गेशे जम्पा उपन्यास की तेरहवीं कड़ी

    दिनांक 19-अक्तूबर-2020
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नीरजा माधव
हमारे देश में तिब्बती शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या है। चीन की विस्तारवादी नीति के परिणामस्वरूप एक अहिंसक धार्मिक देश तिब्बत पराधीन हो गया। 1959 में इसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला जब तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष परम पावन दलाई लामा को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपना देश छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी। भारत में रहने वाला तिब्बती समुदाय तिब्बत में चीनी सत्ता से संघर्षरत तिब्बतियों की सबसे बड़ी ताकत है। 19वीं सदी के अन्त तक तिब्बत स्वतंत्र था। इसके राजनैतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्न पर छाई वैश्विक चुप्पी को तोड़ने और उन्हें स्वाधीनता दिलाने की जद्दोजहद से पूरे है सुप्रसिद्ध लेखिका नीरजा माधव लिखित भारत में हिन्दी का पहला उपन्यास-गेशे जम्पा। प्रस्तुत है इस उपन्यास की तेरहवीं कड़ी
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मैं अंदर आ जाऊं माई? देवयानी ने भिक्षुणी लोये दोलमा से पूछा था। हां, आ जाइए देवयानी। दोलमा का दुर्बल स्वर सुनकर देवयानी चौंक उठी। क्या हुआ माई? तबियत तो ठीक है न? क्यों बुलाया था मुझे? देवयानी ने कई प्रश्न कर डाले। माई, मिग्मर लामा गए थे बुलाने। क्या तबियत अधिक गड़बड़ लग रही थी? नहीं, पहले से आराम तो है, पर कमजोरी बहुत लग रही है, चार कदम बाथरूम जाती हंू तो सांस फूलने लगती है। दोलमा हांफ-सी रही थी। ‘‘क्या करना है, मैं कर दूं।’’ ‘‘करना कुछ नहीं है बेटा, बस कल इन बच्चों को लेकर तिब्बती शोध-केंद्र में चली जाना । वहां लोसर मनाया जा रहा है। हर वर्ष मैं इन लोगों को लेकर जाती हंू।’’ पर माई, वह तो देर रात तक चलता होगा? ‘‘इसीलिए तो कह रही हंू कि कोई जिम्मेदार व्यक्ति साथ रहेगा तो ठीक रहेगा। छोटे-छोटे बच्चे हैं।’’
क्या गेशे जम्पा सर नहीं जाएंगे? अकस्मात् देवयानी पूछ बैठी। दोलमा ने कहा- दरअसल, वे अध्यक्ष हैं न, इस तरह के समारोह में वे शामिल नहीं होते। क्यों? कोई नियम है क्या आप लोगों में? नहीं बेटा, कोई नियम नहीं है। बस, एक तो हमें इस बात का एहसास करते रहना है कि हम परतंत्र हैं, इस देश में शरणार्थी हैं। दूसरे इसलिए भी कि बड़े पदाधिकारी समारोह में सम्मिलित होंगे तो बच्चे और युवा उत्साह और मौज-मस्ती के साथ अपना लोसर नहीं मना पाएंगे। इसीलिए हर वर्ष इस खास मौके पर गेशे जम्पा कहीं बाहर चले जाते हैं ताकि लोगों की खुशी में कोई बाधा न महसूस हो। ओह, यह तपस्या भी करते हैं वे-देवयानी के होंठों से नि:श्वास के साथ एक वाक्य निकला था। क्या करें बेटा, एक ऐसे समय में पैदा हुए हैं तो अपनी खुशियों का त्याग तो करना ही पड़ेगा। दोलमा की दृष्टि छत से चिपक गई थी। वह अब देवयानी की ओर एकटक देख रही थी। मैं सब बच्चों की माई हंू, माने मां। समय-समय पर अपने-अपने ढंग का आकार लेता हुआ होता है उसका व्यक्तित्व, पर गेशे जम्पा एक गरिमापूर्ण पद पर हैं बेटी। उसके अस्तित्व को मनचाहा आकार देना उचित नहीं और ऐसा किया भी नहीं जा सकता। अपने ही समाज की दृष्टि में और सबसे बड़ी बात, अपनी ही दृष्टि में गिर जाने का डर होता है। कौन-सा तिब्बती वर्ष है माई यह? देवयानी ने पूछा। टेलो। ठीक है माई। मै कल शाम को आ जाऊंगी बच्चों को ले जाने। आज जा रही हूं गेला को शुभकामना देने। वह उठ खड़ी हुई थी।
भिक्षुणी दोलमा ध्यान से देवयानी को देख रही थी। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आज तक किसी ने गेशे जम्पा को इस तरह ढंूढकर शुभकामना क्यों नहीं दी? जाऊं माई? वह अनुमति मांग रही थी। जल्दी में हो देवयानी? दोलमा ने प्रश्न के उत्तर में दूसरा प्रश्न छोड़ दिया था। कुछ देर बैठो। बात करने से मेरी बीमारी भी हल्की हो गई है। भिक्षुणी के मुरझाए चेहरे पर फीकी-सी हंसी दौड़ पड़ी थी।
मैं जाऊं मैम? लामा मिग्मर पूछ रहे थे। वे अभी तक कक्ष में बाहर खड़े थे। जी हां, जा सकते हैं आप लामा। बात करने में याद ही नहीं रहा कि आप अभी तक खड़े हैं। देवयानी ने कहा। बैठना हो तो बैठो मिग्मर। दोलमा ने हाथ से कुर्सी की ओर इशारा किया। नहीं माई। चलूं, जरा कुछ काम है। अच्छा। दोलाम की अनुमति पा मिग्मर चले गए थे।
इतनी कम उम्र में यह संन्यासी वेश देखकर मेरा मन बहुत उद्वेलित होता है माई। देवयानी जाते हुए मिग्मर को देखते हुए बोली।


धर्म देश, काल ,परिस्थितियों से प्रभावित होगा है। तथागत का यह सिद्धान्त तिब्बत में जाकर किसी दूसरे रूप में फैला, अन्य देशों में भी उसका स्वरूप थोड़ा-बहुत परिवर्तित जरूर हुआ। मैं भारत आई तो एक नई दृष्टि विकसित हुई। धर्म को वास्तविक रूप में पहचाना मैंने। सभी तंत्र-मंत्र और आडंबर से दूर। दोलमा की आंखों में शान्ति की अनुभूति थी


क्यों, यह तो त्याग और तपस्या की बात है। दोलमा ने स्पष्ट किया। फिर भी, इतनी कम उम्र में ही सांसारिक माया-मोह से विरक्त होने का बीड़ा उठाना, क्या कम कष्ट की बात है? हमारे यहां तो इसे अच्छा मानते हैं। हर परिवार का कम से कम एक बच्चा तो अवश्य ही भिक्षु बन जाता है। दोलमा गर्व से बता रही थी। लेकिन माई, क्षमा करिएगा, एक बात पूछ रही हूं-क्या सभी के भीतर से मानवीय दुर्बलताएं समाप्त हो जाती होंगी? देवयानी ने दोलमा के सम्मुख एक बहुत ही उलझा-सा प्रश्न फेंका था उत्तर देने के लिए। दोलमा कुछ क्षण मौन रही, फिर मद्धिम स्वर में बोलीं-मनुष्य है तो मानुषिक दुर्बलताएं भी अवश्य रह-रहकर सिर उठाती हैं, पर उन पर आचार, विचार, संयम के द्वारा विजय प्राप्त करना ही तो इस पथ का कर्म है। जो हार जाता है उन दुर्बलताओं से, उनके लिए दूसरा रास्ता खुला रहता है। ऐसी कोई अभेद्य दीवार नहीं है जिसे इधर से उधर लांघा न जा सके। हम लोगों के यहां तो गृहस्थ धर्म को भी उच्च स्थान देते हुए कहा गया है कि यही सच्ची तपस्या है। एक ही व्यक्ति के जीवन में चारों आश्रमों का पालन अनिवार्य माना गया है।
देवयानी, मुझे लगता है कि धर्म देश, काल, परिस्थितियों से प्रभावित होगा है। तथागत का यह सिद्धान्त तिब्बत में जाकर किसी दूसरे रूप में फैला, अन्य देशों में भी उसका स्वरूप थोड़ा-बहुत परिवर्तित जरूर हुआ। मैं भारत आई तो एक नई दृष्टि विकसित हुई। धर्म को वास्तविक रूप में पहचाना मैंने। सभी तंत्र-मंत्र और आडंबर से दूर। दोलमा की आंखों में एक शान्ति की अनुभूति थी। माई, एक बात पूछंू। बुरा नहीं मानेंगी न? देवयानी के दोनों हाथ जुड़े हुए थे।
पूछो देवयानी, संकोच कैसा? दोलमा ने लेटे-लेटे अपनी दोनों हथेलियों में उसके जुड़े हुए हाथों को भर लिया। आपके इस जीवन को देखकर बड़ी श्रद्धा उमड़ती है और साथ ही जिज्ञासा भी। देवयानी कुछ पूछने की भूमिका बना रही थी। दोलमा उसकी ओर देख मुस्करा रही थी।
आप भिक्षुणी कब बनीं? उसने प्रश्न किया।
तुम्हारी उम्र की रही होऊंगी। भिक्षुणी दोलमा का शान्त
स्वर गूंजा।
क्यों? क्या जीवन से कोई आसक्ति एकाएक समाप्त हो गई?
उलझा-सा प्रश्न है बेटा। उत्तर फिर कभी दूंगी। भिक्षुणी दोलमा का हाथ निढाल-सा देवयानी की गोद में पसर गया था जिसमें एक आत्मीयता सी छिपी थी और विवशता भी।
ठीक है माई। मैं फिर कभी पूछंूगी जब आप स्वस्थ होंगी। आज बस इतना बता दीजिए कि आप भिक्षुणी बनने के बाद भारत आई थीं या यहां आकऱ.़..। देवयानी की जिज्ञासा समाप्त नहीं हुर्ह थी। तय करके ही आई थी यहां। भिक्षुणी का एक संक्षिप्त-सा उत्तर कई और उत्सुकताएं जगा गया था मन में देवयानी के, पर यह उचित समय नहीं था पूछने का।
ओह! केवल एक शब्द निकला था देवयानी के मुख से और कुछ क्षण के लिए कक्ष में सन्नाटा-सा पसर गया था। देवयानी अपनी गोद में पड़े माई दोलमा के हाथ को धीरे-धीरे सहलाने लगी थी। चलूं, माई। फिर किसी दिन आपके पास बैठूंगी और आपकी पिछली जिंदगी के पन्ने पलटूंगी। वह मुस्कराई थी।
क्या पलटना चाहती हो? कोई प्रयोजन है? भिक्षुणी के शान्त चेहरे पर एक दुर्बल मुस्कुराहट रेंग उठी। कोई खास प्रयोजन नहीं है। बस, उत्सुकता होती है आपके बारे में जानने की, गेला के बारे में जानने की या यूं कहिए, सभी के बारे में जानने की क्योंकि एक अलग-अलग कहानी लिखी है सभी के अतीत के पन्नों पर। उसे ही पढ़ना चाहती हूं। देवयानी ने भोलेपन से कहा तो भिक्षुणी हंस पड़ी।
 मैंने तो उनमें से कई पन्नों को एक साथ जोड़कर चिपका दिया है ताकि हवा के झोकों से फड़फड़ाकर खुल न जाएं। इसलिए कैसे पढ़ सकोगी पूरी कहानी? शुरू और अन्त से बीच का अनुमान लगा लूंगी। फिर भी कहानी पूरी तो न होगी। एक बाल सुलभ हंसी थिरकी माई के होंठों पर।
प्रयास करूंगी कि उन पन्नों को धीरे-से अलग करके पढ़ लूं पूरी कहानी। देवयानी भी चंचल हो उठी। बहुत शैतान हो तुम। भिक्षुणी ने मीठी झिड़की दी। चलूं माई? देखती हूं, यदि गेला से भेंट हो जाए। वह उठ खड़ी हुई और अभिवादन में हाथ जोड़ दिए।
देवयानी के जाते ही कक्ष में एकान्त पसर गया था। भिक्षुणी लोये दोलमा ने आंखें मूंद ली थीं और उनका दूर-दूर तक का फैला अतीत दो पनीली सीपियों में सिमटकर कैद हो गया था।
लोये! ओ लोये! उसकी सबसे प्रिय सहेली पासंग दौड़ती हुई उसके पास आ गई थी।
क्या है री पासंग! इस तरह हांफ क्यों रही है? क्या कोई भूत-प्रेत देख लिया? क्युछु नदी के तट पर बालू और छोटे-छोटे पत्थरों से बने एक ऊंचे स्थान पर बैठी लोये ने पूछा था।       (जारी...)