विस्तारवादी चीन के सामने दृढ़ता से खड़ा भारत, शासन—प्रशासन, सेना व जनता ने दिया वीरता का अनूठा परिचय

    दिनांक 25-अक्तूबर-2020
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कोरोना महामारी के संदर्भ में चीन की भूमिका संदिग्ध रही है। परंतु भारत की सीमाओं पर जिस प्रकार से चीन द्वारा अतिक्रमण का प्रयास अपने आर्थिक—सामरिक बल के उन्माद में उसने किया, वह तो सम्पूर्ण विश्व के सामने स्पष्ट है। भारत का शासन, प्रशासन, सेना तथा जनता, सभी ने इस आक्रमण के सामने दृढ़ता से खड़े होकर अपने स्वाभिमान, दृढ़ निश्चय व वीरता का अनूठा परिचय दिया। इससे चीन को अनपेक्षित आघात पहुंचा है
विजयादशमी उत्सव पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने चीन को आड़े हाथों लिया। कोराना को केंद्रित करते हुए उन्होंने कहा कि इस महामारी के संदर्भ में चीन की भूमिका संदिग्ध रही, ऐसा कहा जा सकता है। परंतु भारत की सीमाओं पर जिस प्रकार से अतिक्रमण का प्रयास अपने आर्थिक सामरिक बल के उन्माद में उसने किया, वह तो सम्पूर्ण विश्व के सामने स्पष्ट है। भारत का शासन, प्रशासन, सेना तथा जनता, सभी ने इस आक्रमण के सामने दृढ़ता से खड़े होकर अपने स्वाभिमान, दृढ़ निश्चय व वीरता का अनूठा परिचय दिया। इससे चीन को अनपेक्षित आघात पहुंचा है। इस परिस्थिति में हमें सजग होकर दृढ़ रहना पड़ेगा। चीन ने अपनी विस्तारवादी मनोवृत्ति का परिचय इसके पहले भी विश्व को समय-समय पर दिया है। आर्थिक, सामरिक, आंतरिक तथा सीमा सुरक्षा व्यवस्थाओं में पड़ोसी देशों के साथ तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों में चीन से भी बड़ा स्थान प्राप्त करना ही उसकी दानवी महत्वाकांक्षा के नियंत्रण का एकमात्र उपाय है। इस ओर हमारे शासकों की नीति कदम बढ़ा रही है, ऐसा दिखाई देता है। श्रीलंका, बांग्लादेश, ब्रह्मदेश, नेपाल जैसे हमारे पड़ोसी देश, जो हमारे मित्र भी हैं और बहुत मात्रा में समान प्रकृति के देश हैं, उनके साथ हमें अपने सम्बन्धों को अधिक मित्रतापूर्ण बनाने में तेजी लानी चाहिए। इस कार्य में बाधा उत्पन्न करने वाले मनमुटाव, मतान्तर, विवाद के मुद्दे आदि को शीघ्रतापूर्वक दूर करने का अधिक प्रयास करना पड़ेगा।
श्री भागवत ने कहा कि हम सभी से मित्रता चाहते हैं। यह हमारा स्वभाव है। परन्तु यह नहीं हो सकता कि हमारी सद्भावना को दुर्बलता मानकर अपने बल के प्रदर्शन से कोई भारत को चाहे जैसे नचा या झुका लेगा। ऐसा दुःसाहस करने वालों को अब यह समझ में आ जाना चाहिए। हमारी सेना की अटूट देशभक्ति व अदम्य वीरता, हमारे शासनकर्ताओं का स्वाभिमानी रवैया तथा हम सब भारत के लोगों के दुर्दम्य नीति-धैर्य का जो परिचय चीन को पहली बार मिला है, उससे उसके भी ध्यान में यह बात आनी चाहिए। उसके रवैये में सुधार होना चाहिए। परन्तु नहीं हुआ तो जो परिस्थिति आएगी उसमें हम लोगों की सजगता, तैयारी व दृढ़ता कम नहीं पड़ेगी, यह विश्वास आज राष्ट्र में सर्वत्र दिखता है।
भारतविरोधी ताकतों से सावधान
भारत विरोधी ताकतों से सवाधान करते हुए श्री भागवत ने कहा कि ऐसा नहीं है कि राष्ट्र की सुरक्षा व सार्वभौम सम्प्रभुता को मिलने वाली बाहरी चुनौतियां ही ऐसी सजगता तथा तैयारी की मांग कर रही हैं। देश में पिछले वर्ष कई बातें समानांतर चलती रहीं। उनके निहितार्थ को समझते हैं तो इस नाजुक परिस्थिति में समाज की सावधानी, समझदारी, समरसता व शासन-प्रशासन की तत्परता का महत्व सबके ध्यान में आता है। सत्ता से जो वंचित रहे हैं, ऐसे सत्ता लोभी राजनीतिक दलों के पुनः सत्ता प्राप्ति के प्रयास प्रजातंत्र में चलने वाली एक सामान्य बात है। लेकिन उस प्रक्रिया में भी एक विवेक का पालन अपेक्षित है। यह राजनीति में चलने वाली आपस की स्पर्धा है, शत्रुओं में चलने वाला युद्ध नहीं। स्पर्धा चले, स्वस्थ चले, परंतु उसके कारण समाज में कटुता, भेद, दूरियों का बढ़ना, आपस में शत्रुता खड़ी होना आदि नहीं होना चाहिए। ध्यान रहे, इस स्पर्धा का लाभ लेने वाली, भारत को दुर्बल या खण्डित देखने की इच्छा वाली, भारत का समाज सदा कलहग्रस्त रहे इसलिए उसकी विविधताओं को भेद बताकर, या पहले से चलती आई हुई दुर्भाग्यपूर्ण भेदों की स्थिति को और विकट व संघर्षयुक्त बनाते हुए, आपस में झगड़ा पैदा करने वाली ताकतें विश्व में हैं व उनके हस्तक भारत में भी हैं। उनको अवसर देने वाली कोई बात अपनी ओर से न हो, यह चिंता सभी को करनी पड़ेगी। समाज में किसी प्रकार से अपराध अथवा अत्याचार की कोई घटना हो ही नहीं, अत्याचारी व आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों पर पूर्ण नियंत्रण रहे, पर फिर भी ऐसी घटनाएं हों तो दोषी व्यक्ति तुरंत पकड़े जाएं और कड़ी से कड़ी सजा पाएं, यह शासन—प्रशासन को समाज का सहयोग लेते हुए सुनिश्चित करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि शासन-प्रशासन के किसी निर्णय पर या समाज में घटने वाली अच्छी—बुरी घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया अथवा विरोध हम लोगों की कृति, राष्ट्रीय एकात्मता का ध्यान व सम्मान रखकर, समाज में विद्यमान सभी पंथ—प्रांत—जाति—भाषा आदि विविधताओं का सम्मान रखते हुए व संविधान—कानून की मर्यादा के अंदर ही अभिव्यक्त हो, यह आवश्यक है। दुर्भाग्य से अपने देश में इन बातों पर प्रामाणिक निष्ठा न रखने वाले अथवा इन मूल्यों का विरोध करने वाले लोग भी अपने आप को प्रजातंत्र, संविधान, कानून, पंथनिरपेक्षता आदि मूल्यों के सबसे बड़े रखवाले बताकर, समाज को भ्रमित करने का कार्य करते रहे हैं। 25 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा में दिये अपने भाषण में श्रद्धेय डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने उनके ऐसे तरीकों को "अराजकता का व्याकरण" कहा था। ऐसे छद्मवेषी उपद्रवियों को पहचानना, उनके षड्यंत्रों को नाकाम करना तथा भ्रमवश उनका साथ देने से बचना समाज को सीखना पड़ेगा।