यहां ताकत बने तो आगे निकल जाएंगे हम

    दिनांक 28-अक्तूबर-2020
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बालेंदु शर्मा दाधीच
तकनीक की दुनिया में तीसरा बड़ा मौका आ रहा है भारत के पास। यह उतना ही बड़ा हो सकता है जितना कि कंप्यूटर और इंटरनेट का आगमन था। यह है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या कृत्रिम बुद्धिमत्ता का क्षेत्र, जहां भारत के लिए संभावनाएं उभर रही हैं। ऐसे में इसका पूरा फायदा उठाकर हम अपना कायापलट कर सकते हैं

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रेज़-2020 का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी। सम्मेलन में केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद सहित देश के शीर्ष उद्योगपति, नीति-निर्माता उपस्थित थे। 
दिल्ली में गत सप्ताह पांच से नौ अक्तूबर के बीच एक ऐसा वैश्विक सम्मेलन हुआ, जिसमें भारत की आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि और महत्वाकांक्षा की झलक दिखाई दी। सामाजिक सक्षमता के लिए उत्तरदायी कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी ‘रेजÞ’ (रेस्पॉन्सिबल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस फॉर सोशल एम्पावरमेंट) से जुड़े इस सम्मेलन ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बारे में वैश्विक विमर्श की बड़ी पहल की। दर्जनों सत्रों, चर्चाओं, व्याख्यानों और बहसों में विज्ञान और तकनीक की दुनिया में काल-विभाजक परिवर्तन लाने में सक्षम इस विषय पर अंतरराष्ट्रीय वैचारिक धारा को प्रभावित करने वाले ज्वलंत मुद्दे उठे। किंतु केंद्र में रहा भारत, उसकी क्षमताएं, नेतृत्वकारी स्थिति तथा महत्वाकांक्षाएं। विशेषकर यह प्रश्न कि क्या भारत दुनिया में पैदा हो रहे इस अद्भुत अवसर का लाभ उठाकर सामाजिक-आर्थिक तरक्की की नई ऊंचाई हासिल कर सकता है।
भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा नीति आयोग की ओर से आयोजित ‘रेजÞ’-2020 में सैकड़ों विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया और लगभग 50,000 लोगों ने प्रतिभागिता की। इससे इस सम्मेलन के महत्व और प्रभाव का अनुमान लगाया जाता है।
मुद्दा क्या है
पहले कंप्यूटर और फिर इंटरनेट का आगमन न सिर्फ सूचना प्रौद्योगिकी के जीवनकाल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटनाएं हैं बल्कि मानव विकास के संदर्भ में भी बहुत बड़ी घटनाएं हैं। अगर ये दोनों न होते तो आज की दुनिया कितनी अलग होती, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। जिन देशों ने इनमें बढ़त प्राप्त की वे आर्थिक समृद्धि के शीर्ष पर हैं। अमेरिका जहां कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और इंटरनेट अनुप्रयोगों के लिहाज से अग्रणी हैं, वहीं यूरोप के अनेक देश भी इन क्षेत्रों में काफी आगे बढ़ चुके हैं। इसी संदर्भ में चीन का भी नाम लिया जा सकता है, जो सॉफ़्टवेयर के क्षेत्र में तो वैश्विक बढ़त नहीं ले सका लेकिन हार्डवेयर के विनिर्माण में दुनिया की अग्रणी ताकत बन गया। उसके बाद उसने इंटरनेट अर्थव्यवस्था का भी भरपूर लाभ उठाया और आज दुनिया में सर्वाधिक सफल तथा मूल्यवान इंटरनेट कंपनियों में से कई कंपनियां चीन से आई हैं, जैसे अलीबाबा, टेन्सेन्ट, बाइदू, बाइट डांस आदि।
भारत इस वैश्विक क्रांति के कुछ अन्य पक्षों में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। हम आईटी सेवाओं के क्षेत्र में आगे हैं। हाल के वर्षों में हम संचार तथा डेटा कनेक्टिविटी में भी बड़ी उपलब्धियां अर्जित कर रहे हैं।
रिलायंस के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने हाल ही में कहा कि डेटा की खपत के मामले में हम दुनिया में 155वें स्थान से पहले स्थान पर आ गए हैं। एक अन्य महत्वपूर्ण बात जो अक्सर हमारी दृष्टि में नहीं आ पाती वह यह है कि अमेरिका तथा यूरोप की उपलब्धियों में भारतीय युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत के पास ऐसी प्रतिभाएं तथा संसाधन मौजूद हैं, जो उसे भी अमेरिका, यूरोप और चीन की तरह सूचना प्रौद्योगिकी के विविध पक्षों में अग्रणी शक्ति बना सकें। समस्या यह है कि हमने वह ढांचा तैयार नहीं किया जिसमें इन प्रतिभाओं तथा संसाधनों का उपयोग किया जा सके और अंतत: यह क्षेत्र अपनी संपूर्ण संभावनाओं के साथ आकार ले सके तथा देश की आर्थिक प्रगति में बड़ा योगदान दे सके।
अमेरिका तथा यूरोप की उपलब्धियों में भारतीय युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इससे यह तो स्पष्ट हो जाता है कि भारत के पास ऐसी प्रतिभाएं तथा संसाधन मौजूद हैं, जो उसे भी अमेरिका, यूरोप और चीन की तरह सूचना प्रौद्योगिकी के विविध पक्षों में अग्रणी शक्ति बना सके
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले एवं दूसरे कार्यकाल में इन तथ्यों पर सरकार की लगातार दृष्टि है। इस अवधि में ऐसी योजनाएं, कार्यक्रम और पहल हुई हैं, जिनकी महत्ता वैश्विक स्तर पर स्वीकार की गई है और जिन्होंने डिजिटल तथा आईटी नवाचार के क्षेत्र में भारत की क्षमताओं के प्रति विश्वास तथा सम्मान का भाव पैदा किया है। हम सरकारी सेवाओं तथा आम प्रयोक्ता से जुड़ी प्रक्रियाओं का व्यापक पैमाने पर डिजिटाइजेशन करने में सफल रहे हैं। एकीकृत भुगतान प्रणाली (यूपीआई) और आधार इसके दो उत्कृष्ट उदाहरण हैं। नेशनल आॅप्टिकल फाइबर नेटवर्क का व्यापक प्रभाव होने वाला है। डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया और इनोवेट इंडिया जैसे कार्यक्रम उस दूरदर्शिता के प्रतीक हैं, जिसकी आज के प्रतिद्वंद्विता भरे समय में भारत को आवश्यकता है। सरकार हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और इंटरनेट तीनों ही क्षेत्रों में गंभीरता से कोशिश कर रही है।
आ रहा है बड़ा अवसर
इस बीच, तकनीक की दुनिया में तीसरा बहुत बड़ा मौका आ रहा है। यह उतना ही बड़ा हो सकता है जितना कि कंप्यूटर और इंटरनेट के आगमन का मौका था। और यह है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या कृत्रिम बुद्धिमत्ता का क्षेत्र जहां भारत के लिए बड़ी संभावनाएं उभर रही हैं। हमारे सामने करीब-करीब उसी तरह का अवसर मौजूद है, जैसा कि आज के दो-तीन दशक पहले चीन के सामने मौजूद था और उसने उसका पूरा फायदा उठाकर अपना कायाकल्प कर लिया। चीन दुनिया का ‘मैन्युफैक्चरिंग हब’ बन गया और आज स्थितियां ऐसी हैं कि अगर हम जमकर जुट जाएं तो भारत 20-25 साल बाद दुनिया का ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ हब बन सकता है।
पूरी दुनिया इस अवसर का फायदा उठाने में लगी है। अमेरिका, चीन और यूरोप रात-दिन इस क्षेत्र में बढ़त बनाने में जुटे हुए हैं। वहां अनुसंधान और कौशल विकास पर बहुत बड़ी राशि खर्च की जा रही है। यहां चंद सवाल हम सबके मन में आते हैं। मसलन यह कि इन हालात में भी अगर हम कहते हैं कि भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में इन दिग्गजों से आगे निकल सकता है तो आखिर इसका क्या आधार है। दूसरा सवाल यह कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में आर्थिक तरक्की की इतनी संभावनाएं भला कैसे हैं। तीसरा यह कि दुनिया भर में लोग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के प्रति सतर्क और आशंकित दिखाई दे रहे हैं।
तो फिर हम इतने उतावले क्यों हैं?
कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर राष्ट्रीय रणनीति, जो नीति आयोग की पहल है, से इस उतावलेपन का कारण पता चलता है। इसमें अनुमान लगाया गया है कि यदि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भारत की अर्थव्यवस्था में सन् 2035 तक लगभग एक ट्रिलियन डॉलर (957 अरब डॉलर) का योगदान देने की क्षमता रखती है जो उस समय के सकल घरेलू उत्पाद का 1.3 प्रतिशत हो सकता है। यह एक बड़ा आंकड़ा है। आप कल्पना कर सकते हैं कि विगत कुछ वर्षों में हमारी जीडीपी 6 से 7 फीसदी के बीच रही है। अगर इसमें 1.3 प्रतिशत और जुड़ जाए तो वह चीन के श्रेष्ठ वर्षों की श्रेणी में आ सकती है।
 
इन परिस्थितियों में, यह मात्र संयोग नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रेज-2020 में अपने उद्घाटन भाषण में भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का ग्लोबल हब (अंतरराष्ट्रीय केंद्र) बनाने की आकांक्षा जाहिर की है। उन्होंने खास तौर पर कुछ क्षेत्रों का उल्लेख किया जैसे- सरकारी सेवाएं, कृषि और अगली पीढ़ी की शहरी आधारभूत संरचनाएं। भारत की आर्थिक प्रगति में इन सभी क्षेत्रों की बड़ी प्रतिभागिता रहने वाली है। स्वास्थ्य, परिवहन, शिक्षा, विनिर्माण, जन-सेवाएं आदि बहुत सारे क्षेत्र हैं जिनका कायाकल्प आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से होना अवश्यंभावी है। अमेरिका इस दौड़ में सबसे आगे है। चीन का भी नाम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के संभावित वैश्विक नेता के रूप में लिया जाने लगा है। सवाल उठता है कि क्या भारत आगे निकलकर सबको चकित कर सकता है?
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है क्या
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दरअसल मशीनों के भीतर इनसानों जैसी ही सीखने, विश्लेषण करने, सोचने, किसी बात को समझने, समस्याओं का समाधान करने, निर्णय लेने आदि की क्षमताएं पैदा हो जाने से संबंधित है। ये ऐसी क्षमताएं हैं, जो इनसान के पास तो हैं लेकिन दुनिया में किसी दूसरे प्राणी के पास नहीं हैं। अगर किसी प्राणी के पास इनमें से एकाध क्षमता है भी तो वह बेहद सूक्ष्म स्तर पर है। लेकिन अब प्रौद्योगिकी ने इतनी तरक्की कर ली है कि बेजान मशीनों के भीतर इनसे मिलती-जुलती क्षमताएं आ गई हैं। हमारी इंद्रियां जो काम करती हैं उनमें से कई काम अब मशीनें भी करने लगी हैं। वे देख सकती हैं, सुन सकती हैं, बोल सकती हैं, चल-फिर सकती हैं, यहां तक कि स्पर्श आदि को भी महसूस कर सकती हैं। उन्नत शोध और विकास के अलावा ऐसे कई कारण हैं जिनकी बदौलत यह क्षमता पैदा हो रही है। जैसे- बड़ी मात्रा में डेटा का उपलब्ध होना, उसका विश्लेषण करने की काबिलियत पैदा होना, कंप्यूटरों की क्षमता का बहुत अधिक बढ़ जाना, क्लाउड कंप्यूटिंग का विकास, इंटरनेट कनेक्टिविटी आदि।

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से होगा काम आसान 
 
जब मशीनें इनसान जैसी क्षमताएं पा जाएं तो खुशी भी होती है और डर भी लगता है। खुशी यह कि हमारे पास ऐसी मशीनें होंगी जो अनगिनत इनसानों के बराबर काम कर डालेंगी और वह भी बेहतर क्वालिटी के साथ। डर इस बात का, कि फिर इनसान का क्या होगा? वह क्या करेगा और खाएगा-कमाएगा कैसे? सबसे बड़ी बात यह कि सोचने-समझने में और अपना काम खुद करने में सक्षम मशीनें सदा-सदा तक इनसान के काबू में बनी रहेंगी, इस बात की क्या गारंटी है। उनमें से इक्का-दुक्का ने भी कोई बड़ा कारनामा कर दिखाया (जैसे कहीं बम गिरा देना, किसी प्रणाली को ध्वस्त कर देना आदि) तो हमारा और इस दुनिया का क्या होगा। इस पर कई डरावनी फिल्में भी बनी हैं और उपन्यास भी लिखे गए हैं। रेजÞ-2020 की बुनियादी थीम-उत्तरदायी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में इन तमाम आशंकाओं पर गौर किया गया है। स्वयं प्रधानमंत्री ने भी इस बात पर विशेष जोर दिया कि इसके इस्तेमाल के प्रति विश्वास या भरोसा पैदा करना हमारा समन्वित उत्तरदायित्व है। हमें इसका सुरक्षित इस्तेमाल सुनिश्चित करना है। अगर ऐसा हो गया तो इनसान और तकनीक का टीमवर्क धरती के लिए अद्भुत योगदान दे सकता है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की वजह से हम ऐसी मशीनें और प्रणालियां बना लेंगे जो इनसान का काम आसान कर देंगी, उसे तेज रफ़्तार के साथ तथा बेहतर ढंग से करेंगी। अगर व्यापक रूप से देखें तो यह संसाधनों पर होने वाले खर्च को बहुत कम कर देंगी, जबकि लाभप्रदता को बहुत बढ़ा देंगी। जैसे इनसानों द्वारा चलाई जाने वाली एक फैक्टरी में रोजाना एक हजार स्कूटर बनते हैं, लेकिन अगर वह फैक्टरी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा चलाई गई तो शायद वहां इससे दस गुने स्कूटर बनने लगें और कामगारों का खर्च घटकर दसवें हिस्से पर आ जाए। यानी 10 फीसदी खर्च पर 1000 फीसदी परिणाम। मैं जानता हूं कि आपके मन में क्या सवाल आएगा। वह यह कि हमारा देश तो कामगारों और किसानों का देश है। अगर इसी तरह कामगार बेरोजगार होते रहे तो फिर बेरोजगारों की इतनी बड़ी फौज खड़ी हो जाएगी कि देश की अर्थव्यवस्था वैसे ही डूब जाएगी।
डर के आगे जीत है
आपका डर अनुचित नहीं है, लेकिन हमें हमारे योजनाकारों के वास्तविक मंतव्य को समझने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि हम भारत को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का ग्लोबल हब बनाना चाहते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि हम सिर्फ अपने यहां पर ऐसी मशीनों, तकनीकों, सेवाओं और उत्पादों का ‘प्रयोग’ करने मात्र तक सीमित नहीं रहेंगे। हम उनका निर्माण और विकास पूरी दुनिया के लिए करेंगे। अपेक्षा यह है कि हम उपभोक्ता या प्रयोक्ता मात्र नहीं होंगे बल्कि प्रदाता होंगे। सिर्फ ग्राहक नहीं होंगे, विक्रेता होंगे। हम इनोवेटर (नवोन्मेषकर्ता) होंगे और अन्वेषक होंगे। तब दुनिया भर से कंपनियां और सरकारें भारत की ओर आएंगी। परिणामत: हमारी अर्थव्यवस्था लाभान्वित होगी। 
 ( लेखक सुप्रसिद्ध तकनीक विशेषज्ञ हैं )