तनिष्क के विज्ञापन में क्या गलत है?

    दिनांक 19-अक्तूबर-2020
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दीपक जोशी की फेसबुक वॉल से 
एक और ऐतिहासिक फिल्म थी शोले। इसके पटकथा लेखक थे- सलीम-जावेद। फिल्म में वीरू भगवान शंकर की मूर्ति की पीछे छिपकर बसंती से फ्लर्ट करता है। यानी मंदिर का इस्तेमाल फ्लर्टिंग के लिए हो रहा है। गांव के सबसे अमीर ठाकुर परिवार के घर लालटेन जलती है, पर रहीम चाचा की मस्जिद में लाउड स्पीकर बज रहा है।
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विज्ञापन की आड़ में हिंदू विरोधी कुत्सित मानसिकता का प्रचार

यह बताने से पहले 19 साल पीछे ले जाना चाहूंगा। 2001 में सनी देओल की फिल्म आई थी-गदर। एक सरदार (तारा सिंह) व एक मुसलमान (सकीना) की प्रेम कहानी। फिल्म को ऐतिहासिक कामयाबी मिली। लेकिन फिल्म के खिलाफ मुसलमानों ने गदर मचाया था। वे इस बात से नाराज थे कि एक सरदार ने एक मुसलमान की मांग में सिंदूर कैसे भर दिया? देशभर में बवाल हुआ। भोपाल में तो जबरदस्त आगजनी हुई। आगजनी करने वाला सबसे बड़ी सेकुलर पार्टी कांग्रेस का नेता आसिफ था। एक फिल्मी कहानी पर शहरों में आग लगाने वाले ज्ञान दे रहे हैं कि तनिष्क के विज्ञापन का विरोध क्यों?

इसी विज्ञापन को थोड़ा बदल लीजिए। हिंदू घर में किसी मुस्लिम लड़की को दिखा दीजिए। सारा लिबरलिज्म हवा हो जाएगा। किसी तिलक लगाए हिंदू को किसी हिजाब वाली महिला के साथ दिखा दीजिए। सर्फ एक्सेल का एक विज्ञापन आया था। झक सफेद कुर्ता-पजामा पहने एक मुस्लिम बच्चा नमाज अदा करने जा रहा था। हिंदू बच्चे होली पर रंग फेंककर उसे परेशान कर रहे थे। तभी एक लड़की साइकिल पर उसे मस्जिद पहुंचाती है। यानी इससे दो संदेश दे दिए। पहला, होली पर हिंदू दूसरों को परेशान करते हैं और दूसरा, रंग पड़ जाएगा तो अल्लाह दुआ कबूल नहीं करेगा। अगर वह मुस्लिम बच्चा रंग लगे कपड़ों में ही नमाज पढ़ लेता तो क्या उसकी दुआ कुबूल नहीं होती? बच्चों के विज्ञापन में भी हिंदू-मुस्लिम डालने का क्या मतलब? यहां यह भी बता दिया गया कि कौन से धर्म के लोग गुंडई (Bully) करते हैं। तनिष्क को ही ले लीजिए।

विज्ञापन वापस लेने पर जो सफाई दी है, उसमें कहा है कि अपने कर्मचारियों का ख्याल रखते हुए विज्ञापन वापस लेने का फैसला लिया गया है। यानी हिंदू हमला कर देते, जबकि सेटेनिक वर्सेज से लेकर शार्ली ऐब्दो  और कमलेश तिवारी से बेंगलुरु दंगे तक इतिहास है कि अभिव्यक्ति की आजादी की कौन कितनी इज्जत करता है।  आप लव जिहाद को राइट विंग का एजेंडा कहकर खारिज कर देते हैं। गूगल पर केरल ईसाई लव जिहाद टाइप करिए। सैकड़ों लेख मिल जाएंगे, जिसमें ईसाई संगठन भी लव जिहाद का जिक्र कर रहे हैं। हिंदी अखबार पढ़ लीजिए। शायद ही कोई दिन बीतता हो जब लव जिहाद व सूटकेस में सिर कटी लाश की खबर न छपती हो। जिस दिन तनिष्क का विज्ञापन आया, उसी के अगले दिन लखनऊ में एक महिला ने विधानसभा के सामने खुदकुशी क्यों की, सब जानते हैं और तनिष्क क्या दिखा रहा था? धीरे-धीरे ब्रेन वॉश ऐसे ही किया जाता है।

एक और ऐतिहासिक फिल्म थी शोले। इसके पटकथा लेखक थे- सलीम-जावेद। फिल्म में वीरू भगवान शंकर की मूर्ति की पीछे छिपकर बसंती से फ्लर्ट करता है। यानी मंदिर का इस्तेमाल फ्लर्टिंग के लिए हो रहा है। गांव के सबसे अमीर ठाकुर परिवार के घर लालटेन जलती है, पर रहीम चाचा की मस्जिद में लाउड स्पीकर बज रहा है। ‘दीवार’ में बिल्ला नंबर 786 अमिताभ की जान बचाता है,पर अमिताभ की मां निरुपा रॉय जिस भगवान भोलेनाथ की जिंदगी भर पूजा करती है, वह उसे दुख के अलावा कुछ नहीं देते। अमिताभ मंदिर में जाकर शिवजी से इसकी शिकायत भी करते हैं। क्या यह सब महज एक संयोग था? जावेद अख्तर के आजकल के ट्वीट देखकर लगता तो नहीं कि यह सिर्फ एक संयोग था।