श्रद्धांजलि / स्व. आर. रामगोपालन जी : एक साहसी संत

    दिनांक 14-अक्तूबर-2020
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और ‘हिंदू मुन्नानी’  के संस्थापक श्री आर. रामगोपालन जी के निधन से राष्ट्रवादी आंदोलन को अपूरणीय क्षति हुई है। संघ के स्वयंसेवक और कार्यकर्ता उन्हें स्नेह से गोपाल जी कहते थे। गोपाल जी ने गत 30 सितंबर को 94 वर्ष की आयु में स्वर्ग को प्रस्थान किया।

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आर. रामगोपालन

एक ऊर्जावान युवा
नागपट्टिनम जिले के सिरकाजी में 19 सितंबर, 1927 को जन्मे गोपाल जी का संघ से पहला परिचय उस समय हुआ जब वे चैन्ने में पढ़ रहे थे। उन्होंने 1944 से शाखा में भाग लेना शुरू कर दिया। विभाजन के शिकार लोगों के शरणार्थी शिविर के दौरे ने गोपाल जी पर बहुत गहरा प्रभाव डाला। यहीं से हिंदू समाज की सेवा और संघ की गतिविधियों में भाग लेने की इच्छा उनके मन में बलवती होने लगी थी। 1947 में उन्होंने एक इलेक्ट्रिकल कंपनी की नौकरी छोड़कर प्रचारक बनने का फैसला किया।


उत्कृष्ट संपर्क प्रमुख
जल्दी ही वे मदुरै जिले के जिला प्रचारक बने। इस दौरान  उन्होंने श्रीगुरुजी के 51वें जन्मदिवस के अवसर पर एक बड़ी सभा का आयोजन किया, जिसकी अध्यक्षता महान राष्ट्रवादी नेता और नेताजी के अनुयायी पसपन मुथुरामलिंग थेवर ने की थी। 1964 में वे प्रांत प्रचारक बने। आपातकाल (1975-77) के दौरान उन्होंने कई विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया।

राष्ट्रवादी भावना को जगाया
तमिलनाडु में प्रांत प्रचारक के तौर पर उन्होंने देसिया चिन्तनाई काजगम (प्रज्ञा प्रवाह) को शुरू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसका उद्देश्य राज्य में राष्ट्रवादी भावना को सशक्त करना था। द्रविड़ संगठन लोगों के बीच कुप्रचार कर रहे थे,  ‘‘तमिल एक अलग भाषा है, लिहाजा तमिलनाडु को एक अलग देश बनना चाहिए।’’ गोपाल जी ने कई तमिल विद्वानों की लिखी करीब 100 पुस्तकों से उद्धृत तमिल साहित्य के प्रमाण के साथ लोगों को समझाया कि तमिल और तमिलनाडु प्राचीनकाल से भारत का अभिन्न अंग हैं। इसका तमिल बुद्धिजीवियों पर गहरा प्रभाव पड़ा।

इसी प्रकार, उन्होंने ‘नाननेरी’ और ‘थायगा भूमि’ नाम से हाथ से लिखी पत्रिकाओं की शुरुआत की और हिंदुत्व की विचारधारा और तमिल एवं तमिलनाडु की एकता के भाव को राज्य में जन-जन तक पहुंचाया। ये पत्रिकाएं बाद में ‘थायगा भूमि’ और ‘विजया भारतम्’ नाम की साप्ताहिक पत्रिका बन गर्इं।

 ‘हिंदू मुन्नानी’ की स्थापना
1980 में करूर में हुई संघ कार्यकारिणी बैठक में तमिलनाडु में व्याप्त हिंदू-विरोधी ताकतों को ध्यान में रखते हुए उन्हें ‘हिंदू मुन्नानी’ शुरू करने की जिम्मेदारी दी गई, जो आज तक तमिलनाडु में हिंदू समाज की रक्षा करने में अग्रणी रहा है। इस सिलसिले में हिंदू मुन्नानी की स्थापना से पहले के दशकों में हिंदू समाज की स्थिति को जानना प्रासंगिक होगा। उन दिनों  तमिलनाडु के हिंदुओं का अस्तित्व न जाने कितने खतरों का सामना कर रहा था। उपनिवेशवादियों और मिशनरियों ने विशेष रूप से दक्षिण तमिलनाडु में एक कृत्रिम जातीय भेदभाव की चिनगारी को हवा देकर हिंदुओं के बीच कलह के बीज बो दिए थे। कन्याकुमारी में ईसाइयों की आबादी में खतरनाक उछाल आया था। उनकी हिमाकत इतनी बढ़ चुकी थी कि उन्होंने जिले के नाम को ‘कन्नी मैरी’ या ‘वर्जिन मेरी’ में बदलने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया था। उधर तिरुवनंतपुरम में मुस्लिम संगठन खुली घोषणाएं कर रहे थे कि वे निर्धारित अवधि में लाखों हिंदुओं का कन्वर्जन कर देंगे। दूसरी ओर, उस समय के सत्तारूढ़ शासक के वैचारिक सलाहकार द्र्रविड़ काजीगम (डीके) भगवान राम की मूर्तियों पर चप्पलें फेंक हिंदू देवी-देवताओं की अलौकिक छवि को अपनी अशोभनीय टिप्पणियों और बहसों में धूमिल करने के प्रयास में निम्नस्तर पर उतरते जा रहे थे। लेकिन हिंदू अपने धर्म का इतना अनादर देखने के बाद भी मूकदर्शक बने रहे। शायद उन्हें इन हिंदू-विरोधी गतिविधियों के विरोध में स्वर उठाने के लिए किसी का इंतजार था। श्री गोपाल जी यानी हिंदू मुन्नानी ने मानो उस रिक्त स्थान को भर दिया। इसके परिणामस्वरूप हिंदू जातिगत बाधाओं को तोड़कर हिंदू मुन्नानी द्वारा दिखाए मार्ग पर तेजी से बढ़ चले।

गोपाल जी ने मीनाक्षीपुरम में हिंदुओं के कन्वर्जन से उभरे हिंदू आक्रोश को एक सबल प्रवाह में बांधकर तमिलनाडु में हिंदू पुनरुत्थान की धारा को अभूतपूर्व गति दी। गोपाल जी की सफलता से हिंदू-विरोधी गुट चिढ़ने लगे थे। अपनी चिढ़ में अंधे होकर वे हिंदू कार्यकर्ताओं के खिलाफ हिंसक हो उठे। कट्टरवादी तत्व हिंदू मुन्नानी के कार्यकर्ताओं पर लगातार हिंसक हमले करते रहे थे। गोपाल जी के जीवन पर भी घात लगाने के कई प्रयास किए गए। 1984 में मदुरै रेलवे स्टेशन पर उन पर किया गया हमला सबसे घातक था, जिसने उनके सिर पर चोट का स्थायी निशान छोड़ दिया। इन सारी घटनाओं से विचलित हुए बगैर वे निर्भीकता के साथ तमिलनाडु का दौरा करते रहे। परिणामस्वरूप लोग उन्हें ‘वीरा थुरवी’ (एक साहसी संत) कहकर पुकारने लगे।

प्रकाशवान करने वाला एक अध्याय हुआ समाप्त

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत एवं सरकार्यवाह श्री भैयाजी जोशी ने हिन्दू मुन्नानी के संस्थापक श्री राम गोपालन जी को श्रद्धाजंलि अर्पित की। संघ की ओर से जारी शोक संदेश में कहा गया कि उनके निधन का समाचार अत्यंत पीड़ादायक है। सबको प्रकाशवान करने वाला एक अध्याय समाप्त हो गया। उनके सभी परिचितों एवं उनके मार्गदर्शन में कार्य करने वाले समस्त जनों के प्रति हमारी संवेदना है। श्री राम गोपालन जी ने अपना पूरा जीवन हिंदू समाज को संगठित एवं शक्तिशाली बनाने के लिए समर्पित कर दिया। राष्ट्र कार्य में उनकी भूमिका और योगदान चिरस्थायी रहेगा। हम प्रभु चरणों में प्रार्थना करते हैं कि दिवंगत आत्मा को सद्गति प्रदान करें।


विलक्कू पूजा का पुन: प्रारंभ
हिंदुओं को एकजुट करने में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को महसूस करते हुए उन्होंने विलक्कू पूजा (दीपक की पूजा) की प्रथा को पुनर्जीवित किया, जो सैकड़ों से लाखों तक बढ़ गया। इसके परिणामस्वरूप महिलाओं ने हिंदू समाज के साथ हुए अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद की।

जन आंदोलन के प्रणेता
गोपाल जी ने कई जन आंदोलनों का नेतृत्व किया। जैसे- जलकांंतेश्वर मंदिर में शिवलिंग की स्थापना, दशकों से रुके तिरुवरूर मंदिर के रथ को चलाना, धनुषकोटि, राम सेतु आदि को पुन: पहचान देना। गोपाल जी ने हिंदू मुन्नानी संगठन के माध्यम से त्रिपलीकेन इलाके की गणेश पूजा को कुछ ही समय में एक राज्यव्यापी आंदोलन में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1983 में त्रिपलीकेन में एक गणेश विसर्जन से शुरू उत्सव आज बढ़ कर पूरे तमिलनाडु में 50,000 की संख्या पर पहुंच चुका है।

निर्भीक योद्धा
वे हिंदुओं को एकजुट करने के लिए हमेशा नए विचारों की ऊर्जा से जनमानस का मार्ग प्रशस्त करते रहे। उन्होंने ग्राम सभाओं की शुरुआत की, जिसमें ग्रामीण एक जगह इकट्ठे होकर अपनी समस्या पर चर्चा कर खुद समाधान निकालने का प्रयास करते हैं। गोपाल जी के मार्गदर्शन मे हिंदू मुन्नानी के कार्यकर्ताओं ने पूरे राज्य में कई मौकों पर अवैध मिशनरी गतिविधियों और अनधिकृत चर्च के निर्माणों को बंद कराया। प्राचीन हिंदू ज्ञान से प्रेरणा लेकर गोपाल जी ने हिंदू समाज की रक्षा में न केवल ‘शक्ति’, बल्कि  ‘युक्ति’ का भी प्रयोग किया।

बहुमुखी प्रतिभा संपन्न व्यक्तित्व
गोपाल जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे एक प्रबुद्ध पाठक, लेखक, कवि, बांसुरी वादक आदि थे। जब वे कम आयु के थे तभी उनकी इच्छा जी.एन.बालसुब्रमण्यम से कर्नाटक संगीत सीखने की थी, पर नियति ने अलग योजना बना रखी थी। उनकी संगीत प्रतिभा संघ में पल्लवित हुई और उनके लिखे देशभक्तिपूर्ण गीत सैकड़ों स्वयंसेवकों की आवाज में गूंज उठे और दशकों से स्वयंसेवकों और हिंदू कार्यकर्ताओं को प्रेरणा दे रहे हैं। उनके कुछ गीतों के भाव ने स्वयंसेवकों के दिलों में एक अमिट छाप छोड़ी है। उन्होंने बड़ी शोधपूर्ण और दिलचस्प पुस्तकें लिखी हैं, जिसमें आपातकाल पर लिखी लंबी किताब भी शामिल है। 75 वर्ष की आयु में भी वे बांसुरी बजाया करते थे। उनके मार्गदर्शन में हिंदू मुन्नानी ने आम लोगों के लिए सैकड़ों छोटी-छोटी किताबें प्रकाशित कीं, जिनमें हिंदू समाज के विभिन्न मुद्दों पर प्रकाश डाला गया।
स्व. गोपाल जी को पाञ्चजन्य परिवार की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि।