दलितों के आरक्षण के मुद्दे पर एएमयू में नहीं दिख रहे 'मीम' और 'जय भीम' वाले

    दिनांक 27-अक्तूबर-2020   
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अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र ऐसी ही एक लड़ाई विश्वविद्यालय के अंदर लड़ रहे हैं, जहां अनुसूचित जाति से आने वाले छात्रों के साथ विश्वविद्यालय प्रशासन भेदभाव कर रहा है। विश्वविद्यालय में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग के छात्रों के अधिकारों के लिए जागरूक छात्रों का एक समूह उन्हें आरक्षण दिलवाने के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बचाओ मोर्चा के तत्वावधान में लड़ाई को आगे बढ़ा रहा है
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बाबा साहब भीमराव रामजी आम्बेडकर के हवाले से इस बात का उल्लेख कई जगह मिलता है कि डॉ आम्बेडकर चाहते थे कि हिंदू संत इस बात की घोषणा कर दें कि छुआछूत हिंदू समाज का हिस्सा नहीं है तो इससे समाज में छुआछूत की भावना मिट सकती है। बाबा साहब के कथन की प्रेरणा ही रही होगी जब विश्व हिंदू परिषद ने साल 1969 में उडुपी के सम्मेलन में समाज से ऊंच-नीच का भेदभाव मिटाने का प्रस्ताव पास किया था। 1969 के बाद छुआछूत के खिलाफ अपनी मुहिम को विश्व हिंदू परिषद ने लगातार जारी रखा है। विश्व हिन्दू परिषद के इस अभियान से देश भर के हर वर्ग के लोग जुड़ रहे हैं।

हिन्दू हो तो एक पहचान, जय श्रीराम, जय श्रीराम
जय वाल्मीकि-जय श्रीराम, जय वाल्मीकि-जय श्रीराम

विश्व हिन्दू परिषद का प्रयास सराहनीय है। बीते 23 अगस्त को हरियाणा के गोहाना में 100 से अधिक वाल्मिकी समाज से आने वाले युवकों ने विहिप का भगवा पट्टा बांधा। इससे पहले उनका उपयोग कुछ शरारती तत्वों द्वारा हिन्दू समाज को बांटने के लिए किया जा रहा था। उन्हें यह समझाने का प्रयास किया गया था कि जिस हिन्दू समाज को तुम्हारी चिन्ता नहीं है, उसकी चिन्ता तुम क्यों कर रहे हो ? विहिप के कार्यकर्ताओं के संपर्क में आकर उन्होंने जाना कि उन्हें किस तरह भटकाया जा रहा था और अपने ही भाइयों के खिलाफ खड़ा किया जा रहा था। देश भर में खड़ी हो रही इन स्थितियों को देखते हुए यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं माना जाना चाहिए कि  वाल्मिकी समाज के अधिकारों के लिए इस लड़ाई को कई स्तरों पर अपने ही देश में लड़ने की जरूरत है। 

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र ऐसी ही एक लड़ाई विश्वविद्यालय के अंदर लड़ रहे हैं, जहां अनुसूचित जाति से आने वाले छात्रों के साथ विश्वविद्यालय प्रशासन भेदभाव कर रहा है। विश्वविद्यालय में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग के छात्रों के अधिकारों के लिए जागरूक छात्रों का एक समूह उन्हें आरक्षण दिलवाने के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बचाओ मोर्चा के तत्वावधान में अपनी लड़ाई को लड़ रहा है।

यहां गौरतलब यह है कि इन छात्रों को कांग्रेस इको सिस्टम वाले उन कथित अम्बेडकरवादियों का समर्थन नहीं मिल रहा जो दलित और मुसलमान एकता का उत्तर प्रदेश में राजनीतिक समीकरण बनाने की कोशिश में लगे हैं। इसलिए वे उस हर एक मौके पर लापता हो जाते हैं या फिर अपने फंडिंग एजेन्सियों से सलाह लेने चले जाते हैं, जहां अपराधी मुसलमान होता है और पीड़ित अनुसूचित जाति का परिवार। फरवरी में दिल्ली दंगों में पीड़ित दलित परिवार इन कथित भीम—मीम मसीहाओं के इंतजार में अब तक बैठा है। ये नहीं आए। अब इन कांग्रेसी इको सिस्टम की फंडिंग पर जी रहे कथित दलित मसीहाओं का सच देश का अनुसूचित जाति और जनजाति समाज समझने लगा है।

एएमयू बचाओ मोर्चा के छात्र नेताओं ने घोषणा की है कि 23 जनवरी को वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के दिन हजारों छात्रों के साथ एएमयू में मार्च करेंगे और एएमयू के कुलपति को मांगों के संबंध में एक ज्ञापन सौंपेंगे। सौरभ चौधरी मोर्चा अध्यक्ष हैं और अमित गोस्वामी महासचिव। इस आंदोलन से जुड़े बिंदुओं पर हुई एक बैठक में मीडियाकर्मियों को बताया गया कि एएमयू में अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के छात्र 100 साल तक आरक्षण से वंचित हैं। अब समाज जागरूक हो रहा है। वंचितों को उनका अधिकार मिलना चाहिए।

कम से कम इस लड़ाई में उन मुसलमानों को जरूर साथ आकर खड़ा होना चाहिए जो हिन्दू समाज में दलितों के सवाल सोचते हैं। अखबारों में लिखते हैं, टेलीविजन चैनल पर बहस करते हैं या फिर जिनकी रुचि भीम—मीम के नाम पर समाज बांटने की राजनीति करने में है।