गेशे जम्पा - बारहवीं कड़ी

    दिनांक 05-अक्तूबर-2020
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नीरजा माधव
हमारे भारत देश में तिब्बती शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या है। चीन की विस्तारवादी नीति के परिणामस्वरूप एक अहिंसक धार्मिक देश तिब्बत पराधीन हो गया। 1959 में इसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला जब तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष परम पावन दलाई लामा को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपना देश छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी।  भारत में रह रहा तिब्बती समुदाय तिब्बत में रह रहे चीनी सत्ता से संघर्षरत तिब्बतियों की सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है। 19वीं सदी के अन्त तक तिब्बत स्वतंत्र था। तिब्बत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्न पर छाई वैश्विक चुप्पी को तोड़ने और उन्हें स्वाधीनता दिलाने की जद्दोजहद करता है सुप्रसिद्ध लेखिका नीरजा माधव द्वारा लिखा भारत में हिन्दी का पहला उपन्यास-गेशे जम्पा। प्रस्तुत है इस उपन्यास की बारहवीं कड़ी
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हमारे इस अहिंसक अभियान से जुड़े स्थानीय समर्थकों, जिनमें बुद्धिजीवी, साहित्यकार, कलाकार सभी होंगे, के समवेत हस्ताक्षर से एक अपील चीनी शासकों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भेजने की योजना है, ताकि एक दबाव बने। यह कार्य विश्व में जिन-जिन देशों में हम तमाम तिब्बती शरणार्थी हैं, वहां वहां एक साथ हो रहा है।
हमारा यानी भारत सरकार का सहयोग कैसा लग रहा है तुम लोगों को? देवयानी के प्रश्न में एक आकुलता थी। बहुत अच्छा दीदी। हम क्या, हमारी आने वाली सैकड़ों पीढ़ियां इस ऋण को चुका नहीं पाएंगी। वह भावुक हो उठा था। कभी तुम लोग इस दिशा में भी विचार करते हो ढोंढप् कि हमें तिब्बत जाकर अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए? जैसे भारत में आजादी की लड़ाई के लिए हुआ?
हुआ था न देवयानी मैदम! उस समय मैं वहीं धर्मशाला में थी। तिब्बती जवानों की एक टुकड़ी अपने देश जाने के लिए तैयार हुई थी, पर उसे हिन्दुस्थानी सेना ने ही रोक दिया था बार्डर पर। इस बार लोब्जंग ने देवयानी को जवाब दिया। क्यों? क्यों रोक दिया था? देवयानी के लिए यह एक नया तथ्य था।
क्योंकि चीन को पता चल गया था। अब आप तो जानती ही हैं कि उनके जासूस हर जगह छूटे हुए हैं। हमारी छोटी-छोटी गतिविधियां भी उन तक पहुंचती रहती हैं। इसीलिए उन लोगों ने भारत की सरकार पर दबाव डाला था कि वह अपने देश में चीन-विरोधी गतिविधियां चला रहा है जो उचित नहीं है। उसे रोका जाना चाहिए। इसलिए सेना ने उन्हें तिब्बत नहीं जाने दिया। इसका मतलब तो यह हुआ कि अब तिब्बती शरणार्थी वापस अपने देश जाना भी चाहें तो नहीं जा सकते। दीपेश अचानक ही बोल पड़ा।
नहीं, जा क्यों नहीं सकते। इक्का-दुक्का जाते हैं तो ऐसी कोई समस्या नहीं आती। लेकिन वहां का प्रशासन चौकन्ना तो हो ही जाता है। कहीं दूसरे देश से लौटकर वह विरोधी गतिविधियां उकसाने का कार्य तो नहीं कर रहा है? ढोंढप् ने मानो सफाई दी। तो फिर तिब्बतियों को वहां जाकर रहने में क्या आपत्ति है? दीपेश का अगला प्रश्न किया। ऐसा नहीं है भाईसाहब। स्त्रियों, बच्चों और लामाओं के साथ उनका दुर्व्यवहार दूसरे ढंग का होता है। ढोंढप् दुखी स्वर में बोल पड़ा। वहां हमारी प्रजाति समाप्त करने के लिए लड़कियों की शादी जबरन उन लोगों के साथ कर दी जाती है। बच्चा पैदा होता है तो यदि लड़की है तो समाप्त कर दिया जाता है और लड़का होता है तो अपनी सेना में भर्ती कर लिया जाता है। इस बार लोब्जंग का उत्तर दीपेश को चुप करा
गया था।
बिल्कुल सही कह रही हैं लोब्जंग आप। अब हम लोग अपनी चर्चा यहीं समाप्त करें तो कैसा होगा? देवयानी ने कहा।
दीपेश फर्श पर अपने लिए बिस्तर लगा रहा था। गद्दे पर चादर डालते हुए वह धीरे-धीरे बड़बड़ा रहा था-अब क्या जाएंगे ये लोग। ऐसे ही बीच-बीच में मीटिंग करके दिखाते हैं कि हम स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे हैं। असली बात तो ये है कि इतनी सुख-सुविधा अब इन्हें तिब्बत में कहां मिलेगी जिसके ये आदी हो चुके हैं।
यहां तो किसी-किसी को ए.सी. का सुख मिल पा रहा होगा, वहां तो पूरे तिब्बत का ही मौसम ए.सी. से अच्छा होता है। देवयानी अपने बाल गूंथते हुए बोली। अपने गेश्ो जम्पाजी से पूछो दीदी कभी कि क्या वे तिब्बत जाने का मन बना रहे हैं? दीपेश अपने बिस्तर पर लेट गया था। ईश्वर उन लोगों को भी आजादी का वह दिन दिखाए तो जरूर ही जाना चाहेंगे वे। गेश्ो जम्पा का धीर-गंभीर व्यक्तित्व देवयानी की आंखों में घूम गया था। तब तुम्हारा क्या होगा, दीदी? दीपेश ठहाका लगा उठा। क्या क्या बकता है रे दीपेश तू! तेरा दिमाग हमेशा उल्टी बातें ही सोचता है? चल, सो जा। मां ने डांट लगाई थी। देख लेना दीदी, चीन ने वहां उपनिवेश बनाया है, ये लोग भारत को उपनिवेश बना लेंगे। हटने का नाम नहीं लेंगे। भारत सरकार नहीं चेतेगी तो जल्दी ही मानवाधिकार की दुहाई देते हुए ये भी एक खंड अपने लिए मांगने लगेंगे। चीन से संबंध खराब हो रहे हैं, सो अलग है। दीपेश बड़बड़ा रहा था।
चुप रहो मेरे विदेश मंत्री! सारी नीतियां और भविष्य तुम्हीं जानते हो? कृपा करके सो जाओ। दीवारों के भी कान होते हैं। देवयानी ने एक मीठी झिड़की देते हुए करवट बदल ली। उनके लिए दीवारों के कान होते हैं और हम तो आंखों के सामने दीवार खड़ी किए बैठे हैं। दीपेश फिर फुसफुसाया तो देवयानी की हंसी दूट गई। हे भारत भाग्यविधाता, सो जाओ, ताकि समय रहते जाग सको।  देवयानी ने अपना चेहरा पीछे घुमाकर दीपेश से कहा।

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चीन के जासूस हर जगह छूटे हुए हैं। हमारी छोटी-छोटी गतिविधियां भी उन तक पहुंचती रहती हैं। इसीलिए उन लोगों ने भारत की सरकार पर दबाव डाला था कि वह अपने देश में चीन-विरोधी गतिविधियां चला रहा है जो उचित नहीं है। उसे रोका जाना चाहिए। इसलिए सेना ने उन्हें तिब्बत नहीं जाने दिया।

जागकर भी क्या करूंगा जब आप जैसे बड़े-बुजुर्गों में तिब्बत-प्रेम इस तरह कूट-कूटकर भरा होगा? दीपेश हंसते हुए दूसरी ओर मुंह घुमाकर सोने का बहाना करने लगा। देवयानी के ओठों पर एक मृदुल मुस्कान तैर उठी थी। उसे वह घटना याद आई थी-
प्रेम के लिए भाषा एक आवश्यक तत्व है। गैर भाषा-भाषी व्यक्ति के लिए किसी के हृदय में प्रेम उतनी जल्दी अंकुरित नहीं हो सकता, जितनी तीव्रता से स्व-भाषी के प्रति हो सकता है। अध्यापक कक्ष में विशुद्ध प्रेम पर तर्क-वितर्क चल रहा था। प्रसंगवश देवयानी ने बहुत ही गंभीरता से अपना पक्ष रखा था।
प्रेम के कई रूप होते हैं न? सबसे पहले तो उसके स्वरूप और लक्षणों की व्याख्या करनी चाहिए। नवीन शर्मा ने अपनी बात रखी तो सभी लोग ठहाका लगा हंस पड़े थे। तुम तो यार, इंटरमीडिएट की विज्ञान प्रायोगिक परीक्षा की तरह प्रेम की चीरफाड़ करने लगे। बालेंदु हंस पड़े थे। बहुत जरूरी होता है, सर। अपने-आप तो प्रेम का मेंढक टर्र-टर्र करता ही है, पर आपकी चीरफाड़ के बाद भी वह वैसे ही टर्रा सके, इसमें आपकी सफलता है। ओह, अब नवीनजी की बातें विकृति की ओर मुड़ रही हैं। मैं चल रही हूं क्लास लेने। देवयानी एक झटके में उठ खड़ी हुई थी।
कमरे से बाहर निकलते ही गेशे जम्पा उधर से आते हुए दिखाई दिए थे। क्या इनके मन में भी कभी किसी के लिए प्रेम अंकुरित हुआ होगा? मानवीय दुर्बलताओं ने चुपके से झांका होगा अंतर्मन में, फिर कैसे मुक्ति पाई होगी उससे इन्होंने? सोचते हुए देवयानी गेशे जम्पा के सम्मुख पहुंच चुकी थी, पर उनकी ओर देखते हुए भी वह अभिवावदन करना भूल गई।
क्या बात है देवयानी? कोई उलझन..? उन्होंने मुस्कुराते हुए धीरे-से ठिठककर पूछा था। टाशी डेलेक, गेला। उसने अभिवादन के लिए हाथ जोड़ दिए।
किसी सोच में हो देवयानी? गेशे जम्पा ने पुन: प्रश्न दोहराया। नहीं, नहीं तो, गेला। उसने अपने चेहरे को आंचल से पोंछते हुए जवाब दिया। प्रेम, घृणा और उलझन के लिए किसी भाषा या अभिव्यक्ति की आवश्यकता नहीं होती। चेहरा और आंखें स्वयं बता देती हैं। गेशे जम्पा उसे गहरी दृष्टि से देखते हुए बोले थे।
वह उनकी आंखों में सीधे देखकर बात करने में स्वयं को असमर्थ पाने लगी थी। उनके पीछे बरामदे में रखे गमले को देखते हुए ही उसने उत्तर दिया था-जी, वो टीचर्स रूम में कुछ बहस हो रही थी, उसी के बारे में सोच रही थी। कोई अप्रिय विषय तो नहीं था। गेशे जम्पा उससे बातें करने के मूड में दिखाई पड़े थे। नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है सर।
कभी ऐसी कोई बात हो तो मुझसे बताने में संकोच न करना।
जी, अच्छा। उसने सिर को झुकाते हुए कहा था।
क्लास है?
जी।
अच्छा। वे आगे बढ़ने लगे थे। पीछे से नवीन और बालेंदु के आने की आहट सुन वह भी अपनी राह चल पड़ी थी।
प्रेम की प्लेटॉनिक थियरी। वे दोनों अभी तक बहस में उलझे थे। गेशे जम्पा और देवयानी के कानों में एक साथ यह वाक्य पड़ा था और दोनों ने एक साथ पीछे मुड़कर बीच में आ रहे नवीन शर्मा एवं बालेंदु को देखने का उपक्रम किया था। देवयानी और गेशे जम्पा दोनों की दृष्टि मिली थी और मनचाहे ही एक मुस्कान तैर गई थी ओठों पर। सोचते-सोचते देवयानी की सकुचाई आंखों में नींद ने चुपके से अपना डेरा जमा लिया था। रात के सन्नाटे में कई इंद्रधनुषी सपने डोलने लगे थे।                  (जारी...)