आधुनिकता के अग्रदूत

    दिनांक 23-अक्तूबर-2020
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श्रद्धांजलि / अक्कितम अच्युतन नंबूदिरी
ज्ञानपीठ सम्मान से सम्मानित मलयालम कवि एवं समाज सुधारक अक्कितम अच्युतन नंबूदिरी का देहावसान हो गया। वे मलयालम भाषा में वेद अध्ययन को समर्पित साहित्यिक आंदोलन ‘अनादि’ से जुड़े थे। वे संस्कार भारती की केरल इकाई, तपस्या के भी अध्यक्ष थे। रा.स्व. संघ की ओर से मैं दिवंगत आत्मा की सद्गति हेतु प्रार्थना करता हूं और शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करता हूं। महाकवि के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम धार्मिक ज्ञान में अधिष्ठित सुधार के उनके संदेश को आत्मसात करें। ओम् शान्ति।  - डॉ. मनमोहन वैद्य, सह सरकार्यवाह, रा.स्व.संघ
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स्व. अक्कितम अच्युतन नंबूदिरी 
ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्ध मलयालम कवि अक्कितम अच्युतन नंबूदिरी का निधन 15 अक्तूबर को केरल के त्रिशूर में हो गया। मलयालम साहित्य की दुनिया में वे आधुनिकता के अग्रदूत माने जाते थे। उन्हें 2019 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। श्री नंबूदिरी का जन्म 8 मार्च, 1926 को केरल के पलक्काड जिले में कुमारनल्लूर में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री वासुदेवन नंबूदिरी एवं माता का नाम पार्वती अन्तर्जनम था। बचपन से ही इनकी रुचि साहित्य और कला की ओर थी। इन्होंने कविता, नाटक और उपन्यास भी लिखे। इसके अलावा उन्होंने संस्मरण, आलोचनात्मक निबंध, बाल साहित्य और अनुवाद का कार्य भी किया।
इनकी कई रचनाएं अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित हुई हैं। इन्होंने 55 किताबों की रचना की। इनमें 45 तो कविता संग्रह हैं। पद्मश्री से सम्मानित श्री नंबूदिरी को 1972 और 1988 में केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1973 में साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा मातृभूमि पुरस्कार, कबीर सम्मान आदि से भी सम्मानित किया गया था। इनकी रचनाएं वामपंथियों को खटकती थीं। इसलिए जब उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला तो आलोचकों ने कहा, ‘‘ज्ञानपीठ को अक्कितम मिल गया।’’ 1950 से प्रचलित उनकी एक प्रसिद्ध मलयालम कविता की छोटी-सी पंक्ति बहुत प्रसिद्ध है, ‘‘वेलिच्चम् दु:खमाणुण्णी, तमस्सल्लो सुखप्रदम्।’’ इसका अर्थ है, ‘‘प्रकाश शोक है, अंधेरा आनंदमय है।’’ यह पंक्ति उनकी पुस्तक ‘इरुपताम् नूट्टाण्डिन्टे इतिहासम्’ (बीसवीं सदी की गाथा) की है। वे व्यंग्य के माध्यम से मलयालम साहित्य की दुनिया में चरित्र और गतिशीलता का प्रकाश फैलाना चाहते थे, साथ में अंधेरे को भी भगाना चाहते थे। उनकी यह पंक्ति आज भी प्रसांगिक है और आने वाले समय में रहेगी।
इनका सर्वश्रेष्ठ अनुवाद श्रीमद् भागवतम् है। इसमें 14,613 श्लोक एवं 2400 पृष्ठ हैं। इनकी कुछ प्रमुख रचनाएं हैं- ‘बलिदर्शनम्’, ‘अरन्गेट्टम्’, ‘निमिष क्षेत्रम्’, ‘इडिन्जु पोलिन्ज लोकम्’, ‘अमृत गाथिका’ आदि। कविता संग्रह ‘बलिदर्शनम्’ के लिए उन्हें 1973 में मलयालम भाषा के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने अपनी रचनाओं में मानवीय भावनाओं को बड़ी ही गहराई से उकेरने के साथ ही भारतीय दर्शन और सामाजिक मूल्यों का समावेश भी किया है। उनकी रचनाएं आधुनिकता और परंपरा के बीच एक सेतु की तरह हैं। 2017 में पद्मश्री से सम्मानित श्री नंबूदिरी को अन्य अनेक सम्मान भी मिले थे। उन्हें केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार (1971 तथा 1973) तथा वायलर पुरस्कार (2012) से भी सम्मानित किया गया था। इसके अलावा श्री नंबूदिरी आशान पुरस्कार, वल्लत्तोल सम्मान, ललिताम्बिका साहित्य सम्मान, ओडक्कुषल सम्मान, कृष्णगीती सम्मान, नालप्पाड् सम्मान, एषुत्तच्चन सम्मान, मूर्तिदेवी सम्मान आदि से भी सम्मानित हो चुके थे।
अपनी रचनाओं के कारण वे सदैव जन सामान्य के हृदय में बने रहेंगे। उनके निधन से रिक्त हुए स्थान को निकट भविष्य में भर पाना असंभव लग रहा है।
( लेखक माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, भोपाल में वरिष्ठ सहायक प्राध्यापक हैं)