मजहबी पट्टी पढ़ाने वालों पर मेहरबान राजस्थान

    दिनांक 28-अक्तूबर-2020
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पाञ्चजन्य ब्यूरो 
 
 
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राजस्थान में कांग्रेस की गहलोत सरकार मुस्लिम तुष्टीकरण में पूरी तरह जुटी हुई है। सरकार न केवल मदरसा बोर्ड को कानूनी मान्यता दे चुकी है, बल्कि अब उनके विकास के लिए खजाने का मुंह भी खोल दिया है। साथ ही, मदरसा शिक्षाकर्मियों के मानदेय में बढ़ोत्तरी की है और वहां पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं का समूह बीमा भी करा रही है। लेकिन वैदिक शिक्षा बोर्ड की घोषणा करने के बाद इस पर कभी विचार ही नहीं किया
 राजस्थान में अशोक गहलोत की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार पूरी तरह से मुसलमानों के तुष्टीकरण में जुटी हुई है। एक तरफ सरकार जनता का पैसा मदरसों के विकास पर खर्च कर रही है, दूसरी तरफ गोशालाओं को दिए जाने वाले अनुदान को कम करने के लिए उसने कई कदम उठाए हैं। यह स्थिति तब है, जब कांग्रेस के ही एक नेता उदित राज उत्तर प्रदेश सरकार को नसीहत दे रहे हैं कि ‘राज्य को धार्मिक शिक्षा और पारंपरिक आयोजनों पर धन नहीं खर्च करना चाहिए। राज्य सरकार द्वारा इलाहाबाद में कुंभ मेले के आयोजन पर 4200 करोड़ रुपये खर्च करना गलत है।’ अगर राज्य का कोई धर्म-मजहब नहीं होता तो राजस्थान में गहलोत सरकार क्यों मदरसों पर आम जनता के कर का पैसा फूंक रही है? यही नहीं, मदरसों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का समूह बीमा भी करा रही है। इससे पहले प्रदेश सरकार मदरसा बोर्ड को कानूनी दर्जा भी प्रदान कर चुकी है।
नए फैसले के अनुसार, गहलोत सरकार राज्य में मदरसों के विकास के लिए 25 लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता मुहैया कराएगी। इस बाबत राजस्थान सरकार के अल्पसंख्यक मामलात विभाग में शामिल किए गए मदरसा बोर्ड के सचिव ने एक अधिसूचना जारी की है। मुख्यमंत्री मदरसा आधुनिकीकरण योजना के तहत मदरसों से 14 अक्तूबर से आवेदन मांगे गए हैं, जिसकी अंतिम तिथि 29 अक्तूबर, 2020 है। योजना में प्राथमिक स्तर के मदरसों को अधिकतम 15 लाख तथा उच्च प्राथमिक स्तर के मदरसों को अधिकतम 25 लाख रुपये मुहैया कराए जाएंगे। कुल स्वीकृत राशि का 90 प्रतिशत राज्य सरकार तथा 10 प्रतिशत मदरसा प्रबंधन समिति देगी। गहलोत सरकार ने बजट-2019 में ‘मुख्यमंत्री मदरसा उन्नयन योजना’ का उल्लेख करते हुए इसके लिए लगभग 7 करोड़ रु. आवंटित किए थे।
इससे पहले इसी महीने राज्य सरकार ने पंजीकृत मदरसों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का दुर्घटना बीमा कराने की घोषणा की थी। राज्य के अल्पसंख्यक मामलात एवं वक्फ मंत्री सालेह मोहम्मद के अनुसार, इस फैसले से सूबे में पंजीकृत 3248 मदरसों में पढ़ने वाले 1.90 लाख विद्यार्थियों का समूह बीमा कराया जा सकेगा। इस पर राज्य मदरसा बोर्ड 19.21 लाख रुपये खर्च करेगा। वित्त विभाग ने इस पर अपनी मंजूरी भी दे दी है। मदरसा विद्यार्थियों का समूह बीमा इसी सत्र से कराया जाएगा। इसी साल जून में सरकार ने राज्य के करीब 6,000 मदरसा पैरा टीचर का मानदेय 15 प्रतिशत बढ़ाने का आदेश जारी किया था। इस आदेश के मुताबिक, पहले चरण में उनके मानदेय में 1,400 रुपये तथा छठे चरण में 1,100 रुपये की वृद्धि की गई है। यह वृद्धि अप्रैल से लागू हो चुकी है।
मदरसा बोर्ड को संवैधानिक दर्जा
बीते साल गहलोत सरकार ने मुसलमानों को खुश करने के लिए मदरसा बोर्ड को संवैधानिक दर्जा देने का निर्देश दिया था। इसके बाद मदरसा अधिनियम में संशोधन किया गया। इसी साल 24 अगस्त को विधानसभा के एक विशेष सत्र में इस बाबत एक विधेयक पारित किया गया। इसके उद्देश्य और कारणों में यह लिखा गया है कि गरीब मुस्लिम परिवारों के बच्चों को अरबी, इस्लामी, आधुनिक और वैज्ञानिक अध्ययनों के साथ मजहबी शिक्षा देने के लिए राज्य में बड़ी संख्या में मदरसे चलाए जा रहे हैं। ऐसे में इनकी स्वायत्तता के लिए स्वतंत्र बोर्ड की आवश्यकता प्रतीत होती है। इसी के साथ सरकार ने मदरसा बोर्ड को कई अधिकार दिए हैं। राज्य सरकार के मंत्री सालेह मोहम्मद कहते हैं, ‘‘इससे पहले हर कोई अपना अध्यादेश थोप देता था, जिसके कारण मदरसा बोर्ड के कर्मचारियों को परेशानी होती थी। अब नए मदरसों के पंजीकरण के साथ उन्हें सरकार की ओर से सरकारी सुविधाएं मिलेंगी, जिसमें मध्याह्न भोजन, विभाग से पाठ्यपुस्तक, फर्नीचर, कम्प्यूटर और पैराटीचर शामिल हैं।’’
हालांकि मदरसा बोर्ड के गठन का विरोध करते हुए भाजपा के पूर्व विधायक ज्ञानदेव आहूजा ने कहा था, ‘‘दो माह पहले हमने राज्य सरकार से मांग की थी कि तब्लीगी जमात और मदरसों पर प्रतिबंध लगाया जाए। इनकी शिक्षा और पाठ्यक्रम की पद्धति देश के खिलाफ है, लेकिन इसके विपरीत सरकार ने मदरसों को स्वायत्तशासी बना दिया। मदरसों को वे अधिकार दे दिए गए जो शिक्षा विभाग के विद्यालयों के पास हैं। मदरसा बोर्ड को संपूर्ण स्वायत्तशासी बना देना यानी कक्षा का वर्गीकरण, पाठ्यक्रम और शिक्षक आदि मदरसा बोर्ड खुद तय करेगा, इससे बड़ा दुर्भाग्य और कुछ नहीं हो सकता।’’
 
 
सवालों के घेरे में मदरसे
2020 छत्तीसगढ़ में रायपुर के खिर्वा स्थित मदरसे में दीनी तालीम हासिल करने आए किशोर ने मदरसा संचालक पर उत्पीड़न का आरोप लगाया था। उसका कहना था कि लॉकडाउन में सभी बच्चे घर चले गए, लेकिन उसे रोक कर घर के काम कराए गए। गलती होने पर यातनाएं दी गईं।
2019 भोपाल के अशोका गार्डन इलाके में एक निजी मदरसे में एक नाबालिग को जंजीर से बांधकर रखने का मामला सामने आया था। मदरसा प्रबंधक का कहना था कि बच्चे के माता-पिता की अनुमति से बच्चे को बेंच से जंजीर में बांधकर रखा जाता था, क्योंकि वह प्राय: मदरसे से भाग जाता था।
2019 उत्तर प्रदेश के बिजनौर के शेरकोट स्थित ‘मदरसा दारूल कुरआन हमीदया’ से अवैध हथियारों का जखीरा बरामद किया गया था। पुलिस ने मदरसे से 6 आरोपियों को गिरफ्तार भी किया था।
2018 महाराष्ट्र के पुणे में एक मदरसे में बच्चों से यौन उत्पीड़न के आरोप में एक मौलवी को गिरफ्तार कर 36 छात्रों को वहां से निकाला गया। इस मदरसे में पढ़ने वाले बच्चे 5 से 14 साल के थे।
2018 हैदराबाद पुलिस ने एक मौलवी को मदरसे में 6 से 8 साल तक के 6 बच्चों के शारीरिक शोषण के आरोप में गिरफ्तार किया था।
2017 लखनऊ के सआदतगंज इलाके के खदीजतुल कुबरा लिलबनात मदरसे पर छापा मारकर 51 छात्राओं को छुड़ाया गया। पीड़ित छात्राओं ने मदरसा संचालक-प्रबंधक पर यौन शोषण और जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाया था।
2015 केरल के विख्यात फिल्मकार और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता अली अकबर ने खुलासा किया था किया था कि जब वह आठ साल के थे, तब मदरसे में मौलाना ने उनका यौन उत्पीड़न किया था।
2015 पत्रकार रजीना ने भी मदरसों में यौन उत्पीड़न की घटनाओं को लेकर फेसबुक पर लिखा था। लेकिन इसके बाद उन्हें अपने समुदाय का कोपभाजन बनना पड़ा था। 
 
 
गहलोत सरकार यह सब उस समय कर रही है, जब केंद्र सरकार नई शिक्षा नीति के जरिए शैक्षिक सुधार की ओर कदम बढ़ा रही है। इसी गहलोत सरकार ने कुछ समय पहले ‘वैदिक शिक्षा बोर्ड’ का गठन करने की घोषणा की थी। वैदिक शिक्षा बोर्ड का गठन तो नहीं हुआ, लेकिन मदरसा बोर्ड को कानूनी मान्यता जरूर दे दी गई। कहीं ऐसा तो नहीं कि राज्य सरकार मदरसों में नई शिक्षा नीति लागू ही नहीं करना चाहती? अगर ऐसा नहीं है तो मदरसा बोर्ड को मान्यता देने का क्या मतलब है? जाहिर है, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत केवल मुसलमानों को खुश करने के लिए ही तमाम फैसले ले रहे हैं ताकि उनका वोटबैंक बरकरार रहे।
मुख्यमंत्री ने पिछले साल गोशालाओं को दिए जाने वाले अनुदान की राशि बढ़ाने की घोषणा की थी। साथ ही, कहा था कि सूबे में चारागाह और गोचर जमीन के आवंटन में गोशालाओं को प्राथमिकता देने के लिए नई नीति लाई जाएगी। लेकिन सूबे की पंजीकृत गोशालाओं को 180 दिन का ही अनुदान मिला। कुल पंजीकृत 1980 गोशालाओं में से 1520 गोशालाओं को इस सहायता से वंचित रखा गया। इसी साल पूर्व की भाजपा सरकार द्वारा पारित सरकार गोसंरक्षण एवं संवर्धन अधिनियम-2016 तथा राजस्थान स्टांप अधिनियम 1988 (1999 का अधिनियम सं. 14) की धारा 3-ख को संशोधित कर स्टांप ड्यूटी से वसूली जाने वाली राशि का उपयोग आपदा निधि में करने का प्रावधान कर दिया गया है। इससे राज्य की गोशालाओं को मिलने वाला अनुदान कम होगा तथा इसके संचालन में मुश्किलें आएंगी।
कंगाली में आटा गीला
दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार तो तुष्टीकरण में और चार कदम आगे है। यहां मस्जिदों के इमामों को सरकार बाकायदा वेतन देती है। केजरीवाल सरकार दिल्ली वक्फ बोर्ड के तहत आने वाली 185 मस्जिदों के इमामों को फरवरी 2019 से बढ़ा हुआ वेतन दे रही है। पहले इनका वेतन 10,000 रुपये था, जिसे बढ़ा कर 18,000 कर दिया गया। इसी तरह, मुअज्जिन के वेतन को 9,000 रुपये से बढ़ाकर 16,000 रुपये प्रतिमाह कर दिया गया। यही नहीं, दिल्ली सरकार वक्फ बोर्ड के अंतर्गत जो मस्जिदें नहीं आती हैं उनके इमामों और मुअज्जिनों को भी क्रमश: 14,000 और 12 रुपये प्रतिमाह वेतन दिए जा रहे हैं। इस तरह, दिल्ली में वक्फ बोर्ड की तरफ से लगभग 300 मस्जिदों के इमामों को वेतन दिया जाता है।
उधर, महाराष्ट्र में कांग्रेस समर्थित महाविकास अगाड़ी सरकार ने भी 121 मदरसों में मौलवियों को 1.80 करोड़ रुपये वेतन देने की घोषणा की है।
यह राशि डॉ. जाकिर हुसैन मदरसा आधुनिकीरण योजना के तहत जारी की जाएगी। महत्वपूर्ण बात यह है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार और महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार का कहना है कि उनके पास सरकारी कर्मचारियों को देने के लिए पैसे नहीं हैं। *