हाथरस पर मीडिया और राजनीति के मंडराते गिद्ध

    दिनांक 05-अक्तूबर-2020   
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कांग्रेस इको—सिस्टम का एक बड़ा समूह जातीय संघर्ष की संभावना को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हवा दे रहा है। यह पत्रकारों, प्राध्यापकों और एनजीओ वालों का एक बड़ा समूह है, जो मानता है कि जातीय ध्रुवीकरण करके ही वह कांग्रेस को उसकी खोई साख वापस दिला सकते हैं

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माहौल बिगाड़ने वाले रालोद कार्यकर्ताओं को खदेड़ती पुलिस।
सीबीआई जांच के आदेश के बाद अब लगता है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने हाथरस के नाम पर रची गई एक बड़ी साजिश को नाकाम कर दिया है लेकिन अभी भी दावे से कुछ कहा नहीं जा सकता। कांग्रेस को लेकर हो रहे खुलासे के बाद विश्वास से नहीं कहा जा सकता कि राहुल-प्रियंका वाड्रा की कांग्रेस आगे किसी खतरनाक योजना पर काम नहीं करेगी। शनिवार को भी राहुल-प्रियंका वाड्रा के हाथरस में पीड़िता के गांव से निकलने के बाद स्थानीय नागरिकों के बीच जातीय तनाव का माहौल था । जातीय हिंसा की संभावना से अब भी इंकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस इको—सिस्टम का एक बड़ा समूह जातीय संघर्ष की संभावना को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हवा दे रहा है। उसे लगता है कि जातीय संघर्ष का लाभ सीधे तौर पर बिहार-उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में कांग्रेस को हासिल होगा।
आज राहुल-प्रियंका वाड्रा के कांग्रेस इको सिस्टम के कार्यकर्ताओं ने हाथरस के लिए कई सारी योजनाएं बनाई थी। कुछ खोजी पत्रकारों की रिपोर्ट पर यकीन किया जाए तो इसमें कुछ मीडिया चैनल भी शामिल थे। जो पीड़ितों पर एक खास तरह की रिपोर्ट तैयार करने की तैयारी में लगे थे। इस योजना की रचना से पर्दा नहीं उठता यदि तीन ऑडियो टेप वायरल नहीं होते।
जिसमें एक टेप था इंडिया टुडे की पत्रकार कॉमरेड तनुश्री पांडेय का, जिसमें वह मृतका के भाई से बात कर रहीं हैं। बातचीत में वह कहती हुई पाई गईं—
"भाई , मेरे लिए एक काम कर दो भाई.. प्लीज कर दो एक काम..."
"आप से हाथ जोड़ कर विनती है कि एक छोटा सा वीडियो बना लो'..
"अपने पिता से ये कहलवा दो कि मेरे ऊपर बहुत दबाव था ..
"हमारी बेटी मरी है और हमें देखने भी नहीं दिया गया है"..
"भाई प्लीज... एक विडियो बना कर भिजवा दो"
"भाई तुम ही इस काम को कर सकते हो"...
"भाई सिर्फ 5 मिनट लगेगा.. एक वीडियो बनाओ और सिर्फ मुझे भेजो"...
16 मिनट 10 सेकेंड के इस टेप को दो हिस्सों में सुनने पर पत्रकार की मंशा को समझना सरल होगा। पहला हिस्सा 06 मिनट 40 सेकेन्ड तक चलता है। उसके बाद पीड़िता का भाई बताता है कि उसे संदेह है कि उसका फोन रिकॉर्ड किया जा रहा है। यह सुनते ही इंडिया टुडे की पत्रकार की भाषा बदल जाती है। इस पूरे टेप को मीडिया छात्रों को केस स्टडी के तौर पर सुनाना चाहिए। इसे सुनकर छात्र समझ सकते हैं कि जो बातचीत 6 मिनट 40 सेकेन्ड तक टेप में हो रही है, वह बातचीत कोई पत्रकार नहीं करता। तनुश्री पांडेय ने टेप में कहा है- ''तुम्हे मेरी मदद करनी होगी। प्लीज, बोल रहीं हूं नहीं ये लोग पूरा मामला तुम लोगों पर डाल रहे हैं, ये मैं बोल रही हूं।'' क्या यह किसी पत्रकार की भाषा है ?
बाद में इंडिया टुडे ने फोन की रिकॉर्डिंग को स्वीकार किया। उन्होंने बयान जारी करके बताया कि उनकी पत्रकार तनुश्री पांडेय का वायरल हुआ टेप प्रामाणिक है। यदि वायरल हुए टेप में कोई बात आपत्तिजनक नहीं होती और सामान्य बातचीत होती तो इंडिया टुडे समूह को बहुत सारे कमेंट को ब्लॉक नहीं करना पड़ता। टेप वायरल होने के बाद इंडिया टुडे से लोगों ने सवाल पूछना शुरू कर दिया। दुनिया भर के लोगों से सवाल पूछने वाला इंडिया टुडे समूह अपने ही पाठकों के सवालों से इतना डर गया कि उसे एक-एक कर सवाल पूछने वालों को सोशल मीडिया पर ब्लॉक करना पड़ा।
ऐसा नहीं है कि कॉमरेड तनुश्री पांडेय का पत्रकारिता कॅरियर बेदाग रहा है। उन्होंने इस पर पहले भी कई चांद—सितारे लगाए हैं। उनका एक वीडियो सीएए विरोध-प्रदर्शन के दौरान जेएनयू से वायरल हुआ था। जिस वीडियो को देखकर यही लग रहा था कि वह जेएनयू के एक छात्र नेता को समझा रही थीं कि कैमरे पर क्या बोलना है? वैसे भी किसी छात्र नेता की बाइट लेने से पहले उसे बोलने का प्रशिक्षण देना पत्रकार का काम नहीं होता? लेकिन ऐसा लगता है कि कैमरे पर बाइट लेने से पहले क्या बोलना है, इसका प्रशिक्षण देना मानो तनुश्री पांडेय की पत्रकारिता का हिस्सा है। तनुश्री पांडेय पत्रकारिता करने की जगह कांग्रेस और वामपंथी छात्र नेताओं के प्रवक्ताओं के लिए कोई प्रशिक्षण केन्द्र ही क्यों नहीं खोल लेती?
हाथरस में जातीय हिंसा की जमीन तैयार की जा रही थी। भाजपा के नेता और उप्र सरकार में मंत्री रमापति शास्त्री ने भी ऐसे दंगे की आशंका समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत करते हुए जताई।
इसके संकेत कांग्रेस इको सिस्टम के पत्रकारों के वक्तव्यों में मिल रहे हैं। कॉमरेड भाषा सिंह एक यूट्यूब चैनल पर हाथरस मुद्दे पर बातचीत कर रहीं थीं। इस बातचीत में उन्होंने जातीय संघर्ष की तरफ इशारा करते हुए कहा कि लड़ाई आगे तीखी और बड़ी होने वाली है। अब यहां तीखी लड़ाई से आशय क्या था, यह उन्होंने स्पष्ट नहीं किया लेकिन उनकी बातचीत को सुनकर ऐसा ही लगा कि वे जातीय हिंसा की तरफ संकेत कर रहीं हैं। मेरी जाति और तुम्हारी जाति विमर्श पर उन्होंने बहुत सारा ज्ञान दिया।
कांग्रेस इको सिस्टम का पत्रकारों, प्राध्यापकों और एनजीओ वालों का एक बड़ा समूह है, जो मानता है कि जातीय ध्रुवीकरण करके ही वह कांग्रेस को उसकी खोई साख वापस दिला सकते हैं। यदि हिन्दू समाज जाति के नाम पर नहीं लड़ेगा तो कांग्रेस की फूट डालो और राज करो की नीति सफल नहीं होगी।
कांग्रेस इको सिस्टम के कुछ मजबूत स्तम्भों के नाम लिखे जाएं तो उसमें इंदिरा जयसिंह, राजमोहन गांधी, रामचन्द्र गुहा, शबनम हाशमी, तीस्ता सीतलवार, प्रशांत भूषण, मृणाल पांडेय, आरफा खानम शेरवानी, ओम थानवी, पुरुषोत्तम अग्रवाल, आतीश तासीर जैसे नाम लिखे जा सकते हैं। वास्तव में जाति के नाम पर समाज को बांटने की राजनीति, कांग्रेस और उसके इको सिस्टम की कार्यशैली का हिस्सा है। इसका किसी पीड़िता को न्याय दिलाने से कोई संबंध नहीं है।
कांग्रेस इको सिस्टम ने अपना जाल हाथरस में बिछा लिया था। यदि कुछ खोजी पत्रकारों ने सुबह कांग्रेस के षडयंत्र का खुलासा ना किया होता तो हाथरस आज की रात जल रहा होता। यदि कोई नई साजिश न रची जाए तो कहा जा सकता है कि जातीय संघर्ष में जिस हाथरस को झोंकने की तैयारी कांग्रेस इको सिस्टम के लोग कर चुके थे। उसे कुछ खोजी पत्रकारों ने आडियो लीक करके बचा लिया। जिसमें पूरी योजना समझ में आती है।
दूसरे वायरल ऑडियो में एक लड़का जिसने अपना नाम संजय बताया है, पीड़िता के भाई को निर्देश दे रहा है कि कोई भी तुझे कही लेकर जाए तू नहीं जाएगा। प्रियंका गांधी घर आने वाली है। फोन करने वाला संजय कहता है कि मैं मीडिया का जुगाड़ करता हूं। संजय ही पीड़िता के भाई को बताता है कि मीडिया को क्या बोलना है। वह कहता है— ''जब आए तो बताना कि हम पर जबरदस्ती मुआवजा लेने का दबाव बनाया जा रहा है। हम कोई मुआवजा नहीं लेना चाहते थे।''
आडियो में पीड़िता के भाई को निर्देश देने वाला युवक एक समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में ऑडियो के सही होने की पुष्टी करता है और बताता है कि ‘'मैं अपने घर पर दिल्ली में था और न्यूज देख रहा था। मैंने टीवी पर देखा कि प्रियंका और राहुल गांधी हाथरस पहुंचने वाले हैं। वहां उन्हें (पीड़िता के परिवार को) गांव में कुछ पता नहीं चल पा रहा था, क्योंकि लाइट नहीं आ रही तो वो टीवी भी नहीं देख पा रहे हैं और ना ही किसी मीडिया वाले से मिल पा रहे हैं। मैंने कॉल करके उन्हें बताया कि प्रियंका और राहुल गांधी आपसे मिलने आ रहे हैं। जो भी बुरा व्यवहार आपके साथ हो रहा है, वो उन्हें बताना।’'
लेकिन वायरल टेप में युवक जिस तरह पीड़िता के भाई को निर्देश दे रहा है, उससे युवक के दावे पर संदेह होता है। वह फोन पर बताता है— ''अब कही नहीं जाना है। प्रियंका गांधी घर आएंगी तो उन्हें बताना है कि मैडम जबरन हम पर प्रेशर बनाया गया मुआवजा मंजूर करने के लिए।'' वह युवक फोन पर यह भी कहता है कि यह सब कहते हुए वीडियो बनानी है।
यह युवक जो दावा कर रहा है कि उसने सिर्फ राहुल और प्रियंका वाड्रा के आने की सूचना देने के लिए फोन किया, टेप को सुनते हुए लगता है कि उसका दावा सही नहीं है। वह फोन पर दिशा निर्देश दे रहा है कि पीड़ित परिवार को क्या करना है और क्या नहीं करना है। यहां तक की वह वीडियो बनाने का निर्देश देना भी नहीं भूलता। वह फोन पर मीडिया का जुगाड़ करने की बात भी करता है और फिर इंडिया टुडे की एक पत्रकार का टेप वायरल हो जाता है। यह वही पत्रकार हैं, जिनका एक टेप जेएनयू से भी वायरल हुआ था। इतने सारे संयोग एक ही मामले में हो रहे हैं, क्या यह भी कोई संयोग है?
इस रिपोर्ट में जो कुछ भी लिखा गया है, सोशल मीडिया और इंटरनेट पर ये सारी जानकारी पहले से ही उपलब्ध है फिर भी इन बातों को एक रिपोर्ट में पिरोकर आपके सामने लाना इसलिए जरूरी था, ताकि सनद रहे।
हाथरस की जनता को समझना होगा कि जिस जातीय सौहार्द को वहां के लोगों ने आज तक बिगड़ने नहीं दिया, उसे दिल्ली के कुछ राजनीति और मीडिया के गिद्धों के मंडराने की वजह से आगे भी बिगड़ने नहीं देना है। पीड़िता के न्याय की लड़ाई को कमजोर नहीं पड़ने देना है और दोषियों को इसकी सजा भी दिलवानी है। यह सब आसान नहीं होगा।