अर्थ, कृषि, श्रम, उद्योग तथा शिक्षा नीति में उठाए गए हैं आशा जगाने वाले कदम, लेकिन क्रियान्वयन पूर्ण होने तक देना पड़ेगा बारीकी से ध्यान

    दिनांक 25-अक्तूबर-2020
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अर्थ, कृषि, श्रम, उद्योग तथा शिक्षा नीति में 'स्व' को लाने की इच्छा रखकर कुछ आशा जगाने वाले कदम उठाए गए हैं। व्यापक संवाद के आधार पर एक नई शिक्षा नीति घोषित हुई है। उसका संपूर्ण शिक्षा जगत में स्वागत हुआ है। 'वोकल फार लोकल' स्वदेशी संभावनाओं वाला उत्तम प्रारंभ है। परन्तु इन सबका यशस्वी क्रियान्वयन पूर्ण होने तक बारीकी से ध्यान देना पड़ेगा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने कृषि एवं किसानों की समस्याओं पर भी अपने विचार व्यक्त किए। विजयादशमी उत्सव पर आयोजित कार्यक्रम में विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि हमारी दृष्टि के आधार पर हम अपने गंतव्य तथा पथ को निश्चित करते हैं। दुनिया जिन बातों के पीछे पड़कर व्यर्थ दौड़ रही है, उसी दौड़ में हम शामिल होकर पहले क्रमांक पर आते हैं तो इसमें पराक्रम और विजय तो निश्चित है, परन्तु 'स्व' का भान व सहभाग नहीं है। उदाहरणार्थ, कृषि नीति का हम निर्धारण करते हैं, तो उस नीति से हमारा किसान अपने बीज स्वयं बनाने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए। हमारा किसान अपने को आवश्यक खाद, रोगप्रतिरोधक दवाइयां व कीटनाशक स्वयं बना सके या अपने गांव के आस-पास इसे पा सके, यह आवश्यक है। अपने उत्पादन का भंडारण व संस्करण करने की कला व सुविधा उसके निकट उपलब्ध होनी चाहिए। हमारा कृषि का अनुभव व्यापक व सबसे लम्बा है। इसलिये उसमें से कालसुसंगत अनुभवसिद्ध परंपरागत ज्ञान तथा आधुनिक कृषि विज्ञान से देश के लिये उपयुक्त व सुपरीक्षित अंश, हमारे किसान को अवगत कराने वाली नीतियां बनें। वैज्ञानिक निरीक्षण तथा प्रयोगों को अपने लाभ के अनुसार परिभाषित करते हुए, नीतियों को प्रभावित करके लाभ कमाने के कारपोरेट जगत के चंगुल में न फंसते हुए अथवा बाजार या मध्यस्थों की जकड़न के जाल से अप्रभावित रहकर, अपना उत्पादन बेचने की उसकी स्थिति बननी चाहिए। तब वह नीति भारतीय दृष्टि की यानी स्वदेशी कृषि नीति मानी जाएगी। यह काम आज की प्रचलित कृषि व आर्थिक व्यवस्था में त्वरित न हो, यह संभव है। उस स्थिति में कृषि व्यवस्था व अर्थव्यवस्था को इन बातों के लिए अनुकूलता की ओर ले जाने वाली नीति अपनानी पड़ेगी, तभी वह स्वदेशी नीति कहलाएगी।
विचार और सहयोग से मिलेगी सफलता
श्री भागवत ने कहा कि अर्थ, कृषि, श्रम, उद्योग तथा शिक्षा नीति में 'स्व' को लाने की इच्छा रखकर कुछ आशा जगाने वाले कदम अवश्य उठाए गए हैं। व्यापक संवाद के आधार पर एक नई शिक्षा नीति घोषित हुई है। उसका संपूर्ण शिक्षा जगत में स्वागत हुआ है। हमने भी उसका स्वागत किया है। 'वोकल फार लोकल' स्वदेशी संभावनाओं वाला उत्तम प्रारंभ है। परन्तु इन सबका यशस्वी क्रियान्वयन पूर्ण होने तक बारीकी से ध्यान देना पड़ेगा। इसीलिये स्व या आत्मतत्व का विचार इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में सबको आत्मसात करना होगा, तभी उचित दिशा में चलकर यह यात्रा सफल होगी।
उन्होंने कहा कि हमारे भारतीय विचार में संघर्ष में से प्रगति के तत्व को नहीं माना गया है। अन्याय निवारण के अंतिम साधन के रूप में ही संघर्ष मान्य किया गया है। विकास और प्रगति हमारे यहां समन्वय के आधार पर सोची गई है। इसलिए प्रत्येक क्षेत्र स्वतंत्र व स्वावलंबी तो बनता है, परन्तु आत्मीयता की भावना के आधार पर, एक ही राष्ट्र—पुरुष के अंग के रूप में, परस्पर निर्भरता से चलने वाली व्यवस्था बनाकर, सभी का लाभ, सभी का सुख साधता है। यह आत्मीयता व विश्वास की भावना बनती है, नीति बनाते समय सभी सम्बन्धित पक्षों व व्यक्तियों से व्यापक विचार-विनिमय करके, परस्पर सकारात्मक मंथन के आधार पर सहमति से। सबके साथ संवाद, उसमें से सहमति, उसका परिणाम सहयोग, इस प्रक्रिया के कारण अपने आत्मीय जनों में विश्वास, समाज में यश, श्रेय आदि प्राप्त करने की प्रक्रिया बताई गई है।
समानो मंत्रः समितिः समानी समानं मनः सहचित्तमेषाम् ।
समानं मंत्रमभिमंत्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि।।
सौभाग्य से ऐसा विश्वास सभी के मन में सभी विषयों पर उत्पन्न करने की क्षमता आज के राजनीतिक नेतृत्व के पास होने की आशा व अपेक्षा की जा सकती है। समाज व शासन के बीच प्रशासन का स्तर पर्याप्त संवेदनशील व पारदर्शी होने से यह कार्य और अधिक अच्छी तरह सम्पन्न किया जा सकता है। सहमति के आधार पर किए गए निर्णय बिना परिवर्तन के जब तत्परतापूर्वक लागू होते दिखते हैं तब यह समन्वय और सहमति का वातावरण और मजबूत होता है। घोषित नीतियों का क्रियान्वयन आखिरी स्तर तक किस प्रकार हो रहा है, उसके बारे में सजगता व नियंत्रण सदा ही आवश्यक रहता है। नीति निर्माण के साथ-साथ उसके क्रियान्वयन में भी तत्परता व पारदर्शिता रहने से नीति में अपेक्षित परिवर्तनों के लाभों को पूर्ण मात्रा में पा सकते हैं। उन्होंने कहा कि कोरोना की परिस्थिति ने नीतिकारों सहित देश के सभी विचारवान् लोगों का ध्यान अपने देश की आर्थिक दृष्टि, कृषि, उत्पादन को विकेंद्रित करने वाले छोटे व मध्यम उद्योग, रोजगार सृजन, स्वरोजगार, पर्यावरण मित्रता तथा उत्पादन के सभी क्षेत्रों में शीघ्र स्वनिर्भर होने की आवश्यकता की तरफ आकर्षित किया है। इन क्षेत्रों में कार्यरत हमारे छोटे—बड़े उद्यमी, किसान आदि सभी इस दिशा में आगे बढ़कर देश के लिए सफलता पाने को उत्सुक हैं। बड़े देशों की प्रचंड आर्थिक शक्तियों से स्पर्धा में शासन को उन्हें सुरक्षा कवच देना होगा। कोरोना की परिस्थिति के चलते छह माह के अंतराल के बाद फिर खड़ा होने के लिए आवश्यक सहायता पहुंच रही है, यह भी सुनिश्चित करना होगा।
उन्होंने कहा कि हमारे राष्ट्र के विकास व प्रगति के बारे में हमें अपनी भावभूमि को आधार बनाकर, अपनी पृष्ठभूमि में, अपने विकास पथ का आलेखन करना पड़ेगा। उस पथ का गंतव्य हमारी राष्ट्रीय संस्कृति व आकांक्षा के अनुरूप ही होगा। सबको सहमति की प्रक्रिया में सकारात्मक रूप से हम सहभागी बनाएं, अचूक, तत्परतापूर्ण और तय प्रारूप में योजनाओं का क्रियान्वयन सुनिश्चित करें। आखिरी आदमी तक इस विकास प्रक्रिया के लाभ पहुंचते हैं, मध्यस्थों व दलालों द्वारा लूट बंद होकर जनता जनार्दन सीधा विकास प्रक्रिया में सहभागी व लाभान्वित होती है, यह तय करने पर ही हमारे स्वप्न सत्यता में उतर सकते हैं अन्यथा उनके अधूरे रह जाने का खतरा बना रहता है।
ऐसे में उपरोक्त सभी बातों का महत्व है, परन्तु राष्ट्रोत्थान की सभी प्रक्रियाओं में समाज का दायित्व गुरुतर व मूलाधार का स्थान रखता है। कोरोना की प्रतिक्रिया के रूप में विश्व में जाग्रत हुआ 'स्व' का महत्व, राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक मूल्यों की महत्ता, पर्यावरण का विचार व उसके प्रति कुछ करने की तत्परता आदि कोरोना के मंद होने पर फिर से समाज व्यवहार में इन सब शाश्वत महत्व की उपकारी बातों की अवहेलना न हो। यह तभी सम्भव होगा जब सम्पूर्ण समाज निरंतर अभ्यासपूर्वक इसके आचरण को सातत्यपूर्ण और उत्तरोत्तर आगे बढ़ने वाला बनाएगा। अपने आचरण में छोटे—छोटे परिवर्तन लाने का क्रम बनाकर, नित्य इन सब विषयों के प्रबोधन के उपक्रम चलाकर हम इस परिवर्तन को आगे बढ़ा सकते हैं। प्रत्येक कुटुम्ब इसकी इकाई बन सकता है। सप्ताह में एक बार कुटुम्ब के सब लोग मिलकर श्रद्धानुसार भजन व इच्छानुसार आनन्दपूर्वक घर में बनाया भोजन करने के पश्चात्, दो-तीन घण्टों की गपशप के लिए बैठ जाएं और उसमें इन विषयों की चर्चा करते हुए उसके प्रकाश में, पूरे परिवार में आचरण का छोटा सा संकल्प लेकर अगले हफ्ते की गपशप तक उसको परिवार के सभी सदस्यों के आचरण में लागू करने का कार्य सतत कर सकते हैं। चर्चा आवश्यक है, क्योंकि विषय या वस्तु नई हो या पुरानी, उसका नयापन या पुरानापन उसकी उपयुक्तता सिद्ध नहीं करता। हर बात की परीक्षा करके ही उसकी उपयुक्तता व आवश्यकता को समझना चाहिए, ऐसी पद्धति हमारे यहां बताई गई है-
संतः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेय बुद्धिः।
श्री भागवत ने कहा कि परिवार में अनौपचारिक चर्चा में विषयवस्तु के सभी पहलुओं का ज्ञान, सारासार विवेक से उसकी वास्तविक आवश्यकता का ज्ञान तथा उसको अपनाने अथवा छोड़ने का मन बनता है, तब परिवर्तन समझ—बूझकर व स्वेच्छा से स्वीकार्य होने के कारण शाश्वत हो जाता है। प्रारम्भ में हम अपने घर में रखरखाव, साजसज्जा, अपने कुटुम्ब की गौरव परम्परा, अपने कुटुम्ब के कालसुसंगत रीति—रिवाज, कुल—रीति की चर्चा कर सकते हैं। पर्यावरण का विषय सर्वस्वीकृत व सुपरिचित होने से अपने घर में पानी को बचाकर उपयोग, प्लास्टिक का पूर्णतया त्याग व घर के आंगन में, गमलों में हरियाली, फूल—सब्जी उगाने से लेकर वृक्षारोपण के उपक्रम तक की चर्चा भी सहज व प्रेरक बन सकती है। हम सभी रोज स्वयं तथा कुटुम्ब के लिए समय व आवश्यकतानुसार धन का व्यय करते हुए कुछ न कुछ उपयुक्त कार्य करते हैं। रोज समाज के लिए कितना समय व कितना व्यय लगाते हैं, यह चर्चा के उपरांत कृति के प्रारम्भ का विषय हो सकता है। समाज के सभी जाति—भाषा—प्रांत—वर्गों में हमारे मित्र व्यक्ति व मित्र कुटुम्ब हैं कि नहीं ? हमारा तथा उनका सहज आने-जाने का, साथ उठने-बैठने, खाने-पीने का सम्बन्ध है कि नहीं, यह सामाजिक समरसता की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण आत्मचिंतन कुटुम्ब में हो सकता है। इन सभी विषयों में समाज में चलने वाले कार्यक्रम, उपक्रम व प्रयासों में हमारे कुटुम्ब का योगदान हमारी सजगता व आग्रह का विषय हो सकता है। प्रत्यक्ष सेवा के कार्यक्रम उपक्रमों, जैसे रक्तदान, नेत्रदान आदि में सहभागी होना अथवा समाज का मन इन कार्यों के लिये अनुकूल बनाना, ऐसी बातों में अपना कुटुम्ब योगदान दे सकता है। ऐसे छोटे-छोटे उपक्रमों द्वारा व्यक्तिगत जीवन में सद्भाव, शुचिता, संयम, अनुशासन सहित हम मूल्याधारित आचरण का विकास कर सकते हैं। उसके परिणाम स्वरूप हमारा सामूहिक व्यवहार भी नागरिक अनुशासन का पालन करते हुए परस्पर सौहार्द बढ़ाने वाला व्यवहार हो जाता है। उन्होंने कहा कि प्रबोधन द्वारा समाज के सामान्य घटकों का मन अपनी अंतर्निहित एकात्मता का आधारस्वर हिन्दुत्व को बनाकर चले तथा देश के लिए पुरुषार्थ में अपने राष्ट्रीय स्वरूप का आत्मभान, सभी समाज घटकों की आत्मीयतावश परस्पर निर्भरता, हमारी सामूहिक शक्ति सब कुछ कर सकती है, यह आत्मविश्वास तथा हमारे मूल्यों के आधार पर विकास यात्रा के गंतव्य की स्पष्ट कल्पना जाग्रत रहती है तो, निकट भविष्य में ही हम भारतवर्ष को सम्पूर्ण दुनिया की सुख—शांति का युगानुकूल पथ प्रशस्त करते हुए, बन्धुभाव के आधार पर मनुष्य मात्र को वास्तविक स्वतंत्रता व समता प्रदान कर सकने वाले भारतवर्ष के नाते खड़ा होते देखेंगे। ऐसे व्यक्ति तथा कुटुम्बों के आचरण से सम्पूर्ण देश में बंधुता, पुरुषार्थ तथा न्यायनीतिपूर्ण व्यवहार का वातावरण चतुर्दिक खड़ा करना होगा। यह प्रत्यक्ष में लाने वाला कार्यकर्ताओं का देशव्यापी समूह खड़ा करने के लिए ही 1925 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्य कर रहा है। इस प्रकार की संगठित स्थिति ही समाज की सहज—स्वाभाविक—स्वस्थ अवस्था है। शतकों के आक्रमणों के अंधकार से मुक्त हुए अपने इस स्वतंत्र राष्ट्र के नवोदय की पूर्व शर्त यह समाज की स्वस्थ—संगठित अवस्था है। इसी को खड़ा करने के लिए हमारे महापुरुषों ने प्रयत्न किए। स्वतंत्रता के पश्चात् इस गंतव्य को ध्यान में रखकर ही उसको युगानुकूल भाषा में परिभाषित कर उसके व्यवहार के नियम बताने वाला संविधान हमें मिला है। उसको यशस्वी करने के लिए पूरे समाज में यह स्पष्ट दृष्टि, परस्पर समरसता, एकात्मता की भावना तथा देश हित सर्वोपरि मानकर किया जाने वाला व्यवहार इस संघ कार्य से ही खड़ा होगा। इस पवित्र कार्य में प्रामाणिकता, निस्वार्थ बुद्धि व तन-मन-धनपूर्वक देशभर में लक्षावधि स्वयंसेवक लगे हैं। मैं आपको भी उनके सहयोगी कार्यकर्ता बनकर देश के नवोत्थान के इस अभियान के रथ में हाथ लगाने का आहृवान करता हूं।
"प्रश्न बहुत से उत्तर एक, कदम मिलाकर बढ़े अनेक।
वैभव के उत्तुंग शिखर पर, सभी दिशा से चढ़े अनेक।।"