल सकेंगे, जिससे इस जोखिमभरे खेल से जुड़े खिलाड़ियों को तत्काल मार्गदर्शन मिल सकेगा। 

विक्रम तथा विश्वामित्र पुरस्कार प्राप्त खिलाड़ी और प्रशिक्षक आशीष मेहता कहते हैं, ‘‘ जापान ओलम्पिक में मलखंभ को प्रदर्शन खेल के रूप में शामिल किया जा रहा है। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस खेल को बढ़ावा मिलेगा। वैसे भी भारतीय जिम्नास्टिक के रूप में यह खेल विदेशों में अपनी पहचान बना चुका है।’’

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार उम्दा प्रदर्शन का ही परिणाम रहा कि विदेशों में इसके प्रति आकर्षण बढ़ा और जर्मनी तथा अमेरिका में मलखंभ फेडरेशन गठित हुए। फरवरी 2019 में मुंबई में मलखंभ की पहली विश्व स्पर्धा आयोजित हुई जिसमें अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, इटली, ंिसंगापुर, मलेशिया, जापान, स्पेन और जर्मनी सहित 15 देशों के दलों ने हिस्सा लिया। इसमें भारत ने पहला स्थान प्राप्त किया, जबकि सिंगापुर और मलेशिया क्रमश: दूसरे व तीसरे स्थान पर रहे। आशा की जानी चाहिए कि मलखंभ ओलम्पिक में नियमित तौर पर शामिल हो और भारत का झंडा फहराए।