पुरखे और प्रकृति

    दिनांक 23-अक्तूबर-2020
Total Views |
हद से अनहद
हम अपनी सभ्यता-संस्कृति के 5,000 साल पार कर आए हैं। जन्मते ही हम उस महान परंपरा से जुड़ जाते हैं। हमारा जीवन उस सनातन यात्रा का ही विस्तार है। अपने अतीत से आज। अपने पिंड से ब्रह्मांड। अपनी प्रकृति से संस्कृति। अपने आत्म से अध्यात्म। अपनी हद से अनहद को छूने की एक कोशिश। इन सबको समझने के लिए इस अंक से एक नया स्तंभ ‘हद से अनहद’ शुरू किया जा रहा है
-राजीव कटारा-
श्राद्ध खत्म होते हैं और नवरात्र शुरू हो जाते हैं। अमावस्या का श्राद्ध करने के बाद हम नवरात्र की तैयारियों में जुट जाते हैं। वह एक अलग ढंग की शाम होती है। हम एक तरह के माहौल से बिल्कुल दूसरी तरह के माहौल में चले जाते हैं। लेकिन इस बार श्राद्ध खत्म होते ही पुरुषोत्तम मास लग गया। मेरी याद में तो ऐसा पहली बार हुआ। और उस शाम को एक अलग तरह की उदासी महसूस हुई। नवरात्र के लिए एक महीने का इंतजार अलग अनुभव था। खैर, वह इंतजार भी खत्म हो गया। हम मां की पूजा में लग गए।
अक्सर श्राद्ध और नवरात्र आते हैं, तो कई तरह के सवाल उठने लगते हैं। ठीक श्राद्ध के बाद हम मां के पूजन में लग जाते हैं। यह संयोग है या कुछ और। अपने पुरखों को श्रद्धा अर्पित करने के बाद हम मां की पूजा करने में जुट जाते हैं। श्राद्ध के बाद घट। पुरखों के बाद प्रकृति। मां प्रकृति ही तो हैं। पुरखों को तो याद कर लिया। अब मां को याद करते हैं।
इस सिलसिले में जब पहली बार सोचना शुरू किया, तो इस संयोग पर ध्यान गया। तब पहला सवाल यह उठा कि पुरखों के बाद प्रकृति क्यों? प्रकृति के बाद पुरखे क्यों नहीं? क्या इसलिए कि पुरखे अतीत हैं। वे जा चुके हैं। इसलिए पहले उनको श्रद्धा अर्पित कर दी जाए।
उसके बाद प्रकृति को देखते हैं। वैसे भी पुरखे तो यादें हैं। एक मायने में पीछे लौटना भी है। कुछ भी कहें लेकिन वह शोक का माहौल तो है ही। और अपना तो पूरा जीवन-दर्शन ही आनंदवादी है। शायद इसीलिए पहले हो न हो, लेकिन बाद में आनंद होना ही चाहिए। श्रद्धा के बाद उत्सव जरूरी है। तर्पण के बाद पूजन होना चाहिए। अंत में आनंद होना ही चाहिए।
यह ठीक है कि सृष्टि के लिहाज से पहले प्रकृति ही आती है। पुरखे या परिवार बाद में आते हैं। लेकिन हमारे लिए पहले परिवार ही आता है। आखिर हम जब आंखें खोलते हैं, तो अपने परिवार के बीच ही होते हैं। यही वजह है कि हमारे लिए मानवीय रिश्ते पहले आते हैं। इन्हीं रिश्तों से ही तो पुरखे निकलते हैं। तब अपने लिए पुरखे ही पहले आएंगे न।
अब हम जब अपने पुरखों को याद कर लेते हैं, उन्हें श्रद्धा अर्पित कर देते हैं, तब हमें प्रकृति की याद आती है। उस प्रकृति के बहाने हम आदिस्रोत या आदिशक्ति तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। हम उसकी उपासना करते हैं, उसका पूजन करते हैं। हम प्रकृति को आदि या परम मां की तरह देखते हैं। ब्रह्मांड को पिंड में धारण करने वाली होती है वह परम मां। हम उसे अपनी मां से जोड़ते हैं। हमारी मां है पिंड और परम मां है ब्रह्मांड। आखिर अपने पुरखों की वजह से ही तो हमें अपनी मां मिली है। शायद इसीलिए हम पुरखों का ख्याल पहले करते हैं।
दरअसल, प्रकृति हमारे लिए बाद में जरूर आती है। उसके बिना हम जी नहीं सकते। जीने की सोच भी नहीं सकते। लेकिन पुरखों के बिना तो हम होते ही नहीं। इसीलिए हम दोनों को ही छोड़ नहीं सकते। अपने पुरखों के सहारे ही हजारों साल की सभ्यता-संस्कृति हमारे साथ जुड़ जाती है और हमारे संग-संग चलती है।
सचमुच किसी समाज या संस्कृति में पुरखों के लिए पूरा एक पक्ष नहीं है। अपने पुरखों की याद बीते कल की बात हो सकती है। लेकिन यही याद हमारे बीते कल और आने वाले कल को भी जोड़ती है। हमारे अतीत और भविष्य के बीच एक संतुलन बनाने की कोशिश करती है।
सोचिए तो सही कि हम नवरात्र कब मनाते हैं। वह हमें एक दूसरे संतुलन की ओर ले जाता है। हैरत होती है कि संपातों में पड़ते हैं अपने दोनों नवरात्र। संपात यानी धरती का सूर्य से बराबर की दूरी पर होना। मतलब परम संतुलन। संतुलन समूचे ब्रह्मांड का। आम बोलचाल में संतुलन गर्मी और सर्दी का। असल में प्रकृति भी तभी सुंदर होती है, जब वह संतुलन में होती है। यही वह समय है जब समूची सृष्टि में एक संतुलित ऊर्जा प्रवाह आ रहा होता है। और उसे सचमुच ‘सेलिब्रेट’ करने की जरूरत है।
पुरखे और प्रकृति के ठीक बीच में हम होते हैं। हम यानी आज। पुरखे बीता कल हैं। प्रकृति हमें अपने आज से आने वाले कल की ओर ले जाती है। दोनों ही हमारे लिए जरूरी हैं। हमें दोनों की ही साधना करनी चाहिए। उत्सव मनाना चाहिए।
(लेखक ‘कादम्बिनी’ के संपादक रहे हैं)