दबी आवाज को दिया स्वर

    दिनांक 23-अक्तूबर-2020
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श्रद्धांजलि/स्व. रामविलास पासवान

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आधुनिक भारत के सामाजिक और राजनैतिक आंदोलनों को नेतृत्व देने वाले रामविलास पासवान का गुजर जाना एक युग के अवसान की तरह है। उन्होंने डॉ. आंबेडकर, बाबू जगजीवन राम आदि नेताओं के मार्ग पर चल कर दलित समाज को जगाने का काम किया, उन्हें उनका हक दिलाया।
उनका पैतृक गांव बिहार में खगड़िया के फरकिया क्षेत्र में है। फरकिया उस क्षेत्र को कहा जाता है, जो पानी से भरा रहता है और इस कारण उस क्षेत्र का सर्वे नहीं हो पाता। इस कारण भूमि दस्तावेजों में लगभग 2,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को फरकिया कहा जाता है। उस जलमग्न क्षेत्र की सरसता एवं शीतलता रामविलास जी के जीवन में भी थी। खगड़िया जिले में नेपाल से आने वालीं कई नदियां गंगा में विलीन होती हैं। संभवत: इसी कारण से उनके व्यवहार में मिलनसारिता छलकती थी।
उनके पिता जामुन दास अपने इलाके के जाने-माने कबीरपंथी थे। उनके घर संतों का आना-जाना लगा रहता था। शायद उन संतों के आशीर्वाद के कारण ही वे लगभग 50 साल तक राजनीति में रहे। उन्होंने लगभग तीन दशक तक भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों को संभाला।
मेरे गृह जिले दरभंगा में उनकी ननिहाल है। वे वहां आया करते थे। 1980 में दरभंगा में ही उनसे मेरी पहली भेंट हुई थी। वे एक कार्यक्रम के लिए आए थे। हम कुछ छात्रों ने उनसे मिलने का कार्यक्रम बनाया और उनके पास पहुंच गए। उनका भाषण सुना, बहुत ही प्रेरक लगा। इसके बाद हम लोगों ने कुछ समस्याओं को लेकर उन्हें एक ज्ञापन सौंपा। इसके बाद हम सभी से उन्होंने बात की। वे इतने प्रभावित हुए कि मेरे घर भोजन करने के लिए आ गए। उन दिनों मैं साइंस कॉलेज, पटना में पढ़ रहा था और सांध्य शाखा में जाता था।
वे मंडल आयोग के हिमायती थे और मैं आरक्षण का विरोधी रहा हूं। एक बार मैंने उनसे सवाल किया कि आरक्षण का विकल्प क्या हो सकता है? उन्होंने एक उदाहरण से मुझे समझाया। उन्होंने पूछा कि यदि घास-फूस खाने वाले खगड़िया के घोड़े और काजू, किशमिश, दूध पीने वाले राष्ट्रपति भवन के घोड़े के बीच दौड़ की प्रतियोगिता होगी तो कौन जीतेगा? इसके बाद मैंने कभी उनसे इस तरह का सवाल नहीं किया।
‘दलित सेना’ नामक सामाजिक संस्था का गठन करके उन्होंने समाज के एक बड़े तबके से अपना शाश्वत संबंध बनाए रखा। मैं भी कभी इस संस्था का सक्रिय सदस्य हुआ करता था। इस संगठन के माध्यम से वे हर उस जगह का दौरा करते थे, जहां कोई न कोई घटना-दुर्घटना होती थी। इस सामाजिक पूंजी ने उन्हें राजनैतिक ऊंचाइयां प्राप्त करने में मदद की। उन्हें लोकशक्ति और जनशक्ति पर इतना भरोसा था कि उन्होंने अपनी पार्टी का नाम ही ‘लोक जनशक्ति पार्टी’ रखा। उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करवाने में अग्रणी भूमिका निभाई। इस कारण एक समय उन्हें दलितों और सवर्णों का भी विरोध झेलना पड़ा। सवर्णों का कहना था कि इन सिफारिशों से उनके अधिकार कम हो गए, वहीं दलितों का कहना था कि उनके अधिकारों को बांट दिया गया।
प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह के कार्यकाल में उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री के साथ कल्याण एवं श्रम मंत्रालय का भी दायित्व संभाला। इसी दौरान डॉ. आंबेडकर को भारत रत्न से सम्मानित किया गया। रेल मंत्री के नाते उन्होंने देशभर में 4 क्षेत्रीय कार्यालय खुलवाए। सुदूर एवं उपेक्षित क्षेत्रों में भी रेलवे का विस्तारीकरण, आधुनिकीकरण एवं दोहरीकरण किया। संचार मंत्री के नाते उन्होंने मोबाइल फोन के सिम की उपलब्धता को सुगम बनाया। रसायन एवं उर्वरक मंत्री के नाते उन्होंने यूरिया खाद को सर्वसुलभ बनाया एवं जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता को प्रचलित किया। उन्होंने छह प्रधानमंत्रियों के साथ मंत्री के नाते देश की सेवा की।
वे 1969 में पहली बार विधायक चुने गए और 1977 में लोकसभा पहुंचे। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1999 के चुनाव के बाद एक सांसद के नाते मुझे लोकसभा में उनके साथ काम करने का अवसर मिला। उनके सान्निध्य में बहुत कुछ सीखा। वे कहा करते थे कि समर्थन और विरोध पूरी ईमानदारी से करना चाहिए। वे यह भी कहते थे कि हम सब चौकीदारी परंपरा वाले लोग हैं। इस नाते अपने गांव, समाज, देश की रखवाली करना हमारा धर्म है।
उनके जाने से भारतीय राजनीति में एक बड़ा रिक्त स्थान पैदा हो गया है। (लेखक पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं)