भारत भक्ति तथा मनुष्यता की संस्कृति के विशाल प्रांगण में सबको बसाने वाला, सबको जोड़ने वाला शब्द है हिन्दुत्व

    दिनांक 25-अक्तूबर-2020
Total Views |

pcc2_1  H x W:
'हिन्दुत्व' एक ऐसा ही शब्द है, जिसके अर्थ को पूजा से जोड़कर संकुचित किया गया है। जबकि यह शब्द अपने देश की पहचान को, अध्यात्म आधारित उसकी परंपरा के सनातन सातत्य तथा समस्त मूल्य सम्पदा के साथ अभिव्यक्ति देने वाला शब्द है। इसलिए संघ मानता है कि यह शब्द भारतवर्ष को अपना मानने वाले, उसकी संस्कृति के वैश्विक व सर्वकालिक मूल्यों को आचरण में उतारने को तत्पर तथा यशस्वी रूप में ऐसा करके दिखाने वाली उसकी पूर्वज परम्परा का गौरव मन में रखने वाले सभी 130 करोड़ समाज बन्धुओं पर लागू होता है
ऐसा भ्रम रा.स्व.संघ के बारे में निर्माण न हो, इसीलिए यह जानना जरूरी है कि संघ कुछ शब्दों का उपयोग क्यों करता है अथवा कुछ प्रचलित शब्दों को किस अर्थ में समझता है। 'हिन्दुत्व' ऐसा ही एक शब्द है, जिसके अर्थ को पूजा से जोड़कर संकुचित किया गया है। संघ में उस संकुचित अर्थ में उसका प्रयोग नहीं होता। वह शब्द अपने देश की पहचान को, अध्यात्म आधारित उसकी परंपरा के सनातन सातत्य तथा समस्त मूल्य सम्पदा के साथ अभिव्यक्ति देने वाला शब्द है। इसलिए संघ मानता है कि यह शब्द भारतवर्ष को अपना मानने वाले, उसकी संस्कृति के वैश्विक व सर्वकालिक मूल्यों को आचरण में उतारने को तत्पर तथा यशस्वी रूप में ऐसा करके दिखाने वाली उसकी पूर्वज परम्परा का गौरव मन में रखने वाले सभी 130 करोड़ समाज बन्धुओं पर लागू होता है। उक्त विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने व्यक्त किए। वे नागपुर में विजयादशमी उत्सव पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।
समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दुत्व शब्द के विस्मरण से हमको एकात्मता के सूत्र में पिरोकर देश व समाज से बांधने वाला बंधन ढीला होता है। इसीलिए इस देश व समाज को तोड़ने के इच्छुक, हमें आपस में लड़ाना चाहने वाले इस शब्द को, जो सबको जोड़ता है, अपने तिरस्कार व टीका—टिप्पणी का पहला लक्ष्य बनाते हैं। इससे कम व्याप्ति वाले शब्द, जो हमारी अलग-अलग विशिष्ट लघु पहचानों के नाम हैं तथा 'हिन्दू' शब्द के अंतर्गत पूर्णतः सम्मानित व स्वीकार्य हैं, की विविधताओं को अलगाव के रूप में प्रस्तुत करने पर जोर देते हैं। हिन्दू किसी पंथ, सम्प्रदाय का नाम नहीं है, किसी एक प्रांत का अपना उपजाया शब्द नहीं है, किसी एक जाति की बपौती नहीं है, किसी एक भाषा का गुणगान करने वाला शब्द नहीं है। वह इन सब विशिष्ट पहचानों को स्वीकृत व सम्मानित रखते हुए, भारत भक्ति तथा मनुष्यता की संस्कृति के विशाल प्रांगण में सबको बसाने वाला, सबको जोड़ने वाला शब्द है। इस शब्द पर किसी को आपत्ति हो सकती है। आशय समान है तो अन्य शब्दों के उपयोग पर हमें कोई आपत्ति नहीं है। परन्तु इस देश की एकात्मता व सुरक्षा के हित में, इस हिन्दू शब्द को आग्रहपूर्वक अपनाकर, उसके स्थानीय तथा वैश्विक, सभी अर्थों को कल्पना में समेटकर संघ चलता है। संघ जब 'हिन्दुस्थान हिन्दू राष्ट्र है' का उच्चारण करता है तो उसके पीछे कोई राजनीतिक अथवा सत्ता केंद्रित संकल्पना नहीं होती। अपने राष्ट्र का 'स्व'त्व हिंदुत्व है। समस्त राष्ट्र जीवन के सामाजिक, सांस्कृतिक, इसलिए उसके समस्त क्रियाकलापों को दिग्दर्शित करने वाले मूल्यों व उनकी व्यक्तिगत, पारिवारिक, व्यावसायिक और सामाजिक जीवन में अभिव्यक्ति 'हिन्दू' शब्द से निर्दिष्ट होती है। उस शब्द की भावना की परिधि में आने व रहने के लिए किसी को अपनी पूजा, प्रान्त, भाषा आदि कोई भी विशेषता छोड़नी नहीं पड़ती। छोड़नी पड़ती है तो बस अपना ही वर्चस्व स्थापित करने की इच्छा। स्वयं के मन से अलगाववादी भावना को समाप्त करना पड़ता है। वर्चस्ववादी सपने दिखाकर, कट्टरपंथ के आधार पर, अलगाव को भड़काने वाले स्वार्थी तथा द्वेषी लोगों से बचकर रहना पड़ता है।
समन्वय से मिटेगा अविश्वास

cccc1_1  H x W: 
भारत की विविधता के मूल में स्थित शाश्वत एकता को तोड़ने का ऐसा ही घृणित प्रयास हमारे तथाकथित अल्पसंख्यक तथा अनुसूचित जाति—जनजाति के लोगों को झूठे सपने दिखाकर तथा कपोलकल्पित द्वेष की बातें बताकर चल रहा है। ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसी घोषणाएं करने वाले लोग इस षड्यंत्रकारी चौकड़ी में शामिल हैं, उसका नेतृत्व भी करते हैं। राजनीतिक स्वार्थ, कट्टरपन व अलगाव की भावना, भारत के प्रति शत्रुता तथा जागतिक वर्चस्व की महत्वाकांक्षा, इनका एक अजीब सम्मिश्रण भारत की राष्ट्रीय एकात्मता के विरुद्ध काम कर रहा है। यह समझकर धैर्य से काम लेना होगा। भड़काने वालों के अधीन न होते हुए, संविधान व कानून का पालन करते हुए, अहिंसक तरीके से व जोड़ने के ही एकमात्र उद्देश्य से हम सबको कार्यरत रहना पड़ेगा। एक—दूसरे के प्रति व्यवहार में हम लोग संयमित, नियम कानून तथा नागरिक अनुशासन के दायरे में सद्भावनापूर्ण व्यवहार करते हैं तो ही परस्पर विश्वास का वातावरण बनता है। ऐसे वातावरण में ही ठण्डे दिमाग से समन्वय से समस्या का हल निकलता है। इससे विपरीत आचरण परस्पर अविश्वास को बढ़ावा देता है। अविश्वास की दृष्टि में समस्या का हल आंखों से ओझल हो जाता है। समस्या का स्वरूप भी समझना कठिन हो जाता है। केवल प्रतिक्रिया, विरोध, भय की भावना में अनियंत्रित हिंसक आचरण को बढ़ावा मिलता है, दूरियां और विरोध बढ़ते जाते हैं।
श्री भागवत ने आगे कहा कि आपस में हम सब संयमित व धैर्यपूर्वक व्यवहार रखकर विश्वास तथा सौहार्द को बढ़ावा दे सकें, इसके लिए सभी को अपनी एक बड़ी पहचान के सत्य को स्पष्ट स्वीकार करना पड़ेगा। राजनीतिक लाभ—हानि की दृष्टि से विचार करने की प्रवृत्ति को दूर रखना पड़ेगा। भारत से भारतीय अलग होकर जी नहीं सकते। ऐसे सब प्रयोग पूर्ण असफल हुए हैं, यह दृश्य आंखों के सामने दिख रहा है। स्वयं के कल्याण की बुद्धि हमको एक भावना में मिल जाने का दिशानिर्देश दे रही है, यह ध्यान रखना होगा। ध्यान रखना होगा कि भारत की भावनात्मक एकता व भारत में सभी विविधताओं के स्वीकार व सम्मान की भावना के मूल में हिन्दू संस्कृति, हिन्दू परम्परा व हिन्दू समाज की स्वीकार प्रवृत्ति व सहिष्णुता है।