ज्ञानपीठ विजेता अक्कितम नम्बूदिरी : काव्य से बदलाव तक

    दिनांक 14-अक्तूबर-2020
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 पाञ्चजन्य ब्यूरो

ज्ञानपीठ पुरस्कर से सम्मानित महाकवि अक्कितम के गृहनगर के पास कडवल्लूर में श्री रामास्वामी मंदिर उनकी तपस्या का जीता-जागता स्मारक है। यहां आयोजित होने वाली अन्योन्यम शास्त्रार्थ प्रतियोगिता में विश्व के वैदिक विद्वान एकत्रित होते हैं। उनकी समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने में बड़ी भूमिका है

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साहित्य साधना में रत अक्कितम अच्युतन नम्बूदिरी         (फाइल चित्र)


जब मीडिया में 94 वर्षीय अक्कितम अच्युतन नम्बूदिरी को 2019 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित करने की खबर आई तो मलयालमभाषी साहित्यकार और राजनैतिक समालोचक एम. सतीशन ने कहा कि ज्ञानपीठ को अक्कितम मिल गया। जनमानस के बीच अक्कितम के नाम से विख्यात, वे केरल के एकमात्र ऐसे महाकवि हैं जो घर-घर में मशहूर है। उन्होंने ब्राह्मण समाज, जिसका वे स्वयं हिस्सा हैं, में व्याप्त रूढ़िवादिता और दकियानूसी परंपराओं के खिलाफ अनवरत संघर्ष किया है और उन्हें समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वे अंतिम जीवित समाज सुधारकों में से एक हैं जिन्होंने 94 वर्ष की अवस्था में न केवल नम्बूदिरी परिवारों में, बल्कि पूरे केरल में समाज के निचले वर्गों के लिए काम किया।

उम्र के इस पड़ाव पर भी उन्होेंने अपनी मानसिक दक्षता को बरकरार रखते हुए अपनी यात्रा जारी रखी है। वे कहते हैं, ‘‘मुझे इस बात से ज्यादा खुशी होगी कि मैं एक ज्योतिषी के रूप में जाना जाऊं क्योंकि ज्योतिष विज्ञान मेरी विशिष्टिता रही है जबकि कविता मेरे लिए एक शौक का विषय है। मेरे मन में जो विचार कभी-कभी आते रहे हैं, मैं उन्हें कागज पर उतार देता हूं।’’

वास्तव में ज्ञानपीठ पुरस्कार ने देवयानम परंपरा को एक अलग पहचान दिलाई है जो केरल के पलक्काड जिले के कुमरणानेल्लोर इलाके में प्रचलित है। अक्कितम की क्रांतिकारी कविताओं ने केरल के राजनैतिक और सांस्कृतिक मंच को 1950 और ’60 के दशक में तब उद्वेलित कर दिया था जब उन्होंने साम्यवाद के पतन का पूर्वानुमान लगाया था और 1970 के दशक में सोवियत संघ समाजवादी गणराज्य के विघटन को लेकर भविष्यवाणी की थी। लेकिन पिछले दो दशकों में वे श्रीमद्भागवत का मलयालम में अनुवाद करने की व्यस्तता की वजह से कविताओं से पूरी तरह से दूर हो गए थे।

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ज्ञानपीठ पुरस्कार के साथ मलयालम के सुप्रसिद्ध कवि अक्कितम

अक्कितम का मानना है कि अपने जमाने के महान कवियों उल्लूर एस. परमेश्वर अय्यर, पी. कुन्हीरामन नायर, कुमारन आसन, वल्लथोल नारायण मेनन, एडससेरी गोविंदन नायर, ओलप्पमाणना सुब्रमनियन नम्बूदिरिप्पाडु और वैलोप्पिल्ली श्रीधर मेनन, सभी संस्कृत के विद्वान थे। इसी तरह कुट्टीकृष्णन), तकषीशिवशंकर पिल्लै, केशव देव आदि संस्कृत के ज्ञाता थे


भागवत महापुराण के सभी श्लोक कालजयी हैं और इसके मलयालम में अनुवाद ने इन्हें एक नया और सुन्दर स्वरूप प्रदान किया है। अक्कितम ने जिस तरह से शब्दों और व्याकरण से इसे गढ़ा है, वैसा मलयालम में न भूतो, न भविष्यति ही है। श्लोक इस प्रकार है :
नरायणशंकरम् पुण्य, जिह्वाग्रे वस्य वर्तते
नारायणस्थामानवेथी, वालसम गौरीवा वल्सला
जो रूपांतरित होकर नाविनतुमबिल पुण्य
नारायणाक्षरमिरिक्कूकिल, नारायण थेड़ी वरुम
पशु वल्सथेयेन्नापोल  ...

इस रूपांतरण की विशिष्टता का बखान करते हुए केरल के सबसे पुराने, बड़े और विशिष्ट साहित्यिक और सांस्कृतिक मंच तपस्या के अध्यक्ष प्रोफेसर पी.जी. हरिदास ने बताया कि इससे बेहतर अनुवाद की हम उम्मीद ही नहीं कर सकते। मैं इसे साहित्य को उसके शिखर तक पंहुचा हुआ आंकता हूं।  हरिदास ने अक्कितम को मलयालम का 21वीं सदी का महानतम साहित्यकार माना है। अक्कित्तम तपस्या के संस्थापक अध्यक्ष रहे हैं।

हालांकि उनके प्रशंसकों-मित्रों, जिनमें यज्ञोपवीतम के संपादक जीवन कुमार तथा केरल के एक अन्य प्रमुख साहित्यकार और गुरुवायूरप्पम कॉलेज, कोझिकोड में मलयालम विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर के. पी. शशिधरन शामिल हैं, का मानना है कि यह पुरस्कार उन्हें दो दशक पहले ही मिल जाना चाहिए था। शशिधरन का कहना है कि इसमें कोई संदेह नहीं कि अक्कितम मलयालम के महान साहित्यकारों में से एक हैं।  वे एक पैदाइशी कवि हैं और नई पीढ़ी के साहित्यकार प्रतिभा में उनसे मीलों पीछे हैं क्योंकि उन्हें अभी भी ऐसा कुछ लिखना है जो आपके मस्तिष्क पर छाप छोड़ सके।

उनकी लिखी ‘दी एपिक आॅफ ट्वेंटिएथ सेंचुरी’ मलयालम साहित्यिक परिदृश्य में सबसे बेहतर काव्य कृति के रूप में उभर कर लोगों के सामने आई। यह उपलब्धि किसी भी साहित्यकार के लिए किसी स्वप्न से कम नहीं होती। पर अक्कितम को इस सवाल के उत्तर की तलाश है कि हमारा देश क्यों अवनति की तरफ बढ़ चला है। हालांकि सब कुछ ईश्वर की मर्जी पर चलता है। हमारा कुछ भी नहीं है। सब कुछ उस सत्ता के द्वारा पूर्व निर्धारित है, अक्कितम ने आकाश की तरफ इशारा करते हुए कहा।

दरअसल अक्कितम की पीड़ा उस दिन से शुरू हुई जिस दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने संस्कृत को इस देश की राष्ट्रभाषा बनाने कीइस स्वतंत्रता सेनानी की प्रार्थना को अस्वीकृत कर दिया था। अक्कितम का मानना है कि अगर संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाया गया होता तो भारत आज भी ज्ञान का केंद्र्र होता।

उन्होंने अपनी कविताओं का श्रेय संस्कृत के अपने ज्ञान और साहित्य को दिया। अक्कितम का मानना है कि अपने जमाने के महान कवियों उल्लूर एस. परमेश्वर अय्यर, पी. कुन्हीरामन नायर, कुमारन आसन, वल्लतोल नारायण मेनन, एडससेरी गोविंदन नायर, ओलप्पमाणना सुब्रमनियन नम्बूदिरिप्पाडु और वैलोप्पिल्ली श्रीधर मेनन, सभी संस्कृत के विद्वान थे। इसी तरह उपन्यासकार, जैसे उरूब (पी.सी. कुट्टीकृष्णन), तकषीशिवशंकर पिल्लै, केशव देव और संजयन, सभी को संस्कृत की अच्छी जानकारी थी। इनके लेखन में मौलिकता थी और इनका लिखा हुआ साहित्य विश्वस्तरीय था। क्या उस स्तर का कोई भी लेखक है वर्तमान में? ऐसा कह सकते हैं कि कथाकार एम. टी. वासुदेवन नायर का स्तर वैसा ही है, लेकिन अन्य कोई भी ऊपर लिखे नामों के आस-पास नहीं फटकता।


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अक्कितम ने नम्बूदिरी समाज में व्याप्त बहुत सी असंगत, गैरजरूरी और अनुपयोगी परम्पराओं से समाज को मुक्ति दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई। विधवाओं का पुनर्विवाह और उनका घर से बाहर जाकर काम करने का विचार मात्र 20वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक अकल्पनीय था। उन्होंने वी. टी. भट्टथिरिप्पाडु और ईएमएस नम्बूदिरिपाद के साथ मिलकर इस बुराई को दूर करने के लिए काम किया और इसके लिए सभी मंचोंऔर तरीकों का सहारा लिया

अक्कितम का मानना है कि मलयालम काव्य न केवल रुग्ण है बल्कि मृत्युशैया पर है। जब उनसे यह पूछा गया कि समकालीन लेखक पुराने समय के साहित्यकारों की बराबरी करने में क्यों असफल रहते हंै तो मलयालम के इस पुरोधा ने इसे विश्लेषित करते हुए कहा कि कोई भी व्यक्ति जो अपने आप को एक कवि, उपन्यासकार, लघु कथा लेखक अथवा साहित्यिक समालोचक मानता है तो वह इनमें से कुछ नहीं बन पाता। जो अपने को पैदाइशी कलाकार मानता है तो उसका असफल होना निश्चित है। सभी सजीव वस्तुएं ईश्वर का रूप हैं। किसी व्यक्ति का विश्वास अहंकार में न होकर उसकी अनंतता, गहराई और सम्पूर्णता में होना चाहिए।

अक्कितम ने इस तरफ भी इशारा किया कि साहित्य चाहे वह कविता हो या उपन्यास, लघु कथा हो या नाटक, एक सतत प्रक्रिया है।  कालिदास और वाल्मीकि ने जो कुछ भी लिखा, वह उनके अनुभवों पर आधारित था। इस पृथ्वी पर पैदा हुए हर व्यक्ति के अनुभवों का अपना एक अलग संसार होता है और वे सभी इसे महसूस करने में सक्षम होने चाहिए। उन्होंने नई पीढ़ी को आगाह करते हुए कहा और पूछा, क्या उनको वह पुरानी फारसी कहावत ध्यान है कि ‘अरे मूर्ख, अपने दिल में झांक तब लिख’?

अब उस सामायिक विषयवस्तु पर वापस लौटें हैं जिसने पूरे देश को भयाक्रांत कर रखा है, जिसमें नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ शाहीन बाग जैसे देशव्यापी आंदोलन शामिल हैं। यहां तक कि अक्कित्तम ने देश के विखंडन तक के खतरे को निर्मूल मानने से भी इनकार किया।  उन्होंने कहा कि भारत की समस्याओं का केन्द्र बिन्दु भारत का विभाजन करके पाकिस्तान का निर्माण था और जो साम्प्रदायिक विभेद आज नजर आते हैं, उनकी उत्पत्ति पाकिस्तान के निर्माण में निहित है। इसके लिए जवाहरलाल नेहरू स्वयं जिम्मेदार हैं, ऐसा अक्कित्तम का मानना है जिन्होंने गुलामी से मुक्त होते भारत के राजनैतिक परिदृश्य में चल रही नूरा कुश्ती को बहुत नजदीक से देखा था।

हालांकि भारत को राजनीतिक आजादी तो मिल गई लेकिन सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्रों पर साम्यवादी लोग ही काबिज रहे। मुल्कराज आनंद और अली सरदार जाफरी ने लेखकों का एक ऐसा गिरोह तैयार किया जो साहित्य की आयातित विधा की ओर उन्मुख थे। अक्कितम ने माना कि यह बहुत दु:ख की बात है कि हमारे पास हमारी संस्कृति और परम्पराओं पर पश्चिम के द्वारा किए गए आक्षेप का जवाब देने के लिए लेखकों तक की कमी है।

मुल्कराज आनंद की चर्चा मलयालम के एक प्रसिद्ध लेखक और भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी मलयतूर रामकृष्णन के जीवन इतिहास में मिलती है। रामकृष्णन ने अपने संस्मरण में बताया है कि मुल्कराज आनन्द ने उन्हें कैसे प्रभावित किया और कहा कि उन्हें केरल जैसी छोटी जगह में रहने की जरूरत नहीं है, और बम्बई आने के लिए यह कहते हुए आमंत्रित किया कि उनके जैसे बुद्धिजीवियों का वहां इंतजार रहता है। ‘जब मैं बम्बई के मालाबार हिल्स इलाके में स्थित आनंद के महलनुमा घर पंहुचा, उन्होंने मुझसे मिलने से इनकार कर दिया। और जब मैं उनसे किसी तरह से मिलने में सफल रहा तो उन्होंने मुझसे कहा कि इस नारकीय शहर से बाहर निकलूं और केरल वापस जाऊं,’ यह है मुल्कराज आनंद की सच्चाई जो रामकृष्णन ने अपने संस्मरण में लिखी है। बस, इतनी ही है भारत में साम्यवादी विचारधारा की असलियत। अक्कितम ने यह भी स्पष्ट किया कि संस्कृत की कृतियां, जैसे वेद और उपनिष्द् पढ़ने के बाद उन्हें लग गया था कि मार्क्सवादी विचारधारा का असफल होकर समाप्त होना अवश्यम्भावी है, क्योंकि यह भारतीय संस्कृति, साहित्य, परंपरा और विरासत का न तो मुकाबला कर सकती है, न ही कभी
कर पाएगी।

अक्कितम की क्रांतिकारी कविताओं ने केरल के राजनैतिक और सांस्कृतिक मंच को 1950 और 60 के दशक में उद्वेलित कर दिया था जब उन्होंने साम्यवाद के पतन का पूर्वानुमान लगाया। अक्कितम ने ’70 के दशक में सोवियत संघ समाजवादी गणराज्य के विघटन को लेकर भविष्यवाणी की थी और ठीक वैसा ही हुआ। कभी साम्यवादियों के पसंदीदा रहे ये कवि आज उनमें अस्पृश्य माने जाते हैं। उन्होंने श्रीमद्भागवत का मलयालम में अनुवाद करके बड़ा काम किया है

नम्बूदिरी समाज में प्रचलित लेकिन बदलते समय के साथ बहुत सारी असंगत, गैरजरूरी और अनुपयोगी हो चुकी परम्पराओं से समाज को मुक्ति दिलाने में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई है। नम्बूदिरी विधवाओं का पुनर्विवाह और उनका घर से बाहर जाकर काम करने का विचार मात्र 20वीं शताब्दी के पूर्वार्ध तक अकल्पनीय था। उन्होंने वी. टी. भट्टथिरिप्पाडु और ईएमएस नम्बूदिरिपाद (केरल के पहले मुख्यमंत्री) के साथ मिलकर इस बुराई को दूर करने के लिए अधिक से अधिक समय दिया और इस बुराई और हठधर्मिता को समाप्त करने के लिए सभी मंचों और तरीकों का सहारा लिया। नम्बूदिरी समाज में उस समय में व्याप्त जड़ता को इस कवि ने इस तरह की बुराइयों के जड़ जमाने का कारण बताया। अक्कितम  का कहना है कि इसके लिए हम स्वयं जिम्मेदार हैं क्योंकि नम्बूदिरी न केवल आर्थिक रूप से मजबूत थे बल्कि सामाजिक अनुक्रम में भी काफी ऊपर थे, न ही किसी बात को लेकर समाज में चिंता जैसी स्थिति थी लेकिन जब समाज का जिंदगी की वास्तविकताओं से सामना हुआ और मुश्किलों से दो चार होना पड़ा तो इन्हें बदलना ही पड़ा, इन्हें पूरी तरह से बदलना पड़ा। ऐसा ही कुछ मिलता-जुलता मामला कमजोर और शोषित वर्ग के लोगों को लेकर था जिन्हें संस्कृत, वेद और उपनिषदों की शिक्षा से ही शताब्दियों तक दूर रखा गया था। अक्कितम इस सामाजिक क्रांति के प्रणेता थे जिसने प्रचलित रीति-रिवाजों को उलट-पुलट कर रख दिया था और जिसने निचले तबके के लोगों के लिए महान भारतीय व्यवस्था, ज्ञान और परम्पराओं को सीखने का दरवाजा खोल दिया।

अक्कितम के गृहनगर के नजदीक कडवल्लूर में श्री रामास्वामी मंदिर उस तपस्या का जीता-जागता स्मारक है। ऋग्वेद पर आयोजित किए जाने वाले वार्षिक अन्योन्यम (एक बौद्धिक प्रतियोगिता) में नवंबर और दिसंबर के महीने में कडवल्लूर में पूरे विश्व के वैदिक विद्वान एकत्रित होते हैं और सबसे योग्य विद्वान को विजेता के रूप में सम्मानित किया जाता है। इस सदियों पुरानी वैदिक शास्त्रार्थ प्रतियोगिता का आयोजन कडवल्लूर अन्योन्यान्य परिषद् के संरक्षण में किया जाता है और यह विश्व में इस तरह की एकमात्र प्रतिस्पर्धा है। अक्कितम ने माना कि पश्चिम के लोगों के द्वारा फैलाये जा रहे समाजवाद की भारत में सफलता का एकमात्र रास्ता इसे भारतीय संस्कृति को माध्यम बनाकर लागू करना है।

अक्कितम ने अपने 94 वर्ष के जीवन काल में हजारों कविताएं लिखी हैं और उनका लिखना अब भी जारी है। जिन्हें साम्यवादी विचारधारा के नजदीक माना जाता था, वे ही अचानक उनके लिए अछूत हो गए जब उन्होंने मार्क्सवादियों के द्वारा फैलाई जा रही सामाजिक बुराइयों पर प्रश्न किया और उसे चुनौती दी। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी एक ऐसी विचारधारा की पोषक है जिसे अपने दुश्मनों को समाप्त करने के लिए हिंसा का सहारा लेते पाया गया, जो अक्कित्तम जैसे कवि को अस्वीकार्य था। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि मार्क्सवादियों ने उन पर फासीवादी और सांप्रदायिक होने का आरोप लगाया। अक्कितम का कहना है, कि कवि के रूप में मेरा लक्ष्य पूरा हो गया है लेकिन ज्योतिष के प्रति मेरे लगाव ने मेरी ऊर्जा और मेरी आत्मा को बचाए रखा है। अब यह नई पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि जहां मैंने और मेरे सहकर्मियों ने इसे छोड़ा है, वहां से वह इसे आगे लेकर जाए। जो लोग कविताएं और कहानियां लिखने के लिए उत्सुक हैं वे यहां से असीमित ऊर्जा और प्रेरणा गृहण कर सकते हैं।