मुनव्वर, इंदौरी और “गंगा-जमुनी” तहजीब का ढकोसला

    दिनांक 01-नवंबर-2020   
Total Views |
शेर ओ शायरी और मुशायरों की चाशनी में लपेटकर परोसे जा रहे जिहाद का पर्दाफ़ाश हो रहा है. समझना होगा कि कैसे महफिलों से एक उन्माद भरे एजेंडे को पोसा जाता रहा है

munwaar rana_1   
मुनव्वर राणा एक बार फिर गला रेतने वाले जिहादियों की ढाल बनकर सामने आए हैं. उनका कहना है कि फ़्रांस में निर्दोष लोगों को चाक़ू घोप रहे जिहादी हमलावरों को “ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया” है. राणा को नाटो द्वारा अफगानिस्तान में तालिबान पर की गई बमबारी पर अफ़सोस है. राणा पाकिस्तान-बंग्लादेश में सताए-मारे-काटे जा रहे हिंदुओं को भारत की नागरिकता देने के खिलाफ हैं. जब मरकज़ वाले देश में कोरोना बाँटते घूम रहे थे और प्रतिबंध के बावजूद देश की अनेक मस्जिदों में सामूहिक नमाज का देश का आम नागरिक और मीडिया विरोध कर रहा था तो ये विरोध मुनव्वर राणा को सहन नहीं हुआ. शायर का शेर बाहर निकला –
“जो भी ये सुनता है हैरान हुआ जाता है, अब कोरोना भी मुसलमान हुआ जाता है.”
मुनव्वर को जवाब भी जबरदस्त मिला था –“जब भी मेरा देश मुश्किल में आता है, ये मुनव्वर भी मुसलमान ही हो जाता है.”
बुद्धिजीवी के रूप में महिमामंडित किए गए मुनव्वर राणा को आज तक ज़रा सी बात समझ नहीं आ सकी कि पाकिस्तान –बंग्लादेश में सताए जा रहे हिंदू-सिखों- ईसाईयों को शरण देने का भारत का पुराना वचन है, नागरिकता संशोधन क़ानून 2019 इसी मानवीय और नैतिक जिम्मेदारी को निभाने वाला क़ानून है, जिसका विरोध अनैतिक और अमानवीय है. इस कानून में कुछ भी मुस्लिम विरोधी नहीं है, बल्कि इसका सोचा-समझा विरोध मज़हबी कट्टरता को ही दिखलाता है. राणा साहब इस क़ानून के खिलाफ बोलते रहे. उनकी दोनों बेटियाँ भी मैदान में थीं. लखनऊ में धारा 144 लागू होने के बाद भी नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में हो रहे प्रदर्शन के मामले में पुलिस ने मुनव्वर राणा की दोनों बेटियों समेत 12 अज्ञात महिलाओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया. बेटियों पर एफआईआर होने पर मुनव्वर राना ने कहा, 'मेरे पर मुकदमा दर्ज करो, ऐसी बागी बेटियां पैदा की'
अच्छा ही है, कि मुनव्वर राणा जैसे शायरों का तथाकथित सेकुलरिज्म खुलकर सामने आ रहा है. ये लोग अपनी कट्टरता को शब्दों के जाल में छिपाकर पेश करते आए हैं. ये लोग कठमुल्ला सोच को शायरी और मुशायरों की चाशनी में लपेटकर आम भारतीय के गले उतारते आए हैं. जिहादी गिरोह को उकसाते, उसका नैतिक समर्थन करते रहे हैं.
राहत इन्दौरी का वो शेर खूब उछाला जाता है,कि ... सभी का खून है शामिल यहाँ की मिटटी में, किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है.....“ ग़ज़ल जिसका ये शेर है, इसी जिहादी एजेंडे का उदाहरण है. ये लोग अपने प्रशंसकों, तालियाँ पीटने वालों को बहुत अच्छी तरह से समझते हैं. ये जानते हैं कि इनमे से ज्यादातर को उर्दू की मामूली समझ भी नहीं है. इस्लामी अवधारणा, इतिहास और शब्दावली का भी शायद ही कुछ पता हो. ये तो शेर ओ शायरी में कुछ मिनटों का दर्द और सुकून तलाशते हैं, और जीवन की आपाधापी में व्यस्त हो जाते हैं. इसलिए वो शेर एक कहते हैं लेकिन उसके मतलब दो निकाले जाते हैं. आम ताली पीटने वाले उसका एक मतलब निकालते हैं और जिहादी दूसरा. इन्दौरी की पूरी ग़ज़ल इस तरह थी

अगर खिलाफ हैं, होने दो, जान थोड़ी है

ये सब धुंआ है, कोई आसमान थोड़ी है


लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द्द में

यहाँ पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है


मैं जानता हूं कि दुश्मन भी कम नहीं लेकिन

हमारी तरह हथेली पे जान थोड़ी है


हमारे मुंह से जो निकले वही सदाक़त है

हमारे मुंह में तुम्हारी जुबां थोड़ी है


जो आज साहिब-इ-मसनद है कल नहीं होंगे

किराएदार है जाती मकान थोड़ी है


सभी का खून है शामिल यहाँ की मिटटी में

किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है

अब पंक्तियों पर गौर करें, -
अगर खिलाफ हैं, होने दो, जान थोड़ी है.. (सीएए के समर्थक) खिलाफ होते हैं तो हो जाने दो, हमारे कोई अपने थोड़े ही हैं.
लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द्द में, यहाँ पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है.. यहाँ किस “आग” और कौनसे “मकानों” की बात हो रही है ? क्या आगज़नी की धमकी दी जा रही है? ये “हमारे और तुम्हारे” मकान किसके हैं?
मैं जानता हूँ कि दुश्मन भी कम नहीं लेकिन, हमारी तरह हथेली पे जान थोड़ी है. ये “दुश्मन” कौन है? क्योंकि ग़ज़ल हिंदुओं-सिखों को नागरिकता देने वाले नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में कही गई थी. इस पंक्ति का भी ख़ास मतलब है कि “हमारी तरह हथेली पर जान थोड़े ही है..” कठमुल्ला फौज जब जिहादियों को उकसाती है तो यही वाक्य कहती है कि मुसलमान की असली जिंदगी तो मरने के बाद (जन्नत में) शुरू होती है, इसलिए हम मरने से नहीं डरते. मरने को बेताब रहते हैं. जान हथेली पर रखे घूमते हैं, आदि.
हमारे मुंह से जो निकले वही सदाक़त है, हमारे मुंह में तुम्हारी जुबां थोड़ी है.. सदाक़त का अर्थ है सत्य, ज्ञान. जाकिर नाइक, हाफ़िज़ सईद, लादेन, बगदादी और पाकिस्तान के संविधान की भी यही भाषा है, कि इस्लाम और कुरआन ही एकमात्र सत्य है. वो कहते हैं कि हम जो कहते हैं वही सच है. दूसरों की बातों का कोई महत्व नहीं है.

सभी का खून है शामिल यहां की मिटटी में, किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है.. सभी का खून से क्या मतलब है? खून तो सभी का एक ही स्रोत से है. भारत के मुसलमान भी हिंदू पूर्वजों की ही संतान हैं, लेकिन ये सच जिहाद के उद्देश्य के आड़े आता है, इसलिए इस पर लगातार धूल डालने की कोशिश की जाती है.
यही गंगा-जमुनी तहजीब के नाम पर दशकों से हो रहा शेरो-शायरी छाप ढकोसला है. गंगा और जमुना अलग-अलग हैं क्या? गंगा के किनारे काशी है तो यमुना भी तो कृष्ण की अठखेलियों की साक्षी है. सूरदास, रसखान और मुगलानी ताज ने यमुना के किनारे वंशी बजाते कृष्ण की ही तो आराधना की है. लेकिन सेकुलर शायरों और लिबरल बुद्धिजीवियों को रसखान और मुगलानी ताज कभी याद नहीं आते. उन्हें याद आते हैं इस्लामी उन्माद से भरे, पाकिस्तान के मानस पिता अल्लामा इकबाल. जो शुरुआत में “सारे जहाँ से अच्छा..” लिखने के बाद यू टर्न लेते हैं और अल्लाह से “शिकवा” करने लगते हैं कि दुनिया में इस्लामी हुकूमत सिमटती जा रही है. इकबाल के लिए ये सेकुलर दीवानगी आज़ादी जितनी पुरानी है. विश्विद्यालयों और राजभवनों तक में इस तबियत के मुशायरे होते रहे हैं. पाठ्यक्रमों में सच को तोड़ा-मरोड़ा और छिपाया गया है. बेखबर श्रोताओं ने तालियाँ पीटी हैं, नोट लुटाए हैं. इसलिए खुसरो, रहीम और दारा शिकोह को भुलाकर भारत भूमि को खून से नहलाने वाले और वैश्विक इस्लामी खिलाफत का ख्वाब देखने वाले इकबाल को सेकुलरिज्म का मसीहा बतलाने वाली महफिलों से राणा और इंदौरी जैसे शायर बाहर निकलते रहे, तो अचरज ही क्या. पर नकाब उतर रहे हैं, ये अच्छी बात है.