कोरानाकाल में उच्चतम कर्तव्यबोध के साथ कार्य करने वाले सभी सेवा परायण घटकों को है श्रद्धापूर्वक नमन

    दिनांक 25-अक्तूबर-2020
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संघ के स्वयंसेवक गत मार्च महीने से समाज सेवा में लगे हुए हैं। इसके अलावा प्रशासन के कर्मचारी, विभिन्न उपचार पद्धतियों के चिकित्सक तथा सुरक्षा और सफाई सहित सभी काम करने वाले कर्मचारी कोरोनाकाल में उच्चतम कर्तव्यबोध के साथ रुग्णों की सेवा में जुटे रहे। स्वयं के कोरोना वायरस से संक्रमित होने का जोखिम उठाते हुए उन्होंने दिन-रात अपने घर—परिवार से दूर रहकर युद्ध स्तर पर सेवा का काम किया। ऐसे सभी सेवा परायण घटकों को श्रद्धापूर्वक शत—शत नमन है। वे सभी धन्य हैं। विजयादशमी उत्सव के मौके पर नागपुर के डॉ. हेडगेवार स्मृति मंदिर परिसर में स्थित महर्षि व्यास सभागार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने शस्त्रपूजन कार्यक्रम को संबोधित किया। इस दौरान श्री भागवत ने कोरोनाकाल में भारत की स्थिति पर चर्चा करते हुए कहा कि विश्व के अन्य देशों की तुलना में हमारा भारत संकट की इस परिस्थिति में बेहतर तरीके से खड़ा हुआ है। भारत में इस महामारी के विनाश का प्रभाव बाकी देशों से कम दिखाई दे रहा है। इसके कुछ कारण हैं। शासन—प्रशासन ने तत्परतापूर्वक इस संकट से समस्त देशवासियों को सावधान किया, सावधानी के उपाय बताए और उपायों पर अमल भी पूरी तत्परता से हो, इसकी व्यवस्था की। संचार माध्यमों ने भी इस महामारी को अपने प्रसारण का लगभग एकमात्र विषय बना लिया। सामान्य जनता में यद्यपि उसके कारण अतिरिक्त भय का वातावरण बना, पर इससे यह लाभ भी हुआ कि समाज ने सावधानी बरतने में, नियम व्यवस्था का पालन करने में अतिरिक्त दक्षता दिखाई। प्रशासन के कर्मचारी, विभिन्न उपचार पद्धतियों के चिकित्सक तथा सुरक्षा और सफाई सहित सभी काम करने वाले कर्मचारी उच्चतम कर्तव्यबोध के साथ रुग्णों की सेवा में जुटे रहे। स्वयं के कोरोना वायरस से संक्रमित होने का जोखिम उठाते हुए उन्होंने दिन-रात अपने घर—परिवार से दूर रहकर युद्ध स्तर पर सेवा का काम किया। उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थिति में नागरिकों ने भी अपने समाज बंधुओं की सेवा के लिए स्वयंस्फूर्त तरीके से जो भी समय की आवश्यकता थी उसको पूरा करने में प्रयासों की कमी नहीं होने दी। समाज में कहीं-कहीं इन कठिन परिस्थितियों में भी अपने स्वार्थ साधने के लिए जनता की कठिनाइयों का लाभ लेने की प्रवृत्ति दिखी। परन्तु बड़ा चित्र तो शासन-प्रशासन व समाज के सहयोग, संवेदना व परस्पर विश्वास का ही रहा। समाज की मातृशक्ति भी स्वप्रेरणा से सक्रिय हुई। महामारी के कारण पीड़ित होकर जो लोग विस्थापित हो गए, जिनको घर में वेतन और रोजगार बंद होने से विपन्नता का और भूख का सामना करना पड़ा, उन्होंने भी प्रत्यक्ष उस संकट को झेलते हुए अपने धैर्य और सहनशीलता को बनाए रखा। अपनी पीड़ा व कठिनाई को किनारे रखते हुए दूसरों की सेवा में वे लग गए। ऐसे कई प्रसंग अनुभव में आये। विस्थापितों को घर पहुंचाने, यात्रा पथ पर उनके भोजन—विश्राम आदि की व्यवस्था करने, पीड़ित—विपन्न लोगों के घर पर भोजन सामग्री आदि पहुंचाने जैसे आवश्यक कार्यों में सम्पूर्ण समाज ने असाधारण प्रयास किए। एकजुटता व संवेदनशीलता का परिचय देते हुए जितना बड़ा संकट था, उससे अधिक बड़ा सहायता का उद्यम खड़ा किया। व्यक्ति के जीवन में स्वच्छता, स्वास्थ्य तथा रोगप्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने वाली अपनी कुछ परंपरागत आदतें व आयुर्वेद जैसे शास्त्र भी इस समय उपयुक्त सिद्ध हुए।

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उन्होंने कहा कि अपने समाज की समरसता का, सहज करुणा व शील प्रवृत्ति का, संकट में परस्पर सहयोग के संस्कार का यानी जिन्हें अंग्रेजी में 'सोशल कैपिटल' कहा जाता है, अपने उस सांस्कृतिक—संचित सत्व का सुखद परिचय इस संकट में हम सभी को मिला। स्वतंत्रता के बाद धैर्य, आत्मविश्वास व सामूहिकता की यह अनुभूति अनेक लोगों ने पहली बार देखी है। सेवा में लगे सभी आम व खास जन को, जीवित या बलिदान हो चुके बंधु—भगिनियों को, चिकित्सकों को, कर्मचारियों को, समाज के सभी वर्गों से आने वाले सेवा परायण घटकों को श्रद्धापूर्वक शत—शत नमन है। वे सभी धन्य हैं। सभी बलिदानियों की पवित्र स्मृति को हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि है।
 
श्री भागवत ने आगे कहा कि कोरोनाकाल में परिस्थिति से उबरने के लिए अब दूसरे प्रकार की सेवाओं की आवश्यकता है। शिक्षा संस्थान फिर से प्रारम्भ करना, शिक्षकों को वेतन देना, अपने बच्चों को विद्यालय-महाविद्यालयों का शुल्क देते हुए फिर से पढ़ाई के लिए भेजना आदि इस समय समस्या का रूप ले सकते हैं। कोरोना के कारण जिन विद्यालयों को शुल्क नहीं मिला, उन विद्यालयों के पास वेतन देने के लिए पैसा नहीं है। जिन अभिभावकों के काम बंद हो जाने के कारण बच्चों के विद्यालयों का शुल्क भरने के लिए धन नहीं है, वे लोग समस्या में पड़ गए हैं। इसलिए विद्यालयों का प्रारम्भ, शिक्षकों के वेतन तथा बच्चों की शिक्षा के लिए कुछ सेवा—सहायता करनी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि विस्थापन के कारण रोजगार चला गया, नए क्षेत्र में रोजगार पाना है तो उसका प्रशिक्षण चाहिए, यह समस्या विस्थापितों की है। वापस अपने गांव गए, सब विस्थापित रोजगार पा जाएंगे, ऐसा नहीं है। विस्थापित के नाते गए बन्धुओं की जगह पर उसी काम को करने वाले दूसरे बन्धु सब जगह नहीं मिले हैं। अतः रोजगार का प्रशिक्षण व रोजगार का सृजन का काम करना पड़ेगा। इस सारी परिस्थिति के चलते घरों व समाज में तनाव बढ़ने की परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में अपराध, अवसाद, आत्महत्या आदि कुप्रवृत्तियां ना बढ़ें, इसलिए उचित मार्गदर्शन की व्यापक आवश्यकता है।
भय नहीं, सजगता चाहिए
श्री भागवत ने कहा कि संघ के स्वयंसेवक तो गत मार्च महीने से ही इस संकट के संदर्भ में समाज में आवश्यक सब प्रकार की सेवा में जुटे हैं। सेवा के इस नए चरण में भी वे पूरी शक्ति के साथ सक्रिय रहेंगे। समाज के अन्य बन्धु-बांधव भी लम्बे समय सक्रिय रहने की आवश्यकता को समझते हुए अपने—अपने प्रयास जारी रखेंगे, यह विश्वास है। कोरोना वायरस के बारे में पर्याप्त जानकारी विश्व के पास नहीं है। यह रूप बदलने वाला विषाणु है। बहुत शीघ्र फैलता है। परन्तु हानि की तीव्रता में कमजोर है, इतना ही हम जानते हैं। इसलिए लम्बे समय तक इसके साथ रहकर, इससे बचना और इस बीमारी तथा उसके आर्थिक व सामाजिक परिणामों से अपने समाज—बन्धुओं को बचाने का काम करते रहना पड़ेगा। मन में भय रखने की आवश्यकता नहीं अपितु सजगतापूर्वक सक्रियता की आवश्यकता है।