पूर्व सीबीआई चीफ राघवन का खुलासा, कांग्रेस ने गुजरात दंगों में मोदी को क्लीन चिट देने पर उन्हें प्रताड़ित किया था

    दिनांक 29-अक्तूबर-2020   
Total Views |
सीबीआई के प्रमुख रहे आर.के. राघवन ने अपनी एक किताब 'ए रोड वेल ट्रेवल्ड' में खुलासा किया है कि मोदी को क्लीन चिट देने के बाद उन्हें कांग्रेस ने बहुत प्रताड़ित किया था। कांग्रेस ने उन पर दबाव बनाया था कि उन्हें झूठा फंसाया जाए

raghawan _1  H
कांग्रेस के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) कैसे राजनीतिक बिसात का मोहरा रही है ये बात एक बार फिर साबित हो गई है. सीबीआई के प्रमुख रहे आर.के. राघवन ने अपनी एक किताब में कई सनसनीखेज खुलासे किए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगों में फंसाने की तमाम साजिशों के बीच सीबीआई ने जब 2012 में उन्हें क्लीन चिट दी थी, तो राघवन ही सीबीआई के प्रमुख थे. राघवन जानते थे कि जांच का नतीजा कोई भी हो, निशाना उन्हें बनाया जाएगा. इसलिए उन्होंने नरेंद्र मोदी से होने वाली पूछताछ से खुद को अलग रखा. याद रखिए मोदी को इस क्लीन चिट पर सुप्रीम कोर्ट की भी मुहर लग चुकी है. लेकिन राघवन की किताब ने एक बार फिर कांग्रेस को कटघरे में ला खड़ा किया है. उन्होंने आपबीती में लिखा है कि मोदी को क्लीन चिट देने के कारण उन्हें कैसे परेशान किया. इस बात का भी विस्तार से खुलासा किया है कि बोफोर्स मामले की जांच को कांग्रेस ने कैसे पलीता लगाया.
राघवन की किताब 'ए रोड वेल ट्रेवल्ड' हाल ही में प्रकाशित हुई है. इसमें उन्होंने विस्तार से लिखा है कि मोदी को क्लीन चिट देने के कारण उन्हें कैसे प्रताड़ित किया गया. बकौल राघवन मेरे खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक में याचिका दायर हुई. आरोप लगाया गया कि उन्होंने मोदी के लिए जांच में पक्षपात किया है. लेकिन जांच बहुत पेशेवर तरीके से की गई थी. इसलिए जांच पर सुप्रीम कोर्ट ने भी मोहर लगाई. उन्होंने एक और सनसनीखेज खुलासा किया है. सीबीआई चीफ रहते हुए केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग करके उनके फोन टैप किए गए. हालांकि पूरी कांग्रेस सरकार की मशीनरी मिलकर राघवन के खिलाफ कुछ भी हासिल न कर सकी.
दरअसल सीबीआई के पास इस बात की जांच थी कि 2002 के गुजरात दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका थी. इन आरोपों की जांच के लिए गठित एसआईटी की अगुआई राघवन ही कर रहे थे. उन्होंने लिखा है कि दंगे में मोदी की भूमिका की जांच को लेकर मोदी के विरोधियों की रुचि कुछ और ही थी. मायने ये कि वे ऐसे नतीजे चाहते थे, जो उनके अनुकूल हों. लेकिन जांच में कुछ और ही निकल कर आया. मसलन उन्होंने पूर्व आईपीएस अफसर संजीव भट्ट का उदाहरण दिया है. संजीव भट्ट मोदी के प्रखर विरोधी मंडली का मुख्य चेहरा रहे. जो आरोपों का जाल मोदी के खिलाफ बुना गया गया, उसमें संजीव भट की गवाही की अहम भूमिका थी. असल में संजीव भट ने आरोप लगाया था कि 28 फरवरी 2002 को मुख्यमंत्री ने एक बैठक के दौरान कहा था कि हिंदुओं में जो गुस्सा है, उन्हें उसे निकालने से न रोका जाए. लेकिन राघवन ने अपनी किताब में खुलासा किया कि भट का ये आरोप पूरी तरह बेबुनियाद निकला.
जांच का सबसे अहम मुकाम था, मोदी से पूछताछ. जितने आरोप लगाए गए थे, उन पर पूछताछ होनी थी. राघवन ने लिखा है कि हमने मुख्यमंत्री के स्टॉफ को संदेश दिया कि उन्हें एसआईटी के मुख्यालय आना होगा. कहीं और ये पूछताछ होती, तो मुख्यमंत्री के विरोधी पक्षपात का आरोप लगा सकते थे. लेकिन मोदी ने बिना कोई देर किए गांधी नगर स्थित एसआईटी के मुख्यालय आने पर हामी भर दी. राघवन ने खुद को पूछताछ से अलग कर लिया. पूछताछ के लिए एसआईटी के सदस्य अशोक मल्होत्रा को चुना गया. राघवन के इस फैसले से कई लोग हैरत में रह गए थे.
राघवन ने लिखा है, मोदी से पूछताछ 9 घंटे तक चली. मल्होत्रा ने मुझे बताया कि देर रात तक पूछताछ चलती रही, लेकिन मोदी बहुत शांत रहे. उन्होंने किसी सवाल टाला नहीं. सबका जवाब दिया. इस नौ घंटे में उन्होंने कोई ब्रेक नहीं लिया. उन्होंने चाय व अन्य किसी किस्म की पेशकश को ठुकरा दिया. अपनी पानी की बोतल तक वे साथ लेकर आए थे. कांग्रेस के पूर्व सासंद अहसान जाफरी की विधवा जाकिया जाफरी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके आरोप लगाया था कि मुख्यमंत्री और उनके अधिकारी दंगे में शामिल थे. लेकिन एसआईटी को जांच में इस बाबत कोई सुबूत नहीं मिला. मोदी को क्लीन चिट उनके विरोधियों के लिए सबसे बड़ा झटका था. दरअसल सीबीआई की इसी क्लीन चिट के बाद मोदी का राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश का रास्ता साफ हुआ.
राघवन ने ‘बोफोर्स’ मामले का हवाला देते हुए लिखा है कि यह इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि एक पार्टी की सरकार, जिसके पास छिपाने को बहुत कुछ था, उसने कैसे एक सही मामले की जांच को पलीता लगा दिया. अदालत में मामला न टिक पाने के लिए वे लोग दोषी हैं जिनके हाथ में 1990 के दशक में और 2004 से 2014 तक जांच एजेंसी का नियंत्रण था. यह मामला 1,437 करोड़ रुपये के हॉवित्जर तोप सौदे में कथित रिश्वत से जुड़ा है. इसी मामले के चलते 1989 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकार को सत्ता से बाहर होना पड़ा था. स्वीडन की कंपनी बोफोर्स के साथ इस सौदे पर 1986 में हस्ताक्षर हुए थे. आरोप था कि कंपनी ने नेताओं, कांग्रेस के नेताओं और नौकरशाहों को लगभग 64 करोड़ रुपए की रिश्वत दी थी. चार जनवरी 1999 से 30 अप्रैल 2001 तक मामले की जांच करने वाले राघवन ने अपनी आत्मकथा में कांग्रेस की भूमिका की आलोचना की है. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जांच के दौरान इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी कि ये भुगतान क्या पार्टी के लिए किया गया था. राघवन ने लिखा है, ‘‘यह संभव है कि कुछ भुगतान कांग्रेस पार्टी के लिए रहा हो. हालांकि, इसकी पुष्टि करना कठिन है। बोफोर्स मामला इस बात का उदाहरण रहेगा कि किस तरह एक सही मामले को एक पार्टी की सरकार द्वारा जानबूझकर बिगाड़ा जा सकता है. दोष उन लोगों पर जाता है जिन्होंने 1990 के दशक में और 2004-14 के दौरान सीबीआई को नियंत्रित किया.”
वर्ष 1991-96 में जहां कांग्रेस नेता पी वी नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे, वहीं 2004 से 2014 तक भी मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी. नवंबर 1990 से जून 1991 तक कांग्रेस के बाहरी समर्थन से चंद्रशेखर के नेतृत्व में अल्पमत की सरकार थी. वर्ष 1988 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकार के दौर में प्रारंभिक जांच का जिक्र करते हुए राघवन ने कहा कि यह सब स्वीडिश रेडियो और राष्ट्रीय दैनिक हिन्दू के खुलासों से जनता में उत्पन्न असंतोष की वजह से किया गया. मामला इतना तूल पकड़ गया था कि जांच के सिवाय राजीव गांधी सरकार के पास कोई विकल्प नहीं था. लेकिन असल में ये सब कुछ चीजों को छिपाने के लिए किया जा रहा था.