वामपंथी फरेब को ढोने में डूबी कांग्रेस!

    दिनांक 20-अक्तूबर-2020
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अंशु जोशी

राहुल और प्रियंका की अगुआई वाली आज की कांग्रेस के मौजूदा रंग-ढंग और चाल-चलन से साफ है कि पार्टी वामपंथियों की देशघाती राजनीति को अंगीकार कर तेजी से पतन की ओर बढ़ चली है। रक्षा-विदेश-अर्थ और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर राहुल-प्रियंका के देशविरोधी बयानों से साफ है कि उनके सलाहकार जनेवि छाप कम्युनिस्ट हैं 

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कांग्रेस के युवराज राहुल ही डुबो रहे कांग्रेसी नैया   

पिछले कई महीनों से यह स्पष्ट दिख रहा है कि अपनी मूल विचार पद्धति से कांग्रेस कहीं दूर भटक चुकी है। वह पार्टी जो साम्यवाद के प्रति सहानुभूति रखते हुए भी वामपंथ से अलग दिखाई पड़ती थी, आज वामपंथियों के हाथों संचालित हो रही है और इसका असर निश्चित रूप से न सिर्फ कांग्रेस के अपने भविष्य के लिए बल्कि, भारतीय राजनीति के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है। वह पार्टी जो कभी लाल-बाल-पाल के समय से राष्ट्र की अवधारणा को मान, इस भारत राष्ट्र के अनेकता में एकता के अनोखे रंग को पहचानती हुई कहीं न कहीं राष्ट्रवाद का स्वर गुनगुनाती नजर आती थी, आज वामपंथ के साथ एकाकार हो अलगाववाद के सुर बुलंद करती दिखाई पड़ती है। दिल्ली के शाहीन बाग में कांग्रेस ने जिस प्रकार अलगाववादी शक्तियों को खुल कर समर्थन दिया, उससे स्पष्ट हो गया कि भारत को तोड़ने की विचारधारा कहीं न कहीं इस पार्टी पर हावी हो गई है।

क्या राहुल गांधी के लिए राष्ट्र की सुरक्षा और अस्मिता से बढ़कर राजनीति हो गयी थी जो उन्होंने ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ पर प्रश्न उठाये, फूहड़ टिप्पणियां कीं ? उनके इस व्यवहार पर 2010 का जनेवि वह समय याद आ गया जब दंतेवाड़ा में सीआर पीएफ के 76 जवानों की नक्सलियों द्वारा निर्मम हत्या पर परिसर में वामपंथियों द्वारा ‘विजय जलूस’ निकाला गया था।

नई नहीं ये नजदीकियां
हालांकि वामपंथ से कांग्रेस की नजदीकियां नई नहीं हैं। विचारधारा के स्तर पर सर्वथा पृथक होते हुए भी नेहरू-गांधी परिवार का वामपंथ प्रेम सर्वविदित है। आज नेपाल में वामपंथी सरकार के चलते हम दोनों देशों के बीच रिश्तों के जिस संकट का सामना कर रहे हैं, उसकी जड़ें कहीं न कहीं भारत और कांग्रेस तक पहुंचती हैं। कांग्रेस ने न सिर्फ नेपाल में राजशाही के अंत का पुरजोर समर्थन किया था, बल्कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रांगण से वामपंथ का पाठ पढ़ा-पढ़ा कर बाबूराम भट्टराई जैसे नेता भी नेपाल भेजे जिन्होंने आगे चलकर नेपाल को कम्युनिस्ट चश्मा पहनाकर भारत के साथ सम्बन्ध खट्टे करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह जानते हुए भी कि कला, अकादमिक और पत्रकारिता जगत का राष्ट्र की उन्नति के साथ कितना महत्वपूर्ण सम्बन्ध है, पहले पंडित नेहरू, फिर इंदिरा गांधी और तत्पश्चात राजीव गांधी ने इन तीनों क्षेत्रों में वामपंथियों को खूब पुष्पित-पल्लवित होने के अवसर प्रदान कर देश-विरोधी बीज पनपाए। पर हां, ये भी सही है कि कांग्रेस ने वामपंथियों को अकादमिक, पत्रकारिता और कला जगत तक सीमित रखते हुए अपने कोर राजनीतिक केंद्र से दूर ही रखा, जहां शक्ति की कमान कांग्रेस के अपने नेताओं के हाथ ही रही।

वामपंथी मुलम्मे में राहुल-प्रियंका
पर आज स्थितियां एकदम भिन्न नजर आती हैं। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी तथा उत्तर प्रदेश की कमान मुख्य रूप से संभालने वाली प्रियंका गांधी वाड्रा पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के दो वामपंथी युवाओं का जादू ऐसा सर चढ़कर बोल रहा है कि पार्टी अपने मूल विचारों से ही खिसकती नजर आती है। हाथरस में पिछले कुछ दिनों जो कुछ हुआ, जिस प्रकार कांग्रेस ने पूरे मामले को दलित कार्ड से जोड़ा, जिस प्रकार भाई-बहन, दोनों ने हाथरस जाकर एक वामपंथी कार्यकर्ता को ‘पीड़िता की भाभी’ बनाकर गले लगाया, वह राजनीति का शुद्ध वामपंथी फार्मूला नजर आता है। हाल ही में जब सोशल मीडिया और अखबारों के माध्यम से यह सत्य सामने आया कि, इतने दिनों से जो महिला ‘पीड़िता की भाभी’ बनकर टीवी मीडिया को ‘बाइट्स’ देती नजर आ रही थी, और जिसे बड़े भावपूर्ण तरीके से प्रियंका ने गले लगाया, वह एक वामपंथी कार्यकर्ता है और पीड़िता से उसका कोई रिश्ता ही नहीं है, तो यह चर्चा भी शुरू हो गयी कि हाथरस पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया कांग्रेसी नहीं अपितु शुद्ध वामपंथी है। दलित-दलित चिल्लाकर जाति की राजनीति करने पर गले लगाने के लिए सवर्ण का इंतजाम जैसे दोगले प्रतिमान वामपंथियों को प्रिय रहे हैं। कई खबरें देखने में आई हैं जब राहुल को दलितों के यहां भोजन करने का ‘अहसान’ करा उनको मसीहा साबित करने का प्रयत्न किया गया था। दलित क्या कोई दूसरे ग्रह के प्राणी हैं? यदि नहीं तो उनके यहां भोजन करने को खबर क्यों बनाया जाता है? अहसान क्यों जताया जाता है? यदि राहुल ने किसी दलित के घर खाना खाया तो इसमें खबर जैसा क्या है? यदि पूर्वाग्रहों से दूर एक स्वस्थ समाज की स्थापना करनी है तो सबसे पहले इस भावना का नाश होना चाहिए जो किसी सवर्ण को दलित के यहां कुछ खाने-पीने को अहसान के रूप में बनाकर प्रस्तुत करे। पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में ‘प्रोपेगेंडा की राजनीति’ करने वाले महात्मा गांधी के समरसता के भाव को कैसे समझेंगे, वे तो दलितों को ओछी राजनीति के कार्ड के रूप में देखेंगे और शक्ति वितरण का समय आने पर लात मारकर कोने में कर देंगे। यही नहीं, भीम-मीम की बातें करने वाले कैसे दोनों में से एक को चुनने की अवस्था में मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति अपनाते हैं, यह किसी से नहीं छुपा है। हाथरस में ‘दलित अधिकार’ की बात करने वाले राहुल और प्रियंका बलरामपुर और राजस्थान की बलात्कार की घटनाओं पर कैसे चुप्पी साध गए, यह भी पूरे राष्ट्र ने देखा। यह वामपंथी असर ही है जो इनसे पहलू खान की हत्या पर आंदोलन करवाता है पर अंकित शर्मा की हत्या पर चुप्पी सधवा देता है।


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हाथरस में नक्सली कार्यकर्ता को ‘पीड़िता की भाभी’ बताकर गले लगातीं प्रियंका गांधी (फाइल चित्र)
राहुल ने लोकसभा चुनावों के ऐन पहले मार्च 2019 में ‘न्याय योजना’ की घोषणा की जिसके तहत जनसंख्या के एक हिस्से को वार्षिक न्यूनतम आय सरकार की तरफ से देने की बात की गयी थी। कई अर्थशास्त्रियों ने इसे देश की अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी बताया था। इसी तरह प्रियंका के उत्तर प्रदेश दौरे के दौरान भीम सेना प्रमुख चंद्र शेखर से मुलाकात भी उनके वामपंथी सलाहकार की सलाह का ही असर था।

इसके पहले भी दिल्ली में प्रवासी कामगारों के लिए ‘हजारों बसों का त्वरित प्रबंध’ करने की खोखली वामपंथी राजनीति करने पर प्रियंका और राहुल के मुंह जनता के सामने लाल हो चुके हैं। उन्हें यह समझने की आवश्यकता है कि कॉलेज परिसर छाप प्रोपेगेंडा राजनीति को कांग्रेस का वैचारिक अधिष्ठान बनाने पर वे कहीं के नहीं रहेंगे। वामपंथी किले वैसे भी पूरे देश से ढह चुके हैं। कुछेक परिसरों और केरल को छोड़कर वे अपने लिए जमीन तलाश रहे हैं। ऐसे में जिस प्रकार कांग्रेस की विचारधारा को वामपंथियों ने ‘हाइजेक’ कर लिया है, कहना न होगा कि कांग्रेस अपना अस्तित्व ही खोती नजर आ रही है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कांग्रेस के कई वरिष्ठ कार्यकर्ता इस बारे में दबे स्वरों में बोलने भी लगे हैं। हाल ही में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस की कार्यपद्धति पर गंभीर प्रश्न कर पार्टी ही छोड़ दी। सचिन पायलट भी इसी तैयारी में थे।

दबी जबान में यह बात अब सोशल मीडिया के जरिये खुल कर सामने आ रही है कि राहुल और प्रियंका ने अपने नए वामपंथी सिपहसालारों की सलाह पर चलने को तरजीह देते हुए अपने पुराने, वरिष्ठ और वर्षों से प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की बात सुनना ही बंद कर दिया है। और तो और, सुना और पढ़ा तो ये भी जा सकता है कि राहुल के वामपंथी सलाहकार उन्हें साम्यवाद की राह पर चलाते हुए ऐसे-ऐसे आर्थिक फार्मूले बता रहे हैं कि अर्थशास्त्री सिर पीट लें। उदाहरणस्वरूप, राहुल ने लोकसभा चुनावों के ऐन पहले मार्च 2019 में ‘न्याय योजना’ की घोषणा की जिसके तहत जनसंख्या के एक हिस्से को वार्षिक न्यूनतम आय सरकार की तरफ से देने की बात की गई थी। कई अर्थशास्त्रियों ने इसे देश की अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी बताया थी। इसी तरह प्रियंका के उत्तर प्रदेश दौरे के दौरान भीम सेना प्रमुख चंद्र शेखर से मुलाकात भी उनके वामपंथी सलाहकार की सलाह का ही असर था। वामपंथ के बढ़ते प्रभाव के साथ राहुल गांधी पार्टी के नीति प्रबंधन के लिए वाम झुकाव वाले बुद्धिजीवियों की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं। चुनावों के दौरान राहुल गांधी ने नीति आयोग को भंग करने और समाजवादी युग लाने के लिए योजना आयोग को फिर से स्थापित करने का वादा किया था, जिसे उन्हीं की पार्टी के बड़े नेता और पूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम ने खुद ‘भद्दा’ कहा था।

आज जब वेनेजुएला जैसे देश अपनी कम्युनिस्ट नीतियों के कारण गहन आर्थिक संकटों से जूझते हुए संघर्ष कर रहे हैं, कांग्रेस पर बढ़ता कम्युनिस्ट प्रभाव निश्चित रूप से भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं है। साथ ही, मजहब और जाति की राजनीति कर ध्रुवीकरण करने का पुराना वामपंथी हथकंडा भी देश के लिए खतरनाक ही है।

राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को नकारना और उन पर प्रश्न उठाना भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। क्या राहुल गांधी के लिए राष्ट्र की सुरक्षा और अस्मिता से बढ़कर राजनीति हो गई थी जो उन्होंने ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ पर प्रश्न उठाये, फूहड़ टिप्पणियां कीं और सेना तक से ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के सबूत मांगे? उनके इस व्यवहार पर 2010 का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का वह समय याद आ गया जब दंतेवाड़ा में सीआर पीएफ के 76 जवानों की नक्सलियों द्वारा निर्मम हत्या पर वहां परिसर में वामपंथियों द्वारा ‘विजय जलूस’ निकाला गया था। सरकार की असंगत नीतियों का तार्किक विरोध हर विपक्षी पार्टी का अधिकार है और कर्तव्य भी पर सिर्फ विरोध की राजनीति करना कहां तक न्यायसंगत है? लोकतंत्र के लिए सशक्त सरकार के साथ ही एक सशक्त विपक्ष की भी आवश्यकता होती है। पर कांग्रेस आज अपने अस्तित्व को ही खोती नजर आ रही है। वह कांग्रेस जो कभी महात्मा के चरखे पर तिरंगा कातती नजर आती थी, आज नक्सलियों के हाथों पड़ती ‘लाल’ होती नजर आ रही है। यही बदलता स्वरूप कांग्रेस को जनता से न सिर्फ दूर कर रहा है, बल्कि मजहबी तुष्टीकरण और जाति की राजनीति की वजह से उसे अशक्त भी बना रहा है।    (लेखिका जनेवि में सहायक प्राध्यापक हैं)