किसान-हित को साधने वाले कानून

    दिनांक 23-अक्तूबर-2020
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कृषि सुधार कानून के विरोध में नई दिल्ली में ट्रैक्टर जलाते कांग्रेसी कार्यकर्ता। ये लोग किसानों को भ्रमित करने के अलावा और कुछ नहीं कर रहे 
भारत सरकार ने किसानों के हित में तीन कानून बनाए हैं। ये कानून किसानों को बिचौलियों से आजादी दिलाकर उन्हें अपने उत्पाद को कहीं भी बेचने की अनुमति देते हैं। जो लोग इन कानूनों का भय दिखाकर किसानों को डरा रहे हैं, असल में वे कृषि मंडियों में सक्रिय बिचौलियों के दलाल हैं
- राजकुमार चाहर-
इक्कसवीं सदी में भारत का किसान बंधनों में नहीं, खुलकर खेती करेगा। जहां मन आएगा अपनी उपज बेचेगा, किसी बिचौलिए का मोहताज नहीं रहेगा और अपनी उपज, अपनी आय भी बढ़ाएगा। जो लोग बिचौलियों का साथ दे रहे हैं, वे वास्तव में किसानों की कमाई को बीच में लूटने वालों का पक्ष ले रहे हैं। इन कृषि सुधार कानूनों ने हमारे अन्नदाता किसानों को अनेक बंधनों से मुक्ति दिलाई है, उन्हें आजाद किया है। इन सुधारों से किसानों को अपनी उपज बेचने में और ज्यादा विकल्प और अधिक अवसर मिलेंगे। लेकिन जो लोग दशकों तक सत्ता में रहे हैं, वे किसानों को इस विषय पर लगातार भ्रमित करने की कोशिश कर रहे हैं, किसानों से झूठ बोल रहे हैं।
ये किस तरह के किसान हितैषी हैं? किसान जिन यंत्रों की पूजा करते हैं, उन यंत्रों को ये लोग (कांग्रेसी) दिल्ली में इंडिया गेट पर जला रहे हैं। उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहता कि इंडिया गेट में इस तरह की हरकत गैर-कानूनी है। ये लोग निश्चित रूप से किसानों के हितैषी नहीं हैं। वे केवल राजनीति के लिए इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं।
हालांकि इन कृषि कानूनों को लेकर विभिन्न किसान संगठनों के मन में कुछ प्रश्न हैं, जैसे कि न्यूनतम समर्थन मूल्य, मंडियों के खत्म होने का भय। वहीं, खेती के उद्योगपतियों के हाथों में जाने और कृषि में उनके दखल को लेकर भी डर है। ऐसा दुष्प्रचार के कारण हो रहा है। वर्तमान में किसान-हितैषी होने का दम भरने वाली कांग्रेस पार्टी पहले इस कानून को देश के किसानों के लिए अमृत मान रही थी, परंतु आज सबसे ज्यादा विरोध कांग्रेस के नेता ही कर रहे हैं। हालांकि, विपक्ष के विरोध को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, ‘‘हम किसानों की आय को 2022 तक दोगुना करेंगे। यह उसी दिशा में एक कदम है, जिससे कि खुले बाजार में वस्तु का मूल्य बाजार आधारित नियंत्रित होगा और नकदी फसल को बाजार में ज्यादा फायदा होगा। यह किसानों के लिए मंडी के अतिरिक्त एक विकल्प है कि वे अपनी फसल कहीं भी बेच सकें। पूर्व की न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था जारी रहेगी।’’
इस प्रकार 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद कयास लगाए जा रहे थे कि इससे सेवा क्षेत्र में भारी नुकसान होगा, लेकिन आज हम 30 वर्ष बाद देखते हैं कि सेवा क्षेत्र में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। देश की 20 प्रतिशत से जनसंख्या सेवा क्षेत्र पर निर्भर है लेकिन वह जीडीपी का 60 प्रतिशत निर्धारित करती है, वहीं कृषि में 50 प्रतिशत से अधिक लोग जुड़े हैं, लेकिन जीडीपी में इसका योगदान सिर्फ 16 प्रतिशत है। यह जिस प्रकार सेवा क्षेत्र में 1991 में सुधार हुए, वैसे ही 2020 में सरकार का कृषि क्षेत्र में एक क्रांतिकारी कदम है।
हमें इस बात की बेहद खुशी है कि इससे ब्रज के आलू उत्पादक किसानों के लिए भी तरक्की के रास्ते खुलेंगे। अब तक ब्रज के अधिकांश आलू किसान बिचौलियों पर निर्भर थे। इसलिए उनका लाभ बिचौलियों में बंट जाता था। नए कानून के बाद बिचौलियों की भूमिका खत्म हो जाएगी। इससे आलू किसानों की तरक्की के रास्ते खुलेंगे। उन्हें आलुओं का सही दाम मिल सकेगा। उनकी आय में वृद्धि होगी। ब्रज में आलू के साथ ही गेहूं, सरसों की पैदावार अच्छी-खासी संख्या में होती है। अब इस क्षेत्र में धान की फसल का भी प्रचलन बढ़ता जा रहा है। कुछ राज्यों में जब फलों और सब्जियों को कृषि उत्पाद बाजार समिति (एपीएमसी) कानून से बाहर लाया गया था, तो बड़ी संख्या में किसानों को उसका फायदा मिला था। अब अनाज उत्पादक किसानों को भी उसी तरह की आजादी मिलेगी। किसान मजबूत होंगे, तभी आत्मनिर्भर भारत की नींव भी मजबूत होगी।
जहां तक कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधा) कानून-2020 का सवाल है तो यह राज्य सरकारों की ओर से संचालित एपीएमसी मंडियों के बाहर (बाजारों या डीम्ड बाजारों के भौतिक परिसर के बाहर) फार्म मंडियों के निर्माण के बारे में है, क्योंकि भारत में 2,500 एपीएमसी मंडियां हैं जो राज्य सरकारों द्वारा संचालित हैं। वहीं, दूसरा कानून कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020 अनुबंध खेती के बारे में है। जब तक हम लोग इससे जुड़े एक-एक पहलू को नहीं समझ लेंगे, तब तक किसानों को समझाना किसी के बूते की बात नहीं होगी।
ये किस तरह के किसान हितैषी हैं? किसान जिन यंत्रों की पूजा करते हैं, उन यंत्रों को ये लोग (कांग्रेसी) दिल्ली में इंडिया गेट पर जलाते हैं। उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहता कि इंडिया गेट पर इस तरह की हरकत गैर-कानूनी है। ये लोग किसी भी तरह किसानों के हितैषी नहीं हैं। ये केवल राजनीति के लिए कृषि सुधार कानूनों का विरोध कर रहे हैं राज्यों के एपीएमसी के अधिकार बरकरार रहेंगे। इसलिए किसानों के पास सरकारी एजेंसियों का विकल्प खुला रहेगा। नए कानून किसानों को अंतरराज्यीय व्यापार के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जिससे किसान अपने उत्पादों को दूसरे राज्य में स्वतंत्र रूप से बेच सकेंगे। वर्तमान में एपीएमसी की ओर से विभिन्न वस्तुओं पर 1 प्रतिशत से 10 फीसदी तक बाजार शुल्क लगता है, लेकिन अब राज्य के बाजारों के बाहर व्यापार पर कोई राज्य या केंद्रीय कर नहीं लगाया जाएगा। किसी एपीएमसी कर या कोई लेवी और शुल्क आदि का भुगतान नहीं होगा। इसलिए और किसी दस्तावेज की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। वहीं, खरीदार और विक्रेता दोनों को लाभ मिलेगा। निजी कंपनियों और व्यापारियों की ओर से एपीएमसी कर का भुगतान होगा, किसानों की ओर से नहीं।
किसान अनुबंध खेती के लिए निजी एजेंसियों के साथ भी साझेदारी कर सकते हैं। अनुबंध खेती निजी एजेंसियों को उत्पाद खरीदने की अनुमति देगी, अनुबंध केवल उत्पाद के लिए होगा। किसी भी निजी एजेंसी को किसानों की भूमि के साथ कुछ भी करने की अनुमति नहीं होगी और न ही अनुबंध खेती अध्यादेश के तहत किसान की जमीन पर किसी भी प्रकार का निर्माण हो सकेगा। वर्तमान में किसान सरकार की ओर से निर्धारित दरों पर निर्भर हैं। लेकिन नए कानून के कारण किसान बड़े व्यापारियों और निर्यातकों के साथ जुड़ पाएंगे, जो खेती को लाभदायक बनाएंगे। प्रत्येक राज्य में कृषि और खरीद के लिए अलग-अलग कानून हैं। लिहाजा, नए कानून के तहत लागू एक समान केंद्रीय कानून सभी हितधारकों के लिए समानता का अवसर उपलब्ध कराएगा। नए कानून कृषि क्षेत्र में अधिक निवेश को प्रोत्साहित करेंगे, क्योंकि इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। निजी निवेश खेती के बुनियादी ढांचे को और मजबूत करेगा और रोजगार के अवसर पैदा करेगा। एपीएमसी प्रणाली के तहत केवल लाइसेंस प्राप्त व्यापारी, जिसे आड़तिया यानी बिचौलिया कहा जाता है, को अनाज मंडियों में व्यापार करने की अनुमति थी, लेकिन नए कानून किसी को भी ‘पैन नंबर’ के साथ व्यापार करने की अनुमति देते हैं।
इसलिए ये कानून किसानों के हित में हैं। जो भी इस देश के किसानों का भला चाहते हैं, वे उन्हें इन कानूनों के बारे में बताएं कि ये उनके हित में हैं। किसान कुछ नेताओं की राजनीति का मोहरा न बन सकें, इसकी चिंता हम सबको करनी है।
(लेखक फतेहपुर सीकरी, उत्तर प्रदेश से सांसद और भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)