पंजाब : क्या आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पर लौटेगा अकाली दल!

    दिनांक 14-अक्तूबर-2020
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रतन शारदा
1967 के बाद इंदिरा गांधी जैसी मजबूत और जोड़-तोड़ में माहिर नेता के नेतृत्व में चले कांग्रेसी दांव-पेंच में बार-बार सत्ता गंवाने के बाद अक्तूबर 1973 में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब में एक मंथन सत्र आयोजित किया था। क्या भाजपा से गठबंधन तोड़ने के बाद वे अपने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव के बिन्दुओं की राह पर लौट जाएगा

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सरदार प्रकाश सिंह बादल ध्य(म में) के साथ सुखबीर सिंह और हरसिमरत कौर  (फाइल चित्र)

कई दशकों के बाद अकाली दल ने भाजपा के साथ भागीदारी खत्म कर दी है। यह एक सहज-स्वाभाविक गठबंधन था, जो हिंदुओं और सिखों की वंशानुगत एकता पर आधारित होने के साथ ही अलगाववादियों की शरारतों के खिलाफ सबसे अच्छी दवा रहा है। 1985 को छोड़कर दोनों दलों ने साथ में अच्छा प्रदर्शन किया है।
1967 के बाद से इंदिरा गांधी जैसी मजबूत और जोड़-तोड़ में माहिर नेता के नेतृत्व में चले कांग्रेसी दांव-पेंच में बार-बार सत्ता गंवाने के बाद अक्तूबर 1973 में अकाली दल ने आनंदपुर साहिब में एक मंथन सत्र आयोजित किया था, जिसमें पारित प्रस्ताव में कहा गया था कि ‘केंद्र के अधिकार देश की रक्षा, विदेशी संबंध, संचार, रेलवे और मुद्रा जैसे क्षेत्रों तक सीमित होने चाहिए। इनके अलावा सभी विषय पंजाब के अधिकार क्षेत्र में होने चाहिए, जिसे इन विषयों के संबंध में अपना संविधान बनाने का अधिकार होना चाहिए।’
इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि  ‘पंथ के राजनैतिक उद्देश्यों का निश्चित उल्लेख सिख इतिहास के पन्नों में दर्ज दसवें गुरु के आदेशों में है और खालसा पंथ के परिप्रेक्ष्य में इन आदेशों का उद्देश्य खालसा की श्रेष्ठता स्थापित करना है। खालसा के इस जन्मसिद्ध अधिकार को व्यावहारिक रूप देने के लिए आवश्यक वातावरण का निर्माण और एक राजनैतिक संविधान का होना आवश्यक कदम है। इस मुकाम को हासिल करने के लिए दल सभी संभव साधनों का उपयोग करेगा।’
इस प्रकार, यह प्रस्ताव धार्मिक पहचान की राजनीति के नाम पर मौजूद ऐसा हथियार है, जिसका जब जी चाहे उपयोग किया जा सकता है। उस अशांत दौर में अकालियों द्वारा निकाले गए ‘धर्म युद्ध’ मोर्चों ने पंजाब में तपिश बढ़ा दी थी, जो  खालिस्तान से जुड़े आतंकी दौर के सूत्रपात की वजह बनी।
खालिस्तान आंदोलन समाप्त होने के बाद अकाली इस मौलिक विचार पर वापस आए कि सिखों और हिंदुओं का रिश्ता नाखून-खाल जैसा मजबूत है और खालिस्तान जैसी स्थिति से बचने के लिए उन्हें मिलकर काम करने की आवश्यकता है। यह उत्कृष्ट और बुद्धिमत्ता भरा कदम था। विभाजन के दौरान भी हिंदुओं और सिखों की रक्षा के लिए अकालियों और रा.स्व.संघ ने एक साथ काम किया था। वास्तव में, मास्टर तारा सिंह ने 1949 में ए.एन. बाली की पुस्तक ‘नाउ इट कैन बी टोल्ड’ (सुरुचि प्रकाशन, दिल्ली द्वारा पुनर्प्रकाशित) की प्रस्तावना में पश्चिम पंजाब में मुस्लिम उन्मादियों के खिलाफ प्रतिरोध की असल तस्वीर पेश की थी।

अकाली अब क्या करेंगे? क्या वे उत्तेजना फैलाने को आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पर लौटेंगे? लेकिन लगता नहीं, लोग उनके झांसे में आएंगे। अकाली दल एक परिवार-आधारित पार्टी रह गया है। पंजाब वालों ने ’80-’90 के दशक में सबसे बुरे दिन देखे हैं। वे उन दिनों की पुनरावृत्ति नहीं चाहते। कार्यकर्ता-आधारित पार्टी भाजपा अपने बूते अगली चुनावी लड़ाई के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो सकती है


संगरूर में मस्तुआना साहिब गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने अगस्त 1947 में तत्कालीन सरसंघचालक श्रीगुरुजी को गुरुद्वारे में आमंत्रित करने के लिए संघ शिविर का दौरा किया था। गुरुद्वारा प्रमुख ने तब कहा था-‘यह हमारे लिए बहुत सौभाग्य की बात है कि आज हमारे पास एक महान आत्मा है, जिसने धर्म की रक्षा के लिए पवित्र रक्षासूत्र बांधा है। वह ध्यान की शक्ति से एक मजबूत बल संगठित कर रहे हैं जो निश्चित रूप से धर्म की रक्षा करेगा।’उनके संक्षिप्त भाषण के बाद गुरुजी को ‘सरोपा’ भेंट किया गया था।
लेकिन संघ और अकालियों की बढ़ती लोकप्रियता से चिढ़े नेहरू ने उन्हें कुचलने का आह्वान किया था। 26 नवंबर, 1947 को ‘द ट्रिब्यून’, दिल्ली ने एक कड़े संपादकीय में लिखा कि ‘पंडित नेहरू ने पूर्वी पंजाब सरकार को रा.स्व.संघ और अकाली दल पर प्रतिबंध लगाने और उन्हें नष्ट करने का निर्देश दिया है। यह खबर इतनी भयावह है कि इसे किसी हाल में सच नहीं होना चाहिए। और अगर यह सच है, तो इसे केवल इस देश का दुर्भाग्य कहा जा सकता है।...क्योंकि हमारे लिए पंडित नेहरू को यह याद दिलाना आवश्यक है कि अगर इन राष्ट्रवादी संगठनों ने अपनी बहादुरी के साथ क्रूर और अमानवीय पाकिस्तानियों का सामना नहीं किया होता तो हजारों हिंदू और सिख बहनों के साथ बलात्कार होता और हजारों सिख तथा हिंदू बच्चे काट दिए गए होते।...हम बलपूर्वक कहना चाहते हैं कि संघ और अकाली दल ने इस सीमावर्ती राज्य के लोगों के दिलों में अपने लिए गहरी जगह बनाई है। वहां के लोग उन्हें अपने राज्य के प्रहरी के रूप में देखते हैं।... इन संगठनों को सांप्रदायिक या निजी सेना कहना कृतघ्नता के अलावा कुछ नहीं है। भारत सरकार को उन पर गर्व होना चाहिए।’

खालिस्तान आंदोलन की तपिश के दौर को छोड़कर सामाजिक सौहार्द के हित में अकाली दल और जनसंघ या भाजपा आमतौर पर गठबंधन में रहे हैं। 1967 के बाद हुए 11 चुनावों में सात बार अकाली दल ने भाजपा/जनसंघ/जनता पार्टी के साथ मिलकर जीत हासिल की है। राज्य में आतंकवाद की पृष्ठभूमि में 1985 में राजीव गांधी-लोंगोवाल समझौते के बाद अकाली दल अपने बूते जीता था। स्पष्ट रूप से हिंदू-सिख संबंधों के बारे में इस गठबंधन का भरोसा उनके बीच नाखून-खाल का संबंध होने जैसा था।

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किसान सुधार कानून के विरोध में रेल की पटरियों पर बैठे पंजाब के किसान



पंजाब और शेष भारत में जिन लोगों की वर्षों की निष्क्रियता के कारण किसानों में असुरक्षा जड़ जमाए बैठी है, वे उन्हीं के हाथों में खेल रहे हैं। पंजाब में  लगभग सभी व्यवसायों में अकाली नेतृत्व का हाथ है। महाराष्ट्र की कृषि उत्पाद मंडी समितियों की ही तरह पंजाब की मंडियां कुछ राजनेताओं और उनके बिचौलियों द्वारा नियंत्रित और शोषित हैं

हालांकि, यह बराबरी की साझेदारी नहीं थी। पहले के गठबंधनों में भी जब जनसंघ और बाद में भाजपा के पास मजबूत नेता थे, भाजपा को शासन में वह भागीदारी नहीं मिली जिसकी वह हकदार थी। लेकिन सामाजिक एकता जैसे बड़े कारण के लिए भाजपा शिष्टता से इसे निभाती रही। इस गठबंधन पर हमेशा हावी रहे पितृतुल्य व्यक्तित्व प्रकाश सिंह बादल की चतुर राजनीति के कारण भाजपा अपने घटकों और मतदाताओं का ध्यान नहीं रख सकी। समर्थकों को भाजपा नेताओं से हमेशा शिकायत रही कि वे नागरिकों की वित्त या शिक्षा जैसे क्षेत्रों से जुड़ी समस्याएं सुलझाने में भी अक्षम हैं। भाजपा नेताओं और समर्थकों के साथ लगभग संरक्षितों जैसा या अपमानजनक व्यवहार किया जाता था। पिछले दो चुनावों में संतुलन बनाए रखने के लिए भाजपा को कड़ी मेहनत करनी पड़ी थी, क्योंकि पहले के चुनावों के बाद अपेक्षानुरूप कुछ ठोस न होने के कारण उसके मतदाता अकाली दल से नाखुश थे। कहा जाता है कि उभरते हुए तत्कालीन सिख भाजपा नेता नवजोत सिंह सिद्धू को पीछे धकेलने के लिए ही स्व. अरुण जेटली को अमृतसर से चुनाव लड़ने के लिए उकसाया गया था, लेकिन फिर उनका भी साथ छोड़ दिया गया था। वह हार भाजपा के लिए शर्मनाक थी लेकिन गठबंधन बचाए रखने के लिए किसी ने इस बारे में शिकायत नहीं की।
इस वक्त स्पष्ट है कि राष्ट्रीय और राज्य के मुद्दों पर कैप्टन अमरिन्दर सिंह के रवैये ने उन्हें पंजाब के लोगों के बीच लोकप्रिय बना दिया है। पंजाब के नागरिक अच्छी तरह जानते हैं कि उम्र के दबाव में कैप्टन राजकाज में तो ज्यादा मेहनत नहीं करते हैं, लेकिन एनआरआई, खालिस्तानियों, पाकिस्तान और राष्ट्रीय एकीकरण के बारे में उनका नजरिया साफ तौर पर सराहनीय है। अकालियों को लगता है कि अगर वे इस मौके पर चुप रहे तो कांग्रेस को उन पर और बढ़त मिल सकती है। इसलिए, उन्होंने बहुत प्रगतिशील किसान सुधार कानून पर भाजपा का साथ छोड़ देने का आसान रास्ता चुना। दुर्भाग्य से, पंजाब और शेष भारत में जिन लोगों की वर्षों की निष्क्रियता के कारण किसानों में असुरक्षा जड़ जमाए बैठी है, वे उन्हीं के हाथों में खेल रहे हैं।
यह बात सभी को मालूम है कि राज्य के लगभग सभी व्यवसायों में अकाली नेतृत्व का हाथ है, खासतौर पर राज्य सरकार द्वारा संचालित रहे व्यवसायों में। राज्य में सड़क परिवहन के निजीकरण का लाभ शीर्ष अकाली नेताओं और उनके परिवारों को मिला है। खोजी पत्रकारों से अनुरोध है कि वे जाएं और पता लगाएं कि राज्य में ज्यादातर बसों और ट्रॉलियों का मालिक कौन है। महाराष्ट्र की कृषि उत्पाद मंडी समितियों की ही तरह पंजाब की मंडियां इन राजनेताओं और उनके बिचौलियों द्वारा नियंत्रित और शोषित हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आश्वासन के बावजूद कृषि विधेयकों के विरोध का यही कारण है। अकालियों और कांग्रेस को अच्छी तरह से पता है कि कुछ परेशानियों के बाद, पेप्सी पंजाब के किसानों के साथ बढ़िया व्यवसाय कर रही है और वे खुश हैं। ऐसे में नए कानून में बेहतर सुरक्षा के साथ अनुबंध खेती का वे विरोध क्यों कर रहे हैं?
लगता है कि अकाली दल ने इस तथ्य की अनदेखी की है कि भाजपा के समर्थन के बिना उसे बहुमत नहीं मिल सकता। भाजपा जानती है कि अलोकप्रिय अकाली दल की सहयोगी होने के कारण उसे नुकसान पहुंचा है। केवल राज्य के हित में दोनों ने गठबंधन को जीवित रखा था। अब, अगर तात्कालिक लाभ के लिए अकालियों ने भाजपा का साथ छोड़ने का फैसला किया है तो उन्हें भाजपा से ज्यादा परेशानी होगी। गठबंधन न होने की स्थिति में भाजपा का वोट बैंक अकाली दल को हस्तांतरित नहीं होगा और अंतिम लाभ कांग्रेस को मिलेगा।
ऐसे में, अकाली अब क्या करेंगे? क्या वे उत्तेजना फैलाने के लिए वापस आनंदपुर साहिब प्रस्ताव की ओर जाएंगे? लेकिन शक है कि लोग उनके झांसे में आएंगे। पंजाब वालों ने 1980-90 के दशक में सबसे बुरे दिन देखे हैं। वे उन दिनों की पुनरावृत्ति नहीं चाहते। यही वजह है कि अकाली दल न सिर्फ वोट खोएगा, बल्कि धारणा की लड़ाई भी हार सकता है। भाजपा एक कार्यकर्ता-आधारित पार्टी है और यह अपने बूते कायम रहकर अगली चुनावी लड़ाई के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो सकती है। अकाली दल एक व्यावसायिक परिवार-आधारित पार्टी रह गया है। किसी तरह की गलतफहमी सुखबीर बादल और राज्य के लिए खतरनाक परिणाम ला सकती है। उम्मीद है, अकाली नेतृत्व ने अपने कार्यों के नतीजों के बारे में ठीक से विचार कर लिया होगा।      (लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार हैं)