काया पलट सकता है उपवास

    दिनांक 23-अक्तूबर-2020
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जल उपवास में एक निश्चित समय के लिए पानी और रस उपवास में एक निश्चित समय के लिए फलों और सब्जियों के रस का सेवन किया जाता है 
उपवास न केवल रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है, बल्कि लंबे समय तक शरीर पर उम्र का असर नहीं होने देता। इसके अलावा, यह कई तरह की बीमारियों के लिए अचूक दवा से कम नहीं है। इसलिए हमारे शास्त्रों और स्मृतियों में उपवास और व्रत की महत्ता का उल्लेख मिलता है
- डॉ. ऋतु मिश्रा एवं डॉ. सुघोष माधव-
 
सामान्य शब्दों में उपवास का मतलब है— खाद्य या पेय पदार्थों से विमुख होना। संस्कृत में उपधातु का अर्थ है-निकट और वास का अर्थ है- रहने के लिए। अर्थात् उपवास का मतलब है (ईश्वर) के पास रहना या ईश्वर के साथ घनिष्ठ मानसिक नैकट्य की ओर उन्मुख होना। वहीं, अंग्रेजी में २३ह्का अर्थ है- भोजन से दूर रहना।
भारतीय जीवनशैली में उपवास के अलग-अलग तरीके हैं, जैसे- जल उपवास, रस उपवास, अस्थायी उपवास, आंशिक उपवास। यानी एक तय अवधि के लिए कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों तक खाद्य और पेय पदार्थों से विमुख रहना। जल उपवास में एक निश्चित समय के लिए पानी तथा रस उपवास में एक निश्चित समय के पश्चात सब्जी या फलों का रस तिया जाता है। इसी तरह, अस्थायी उपवास को कई उपश्रेणियों में बांटा जा सकता है, जैसे- वैकल्पिक दिवस उपवास जिसमें हर दूसरे दिन प्रतिबंधित भोजन भी शामिल होता है। हालांकि इसमें हर दिन केवल कुछ घंटों तक ही भोजन सीमित रहता है।
शरीर में ऊर्जा का स्तर बना रहे, इसके लिए हमारा शरीर कम समय में मस्तिष्क को आवश्यक ग्लूकोज पहुंचाने के लिए मांसपेशी ऊतक की थोड़ी मात्रा के साथ वसा भंडार से मुख्य रूप से मुक्त वसा (फ्री फैटी एसिड) जलाता है। भूख की लंबी अवधि के बाद शरीर में वसा की मात्रा कम होने पर सूक्ष्म ऊतक व मांसपेशियों को र्इंधन स्रोत के रूप में जलाना शुरू कर देता है। जब हम खाना खाते हैं तो ग्लूकोज हमारे यकृत में ग्लाइकोजन नामक र्इंधन के रूप में जमा होता है। ग्लाइकोजन को समाप्त होने में 10-12 घंटे लगते हैं। इसके खत्म होने के बाद हमारा शरीर वसा को जलाकर उसे ‘केटोन’ में बदलता है। ‘केटोन’ एक प्राकृतिक रसायन है, जिसे हमारा मस्तिष्क ऊर्जा के लिए उपयोग करता है। वेदों-पुराणों में व्रत की महत्ता का वर्णन मिलता है। वाजसनेयी संहिता में अग्नि को व्रतों का अधिपति कहा गया है, जबकि ऋग्वेद और अथर्ववेद में ‘व्रत’ शब्द दैवीय आदेश या आचार संहिता के रूप में प्रयुक्त हुआ है-
विष्णो: कर्माणि पश्यत यतोव्रतानि पस्पशे
इन्द्रस्य युज्य: सखा। (ऋग्वेद 2/22/19)
समानो मंत्र समिति समानी समानं व्रतं सह चित्तमेषाम। (अथर्ववेद 6/64/2)
वैदिक साहित्य में व्रत के मुख्यत: दो अर्थ मिलते हैं- निषिद्ध कार्यों को न करने का निर्देश और विशेष व्यवहार या भोजन आदि करने का निर्देश। (ऌ्र२३ङ्म१८ ङ्मा ऊँं१े२ँं२३१ं, ढ. श्. ङंल्ली, श्ङ्म’. 5 स्रं१३ क, स्र 4, 22, 23)
महाभारत में ‘व्रत’ धार्मिक संकल्प के रूप में आया है, जिसमें मनुष्य को सामान्य व्यवहार और अन्न संबंधी कुछ नियमों का पालन करना होता है। पुराणों में व्रत भंग होने के दोषों और उनके प्रायश्चित का भी वर्णन है। मनुस्मृति में भी अधिक भोजन और इसके दुष्परिणामों के प्रति सचेत करते हुए निर्देश दिए गए हैं-
अनारोग्यमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम्।
अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्तत्परिवर्जयेत्। (मनु., अध्याय-2, श्लोक-57)
नोच्छिष्टं कस्यचिद् दद्यान्नाद्याच्चैव तथान्तरा।
न चैवात्यशनं कुर्यान्न चोच्छिष्ट: क्वचिद् वर्जेत्।। (मनु., अध्याय-2, श्लोक-56)
अर्थात् न तो किसी को जूठा भोजन दें और न ही खाएं। दो समय (सुबह-शाम) के बीच भोजन नहीं करना चाहिए। उचित मात्रा से अधिक भोजन नहीं करना चाहिए और जूठे मुंह कहीं नहीं जाना चाहिए। तात्पर्य यह कि ऋषियों-मनीषियों को यह मालूम था कि भोजन सही अनुपात में ही अच्छा होता है।
उपवास से होने वाले लाभ
उपवास से न केवल शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, बल्कि यह वजन घटाने से लेकर शरीर और मन को स्वस्थ रखने में भी अहम भूमिका निभाता है। आध्यात्मिक उन्नति में तो इसकी भूमिका सर्वविदित है। यही नहीं, टाइप-2 मधुमेह रोगियों पर किए गए एक अध्ययन के अनुसार अनिरंतर (इंटर्मिटंट) उपवास से खून में शर्करा के स्तर को कम किया जा सकता है। इसी तरह, एक अन्य समीक्षा में अस्थायी उपवास तथा वैकल्पिक दिवस उपवास इंसुलिन प्रतिरोध को कम करने एवं कैलोरी सेवन को सीमित करने के तरीकों के तौर पर प्रभावी पाया गया है। इसके अलावा, प्रदाह (्रल्ला’ेंं३्रङ्मल्ल) शरीर की एक सामान्य प्रतिरक्षा प्रक्रिया है जो किसी भी संक्रमण से लड़ने में कारगर होती है। यह हमें जीवाणुओं और विषाणुओं से बचाती है, लेकिन पुराने व लंबी अवधि के प्रदाह स्वास्थ्य के लिए गंभीर हो सकते हैं। कई शोधों से पता चला है कि हृदय रोग, कैंसर व रुमेटाइड गठिया के मामले में भी प्रदाह या सूजन होने पर अस्थायी उपवास से इसे कम किया जा सकता है। एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि दिन में 12 घंटे के उपवास से भी ऐसे ही फायदे होते हैं। 
उपवास वजन घटाने से लेकर शरीर और मन को स्वस्थ रखने में भी अहम भूमिका निभाता है। यही नहीं, टाइप-2 मधुमेह रोगियों पर किए गए एक अध्ययन के अनुसार अनिरंतर (इंटर्मिटंट) उपवास से खून में शर्करा के स्तर को कम किया जा सकता है। साथ ही, यह रक्तचाप, ट्राइग्लिसराइड्स तथा कॉलेस्ट्रॉल को कम करता है। हृदय के लिए लाभकारी है उपवास से रक्तचाप, ट्राइग्लिसराइड्स तथा कॉलेस्ट्रॉल में सुधार आता है। साथ ही, आहार और जीवनशैली में बदलाव कर हृदय रोग के खतरे को कम किया जा सकता है। कुछ चिकित्सा शोधों में पाया गया है कि दिनचर्या में उपवास को शामिल करना हृदय के लिए लाभकारी हो सकता है। दक्षिणी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय व हार्वर्ड विश्वविद्यालय के एक शोध के अनुसार वैकल्पिक उपवास से 8 सप्ताह में बैड कॉलेस्ट्रॉल (एलडीएल) 25 प्रतिशत तथा रक्त ट्राइग्सिराइड्स के स्तर को 32 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। वजन और रक्तचाप घटाने में भी उपवास कारगर है। 4,629 लोगों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि उपवास कोरोनरी धमनी रोग के जोखिम को कम करता है। साथ ही, मधुमेह रोगियों पर भी इसका प्रत्यक्ष असर दिखा।
मानसिक क्रियाओं पर नियंत्रण में मददगार
यह तो ज्ञात ही है कि आहार में बदलाव का प्रभाव मस्तिष्क पर पड़ता है। लेकिन उपवास न केवल मस्तिष्क को स्वस्थ रखता है, बल्कि इसमें उत्पन्न होने वाले तंत्रिका अपह्यासी (न्यूरोडिजेनरेटिव) विकारों को भी रोक सकता है। हालांकि इनमें से ज्यादातर शोध पशुओं पर ही हुए हैं, लेकिन कुछ अध्ययनों से पता चला है कि उपवास इनसान के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव छोड़ता है। चूहों पर 11 माह तक किए गए अस्थायी उपवास के एक शोध में उनकी मानसिक क्रियाओं व मानसिक संरचना, दोनों में सुधार दर्ज किया गया। अन्य पशुओं पर हुए शोध में भी यह तथ्य सामने आया कि उपवास मस्तिष्क के स्वास्थ्य की रक्षा करने में सक्षम है और संज्ञानात्मक कार्य को बढ़ाने में तंत्रिका कोशिकाओं की मदद करता है। इसके अलावा, यह अल्जाइमर और पार्किंसन जैसे रोगों से भी निबटने में कारगर है। वैसे, इनसान की मानसिक क्रियाओं पर उपवास का क्या प्रभाव पड़ता है, इस पर शोध किए जा रहे हैं। 
इसके अलावा, एक शोध में मिर्गी से पीड़ित कुछ बच्चों को विशिष्ट उच्च वसा और कम कार्बोहाइड्रेट वाला आहार दिया गया, जिसका उन पर सकारात्मक प्रभाव देखा गया। नेचर जर्नल में प्रकाशित कुछ वैज्ञानिकों के सुझाव के अनुसार, खाद्य प्रतिबंध का सकारात्मक भावनाओं जैसे नियंत्रण, शक्ति, संतुष्टि या गर्व की भावना के सुदृढ़ीकरण में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। भोजन का समय और वृहद् पोषक संरचना भी संज्ञानात्मक कार्य को प्रभावित कर सकती है। इससे प्रतिक्रिया समय और ध्यान में कमी या स्मृति और सीखने की क्षमता में सुधार हो सकता है। जैसे उच्च प्रोटीन वाला आहार हमारी स्मृति अवलोकन प्रक्रिया को धीमा करता है और व्याकुलता व संवेदनशीलता बढ़ा देता है। जब हम लगातार तरह-तरह के आहार लेते हैं तो शरीर को यकृत में ग्लाइकोजन को कम करने का मौका नहीं मिलता। इससे केटोन उत्पादन के लिए भी पर्याप्त समय नहीं मिलता। जॉन हॉपकिंस स्कूल आॅफ मेडिसिन में न्यूरोसाइंस के प्रोफेसर मार्क मैटसन ने उपवास पर कई शोध किए हैं। उनके प्रयोगों से पता चला है कि सप्ताह में दो दिन तक सीमित कैलोरी सेवन से हिप्पोकैम्पस में तंत्रिका संबंधी काफी सुधार हो सकते हैं। हिप्पोकैम्पस मस्तिष्क का वह हिस्सा होता है, जो लंबी और अल्पकालिक स्मृतियों को नियंत्रित करता है।
कैलोरी सेवन और चयापचय
कुछ शोधों में पाया गया है कि अल्पावधि उपवास न्यूरोट्रांसमीटर नॉर-एपिनेफ्रीन का स्तर बढ़ाकर चयापचय को गति दे सकता है, जो वजन घटाने में सहायक सिद्ध होता है। पूरे दिन का उपवास 9 प्रतिशत तक वजन कम कर सकता है, जबकि 3-12 सप्ताह तक लगातार कैलोरी प्रतिबंध के रूप में उपवास वजन घटाने को प्रेरित करने और क्रमश: 8 प्रतिशत और 16 प्रतिशत तक वजन व वसा घटाने में कारगर साबित हुआ। मानव विकास हार्मोन (एचजीएच) एक प्रकार का प्रोटीन हार्मोन है जो स्वास्थ्य के कई पहलुओं को नियंत्रित करता है। आधुनिक शोध के अनुसार, नियमित उपवास ग्रोथ हार्मोन का स्राव बढ़ाता है, जो शारीरिक विकास, चयापचय, वजन घटाने और मांसपेशी को मजबूत बनाता है। 11 स्वस्थ वयस्कों को 24 घंटे तक उपवास रखने को कहा गया। इस अध्ययन में पता चला कि उनका एचजीएच स्तर काफी बढ़ गया। इसी तरह, 9 पुरुषों पर किए गए एक अध्ययन में पता चला कि मात्र दो दिन के उपवास से शरीर में एचजीएच का उत्पादन 5 गुना तक बढ़ाया जा सकता है।
उपवास व्यक्ति को दीर्घायु बनाता है और यौवन को बरकरार रखता है। एक अध्ययन में चूहों को हर दूसरे दिन भूखा रखने पर पाया गया कि उन पर उम्र का असर (कोशिकीय व आण्विक स्तर पर) देर से हुआ और वे सामान्य चूहों के मुकाबले 83 प्रतिशत अधिक समय तक जीवित रहे। दूसरे जीवों पर प्रयोग के भी समान निष्कर्ष ही निकले हैं।
कैंसर की रोकथाम में सहायक
कैंसर की रोकथाम में उपवास की उपयोगिता पर काफी रोचक अध्ययन सामने आए हैं। उपवास से न केवल कीमोथेरेपी का प्रभाव बढ़ सकता है, बल्कि यह ट्यूमर के बढ़ने की रफ्तार को भी धीमा करता है। एक चूहे पर वैकल्पिक दिन के उपवास और एक टेस्ट-ट्यूब अध्ययन में पता चला कि दोनों ही कैंसर के उपचार और रोकथाम में कारगर हैं। एक अन्य टेस्ट-ट्यूब अध्ययन में पता चला कि उपवास के कई चक्रों से छिपी हुई कैंसर कोशिकाओं का पता लगाया जा सकता है।
यह हम पर निर्भर है कि हम शरीर को कैसा बनाना चाहते हैं। कोई नहीं चाहता कि उसका शरीर रोग ग्रस्त हो और वह तरह-तरह की दवाएं खाए। इसलिए जरूरी है कि एक नियमित दिनचर्या बनाएं, जिसमें उपवास और व्यायाम शामिल हो।
(लेखिका राष्ट्रीय प्रतिरक्षा विज्ञान संस्थान में इन्सपायर फैकल्टी हैं तथा लेखक शहीद भगत सिंह कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में गेस्ट फैकल्टी हैं)