निकिता तोमर की हत्या पर क्यों चुप हैं सेकुलर मीडिया और बुद्धिजीवी

    दिनांक 28-अक्तूबर-2020
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 डॉ. अंशु जोशी
निकिता को तौसीफ ने मार डाला। तौसीफ राजनीतिक रसूख वाले परिवार है। निकिता के परिजनों ने स्पष्ट कहा है कि वह उस पर कन्वर्जन कर निकाह का दबाव बना रहा था। उसने मना किया तो सरेराह उसे गोली मार दी

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पिछले कई दिनों से मैं छद्म धर्मनिरपेक्षता की बांसुरी बजाते कई लोगों को देख रही थी। तनिष्क ने एकत्वम के नाम पर खूब प्रेम से एक तरफा धर्मनिरपेक्षता का गाना गाया। मन में सवाल भी उठा कि हमेशा हिंदू लड़कियां मुस्लिम लड़कों से शादी करती क्यों दिखाई जाती हैं? कभी मुस्लिम लड़कियों को हिंदू परिवारों का हिस्सा बनते क्यों नहीं दिखाया जाता? चाहे फिल्में हो या विज्ञापन या मीडिया का अन्य कोई माध्यम, कई सालों से भारतीयों को सेकुलरिज्म के नाम पर उल्लू बनाने का खेल जारी है। सेकुलरिज्म के इस खेल में हमेशा हिंदू लड़कियां मुस्लिम परिवारों का हिस्सा बन कर एक खुशहाल ज़िंदगी बिताती दिखाई जाती हैं। उसपर तमाम वामी-फेमिनिस्ट बाग़—बाग़ हो जाते हैं। लेकिन अगर असल ज़िंदगी में इसका उल्ट हो तो नतीजे अंकित शर्मा या राहुल हत्याकांड के रूप में सामने आते हैं। हम माने या न माने लव जिहाद का मकड़ जाल है और जो लड़की इसमें फंसने से इंकार कर देती है उसका हाल निकिता की तरह होता है।
कल दिल दहल उठा जब हरियाणा की एक मेधावी छात्र निकिता को तौफीक से सरेबाज़ार गोली खा अपनी जान हारते देखा। उससे भी ज़्यादा आक्रोश तब मन में उठा जब देखा कि न सिर्फ तमाम सेकुलरों और फेमिनिस्टों को सांप सूंघ गया है, मीडिया इसे बड़ी चालाकी से लड़के के नाम को छिपा कर प्रस्तुत कर रही है। अभी अगर उल्टा होता,यानी किसी मुस्लिम लड़की के पीछे कोई हिंदू लड़का पड़ा होता तो तमाम अखबार और अन्य मीडिया बढ़-चढ़ाकर पूरे मामले को धर्म के चश्मे से देखना शुरू कर देते। निकिता का गुनाह सिर्फ इतना था कि उसने तौफीक के जाल में फंसने से इंकार कर दिया था। वह एक अत्यंत मेधावी छात्रा थी और अपने सुनहरे भविष्य के लिए मेहनत कर रही थी। कोई माने या न माने, ये सब लव जिहाद से जुड़ा है। कभी आपने सोच कर देखा कि अगर कोई मुस्लिम लड़की किसी गैर मुस्लिम लड़के से प्रेम करने लगती है तो अंजाम क्या होता है? वही होता है जो अंकित सक्सेना का हुआ था,और जो हाल ही में राहुल का हुआ था।
19 साल का राहुल दिल्ली के आदर्श नगर में रहता था। वह दिल्ली विश्वविद्यालय में ग्रेजुएशन कर रहा था। पिता ड्राइवर और वह स्वयं ट्यूशन पढाता था। उसकी एक मुस्लिम लड़की से दोस्ती थी। दोस्ती आगे बढ़ती इससे पहले ही राहुल को बेदर्दी से हत्या कर दी गई। लड़की के भाई अफरोज ने अपने अन्य चार दोस्तों के साथ मिलकर राहुल की नृशंस हत्या कर दी। इस घटना का मोटिव एकदम स्पष्ट था, मुस्लिम लड़की किसी गैर मुस्लिम से शादी नहीं कर सकती। वहां सेकुलरिज्म के नियम लागू नहीं होते।
किसी गैर मुस्लिम लड़की को निकाह के पहले मुस्लिम बनाने वाले मौलवी आखिर क्यों अपनी लड़कियों को भी उतनी आजादी नहीं देते कि वो भी जहां चाहें जैसे चाहें जाएं और शादी कर लें? क्या यह एक तरफा ही रहेगा? क्या सेकुलरिज्म एक तरफा ही रहेगी? या इसे दो तरफा होना चाहिए? अगर अपने समुदाय की लड़कियों के गैर धर्म में प्यार पर मुस्लिमों की सोच हत्यारी है तो उन्हें क्या हक है कि वो किसी गैर मुस्लिम लड़की से निकाह करें? और अगर करें तो भी समाज उसको क्यों कर स्वीकार करे?
लव जिहाद के कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। 2015—2016 में हैदराबाद में एक प्रतिष्ठित बहु-राष्ट्रीय कंपनी के साथ काम करने वाली एक युवा हिंदू लड़की का अपहरण उसके मुस्लिम मित्र ने कर लिया था जिसने उसे भयंकर शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी कि वो कन्वर्जन कर उससे शादी कर ले। लड़की ने किसी तरह एक दिन सोशल नेटवर्किंग साइट के माध्यम से अपने अन्य मित्रों को संपर्क किया और पुलिस द्वारा बचाई गई। एक अन्य घटना में एक हिंदू शिक्षिका को उसके घर से उठा कर कर मुसलमान बनाया गया और कई दिनों तक उत्तर प्रदेश के हापुड़ में एक मदरसे में उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। वह किसी तरह भागने में सफल रही और मामले की सूचना पुलिस को दी। ऐसे ही कई मामले देश के अन्य हिस्सों से समय समय पर आते रहे हैं।
लव—जिहाद का दरअसल प्रेम से कुछ लेना-देना नहीं है, इसे ‘ कन्वर्जन जिहाद’ कहा जाना चाहिए क्योंकि प्रेम के नाम पर महिलाओं का कन्वर्जन कराना इसका असल उद्देश्य मालूम होता है। विभिन्न समाचार रिपोर्टों और लेखों के अनुसार, केरल के मुख्यमंत्री ने 25 जून, 2012 को केरल विधानसभा में कहा था कि, “2006-2012 के दौरान हिंदू धर्म में 2803 कन्वर्जन और कुल 7713 व्यक्तियों का इस्लाम में कन्वर्जन किया गया था। 2009-12 के दौरान कन्वर्जन करने वालों में 2667 युवतियां थीं जिनमें 2195 हिंदू और 492 ईसाई थीं। दूसरी ओर, 2009-12 के दौरान ईसाई और हिंदू धर्म में कन्वर्जन करने वाली युवा महिलाएं क्रमशः 79 और दो थीं। ” इसका क्या मतलब है? क्या इसका मतलब यह है कि यह केवल हिंदू महिलाएं हैं जो प्यार में पड़ जाती हैं और खुद को बदल लेती हैं? या कि वे अपने धर्म से इतने तंग आ चुकी होती हैं कि वे बिना किसी व्यक्तिगत, भावनात्मक या सामाजिक दबाव के कन्वर्जन कर लेती हैं?
यह किस प्रकार का प्रेम है, जो एक लड़की को कन्वर्जन के लिए मजबूर करता है? इस्लाम के अनुसार, निकाह को तब 'हलाल' (वैध) माना जाता है, जब दूल्हा और दुल्हन दोनों इस्लाम का पालन करते हैं। इसलिए लड़कियों को व्यक्तिगत और सामाजिक रूप से कन्वर्जन के लिए मजबूर किया जाता है। अब सवाल उठता है कि दूल्हा दुल्हन की व्यक्तिगत पसंद, परिवार, समाज और संस्कृति के बारे में एक बार भी क्यों नहीं सोचता है? और, अगर उसका तथाकथित प्रेम शुद्ध और सच्चा है, तो वह कोर्ट मैरिज का विकल्प क्यों नहीं चुनता? या, वह खुद अपना धर्म क्यों नहीं बदलता? कारण स्पष्ट है। उद्देश्य प्रेम नहीं बल्कि कन्वर्जन है। जब तक हम लव जिहाद के इस घिनौने खेल को बंद नहीं करेंगे, सैकड़ों नीकिताएं इसी प्रकार खोखली धर्मनिरपेक्षता की शिकार होती रहेंगी।
 
(लेखिका जेएनयू में सहायक प्राध्यापक हैं )