पश्चिम बंगाल : निर्ममता की हद पार करतीं ‘ममता’

    दिनांक 14-अक्तूबर-2020   
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पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की शह पर उनकी पार्टी के समर्थक अपने राजनैतिक विरोधियों की हत्या करने में सारी हदें पार कर रहे हैं। हिंसा की जो राजनीति पहले वामपंथी करते थे, ममता उसी सिलसिले को आगे बढ़ा रही हैं
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अपने नेताओं की हत्या के विरोध में कोलकाता में प्रदर्शन करते भाजपा के कार्यकर्ता। प्रकोष्ठ में मनीष शुक्ल


राज्य में कानून-व्यवस्था जैसी कोई चीज नहीं रह गई है और यहां का प्रशासन सत्ताधारी दल के लिए कार्य करता है।
- जगदीप धनखड़, राज्यपाल, पश्चिम बंगाल


पश्चिम बंगाल में मार-काट की राजनीति चरम पर है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की शह पर भाजपा और अन्य विरोधी संगठनों के कार्यकर्ताओं को जान से मारा जा रहा है। इसी कड़ी में भाजपा नेता मनीष शुक्ल की हत्या कर दी। उनकी हत्या गत 4 अक्तूबर को टीटागढ़ (बैरकपुर) में उस समय की गई, जब वे एक चाय दुकान पर चाय पी रहे थे। लोगों का कहना है कि दो लोग मोटरसाइकिल पर आए और उन्होंने मनीष पर गोलियों की बौछार कर दी। हत्यारे हेलमेट पहने हुए थे, इसलिए कोई उन्हें पहचान नहीं पाया और वे भागने में सफल रहे। मनीष की घटना स्थल पर ही मृत्यु हो गई। हालांकि उन्हें नजदीक के अपोलो अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

भाजपा का कहना है कि मनीष की हत्या तृणमूल कांग्रेस और प्रशासन की मिलीभगत से हुई है। इस आरोप में दम लग रहा है। उल्लेखनीय है कि मनीष को जो सुरक्षा गार्ड मिले थे, वे उस समय उनके साथ नहीं थे। दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि गत महीने ही बैरकपुर के पुलिस आयुक्त ने उनके हथियार का लाइसेेंस निरस्त कर दिया था। तीसरी बात यह है कि मनीष पर जिस पिस्तौल से गोलियां बरसाई गईं, वह 9 एमएम की थी, जो केवल पुलिस के पास होती है। इन तथ्यों से भाजपा का आरोप सही लग रहा है।
पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था की हालत कैसी है, इसके बारे में राज्य के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने कई बार खुले मंच से चिंता व्यक्त की है। राज्यपाल ने कहा है, ‘‘राज्य में कानून-व्यवस्था जैसी कोई चीज नहीं रह गई है और यहां का प्रशासन सत्ताधारी दल के लिए कार्य करता है।’’


ममता बनर्जी ने माकपा के स्कूल से पीएचडी की है। उनसे माकपा की लीक से हटकर कार्य करने की अपेक्षा करना, अपने को धोखे में रखना है। ममता ने माकपा की तरह ही अपने विरोधियों को निपटाना शुरू किया है। भाजपा तेजी से राज्य में अपना विस्तार कर रही है। हर चुनाव में उसका मत प्रतिशत बढ़ रहा है। यह न तो ममता को पसंद है और न ही उनके समर्थकों को। इसलिए राज्य में भाजपा के कार्यकर्ताओं की हत्या हो रही है।
— सुमन भट्टाचार्य, पत्रकार, कोलकाता


हत्या की राजनीति का इतिहास   
पश्चिम बंगाल में हत्या की राजनीति की शुरुआत वामपंथियों ने की थी। कई दशक पहले वामपंथियों ने साईबाड़ी (बर्धमान जिले) में प्रणव साई, मलय साई व जितेंद्र नाथ राय की हत्या कर दी थी और उनके अंगूठे के खून से सने हुए चावल उनके परिवार वालों को खिलाए थे। उल्लेखनीय है कि ये लोग कांग्रेस के समर्थक थे। इसलिए उनकी हत्या की गई थी।  इसके बाद तो राज्य की राजनीति का स्वरूप ही रक्तरंजित हो गया और सत्ताधारी दलों के द्वारा अपने विरोधियों को चुन-चुनकर मारा जाने लगा। 1972 में कांग्रेस सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के समय तो भाकपा, जो उस समय मुख्य विरोधी दल था, के नेताओं को खोज-खोजकर मारा गया। 1977 में प्रदेश में पहली बार वाममोर्चे की सरकार बनी। इसके बाद वामपंथियों ने अपने विरोधियों को सरेआम मारना शुरू कर दिया। 30 अप्रैल,1982 को दक्षिण कोलकाता के बिजान सेतु पर माकपा के गुर्गों ने आनंद मार्ग के 17 संन्यासियों की हत्या कर दी। उनमें एक महिला संन्यासी भी थी। 
पश्चिम बंगाल में 34 साल तक वाम दलों की सरकार रही। इस दौरान अनगिनत राजनीतिक विरोधियों को मार दिया गया। विरोधियों को केवल इसलिए मारा गया कि वामपंथ को चुनौती देने वाली कोई विचारधारा पनप न सके। 1977 से 2011 तक वामपंथ की सरकार रही। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनी। सरकार बनते ही तृणमूल समर्थक बेलगाम हो गए। 2011 से लगातार तृणमूल के कार्यकर्ता अपने विरोधियों को मौत के घाट उतार रहे हैं। एक आंकड़े के अनुसार 1977 से 2020 तक पश्चिम बंगाल में 1,00,000 से अधिक राजनीतिक विरोधियों की हत्या वामपंथ और तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों ने की है।

2011 में जगी थी आस 
2011 में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई तो लोगों में एक बड़ी आस जगी थी कि अब राज्य में विकास होगा और राजनीतिक हत्याएं नहीं होंगी,  लेकिन हुआ इसके विपरीत। कोलकाता के जाने-माने पत्रकार सुमन भट्टाचार्य कहते हैं, ‘‘ममता बनर्जी ने माकपा के  स्कूल से पीएचडी की है। उनसे माकपा की लीक से हटकर कार्य करने की अपेक्षा करना, अपने को ही धोखे में रखना है। ममता ने माकपा की तरह ही अपने विरोधियों को निपटाना शुरू किया है। भाजपा तेजी से राज्य में अपना विस्तार कर रही है। हर चुनाव में उसका मत प्रतिशत बढ़ रहा है। यह न तो ममता को पसंद है और न ही उनके समर्थकों को। इसलिए राज्य में भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या हो रही है। इसके साथ ही ममता ने मुस्लिम तुष्टीकरण की सारी सीमाएं पार कर दी हैं।’’

भाजपा को रोकने का प्रयास

2017 में प्रदेश में हुए पंचायत चुनावों में तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने भाजपा के 27 कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्या कर दी थी। भाजपा के कई कार्यकर्ताओं को तो चुनाव के लिए नामांकन तक नहीं करने दिया गया था। भाजपा के जो नेता पंचायत चुनाव जीते हैं, उनमें से कई को तो अब तक चुनाव जीतने का प्रमाणपत्र तक नहीं दिया गया है। इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि ममता बनर्जी अपने विरोधियों को किस तरह कुचलना चाहती हैं।

भाजपा विरोधियों में खलबली
बंगाल में भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता से न केवल तृणमूल कांग्रेस में खलबली है, बल्कि वामपंथी, जिहादी और बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों में भी दहशत है। इन लोगों को लगने लगा है कि यदि बंगाल में भाजपा मजबूत होती है तो उनका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। सबसे ज्यादा डर घुसपैठियों को लग रहा है। यह डर अचानक नहीं पैदा हुआ है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में भाजपा को 39.7 प्रतिशत और 2014 के लोकसभा चुनाव में 17 प्रतिशत मत मिले थे। यही कारण है कि ममता भाजपा से परेशान हो रही हैं। इसलिए उन्होंने राज्य के मुसलमानों को भाजपा का डर दिखाना शुरू कर दिया है।

2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल में 27 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता थे, जो अब बढ़कर 35 प्रतिशत के आसपास हो गए हैं। एक अनुमान के अनुसार 90 प्रतिशत मुसलमान तृणमूल को वोट देते हैं। यह वोट बैंक मजबूती से तृणमूल के साथ खड़ा रहे, इसलिए ममता उन्हें भाजपा का डर दिखाने से कभी नहीं चूकतीं। इसके साथ ही उन्होंने अपनी छवि को धुर मोदी विरोधी बनाने का प्रयास किया है। किन्तु राज्य के हिंदुओं में स्वत: इस क्रिया की विपरीत प्रतिक्रिया दिख रही है। ममता की हिंसा और मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति से बंगाल के हिंदू परेशान हो गए हैं। ऐसे लोग भाजपा को पसंद कर रहे हैं। ममता की असली चिंता यही है। 2021 में पश्चिम बंगाल में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। ममता को लग रहा है कि यदि इसी तरह भाजपा का विस्तार होता गया तो उनकी राजनीति समाप्त हो जाएगी। इसलिए राजनीतिक विरोधियों की हत्या में तेजी आई है। 
लोग मान रहे हैं कि ममता की मार-काट की राजनीति ही उन्हें ले डूबेगी। पश्चिम बंगाल के भद्र पुरुष इसी दिन की उम्मीद लगाए बैठे हैं।