काफी है कलंकित पहचान भी बदल देना

    दिनांक 06-अक्तूबर-2020
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पंकज कुमार झा की फेसबुक वॉल से 
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भगवान की कसम खा कर कहता हूं भाई!
हम वो बिहारी नहीं हैं जो
लालू बताते रहे हैं आपको।
हम वो बिहारी हैं जैसा दिनकर,
नागार्जुन, विद्यापति ने आपको बताया है।

सच कह रहा हूं भाई!
हम वैसे नहीं ठठाते हैं, जैसा लालू ठठाता था,
हम वैसा मुस्कुराते हैं, जैसे बुद्ध मुस्कुराते थे।

आप तय मानिए भाई
वो लाठी हमारी पहचान कभी नहीं रही
जिसे लालू चमकाते रहे थे,
हमारे पास तो वो लाठी थी
जिसे थाम कर मोहनदास महात्मा बन गए।

अब तो मान लीजिये भाई प्लीज
कि हमारी वीरता ‘भूराबाल’ साफ करने में नहीं थी,
हम तो ‘महावीर’ बनना सीखते रहे थे।

माटी की कसम खा कर कह रहा हूं साहब,
हम कभी ‘बिहारी टाइप’ भाषा नहीं बोलते हैं।
हम मैथिली-भोजपुरी आदि बोलते हैं सर,
‘बिहारी’ भाषा तो बस लालूनुमा लोग बोलते हैं।

तय मानिए सर,
हम चारा नहीं खाते,
गाय-भैंस पालते हैं।

सच कह रहा हूं मालिक,
हम लौंडा नाच नहीं कराते,
सोहर-समदाउन और बटगबनी गाते हैं।

हम घर नहीं जलाते चाचा,
सच कह रहा हूं,
सामा-चकेवा पावनि में हम चुगले को जलाते हैं।

जरा ध्यान दीजिए भाई,
लालू हमारे ‘कंस’ महज इसलिए नहीं हैं
कि वे पशुओं का चारा खा गए।
वे हमारे लिए बख्तियार खिलजी इसलिए हैं,
क्यूंकि वह हमारी पहचान को खा गए,
हमारी पुस्तकें जला डालीं।
हमारी सभ्यता, संस्कृति सबको
एक झटके में लालूनुमा बना डाला,
सब नष्ट कर डाला।

तय मानिए प्रिय भारतवासी,
हम भी उसी देश के वासी हैं
जिस देश में गंगा बहती है।
लालू वाला ‘बथानीटोला’ का बिहार दूसरा था
जहां खून की नदियां बह गयी थीं,
हमारा तो दिनकर वाला सिमरिया है
जहां के गंगा किनारे मेरे विद्यापति गाते थे
बर सुखसार पाओल तुअ तीरे....!

नयन में नीर भर कर हम
अपने उसी बिहार को
उगना की तरह तलाशते हुए
द्रवित हो पुकार रहे हैं
उगना इ मोर कतय गेलाह।

ठीक है अब चारा वापस नहीं आयेगा,
हम जैसे लोग ‘बेचारा’ ही बने रहेंगे
हमारा भविष्य अब लौट कर नहीं आयेगा।

लेकिन प्लीज सर,
प्लीज प्लीज, हमारी पहचान लौटा दीजिये!
‘भौंडे बिहारीपना’ की बना दी गई
मेरी पहचान को सदा के लिए,
हमेशा के लिये
बिरसा मुंडा जेल में ही
बंद कर दीजिये मेरे भाई।
त्राहिमाम्!