अटल सुरंग के जरिए सेना का आज से लद्दाख पहुंचना आसान, सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इस क्षेत्र के प्रति पाञ्चजन्य की तीन दशक से अधिक की रही है चिंता

    दिनांक 03-अक्तूबर-2020
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अजय सेतिया
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज रोहतांग स्थित अटल सुरंग का उद्घाटन किया। सामरिक दृष्टि से अतिमहत्वपूर्ण इस सुरंग के जरिए अब साल भर लेह—लद्दाख का आवागमन सुलभ रहेगा। सामरिक एवं रणनीति रूप से महत्वपूर्ण इस क्षेत्र के प्रति पाञ्चजन्य की चिंता 35 साल से अधिक की रही है। पाञ्चजन्य ने उस समय भी यहां की स्थिति के प्रति न केवल आगाह किया था बल्कि चीन के मंसूबों और उसके द्वारा इस क्षेत्र में की जा रही साजिशों को परत—दर—परत खोलकर देश के सामने रखा था।

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जून, 1985 की बात है। मैं लाहौल स्पीती जिले के मुख्यालय केलांग गया था। वहां से लौटकर मैंने एक खबर लिखी थी,“ लाहौल स्पीती पर चीनी नजर।“ यह खबर 14 जुलाई, 1985 को पाञ्चजन्य की लीड स्टोरी बनी थी। खबर का सार था–“तिब्बत पर कब्जा कर लेने के बाद चीन ने भारतीय क्षेत्र लाहौल स्पीती पर निगाह डालना शुरू कर दिया है। तिब्बतियों के माध्यम से हिमाचल प्रदेश के इस सीमान्त एवं पिछड़े जिले में चीन एक गहरी साजिश रच रहा है।
मध्य प्रदेश के प्यारे लाल खंडेलवाल उस समय राज्यसभा के सांसद थे और उन्होंने पाञ्चजन्य की खबर के आधार पर राज्यसभा में सवाल पूछा था कि क्या केंद्र को चीन के इस षड्यंत्र की जानकारी है। उस समय केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री कुमुद बिन जोशी ने इस खबर की पुष्टि करते हुए कहा था कि सरकार कदम उठा रही है।

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असल में लाहौल स्पीती से भारत का सड़क मार्ग सिर्फ तीन महीने ही खुला रहता था और 9 महीने सम्बन्ध टूट जाता था। इसी कारण चीन को अलगाववाद फैलाने का मौक़ा मिल रहा था। कुमुद बिन जोशी ने राज्यसभा को बताया था कि पंडित जवाहर लाल नेहरू भी लाहौल स्पीती से सारा साल सड़क सम्पर्क के खोलने के लिए चिंतित थे और एक योजना बनाई गई थी। हालांकि यह सच नहीं था। नेहरू ज्यादा खर्चे के कारण सुरंग के लिए कतई गम्भीर नहीं थे। चीन के बार्डर को लेकर वह कभी भी गंभीर नहीं रहे थे। हां, 1962 के युद्ध के बाद नेहरू ने रोहतांग दर्रे पर रोप-वे बनाने का सर्वेक्षण जरूर करवाया था, लेकिन उस पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। इंदिरा गांधी ने जरूर 1983 में मनाली और लेह के बीच सालभर कनेक्टिविटी देने वाली सड़क के निर्माण की परियोजना बनवाई थी। लेकिन 1984 में उनकी मृत्यु के बाद फाइल फिर रुक गई थी।


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सुरंग के भीतर किसी कार की अधिकतम रफ्तार 80 किलोमीटर प्रति घंटा हो सकती है। इससे मनाली-रोहतांग दर्रा-सरचू-लेह राजमार्ग पर 46 किलोमीटर की दूरी घटेगी और यात्रा समय भी चार से पांच घंटा कम हो जाएगा।


1985 में राज्यसभा में आश्वासन के बावजूद 2002 तक किसी ने कोई कदम नहीं बढ़ाया था। रोहतांग दर्रे के नीचे रणनीतिक महत्‍व की सुरंग बनाए जाने का असली फैसला 3 जून, 2000 को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लिया था और उन्होंने खुद 26 मई, 2002 को आधारशीला रखी थी। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अटल जी के सपने को साकार करते हुए अटल सुरंग का उद्घाटन किया। निश्चित ही इस सुरंग के रास्ते सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण लद्दाख तक पहुंच मार्ग भी आसान हो जाएगा, जहां तिब्बत—भारत सीमा पर चीन के साथ तनाव बना हुआ है।

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उललेखनीय है कि हिमाचल मंत्रिमंडल ने 20 अगस्त, 2018 को रोहतांग टनल का नाम पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर रखने की सिफारिश की थी, जिसे मंजूर करते हुए अटल जी के जन्मदिन 25 दिसम्बर, 2018 में मोदी ने नामकरण का एलान किया| समुद्र तल से 3,000 मीटर की ऊंचाई पर 1,458 करोड़ रुपये की लगात से बनी दुनिया की यह सबसे लंबी सुरंग लद्दाख के हिस्से को साल भर संपर्क सुविधा प्रदान करेगी। पूर्वी पीर पंजाल की पर्वत श्रृंखला में बनी यह सुरंग 9.2 किलोमीटर, 10.5 मीटर चौड़ी और 5.52 मीटर ऊंची है। सुरंग के भीतर किसी कार की अधिकतम रफ्तार 80 किलोमीटर प्रति घंटा हो सकती है। इससे मनाली-रोहतांग दर्रा-सरचू-लेह राजमार्ग पर 46 किलोमीटर की दूरी घटेगी और यात्रा समय भी चार से पांच घंटा कम हो जाएगा।