गोबर से बनी लकड़ी बनेगी अतिरिक्त कमाई का साधन

    दिनांक 27-अक्तूबर-2020
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उत्तर प्रदेश में गाय के गोबर से बनी लकड़ी लोगों की अतिरिक्त आय का साधन भी बन रही है। इस लकड़ी को गोकाष्ठ कहा जाता है। अंतिम संस्कार में इसका काफी प्रयोग किया जा रहा है

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गाय का गोबर अब उपले, खाद या बॉयोगैस बनाने के ही काम नहीं आता, बल्कि यह लोगों की आय का साधन भी बन रहा है. प्रदेश 11.84 लाख निराश्रित गोवंशों में से अब तक 5 लाख 21 हज़ार गोवंशों को संरक्षित किया गया है. सरकार द्वारा 4500 अस्थायी निराश्रित गोवंश आश्रय स्थल संचालित हैं. ग्रामीण इलाकों में 187 बृहद गौ-संरक्षण केंद्र बनाए गए हैं. शहरी इलाकों में कान्हा गोशाला तथा कान्हा उपवन के नाम से 400 गौ-संरक्षण केंद्र स्थापित किए गए हैं.
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जनपद में स्थित कौड़िहार ब्लॉक के श्रृंगवेरपुर में गोबर से बने उत्पादों को बनाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. उत्तर प्रदेश समेत अन्य प्रदेशों के लोग इसका प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं. संस्थान में गोबर की लकड़ी बनाई जाती है, जिसे गोकाष्ठ कहते हैं. जनपद आगरा की जिला जेल में बंद कैदी जेल के अंदर ही गाय के गोबर से गोकाष्ठ बना रहे हैं. इस गोकाष्ठ को दाह संस्कार में उपयोग किया जा रहा है. फ़िरोज़ाबाद के स्वर्ग आश्रम में भी इसी गोकाष्ठ का प्रयोग हो रहा है. गोकाष्ठ के इस्तेमाल से दाह संस्कार में खर्च कम होता है और पेड़ों को काटना भी नहीं पड़ता.
जनपद उन्नाव के कल्याणी मोहल्ला निवासी किसान व पर्यावरण प्रेमी रमाकांत दुबे ने 75 हजार लागत का एक प्लांट लगाया है. प्रतिदिन रोज दो क्विंटल गो-काष्ठ तैयार हो रहा है. राजस्थान यात्रा के दौरान रमाकांत ने गो-काष्ठ मशीन देखी और लोगों को गो-काष्ठ इस्तेमाल करते देखा, तब उन्हें अपने जनपद में इसकी मशीन लगाने की प्रेरणा मिली. चार मशीनें लगाने के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री रोजगार योजना के तहत आवेदन किया. उनके गोकाष्ठ की योजना को प्रशासन ने मंजूरी दे दी. जानकार बताते हैं कि लकड़ी में 15 फीसदी तक नमी होती है जबकि गो-काष्ठ में मात्र डेढ़ से दो फीसदी ही नमी रहती है. लकड़ी जलाने में 5 से 15 किलो घी का उपयोग होता है जबकि गो-काष्ठ जलाने में एक किलो घी पर्याप्त रहता है. लकड़ी के धुएं से कार्बन डाईआक्साइड गैस निकलती है जो पर्यावरण व इंसानों के लिए नुकसानदेह है जबकि गो-काष्ठ जलाने से 40 फीसदी आक्सीजन निकलती है जो पर्यावरण संरक्षण में मददगार होती है लकड़ी से पांच गुना कम खर्च आता है.