‘साहित्य अमृत’ पत्रिका की रजत जयंती पर विशेष : साहित्य के अमृत की सरिता

    दिनांक 19-अक्तूबर-2020
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संस्कृति की संवाहक यह पत्रिका सदैव सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता कायम रखेगी और पं़ विद्यानिवास मिश्र (संस्थापक संपादक) के शब्दों (‘साहित्य अमृत’ जीवन को संवारने की पत्रिका होगी और हार-हारकर उठने वाले, मर-मरकर जीने वाले मनुष्य की प्रतिष्ठा की पत्रिका होगी) को अमरत्व प्रदान करेगी।

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किसी भी साहित्यिक पत्रिका के लिए रजत जयंती (25वीं वर्षगांठ) तक की यात्रा, एक बड़ी उपलब्धि होती है। अब ‘साहित्य अमृत’ की भी यात्रा 25वें वर्ष तक पहुंच गई है। यह पत्रिका गत 25 वर्ष से साहित्य की उर्वर भूमि में अमृत की वर्षा कर रही है। यह महज संयोग मात्र नहीं कि यदि पं. विद्यानिवास मिश्र जैसे संपादक के मार्गदर्शन में श्यामसुंदर जी द्वारा आरंभ की गई यह पत्रिका विशुद्ध ज्ञानप्रद उद्देश्य के संधान स्वरूप प्रगति कर सकी तो इसके पार्श्व में अटल बिहारी वाजपेयी की प्रेरणा भी प्रवाहमान थी।

साहित्य की ज्ञानस्थली पर सूक्ष्म किंतु गूढ़ सरिताओं के महत्व की चर्चा की जाए तो दृष्टांत स्वरूप ‘साहित्य अमृत’ का स्मरण अनायास ही हो आता है। इसके विशेषांकों की गौरवशाली परंपरा ने अनेकानेक साहित्य मनीषियों का ज्ञान पोषण किया है। जहां तक विशेषांकों की बात है, तो सबसे पहले पत्रिका का प्रवेशांक अगस्त, 1995 में निकला और उसके बाद निरंतर समय-समय पर इसके विशेषांक निकलते रहे। कुछ विशेषांक इस प्रकार हैं- ‘विश्व हिंदी सम्मेलन विशेषांक’ (जुलाई, 2007), ‘भारतीय भाषा अंक’ (जनवरी, 2008), ‘विष्णु प्रभाकर स्मृति अंक’ (जून, 2009), ‘कविता विशेषांक’ (अगस्त, 2010), ‘अज्ञेय जन्मशती अंक’ (अक्तूबर, 2010), ‘जन्मशती-बाबा नागार्जुन, गोपाल सिंह नेपाली, केदारनाथ अग्रवाल, उपेंद्र नाथ ‘अश्क’ (फरवरी, 2011), ‘कहानी विशेषांक’ (फरवरी, 2014), ‘मीडिया विशेषांक’ (अगस्त, 2015), ‘डॉ. कलाम विशेषांक’ (अक्तूबर, 2015), ‘युवा हिंदी कहानी विशेषांक’ (दिसंबर, 2015), ‘स्वाधीनता विशेषांक’ (अगस्त, 2016), ‘लघु कथा विशेषांक’ (जनवरी, 2017), ‘लोक संस्कृति विशेषांक’ (अगस्त, 2017), ‘अटल स्मृति विशेषांक’ (दिसंबर, 2018), ‘शौर्य विशेषांक’ (अगस्त, 2019) एवं ‘गांधी विशेषांक’ (जनवरी, 2020)।

विद्यानिवास मिश्र इस पत्रिका को ‘रचनात्मक व्यापार’ की संज्ञा दिया करते थे। समयानुसार प्रत्येक साहित्यिक विधाओं में लेखन प्रतियोगिताएं- युवा हिंदी कहानी प्रतियोगिता (2006), युवा हिंदी कविता प्रतियोगिता (2008), युवा हिंदी व्यंग्य लेखन प्रतियोगिता (2009), युवा हिंदी कहानी प्रतियोगिता (2015) इसका साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं। ‘साहित्य अमृत’ की 25 वर्ष की विकास परंपरा में अनेकानेक लोकप्रिय अंक शामिल हैं। किंतु ‘रजत जयंती विशेषांक’ विशेष रूप से उल्लेखनीय बन पड़ा है। उपर्युक्त अंक में पिछले 25 वर्ष में प्रकाशित स्मृति शेष साहित्यकारों की जनप्रिय एवं संचित-संग्रहीत एवं सुव्यवस्थित रचनाओं का संग्रह अनायास ही मोह लेता है।

वाड़्मय-वाटिका में सुधि पुष्पों की भांति समादृत विद्यानिवास मिश्र का सांस्कृतिक बोध, कुबेरनाथ राय की लालित्य शैली, कृष्णदत्त पालीवाल का साहित्य ज्ञान, विष्णु प्रभाकर का लेखकीय कौशल, निर्मल वर्मा के मनोवैज्ञानिक लोक, कमलेश्वर के कथा कौशल, मनोहर श्याम जोशी के व्यंग्य एवं महीप सिंह की कहानी कला की सुगंध बखूबी पत्रिका के माध्यम से महसूस होती है।

संपादक लक्ष्मी शंकर वाजपेयी की कर्मठता एवं युद्धस्तरीय परिश्रम ने भी पत्रिका को उत्तंग शिखर का अधिकारी सिद्ध किया है। इसका उत्कृष्ट प्रमाण कोरोना के विकट समय में भी पत्रिका का सुचारु रूप से ‘ई-माध्यम’ द्वारा प्रकाशन है।

किसी भी साहित्यिक पत्रिका की सुस्पष्ट पहचान हेतु इतना समय पर्याप्त नहीं होता, किंतु ‘साहित्य अमृत’ ने इस मिथ को तोड़ा है। इसके विशेषांक वर्तमान सृजनधारा का मुकम्मल दस्तावेजÞ सिद्ध हुए हैं। देश के विभिन्न भागों में रचनारत सर्जक-साहित्यकारों के मध्य सेतुबंधन का उपक्रम भी पत्रिका की उपलब्धि बना है। ‘साहित्य अमृत’ ने साहित्य की प्राय: प्रत्येक विधा जैसे-कथा, आलेख, लघुकथा, कविता, संस्मरण, व्यंग्य, उपन्यास-अंश, आत्म संस्मरण, साक्षात्कार, यात्रा वृत्तांत, बाल रचनाओं आदि को अपने दृष्टिपथ में रखा है, जो विशेष रेखांकनीय है। यह पत्रिका कई उदीयमान-अनचीन्हे रचनाकारों के सृजन को उपयुक्त मंच प्रदान करती आ रही है।

आशा है, साहित्य एवं संस्कृति की संवाहक यह पत्रिका सदैव सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता कायम रखेगी और पं़ विद्यानिवास मिश्र (संस्थापक संपादक) के शब्दों (‘साहित्य अमृत’ जीवन को संवारने की पत्रिका होगी और हार-हारकर उठने वाले, मर-मरकर जीने वाले मनुष्य की प्रतिष्ठा की पत्रिका होगी) को अमरत्व प्रदान करेगी।
                            -बी़ एल. गौड़