कोविड-19 :अवरोधों के बाद भी बढ़ रहा आयुर्वेद

    दिनांक 27-अक्तूबर-2020
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डॉ. नितिन अग्रवाल
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन को आपत्ति है कि भारत सरकार कोरोना मरीजों के इलाज में योग और आयुर्वेद को क्यों शामिल कर रही है। उसका यह रवैया ठीक नहीं है। आज पूरी दुनिया में योग और आयुर्वेद को लेकर एक अलग माहौल है। लोग इन दोनों को अपना रहे हैं, इसे समझने की जरूरत है
 
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गत दिनों भारत सरकार ने कोरोना पीड़ितों के इलाज के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सकों के संबंध में कुछ दिशा-निर्देश जारी किए। इसके साथ ही सरकार ने कोरोना मरीजों के इलाज में योग और कुछ आयुर्वेदिक दवाइयों को शामिल करने की अनुमति दे दी। सरकार ने यह अनुमति ऐसे ही नहीं दी है। बता दें कि इस महामारी में आयुर्वेदिक दवाइयों ने गजब का परिणाम दिया है। हजारों ऐसे कोरोना मरीज हैं, जो केवल और केवल आयुर्वेदिक दवा और योग के कारण ठीक हुए हैं।

उदाहरण के लिए आप नई दिल्ली के सरिता विहार स्थित अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान को ले सकते हैं। यहां पिछले कई महीने से कोरोना पीड़ित मरीजों का इलाज हो रहा है। संस्थान के डीन (पीएचडी) डॉ. महेश व्यास के अनुसार, ‘‘संस्थान के एक हिस्से में कोरोना हेल्थ सेंटर शुरू किया गया है। इसमें 45 शैया हैं। सभी भरी रहती हैं। अब तक यहां जो भी कोरोना पीड़ित आए हैं, वे सभी ठीक होकर घर लौटे हैं।

इनमें एक साल के बच्चे से लेकर 70 साल तक के मरीज थे। कुछ गर्भवती महिलाएं भी थीं। इन सभी को आयुर्वेदिक दवा दी गई।’’ उन्होंने यह भी बताया, ‘‘संस्थान में कोरोना जांच की सभी सुविधाएं हैं। आईसीयू भी है, लेकिन कभी किसी मरीज को आईसीयू में भर्ती करने की जरूरत नहीं पड़ी। हां, भर्ती होते समय जिन मरीजों को आॅक्सीजन की जरूरत थी, उन्हें कुछ दिनों तक आक्सीजन दी गई। साथ ही दवाइयां दी गर्इं। इन दवाइयों से जैसे ही मरीज की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ी, वह ठीक होता गया और सकुशल घर लौट गया।’’ 
देश में जितने भी आयुर्वेदिक संस्थान हैं, उन सभी का ऐसा ही अनुभव रहा है। इन परिणामों को देखते हुए ही भारत सरकार ने उपरोक्त दिशा-निर्देश दिए होंगे, लेकिन इनको लेकर एलोपैथिक चिकित्सकों में एक अजीब प्रतिक्रिया देखी गई। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन को एक पत्र लिखकर सरकार के इस कदम का विरोध किया है। आईएमए ने व्यंग्यात्मक लहजे में सरकार से पूछा, ‘‘आयुर्वेदिक दवाइयों से कोरोना मरीज ठीक हुए, इसके क्या प्रमाण हैं? कितने कोरोना पीड़ित मंत्रियों ने आयुर्वेदिक इलाज कराया?’’
सवाल उठता है कि जो आईएमए आयुर्वेदिक दवाइयों से ठीक होने वाले मरीजों के बारे में सुबूत मांग रहा है, वह अपने चिकित्सकों को अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान जैसे अस्पतालों में क्यों नहीं भेज रहा? 

आयुर्वेद विश्व की सबसे पुरानी चिकित्सा पद्धति है। यूरोप, रूस, अमेरिका में बहुत सारे एलोपैथिक चिकित्सक हैं, जो भारत आकर आयुर्वेद की जानकारी ले चुके हैं, आयुर्वेदिक दवाइयों को समझ चुके हैं। भारत आने वाले ऐसे चिकित्सकों की संख्या हर साल बढ़ रही है। ये चिकित्सक अपने देश लौटकर अपने मरीजों को अंग्रेजी दवाइयों के साथ-साथ आयुर्वेदिक दवाइयां भी दे रहे हैं। गठिया जैसी बीमारियों में तो कुछ चिकित्सक केवल आयुर्वेदिक दवा ही देते हैं। अमेरिका और रूस के अनेक एलोपैथिक चिकित्सक आयुर्वेद और जड़ी-बूटियों पर शोध कर रहे हैं। वे आयुर्वेद के चमत्कारिक परिणाम से बहुत प्रभावित हैं। इसलिए वहां के चिकित्सक अपनी सरकारों से आयुर्वेद को वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में अपनाने के लिए कह रहे हैं। मजेदार बात यह है कि नॉर्वे के ट्रोम्सो जैसे शहर, जहां गर्मियों में मध्यरात्रि में सूरज निकलता है और रूस के साइबेरिया जैसे बेहद ठंडे क्षेत्र में भी आयुर्वेद पहुंच गया है। स्वीडन, फिनलैंड जैसे देशों में भी आयुर्वेदिक दवाइयों की मांग बढ़ी है।

भारत में अनेक आयुर्वेदिक चिकित्सक हैं, जो क्रोएशिया, लातविया और लिथुआनिया जैसे देशों में जाकर आयुर्वेद पर गोष्ठी करते हैं। इस कोरोना काल में अनेक वैश्विक सेमिनार हुए हैं, जिनमें आयुर्वेद की जानकारी दी गई। यह भी बताया गया कि आयुर्वेद किस तरह कोरोना से लड़ने में कारगर है। गोष्ठियों में बड़ी संख्या में आम लोग और चिकित्सक भी शामिल हुए। भारत की अनेक कंपनियां इन देशों में आयुर्वेदिक दवाइयां भेज रही हैं। कोरोना काल में इन देशों में आयुर्वेदिक दवाइयों की मांग कई गुना बढ़ी है। वहीं दूसरी ओर भारत की स्थिति बिल्कुल उलट है। ऐसा लगता है कि भारत के एलोपैथिक चिकित्सक आयुर्वेद को हेय की दृष्टि से देखते हैं। यही कारण है कि जैसे ही सरकार ने आयुर्वेद के लिए दिशा-निर्देश जारी किए आईएमए उसके विरोध में आ गया।

आयुर्वेद विरोधी फेसबुक और ट्विटर
इन दिनों अनेक आयुर्वेद चिकित्सक और आयुर्वेद के प्रशंसक कोरोना काल में मरीजों की सेवा के दौरान आने वाले अपने अनुभवों को फेसबुक और ट्विटर पर डाल रहे हैं। देखा गया कि कई बार फेसबुक ने ऐसी ‘पोस्ट’ को हटा दिया। ग्रेटर नोएडा के अवधेश कुमार कर्ण के साथ ऐसा ही हुआ। उन्होंने 16 अगस्त को आयुर्वेद की प्रशंसा में फेसबुक पर एक ‘पोस्ट’ लिखी थी। इसके लिए उन्हें फेसबुक ने चेताया। इसके बावजूद उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा तो उनकी ‘पोस्ट’ को रोक दिया गया। फेसबुक का कहना था कि  ‘आयुर्वेद पर कोई शोध नहीं है, इसलिए ऐसी ‘पोस्ट’ न डालें’। ट्विटर ने भी कुछ ऐसा ही किया। इस सबसे यही निष्कर्ष निकलता है कि फेसबुक और ट्विटर भी आयुर्वेद विरोधियों के शिकंजे में हैं।  


रूस के नोवोसिबिर्स्क विश्वविद्यालय में डॉ. ओलेग सोरोकिन के नेतृत्व में कुछ चिकित्सकों ने नाड़ी परीक्षण के लिए एक उपकरण बनाया है, जो रोगों के प्रारंभिक निदान के लिए एक प्राचीन आयुर्वेद अभ्यास है। महर्षि महेश योगी ने जीवन-पर्यन्त विदेशों में आयुर्वेद का प्रचार-प्रसार किया। अभी भी डॉ. वसंत लाड, दीपक चोपड़ा जैसे अनेक आयुर्वेदिक चिकित्सक हैं, जो दुनियाभर में आयुर्वेद को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं। इराक जैसे देश में भी डॉ. ईसा सलोमी आयुर्वेद के माध्यम से मनोविकारों का सफलतापूर्वक इलाज कर रहे हैं।

आयुर्वेद वायरस जनित बीमारियों से लड़ने के लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता को ही नहीं बढ़ाता, बल्कि शरीर की कोशिकाओं को भी मजबूत करता है। जैसा कि हम जानते हैं कि कोरोना वायरस हमारी सिर्फ रोग प्रतिरोधक क्षमता पर ही हमला नहीं करता, बल्कि श्वसन प्रणाली पर भी हमला करता है। इससे हमारे शरीर की करोड़ों रोग प्रतिरोधक कोशिकाएं वायरस से लड़ती हैं। इसके परिणामस्वरूप हमारे फेफड़ों की स्वस्थ कोशिकाओं को भारी नुकसान पहुंचता है। इस वजह से सांस लेने में तकलीफ, सूखी खांसी और कभी-कभी हमारे फेफड़े तक भी नष्ट हो जाते हैं, जो  प्राणघातक भी हो सकता है। आयुर्वेदिक औषधियां ऐसी परिस्थिति में हमारे फेफड़ों की कोशिकाओं को मजबूती प्रदान करने की क्षमता रखती हैं तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूत करती हैं।

इन संगठनों की लगी है शक्ति
भारत सरकार ने आयुर्वेद के लिए जो दिशा-निर्देश जारी किए हैं, उसके पीछे अनेक संगठनों के अनुभव और अध्ययन हैं। ये संगठन हैं- अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (दिल्ली), आयुर्वेद संस्थान (जामनगर), राष्टÑीय आयुर्वेद संस्थान (जयपुर), सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेद (सीसीआरएएस), सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन योगा ऐंड नेचुरोपैथी (सीसीआरवाईएन)। ये सभी संगठन लगातार आयुर्वेद पर शोध कर रहे हैं और इसे जन सामान्य तक पहुंचाने में लगे हैं।

शोध पर आधारित दवाइयां
10 अक्तूबर, 2020 तक भारतीय नैदानिक परीक्षण (इंडियन क्लिनिकल ट्रायल) में पंजीकृत 67 विभिन्न पारंपरिक परीक्षणों में से 46 दवाइयां आयुष पर आधारित हैं। इससे साबित होता है कि ये दवाइयां शोध पर आधारित हैं। इसलिए आईएमए का यह कहना कि आयुर्वेद पर शोध नहीं होता, बिल्कुल गलत है।

सौतेला व्यवहार
वर्तमान केंद्र सरकार से पहले जितनी भी सरकारें थीं, सबने आयुर्वेद के साथ सौतेला व्यवहार किया है। इस समय अकेले दिल्ली के एम्स का सालाना बजट 3,000 करोड़ रु. है, वहीं पूरे भारत में आयुष के लिए केवल 2,100 करोड़ रु. का प्रावधान किया गया है। 2014 से पहले तो और भी बुरा हाल था। इसके बावजूद आयुर्वेद ने देश-विदेश तक अपनी पहचान बना ली है। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है।  


आयुर्वेद की कुछ औषधियां, जैसे- संशमनी वटी, दशमूल क्वाथ, त्रिकटु चूर्ण, शिरीषअमृतादी  क्वाथ, अश्वगंधा, हल्दी आदि कोरोना विषाणु को परास्त करने में सक्षम साबित हुई हैं। इन दिनों एक और अच्छी बात यह हुई है कि अमेरिका, जर्मनी, इटली, रूस आदि देशों में हल्दी, अश्वगंधा, आमला (आमलकी) ओजस पुष्टि, च्यवनप्राश जैसे योगों की मांग बहुत बढ़ गई है। ऐसा कोरोना के कारण हुआ है। इन देशों के लोगों को यह बात समझ में आ गई है कि आयुर्वेद किसी भी विषाणु को नष्ट करने में सक्षम है। उम्मीद है कि आने वाले समय में भारत के लोग भी इस बात को समझेंगे और आयुर्वेद की ओर लौटेंगे।
(लेखक विश्व आयुर्वेद परिषद के राष्ट्रीय सचिव हैं)