मीडिया की मारामारी

    दिनांक 19-अक्तूबर-2020
Total Views |
रवि पाराशर

मुंबई पुलिस के अनुसार कुछ चैनल अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए दर्शकों को पैसे का लालच दे रहे हैं। माना कि किसी भी चैनल के लिए टीआरपी जरूरी है, लेकिन इसके लिए लोभ का सहारा लेना ठीक नहीं है, इससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता कम हो रही है 

6n0_1  H x W: 0

आजादी के बाद से अभी तक बहुत-से घोटालों की चर्चा होती रहती है। अब एक नई तरह का घोटाला सुर्खियों में है, जिसे टीआरपी घोटाला कहा जा रहा है। वैसे तो यह नया घोटाला नहीं है, लेकिन पहले कभी इसकी इतनी चर्चा नहीं हुई। टीआरपी यानी ‘टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट’ वह आंकड़ा होता है, जिसके आधार पर विज्ञापन बाजार में टीवी चैनलों की लोकप्रियता और साख निर्धारित होती है। कंपनियों के उत्पादों के एक ही विज्ञापन की दर अलग-अलग टीवी चैनलों के लिए इसी टीआरपी के आधार पर अलग-अलग होती है। यही कारण है कि टीवी चैनलों में टीआरपी में अव्वल आने की होड़ लगी रहती है।

इंडिया टुडे बनाम रिपब्लिक
मुंबई के पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह ने हिंदी समाचार चैनल रिपब्लिक टीवी और मराठी भाषा के दो चैनलों पर फर्जी तरीके से टीआरपी बढ़ाने के आरोप का रहस्योद्घाटन किया, तो मीडिया जगत में खलबली मच गई। हालांकि कथित टीआरपी घोटाले का खुलासा कर खुद परमबीर सिंह भी आरोपों के घेरे में आ गए हैं। टीआरपी जारी करने वाली संस्था बार्क(ब्रॉडकास्ट आॅडियंस रिसर्च काउंसिल) के लिए काम करने वाले ‘हंसा रिसर्च ग्रुप’ ने जो एफआईआर दर्ज कराई थी, उसमें अंग्रेजी के चैनल ‘इंडिया टुडे’ (आजतक) पर टीआरपी में गड़बड़ी का आरोप था। लेकिन मुंबई पुलिस आयुक्त ने मीडिया के सामने दावा किया कि जांच में ‘इंडिया टुडे’ चैनल पर आरोपों का सत्यापन नहीं हुआ। उन्होंने रिपब्लिक टीवी पर आरोप लगाकर अलग ही राग अलाप दिया और इस तरह टीआरपी की जंग ने नया मोड़ ले लिया।
टीआरपी यानी ‘टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट’ वह आंकड़ा है, जिसके आधार पर विज्ञापन बाजार में टीवी चैनलों की लोकप्रियता और साख निर्धारित होती है। कंपनियों के उत्पादों के एक ही विज्ञापन की दर अलग-अलग टीवी चैनलों के लिए इसी टीआरपी के आधार पर अलग-अलग होती है। यही कारण है कि टीवी चैनलों में टीआरपी में अव्वल आने की होड़ लगी रहती है

वैसे यह अपनी तरह का पहला मामला है, जब शिकायतकर्ता ने नामजद एफआईआर कराई हो और पुलिस ने जांच के नाम पर आरोपित को दोषमुक्त करते हुए आरोप को किसी दूसरे के ही सिर मढ़ दिया हो। हंसा रिसर्च ग्रुप ने पुलिस में शिकायत करने से पहले अपने स्तर पर भी जांच अवश्य की होगी। इंडिया टुडे चैनल का नाम कंपनी को सपने में नहीं आया होगा। पुलिस आयुक्त सही हैं और अगर हंसा ने गलत रपट लिखाई थी, तो मुंबई पुलिस ने उसके खिलाफ अभी तक नियमानुसार कार्रवाई क्यों नहीं की? ‘इंडिया टुडे’ या ‘आजतक’ भी हंसा के विरोध में मुखर नहीं हुए हैं। जाहिर है कि दाल में कुछ काला जरूर है। 
मुंबई पुलिस आयुक्त के संवाददाता सम्मेलन के हवाले से इंडिया टुडे का सहयोगी न्यूज चैनल आजतक आनन-फानन में रिपब्लिक चैनल पर कीचड़ उछालने लगा, तो रिपब्लिक ने भी पलटवार में देर नहीं की और मामले को सर्वोच्च न्यायालय  ले गया। रिपब्लिक की दलील है कि क्योंकि सुशांत सिंह की मृत्यु के मामले में उसने मुंबई पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाए थे, इसलिए पुलिस आयुक्त ने उसे ‘रंजिशन’ फंसाने का प्रयास किया है। यहां यह भी जान लीजिए कि पिछले डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय तक ‘आजतक’ टीआरपी में अव्वल आता रहा है, लेकिन सुशांत सिंह मामले में खास तरह की रपट के कारण रिपब्लिक उसे पछाड़ कर शिखर पर पहुंच गया। इस वजह से रिपब्लिक और आजतक की जंग को समझा जा सकता है। बाकी न्यूज चैनल भी इस जंग में कूदे हैं और ‘मेरा कॉलर ज्यादा सफेद’ यह साबित करने के लिए ढेर सारी कालिख एक-दूसरे पर उलीची जा रही है। किसी को इस बात की चिंता नहीं है कि आखिरी तौर पर इससे दामन तो पत्रकारिता का ही काला हो रहा है।    

मुंबई, दिल्ली बनाम पूरा देश
मौजूदा टीआरपी प्रकरण से टीवी मीडिया के कर्म और ‘कंटेंट’ को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं या कहें कि इसने कई पुराने सवालों पर से धूल की मोटी परतें झाड़ दी हैं। पहला प्रश्न तो यही है कि क्या मौजूदा टीआरपी व्यवस्था तर्कसंगत है? बार्क  से पहले टैम टीआरपी की गणना करती थी। भारत जैसे विशाल देश में टैम के सिर्फ 8,000 मीटर के माध्यम से टीवी चैनलों की लोकप्रियता का आकलन किया जाता था। इनमें से 6,000 से ज्यादा मीटर देश के पांच बड़े शहरों में थे। सबसे ज्यादा मीटर मुंबई और उसके बाद दिल्ली में थे। जाहिर है कि न्यूज चैनलों की सामग्री में इन दोनों महानगरों का महत्व बहुत ज्यादा था, जो आज भी है।
आज देश में करीब 20 करोड़ परिवार टीवी देखते हैं, लेकिन बार्क ने पूरे देश में सिर्फ 44,000 मीटर लगा रखे हैं। 2021 तक इनकी संख्या 55,000 किए जाने का लक्ष्य है। घरों के बाहर जैसे मॉल, रेस्तरां इत्यादि में भी बार्क ने सिर्फ 1,050 मीटर लगाए हैं। बार्क की करीब 35 से 40 प्रतिशत टीआरपी गणना मुंबई और दिल्ली के आंकड़ों पर ही आधारित होती है। बिहार जैसे बड़े राज्य का महत्व करीब एक-डेढ़ प्रतिशत ही है जबकि बहुत से राज्यों का महत्व है ही नहीं। यही कारण है कि मुंबई और दिल्ली का मौसम या कोई छोटी-सी घटना, वारदात टीवी पर बड़ी खबर बन जाती है। यही कारण है कि न्यूज चैनलों को ग्रामीण भारत दिखाई नहीं देता और इसी वजह से देश के दूरदराज के इलाकों से जुड़े बड़े और सकारात्मक समाचार राष्टÑीय न्यूज चैनलों पर जगह नहीं बना पाते। इसी के चलते देश में निजी  न्यूज चैनल व्यवसाय शुरू होने पर हर कथित राष्ट्रीय चैनल ने हर राज्य अथवा क्षेत्र में ब्यूरो खोले, लेकिन धीरे-धीरे कुछ को छोड़कर ज्यादातर बंद कर दिए गए। यह सोचकर आश्चर्य होता है कि टीवी चैनलों में केवल कुछ हजार मीटरों के आधार पर अरबों-खरबों रुपए के विज्ञापनों का बंटवारा हो जाता है।

6n07_1  H x W:
टीआरपी घोटाले के आरोप में गिरफ्तार एक आरोपी

स्मार्ट फोन और इंटरनेट की वजह से अब युवा वर्ग ने टीवी से दूरी बना ली है। सेवानिवृत्त हो चुके  लोग, गृहिणियां और सुबोध बच्चे ही टीवी चैनलों के असली दर्शक हैं। लेकिन अफसोस की बात है कि इस लक्ष्य समूह के लिए समाचार  चैनलों पर कुछ  खास सामग्री नहीं है

धूमिल होती संपादक की गरिमा

टीआरपी की त्रुटिपूर्ण व्यवस्था के कारण न्यूज चैनलों की विषय-वस्तु पर गंभीर असर पड़ रहा है। समाचार जगत में किसी समय संपादक बहुत महत्वपूर्ण पद हुआ करता था। अब किसी चैनल के प्रबंधन को संपादक की योग्यता से कोई सरोकार नहीं है। संपादक कितना ही योग्य हो और सु-समाज के निर्माण के लिए उसकी सकारात्मक सोच कितनी भी प्रखर और मुखर हो, कोई मायने नहीं रखती। अगर संपादक प्रचलित हथकंडों से टीआरपी स्थिर रख सकता है या उसमें सुधार कर सकता है, तो यही उसकी सबसे बड़ी योग्यता है। विज्ञापन पाने के लिए संपादक अगर किसी के सामने हाथ फैलाएगा, तो विज्ञापन मिल जाने के बाद वह फिर कभी विज्ञापनदाता के किसी गलत काम पर सवाल भी नहीं उठा पाएगा। समाचार माध्यमों का असल उत्तरदायित्व समाज निर्माण के लिए जिम्मेदार स्तंभों की कमियों की तरफ स्पष्ट संकेत करना होना चाहिए। साथ ही सकारात्मक, सुखद और सद्भावनापूर्ण वातावरण बनाने का काम भी मीडिया का है। एक शब्द में कहें, तो ‘अंत्योदय’ की दिशा में देश का मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है, लेकिन वह टीआरपी के युद्ध में ही उलझ कर रह गया है। अधिकांश न्यूज चैनल आज सामाजिक मूल्यों में क्षरण का माध्यम बन कर रह गए हैं। समाज के बहुआयामी विकास और नागरिकों को नीतिवान बनाए रखने में समाचार सशक्त माध्यम हो सकते हैं, लेकिन टीआरपी ने समाचार और संपादकों को उनके कर्तव्यों से भटका दिया है।



पत्र-पत्रिकाओं के  प्रसार में गड़बड़ी

टीवी चैनलों में अगर दर्शक संख्या या अधिक समय तक देखे जाने के मामलों में अनियमितताएं उजागर हो रही हैं, तो पत्र-पत्रिकाओं के प्रसार में भी गड़बड़ियों की बात गाहे-बगाहे सामने आती रहती है। किसी अखबार की एक प्रति के प्रकाशन पर जितना खर्च आता है, उससे बहुत कम मूल्य पर वह आपके घर पहुंचता है, तो इसका प्रमुख कारण उसमें छपने वाले विज्ञापन ही होते हैं। विज्ञापनों की आय से ही पत्र-पत्रिकाएं अपने खर्च निकालकर मुनाफा कमाती हैं। जिस अखबार का प्रसार ज्यादा होता है, उसके यहां छपने वाले विज्ञापन की दर भी ज्यादा होती है। लेकिन पत्र-पत्रिकाएं एक सीमा से अधिक प्रसार संख्या नहीं बढ़ातीं, क्योंकि फिर कागज और छपाई महंगी होने के कारण प्रकाशित होने वाली हर प्रति की लागत बहुत बढ़ जाती है। केंद्र और हर राज्य का डीएवीपी यानी विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय हर महीने करोड़ों रुपए के विज्ञापन जारी करता है। चंद प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं को छोड़ दें, तो हजारों की संख्या में ऐसे पत्र-पत्रिकाओं को भी सरकारी विज्ञापन मिलते हैं, जिनकी उतनी ही गिनी-चुनी प्रतियां प्रकाशित की जाती हैं, जितनी सरकारी रिकॉर्ड और आॅडिट इत्यादि के लिए आवश्यक होती हैं। यह सारा खेल अधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं है। प्रसार या टीआरपी का खेल कब बंद होगा, पता नहीं। लेकिन इतना अवश्य पता है कि पत्र-पत्रिकाओं ने अपनी प्रतिष्ठा को उतना नहीं गिरने दिया, जितनी न्यूज चैनलों ने गिरा दी है। पत्रकारिता या पत्रकार शब्द भी पत्र-पत्रिकाओं से ही उपजे थे। आज टीवी और डिजिटल माध्यम के दौर में भी अगर पत्रकार शब्द जीवित है, तो पत्र-पत्रिकाओं की प्रतिष्ठा के अपेक्षाकृत बरकरार रहने की वजह से।



टीआरपी प्रणाली क्यों दुरुस्त नहीं?
बार्क से पहले 2014-15 तक टैम के मीटर चुनिंदा घरों के टीवी सेट से जोड़े जाते थे। तब भी टीआरपी घोटाले की चर्चा होती थी। 2004 में तो सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी संसदीय स्थायी समिति में यह मामला उठाया गया था। तत्कालीन कांग्रेस सांसद और पूर्व आईपीएस अधिकारी निखिल कुमार की दलील थी कि टीवी चैनलों और विज्ञापनदाताओं को इस बारे में सही जानकारी हासिल नहीं हो पाती कि भारतीय नागरिकों की टीवी देखने की प्रवृत्ति असल में क्या है? समिति ने माना कि टीआरपी व्यवस्था  सही नहीं है। इसका दायरा बहुत कम होने की वजह से टीआरपी प्रणाली बहुत भरोसेमंद नहीं है। अब बार्क की तरह तब टैम का भी दावा था कि उसके मीटर कहां लगाए गए हैं, इसकी जानकारी केवल उसके कर्मचारियों को ही होती है। लेकिन हम जानते हैं कि लालच बुरी बला है और जो कर्मचारी नौकरी छोड़ देते हैं, वे इसकी जानकारी किसी और को नहीं देंगे, इसका दावा नहीं किया जा सकता है। मौजूदा टीआरपी घोटाले की एफआईआर में भी हंसा रिसर्च ग्रुप के पूर्व कर्मचारियों की ही करतूत की शिकायत की गई है।
टैम के समय बहुत संभव था कि मीटर वाले घरों का पता लगाकर उन्हें चुनिंदा चैनल चलाए रखने के लिए आर्थिक लोभ दिया जाए और अपनी टीआरपी बढ़ा ली जाए। तब और अब में फर्क सिर्फ इतना है कि पहले टैम मीटर (इसे पीपुल मीटर भी कहते हैं) टीवी से जोड़ा जाता था और उसमें दर्ज जानकारी घरों में जाकर जुटाई जाती थी। टैम का दावा था कि मीटर लगवाने के बदले में लोगों को कोई शुल्क नहीं दिया जाता था। प्रश्न यह है कि कोई व्यक्ति फिर क्यों मीटर लगवाने में रुचि लेगा? दूसरी बात यह थी कि मीटर वाले घरों के टीवी वाले कमरे में टैम के कर्मचारियों को हफ्ते में कई बार आंकड़े एकत्र करने के लिए जाना होता था। ऐसे में कोई मध्य या उच्च वर्गीय परिवार क्यों पीपुल मीटर लगवाने की परेशानी मोल लेगा? साफ है कि तब ज्यादातर मीटर निम्न और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में ही लग पाते होंगे, वह भी बिना कुछ लिए-दिए नहीं। अर्थ यह हुआ कि टीआरपी की गणना की मूल भौतिक व्यवस्था में ही भ्रष्ट आचरण अंतर्निहित था।
बार्क की नई प्रणाली में हर चैनल को एक खास आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) दी जाती है। रिमोट में एक खास बटन होता है, जिसे दबाने के बाद दर्शक जो भी चैनल देखता है, जितने समय देखता है, उसकी जानकारी चैनल के कार्यालय में दर्ज हो जाती है। बार्क का दावा यह भी है कि वह घर-घर जाकर थोड़े बड़े आकार में सर्वेक्षण भी करता है। लेकिन अब साफ हो गया है कि तब भी लालच बुरी बला थी और अब भी लालच बुरी बला ही है।


6n07_1  H x W:

पहले क्यों दिखते थे नाग-नागिन?
प्रसंगवश यह भी जान लें कि डीटीएच (डायरेक्ट टू होम) प्रौद्योगिकी से पहले जब केबल टीवी यानी ‘एनालॉग’ का जमाना था, तब टीआरपी बढ़ाने के लिए दूसरे हथकंडे अपनाए जाते थे। केबल आॅपरेटरों को उपकृत कर न्यूज चैनल वाले अपना चैनल किसी लोकप्रिय फिल्म या मनोरंजन चैनल के आसपास ‘सेट’ करा देते थे। फिल्म या कोई धारावाहिक देखते समय ब्रेक होने पर दर्शक इधर-उधर न्यूज चैनल कुछ देर के लिए लगा लेते थे। जब उन्हें वहां सांप-छछूंदर, नाग-नागिन का खेल जैसा कुछ दिखाई देता, तो वे कुछ देर के लिए उत्सुकतावश वहां रुक भी जाते थे। याद कीजिए कि एक दौर में न्यूज चैनलों पर समाचारों की बजाए इस तरह की सामग्री ही परोसी जाती थी। इसकी वजह टीआरपी ही थी। अब डीटीएच के जमाने में खास तरह के चैनलों के अलग-अलग मुहल्ले बन गए हैं, लिहाजा उस तरह का भ्रष्टाचार अब संभव नहीं है।

विकल्पहीनता के कारण गड़बड़ी!
टीआरपी की गणना सिर्फ न्यूज चैनलों की नहीं, सारे चैनलों की होती है। लेकिन साफ है कि यह टीवी चैनलों की लोकप्रियता तय करने का सही पैमाना नहीं है। कुछ हजार दर्शकों की टीवी देखने की आदत हजारों-लाखों करोड़ रुपए के विज्ञापन बाजार की बंदरबांट करा देती है, तो यह सही कैसे हो सकती है? फिर टीआरपी में हेरफेर नहीं होता, अब तो यह भी विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता। नमूने की बेहद सीमित संख्या के कारण ही उसे प्रभावित करने की गुंजाइश भी बढ़ जाती है। केंद्र और राज्य सरकारें जन-कल्याण की योजनाओं के विज्ञापनों पर हजारों करोड़ रुपए खर्च करती हैं। लेकिन जन-कल्याण से जुड़े समाचार टीवी चैनलों पर कितने दिखाए जाते हैं? असल समस्या यही है कि पहले टैम का कोई विकल्प नहीं था और अब बार्क का कोई विकल्प नहीं है।
बार्क में टीवी चैनल उद्योग के ‘इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन’ के साथ ही ‘इंडियन सोसाइटी आॅफ एडवर्टाइजर्स’ और ‘एडवर्टाइजिंग एजेंसी एसोसिएशन आॅफ इंडिया’ शामिल हैं। सवाल यह है कि क्या विज्ञापनदाताओं को इस बात की फिक्र नहीं है कि वे भ्रामक मानकों पर आधारित टीआरपी पर भरोसा कर अरबों रुपए विज्ञापन चलवाने के लिए खर्च कर रहे हैं? अंतत: ये अरबों रुपए देश के नागरिकों की जेब से ही निकलने होते हैं, क्योंकि लागत, उत्पादन व्यय, प्रचार और वितरण व्यय और लाभ इत्यादि जोड़कर ही उत्पादों का अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) तय किया जाता है। टीवी चैनल मालिकों के लिए भी आमदनी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्हें अपने कर्मचारियों-अधिकारियों को अच्छा वेतन और सुविधाएं देनी हैं और लाभ भी कमाना है।


6n09_1  H x W:
मुम्बई के पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह। आरोप है कि इन्होंने बहुत जल्दी इंडिया टुडे चैनल को दोषमुक्त कर रिपब्लिक पर सारा दोष मढ़ दिया।  

‘हंसा रिसर्च ग्रुप’ ने जो एफआईआर दर्ज कराई थी, उसमें अंग्रेजी के चैनल ‘इंडिया टुडे’ (आजतक) पर टीआरपी में गड़बड़ी का आरोप था। लेकिन मुंबई पुलिस आयुक्त ने मीडिया के सामने दावा किया कि जांच में ‘इंडिया टुडे’ चैनल पर आरोपों का सत्यापन नहीं हुआ। उन्होंने रिपब्लिक टीवी पर आरोप लगाकर अलग ही राग अलाप दिया और इस तरह टीआरपी की जंग ने नया मोड़ ले लिया

समाचार उद्देश्य से भटक गया!
सेटेलाइट टीवी चैनल चलाने का खर्च भी बहुत ज्यादा होता है। कुल मिलाकर टीवी चैनल उद्योग और विज्ञापनदाता, दोनों की चांदी हो रही है। लेकिन समाज और उसके संचालन के लिए उत्तरदायी उपकरणों को दर्पण दिखाने वाली संस्था समाचार का मूल उद्देश्य बहुत पीछे छूटता जा रहा है। समाचार को अपने मूल आचरण से भटका दिया गया है। बाजार ने समाचार के सुंदर आवरणों को तार-तार कर उसे कुंठाओं के अंधकूप में लटका दिया है। न्यूज चैनलों से जुड़े पत्रकारों के होंठों पर घर चलाने की मजबूरी के बड़े-बड़े ताले लटका दिए हैं। उनके हौसले और इरादे रिया चक्रवर्तियों की गाड़ियों का पीछा करते-करते हांफ रहे हैं।

क्या हो सकता है समाधान?
ऐसे में बड़ा प्रश्न है कि क्या किया जाए? समस्या है, तो उसके समाधान के बारे में भी विचार किया जाना चाहिए। ज्यादा टीआरपी वाले चैनलों को तो कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन कम टीआरपी वाले चैनल अक्सर यह मांग करते हैं कि टीआरपी का आंकड़ा हर हफ्ते नहीं, बल्कि अधिक अंतराल पर जारी किया जाना चाहिए। उनकी दलील है कि किसी समाचार विशेष की प्रस्तुति के कारण अगर एक हफ्ते टीआरपी ठीक हो जाती है, तो फिर उस जैसे समाचारों के संकलन और उन्हें दिखाने की भेड़चाल शुरू हो जाती है। ऐसे में कम टीआरपी वाले चैनल सदैव असमंजस में ही पड़े रहते हैं कि क्या करें, क्या न करें। हर मामले में स्व-नियमन की आवाज बुलंद करने वाले टीवी चैनल उद्योग को भी इस बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए।
इसमें कोई संदेह नहीं इस डिजिटल दौर में अब टीवी देखने वालों की संख्या में कमी आई है। स्मार्ट फोन और इंटरनेट की वजह से अब युवा आबादी ने टीवी से कुछ दूरी बना ली है। सेवानिवृत्त हो चुके लोग, गृहिणियां और सुबोध बच्चे ही टीवी चैनलों के असली ग्राहक हैं। लेकिन अफसोस की बात है कि इस लक्ष्य समूह के लिए न्यूज चैनलों पर कुछ खास सामग्री नहीं है। टीवी चैनल उद्योग का संगठन है, विज्ञापनदाताओं के संगठन हैं, लेकिन दर्शकों का कोई संगठन नहीं है। हां, अगर दर्शक चाहें, तो टीवी उद्योग का चेहरा बदल सकते हैं। सरकार अगर चाहे, तो टीआरपी जैसे मामले देखने के लिए कोई स्वायत्तशासी निकाय बना सकती है। लेकिन यह तभी होगा, जब राजनीतिक दलों को इस बात के लिए विवश किया जाए कि वे अपने एजेंडे में यह मसला भी प्रमुखता से शामिल करें।       (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)