जिहाद विरोधी क्रांति की तरफ बढ़ता फ्रांस

    दिनांक 31-अक्तूबर-2020   
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फ्रांस की जनता में कट्टरपंथी इस्लामिक तत्वों के खिलाफ गुस्सा है. राष्ट्रपति मेक्रोन ने साफ कर दिया कि खतरा अब दूसरे पक्ष यानी जिहादियों को महसूस होगा. पूरे देश में कट्टरपंथी इस्लामिक तत्वों, संस्थाओं और मस्जिदों के खिलाफ अभियान चल रहा है

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फ्रांस में बृहस्पतिवार को फिर एक जिहादी हमलावर ने अल्लाह-हो-अकबर के नारों के साथ तीन लोगों का गला रेत डाला. हाई स्कूल टीचर सैमुअल पैटी की हत्या के बाद फ्रांस पहले ही सुलग रहा है. अब हालात ऐसे मोड़ पर आ रहे हैं कि इन जिहादियों को सभ्य समाज की ओर से पहली गंभीर चुनौती मिलने लगी है. आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका के नेतृत्व में लड़ी गई वैश्विक जंग असल में एक मैदानी जंग थी. ये एक खतरे के खिलाफ सैन्य जुटान था. वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद भी अमेरिकी समाज में गहरे तक कट्टरपंथी इस्लाम विरोधी सोच पैदा नहीं हो सकी थी. यूरोप के देशों ने एक-एक करके इस्लामिक आतंकवादी हमले झेले, लेकिन यूरोपीय समाज में वैचारिक तौर पर हलचल नहीं हो पाई.
यूरोप में विचार और क्रांति का रास्ता फ्रांस से निकलता है. यूरोप के इतिहास पर सबसे ज्यादा असर फ्रांस की क्रांति का पड़ा. आज जिन मूल्यों की बात पूरा यूरोप करता है, वे फ्रांस की क्रांति से ही जन्मे. अब फ्रांस में एक और क्रांति जन्म ले रही है. यूरोप का समाज विविधता के दिखावे में इतना आगे निकल गया है कि आज मुस्लिम आबादी को लेकर वहां के हर देश में बेचैनी है. सवाल सिर्फ पहल का है, जो फ्रांस ने कर दी है. फ्रांस में कट्टरपंथी इस्लाम विरोधी क्रांति जन्म ले रही है, जिसकी सुगबुगाहट पूरे यूरोप ही नहीं, दुनिया में शुरू हो गई है. हाईस्कूल टीचर सैमुअल पैटी के सरे आम सर कलम कर देने की घटना के बाद जो कुछ हो रहा है, उसमें दुनिया दो खेमों में बंटती जा रही है. एक तरफ तुर्की के बदमिजाज राष्ट्रपति एर्दोगन हैं, पिछलग्गू देशों में पाकिस्तान समेत इस्लामिक कट्टरपंथियों की जमात है. दूसरी तरफ वे देश हैं, जो मानवीय मूल्यों में विश्वास करते हैं. जो मानवीय मूल्यों के पैरोकार हैं, स्वाभाविक तौर पर कट्टरपंथी मध्ययुगीन इस्लामिक हिंसा के खिलाफ हैं. ये देखना सुखद है कि अल्पसंख्यकवाद और तुष्टिकरण के बोझ तले दबी विदेश नीति से पल्ला झाड़कर भारत ने भी फ्रांस का समर्थन कर दिया है.
पेटी की हत्या के बाद से फ्रांस की जनता में कट्टरपंथी इस्लामिक तत्वों के खिलाफ गुस्सा है. राष्ट्रपति मेक्रोन ने साफ कर दिया कि खतरा अब दूसरे पक्ष यानी जिहादियों को महसूस होगा. पूरे देश में कट्टरपंथी इस्लामिक तत्वों, संस्थाओं और मस्जिदों के खिलाफ अभियान चल रहा है. इसी बीच बृहस्पतिवार को फ्रांस के एक चर्च में एक हमलावर ने एक महिला का गला काट दिया और दो अन्‍य लोगों की चाकू मारकर निर्मम तरीके से हत्‍या कर दी. यह घटना फ्रांस के नीस शहर में हुई है. शहर के मेयर ने इस खौफनाक घटना को आतंकवाद करार दिया है. हमलावर ट्यूनीशियाई मूल का 21 साल का नौजवान है. वह शरणार्थी के रूप में फ्रांस में आया था. यूरोप के देशों ने मुस्लिम शरणार्थियों के लिए जिस तरह से दरवाजे खोले थे, वह आज सरदर्द बन चुके हैं. ये बेचारे के रूप में आए और अब यूरोप के हर देश में कट्टरपंथी इस्लाम के झंडाबरदार बन बैठे है. इन शरणार्थियों के रूप में आए जिहादियों ने यूरोप में आतंकवाद के खतरे की सूरत बदल दी है. अब बड़े सुनियोजित हमलों की जगह लोन वूल्फ अटैक होते हैं.

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लेकिन फ्रांस ने जो पहल की है, वह यूरोप के लिए नजीर हैं. इमेनुअल मेक्रोन ने साफ कर दिया है कि काफिर करार देकर हत्या कर देने वाली मानसिकता के इस्लाम को फ्रांस में नहीं चलने दिया जाएगा. सभ्य समाज में इस प्रकार के मध्ययुगीन हमलों को अंजाम देने वाले ये जिहादी जुर्म करके भी उस समाज के नियमों के तहत कानूनी संरक्षण पाते हैं. इनके अपील, वकील और दलील, तीनों अधिकार होते हैं. दूसरों से जीवन का अधिकार छिनने वाले ये जिहादी मजे में अपने इन अधिकारों के साथ अदालतों में खड़े होते हैं. इनके अपराध व्यक्तिगत मान लिए जाते हैं और इन जिहादियों को तैयार करने वाला सिस्टम पूरे मजे में अगले हमले की तैॅयारी करता है. लेकिन इस मर्तबा फ्रांस इस बात पर अडिग है कि इस तरह की विचारधारा को मानने वाले, उन्हें प्रोत्साहन देने वाले, उन्हें संरक्षण मुहैया कराने वाली पूरी कड़ी को बख्सा नहीं जाएगा. पेंटीन में फ्रांस ने मस्जिद को बंद कर दिया है. पेटी के ही स्कूल में पढ़ने वाले एक छात्र के पिता को गिरफ्तार किया गया है. उसने पेटी के खिलाफ आनलाइन अभियान चलाया था. एक मौलाना गिरफ्तार है, कई से पूछताछ हो रही है. इसके अलावा फ्रांस में लंबे समय से कट्टरपंथी इस्लाम का पैरोकार रहा विवादास्पद संगठन कलेक्टिव अगेंस्ट इस्लामोफोबिया (सीसीआईएफ) को राष्ट्र का शत्रु घोषित कर दिया है. इस संगठन में मूल रूप से वहाबी प्रभाव के लोग हैं. फ्रांस अब इनसे किसी भी कीमत पर निपटने को तैयार है. सेना उतार दी गई है. इसके अलावा नीस की घटना के बाद सैन्य बलों की तादाद और बढ़ा दी गई है. मानवाधिकार... आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता.... हर मुसलमान बुरा नहीं है.... मुसलमान हमारे बहुलतावादी समाज का हिस्सा हैं..... इस तरह के हैंगओवर से फ्रांस बाहर आ गया है. पेटी की हत्या के बाद होने वाली कार्रवाई के खिलाफ जिहादी लोकतांत्रिक चोला पहनकर सामने आ गए हैं. उनके प्रदर्शनों से निपटने की जिम्मेदारी सेना को दे दी गई है. और सेना हर संभव तरीके से निपट भी रही है. मुसलमानों के पचास से ज्यादा संगठनों की निगरानी हो रही है. इनमें से अधिकतर को बंद कर देने की तैयारी है. सलाफी और वहाबी मस्जिदों की भी जांच हो रही है.
अभी तक 120 कट्टरपंथी मुस्लिमों के घर की तलाशी हो चुकी है. कई ऐसे संगठनों की पहचान की गई है, जो न सिर्फ कट्टरपंथ फैला रहे हैं, बल्कि जिन पर आतंकवादी संगठनों को फंडिंग का भी शक है. मेक्रोन के चुनाव के बाद दुनिया भर में लिबरल या डेमोक्रेट के चोले में छिपे कम्युनिस्टों ने खूब तालियां बजाई थीं. मेक्रोन भले ही चुनाव जीते, लेकिन उनके कार्यकाल में अब तक बीस लोग इन जिहादियों का शिकार बन चुके हैं. देश के अंदर मुस्लिम कट्टरपंथियों के खिलाफ जो उबाल है, उसका नतीजा है कि मेक्रोन को रुख कड़ा करना पड़ा है. 2022 के चुनाव में मेक्रोन बुरी तरह पिछड़ रहे हैं. इस समय फ्रांस में धुर दक्षिणपंथी नेता मेरिन ली पेन की हवा चल रही है. पेन खुलेआम इस बात को कहते हैं कि देश में शरणार्थियों की आड़ में घुसे जिहादियों को बाहर निकाला जाएगा. वह जिहादियों को गोली की भाषा में समझाने की बात करते हैं. मेक्रोन की आलोचना इस बात को लेकर बहुत ज्यादा हुई है कि बीस हत्याओं के बावजूद वे अब जाकर जागे हैं. कुल मिलाकर फ्रांस का माहौल बहुत गर्म हो चुका है. जिस तरीके के प्रदर्शन हो रहे हैं और उसके जवाब में जिहादी हत्याएं कर रहे हैं, बहुत कुछ होना बाकी है.
दुनिया का परिदृश्य भी फ्रांस के कदम के बाद बदलने लगा है. दक्षिण एशिया के बांग्लादेश, पाकिस्तान जैसे देशों में मेक्रोन के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं. यहां तक कि भारत में भी मुंबई और भोपाल में मुसलमानों ने फ्रांस के खिलाफ प्रदर्शन किया. और हद देखिए कि इन मुसलमानों को शिकायत है कि फ्रांस जिहादियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों कर रहा है. मुस्लिम देशों में भी जिस तरीके से शक्ति संतुलन बदल रहा है, उससे खिलाफत बनाम क्रूसेड का माहौल बनने जा रहा है. तुर्की के तैयब एर्दोगन आटोमन साम्राज्य की लौ दिखाकर मुस्लिमों को रिझा रहे हैं. एर्दोगन तो यहां तक चले गए कि उन्होंने मेक्रोन के दिमागी इलाज की जरूरत बता दी. पाकिस्तान और कई अन्य मुस्लिम देश तुर्की में इस्लाम का नया नेता देख रहे हैं. मलेशिया के पूर्व पीएम महातिर मोहम्मद ने भी जिहादी मुसलमानों की आवाज बनकर कहा कि मुसलमानों द्वारा लाखों फ्रांसिसियों का कत्ल भी जायज होगा. वहीं सऊदी अरब ने तुर्की की खेमेबंदी के खिलाफ काम शुरू कर दिया है. जिस तरह से खाड़ी देशों के इस्राइल के साथ संबंध मधुर होते जा रहे हैं, उससे भी लगता है कि अशांति पसंद मुस्लिम देशों का अगुआ तुर्की बन सकता है. बृहस्पतिवार को फ्रांस के नीस में जिस तरीके से तीन लोगों की हत्या एक जिहादी ने की, सऊदी अरब ने उसकी कड़ी निंदा की है. लेकिन दूसरी तरफ पाकिस्तान है. जहां की असेंबली ने फ्रांस से राजदूत वापस बुलाने का प्रस्ताव पास कर दिया. मजेदार बात ये कि प्रस्ताव पारित हो जाने के बाद पाकिस्तान को पता चला कि फ्रांस में तो उसका कोई राजदूत है ही नहीं. मुस्लिम देशों की इस खेमेबंदी के बाद और दूसरी तरफ यूरोप में फ्रांस के प्रति सहानुभूति के चलते यूरोप और इस्लाम के आमने-सामने आने की पूरी संभावना है.
अब सवाल है कि इस्लामिक आतंकवाद के सबसे पुराने शिकार भारत को कहां खड़ा होना चाहिए. मोदी सरकार के आने के बाद भारत की विदेश नीति मजबूत हुई है। यासिर अराफात जैसे नेताओं में दोस्त तलाशने वाली नई दिल्ली अब नहीं है. भारत ने बहुत साफ और मजबूत स्टैंड लिया है. भारत ने बयान जारी करके फ्रेंच राष्ट्रपति के इस्लाम और कट्टरपंथ को लेकर रुख का समर्थन किया है. विदेश मंत्रालय ने पेटी की सरे आम हत्या की भी निंदा करते हुए कहा कि इस तरह की घटना को किसी भी कारण या हालात की मद्देनजर जायज नहीं ठहराया जा सकता. मेक्रोन ने शुक्रिया अदा करने में जरा भी देर न की. उन्होंने ट्वीट किया कि धन्यवाद भारत. भारत और फ्रांस आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एक-दूसरे पर हमेशा भरोसा कर सकते हैं.
फ्रांस में इस्लाम
फ्रांस में इस्लाम ईसाइयत के बाद दूसरा सबसे बड़ा मजहब है.
पश्चिमी देशों में सबसे अधिक मुस्लिम शरणार्थियों को पनाह देने वाला देश फ्रांस ही है. इनमें अधिकतर सुन्नी मुसलमान हैं.
2017 की एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक फ्रांस में मुसलमानों की संख्या 5760999 है, जो कि फ्रांस की कुल आबादी का 8.8 प्रतिशत है.
पिछले कुछ सालों में जुमे की नमाज सामूहिक रूप से पढ़ने वालों की तादाद 60 प्रतिशत तक पहुंच गई है.
पिछले एक दशक में रमजान के दौरान रोजा रखने वालों की संख्या अस्सी प्रतिशत हो गई है.
2015 से 2018 की समयावधि में फ्रांस में आतंकवादी हमलों में 249 लोगों की मौत हुई और 928 लोग जख्मी हुए. इस समयावधि में कुल 22 आतंकवादी हमले हुए.