असम में मजहबी शिक्षा बंद

    दिनांक 27-अक्तूबर-2020
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पाञ्चजन्य ब्यूरो

सरकारी पैसे से मजहबी शिक्षा देने के विरुद्ध असम सरकार ने बिगुल बजा दिया है। उसका कहना है कि आम जनता के पैसे का इस्तेमाल किसी मजहब की शिक्षा देने में खर्च नहीं होना चाहिए।

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सरकारी पैसे से मजहबी शिक्षा देने के विरुद्ध असम सरकार ने बिगुल बजा दिया है। उसका कहना है कि आम जनता के पैसे का इस्तेमाल किसी मजहब की शिक्षा देने में खर्च नहीं होना चाहिए। इसलिए असम सरकार ने घोषणा की है कि अब असम में सरकारी मदरसों और संस्कृत विद्यालयों को सामान्य शिक्षण संस्थानों में बदल दिया जाएगा। यानी अब इन मदरसों में कुरान की शिक्षा नहीं दी जाएगी, बल्कि सभी विषयों को पढ़ाया जाएगा। असम के शिक्षा मंत्री हेमंत बिस्व सरमा ने कहा है कि इसकी अधिसूचना नवंबर में जारी कर दी जाएगी।

असम सरकार का तर्क है कि सरकारी पैसे से मजहबी शिक्षा देना किसी भी नजरिए से ठीक नहीं है। यदि ऐसा होता है तो विद्यालयों में गीता, बाइबिल आदि पांथिक ग्रंथों को भी पढ़ाया जाना चाहिए। सरमा ने कहा कि मदरसे देश की स्वतंत्रता से पूर्व खोले गए थे और ये ‘मुस्लिम लीग’ की धरोहर हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य मदरसा शिक्षा बोर्ड को भंग कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा, ‘‘अंतिम वर्ष के छात्रों को उत्तीर्ण होकर वहां से निकलने की अनुमति दी जाएगी, लेकिन इनमें अगले वर्ष जनवरी में प्रवेश लेने वाले सभी छात्रों को नियमित छात्रों की तरह पढ़ाई करनी होगी। साथ ही, संस्कृत विद्यालयों को कुमार भास्करवर्मा संस्कृत विश्वविद्यालय को देकर उन्हें शिक्षण तथा अध्ययन केंद्रों में बदल दिया जाएगा, जहां भारतीय संस्कृति का अध्ययन कराया जाएगा।’’

उल्लेखनीय है कि असम में दो तरह के मदरसे संचालित हो रहे हैं। पहला, ‘प्रोविंसलाइज्ड’ जो पूरी तरह सरकारी अनुदान से चलते हैं। इन्हें सरकार ने 1995 में ‘प्रोविंसलाइज्ड’ किया था। दूसरा है खेराजी जिसे निजी संगठन चलाते हैं। राज्य में लगभग 900 निजी और 610 सरकारी मदरसे हैं। सरकारी मदरसों को चलाने के लिए राज्य सरकार को वार्षिक 260 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। वहीं, राज्य में लगभग 100 सरकारी संस्कृत विद्यालय और 500 निजी केंद्र हैं। इन संस्कृत विद्यालयों पर सरकार हर वर्ष लगभग एक करोड़ रुपये खर्च करती है। असम सरकार ने साफ कर दिया है कि राज्य में किसी भी निजी मदरसे को नहीं छेड़ा जाएगा। जो लोग या संगठन अपने स्तर पर मदरसे चला रहे हैं, वे नि:संकोच चलाते रहें।

असम सरकार के इस निर्णय पर राजनीति शुरू हो गई है। असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने इस फैसले का विरोध करते हुए  कहा है, ‘‘सरकार को मदरसों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। मदरसों को किसी मजहब के साथ जोड़कर भी नहीं देखा जाना चाहिए। मदरसों को समाप्त करने के बजाय सरकार को उन्हें मजबूत और आधुनिक बनाना चाहिए था।’’

भारत में यह पहला अवसर है जब किसी राज्य सरकार ने मदरसों को लेकर ऐसा निर्णय लिया है। इससे पहले अनेक राज्य सरकारों ने संस्कृत विद्यालयों को लेकर तो कई तरह के निर्णय लिए थे। 90 के दशक में मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के समय बिहार सरकार ने संस्कृत विद्यालयों और महाविद्यालयों की आर्थिक मदद रोक दी थी।

वहीं, भाजपा की असम इकाई सरकार के इस फैसले के साथ खड़ी है। असम भाजपा के प्रवक्ता रूपम गोस्वामी कहते हैं, ‘‘राज्य सरकार ने सही फैसला लिया है। मजहबीशिक्षा को बढ़ावा देने के लिए धन मुहैया कराना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है।’’

असम सरकार के इस निर्णय का दूसरे राज्यों में भी असर दिखने लगा है। मध्य प्रदेश की वरिष्ठ मंत्री उषा ठाकुर ने अपनी राज्य सरकार से मांग की है कि मदरसों को दी जाने वाली मदद रोकी जाए। गत दिनों एक संवादादाता सम्मेलन में उषा ठाकुर ने कहा, ‘‘सभी आतंकवादी मदरसों से ही निकले हैं। इसलिए मदरसों को सरकार की तरफ से आर्थिक सहायता नहीं मिलनी चाहिए।’’

भारत में यह पहला अवसर है जब किसी राज्य सरकार ने मदरसों को लेकर ऐसा निर्णय लिया है। इससे पहले अनेक राज्य सरकारों ने संस्कृत विद्यालयों को लेकर तो कई तरह के निर्णय लिए थे। 90 के दशक में मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के समय बिहार सरकार ने संस्कृत विद्यालयों और महाविद्यालयों की आर्थिक मदद रोक दी थी। इस कारण उस समय पूरे राज्य में संस्कृत अध्यापक भूखे मरने को मजबूर हो गए थे। संस्कृत शिक्षण संस्थानों के भवन जर्जर स्थिति में पहुंच गए थे। ऐसे ही अनेक राज्य सरकारों ने संस्कृत को दबाकर उर्दू को आगे बढ़ाने का काम किया।

असम सरकार के इस निर्णय को नेता चाहे जिस रूप में देख रहे हों, पर आम लोग इस निर्णय को सही बता रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि किसी का भी तुष्टीकरण नहीं होना चाहिए। उम्मीद है कि अन्य राज्य सरकारें भी इस तरह का निर्णय लेंगी।