बाबासाहेब ने कहा था कि हाल ही की शताब्दियों में भारत में जन्मे सबसे महान आदमी स्वामी विवेकानंद हैं

    दिनांक 12-नवंबर-2020
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निखिल यादव
 स्वामी विवेकानंद की जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रतिमा के होने का मतलब है हर छात्र में भारत के प्रति , भारतीय संस्कृति के प्रति स्नेह,सम्मान,प्रेम,लगाव का प्रतिबिंबित होना

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19वीं शताब्दी के कर्मयोगी स्वामी विवेकानंद की स्वीकार्यता भारत के हर भाग में मिलती है और युवाओं के लिए तो वह प्रेरणा के तौर पर काम करते हैं। भारत के हर विश्वविद्यालय और महाविद्यालय में स्वामी विवेकानंद के विचारों का प्रचार- प्रसार , उनके साहित्य पर स्वाध्याय होना और उनकी प्रतिमा होना स्वाभाविक बात है। इसी श्रृंखला में देश की राजधानी दिल्ली में स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी 12 नवंबर 2020 को भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा का अनावरण करने जा रहे हैं।
जेएनयू में स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा के कई मायने लगाए जा रहे हैं लेकिन अगर हम राजनैतिक दृष्टि वाले चश्मे को निकल पर देखें तो हमें प्रतिमा के अनावरण में हर्ष और उत्साह ही दिखेगा। संयोग से स्वामी जी की प्रतिमा पंडित जवाहरलाल नेहरू की प्रतिमा से लगभग 100 मीटर दूरी पर सामने ही बनाई गई है। पंडित नेहरू जिनके नाम से यह विश्वविद्यालय बना है वह स्वयं स्वामी विवेकानंद जी के बड़े प्रसंशक थे और उनके व्यक्तित्व से प्रभावित थे । पंडित नेहरू द्वारा लिखी गई पुस्तकें '' डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया ''और ''ग्लिम्प्सेस ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री ''में व​ह अनेकों बार स्वामीजी का सन्दर्भ देते हैं। '' डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया ''में पंडित नेहरू लिखते है ''अतीत में निहित और भारत की विरासत में गर्व से भरा हुआ, विवेकानंद जीवन की समस्याओं के प्रति अपने दृष्टिकोण में अभी तक आधुनिक थे और भारत के अतीत और उनके वर्तमान के बीच एक तरह का पुल थे। वह बंगाली और अंग्रेजी में एक शक्तिशाली वक्ता और बंगाली गद्य और कविता के एक सुंदर लेखक थे। वह एक बेहतरीन शख्सियत थे, कशमकश और गरिमा से भरे, अपने और अपने मिशन के प्रति निश्चिंत और एक ही समय में एक गतिशील और ज्वलंत ऊर्जा से भरपूर और भारत को आगे बढ़ाने के जुनून के साथ थे। वह उदास और हिंदू मन को हतोत्साहित करने के लिए एक टॉनिक के रूप में आए और उन्होंने आत्मनिर्भरता को अतीत से जोड़ा।'' ‘’ स्वामी विवेकानंद ने बहुत सी बातें कहीं, लेकिन उनके भाषण और लेखन में एक निरंतरता थी जो थी 'अभय '- निडर रहो, मजबूत बनो। उनके लिए मनुष्य कोई दुखी , पापी नहीं था, बल्कि देवत्व का एक हिस्सा था; उसे किसी भी चीज से क्यों डरना चाहिए ? 'अगर दुनिया में कोई पाप है तो वह कमजोरी है; सभी कमजोरी से बचें, कमजोरी पाप है, कमजोरी मृत्यु है। 'यही महान सबक उपनिषद में भी है।
अपनी अन्य पुस्तक ‘’ग्लिम्प्सेस ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री ''में नेहरू लिखते हैं, रामकृष्ण के एक प्रसिद्ध शिष्य स्वामी विवेकानंद थे, जिन्होंने बहुत ही स्पष्ट रूप से राष्ट्रीय विचारों का प्रचार किया। यह किसी भी तरह से मुस्लिम विरोधी या किसी और के विरोधी नहीं थे, और न ही यह संकीर्ण राष्ट्रवाद था। अपनी पुस्तक में पंडित नेहरू स्वामीजी के भारत में दिए हुए व्याख्यानों पर आधारित पुस्तक'' कोलंबो से अल्मोड़ा ''का सन्दर्भ भी देते हैं।
पिछले साल इस प्रतिमा को कुछ असामाजिक तत्वों ने नुकसान पहुंचाया था स्वाभाविक है वह छात्र और युवा तो हो ही नहीं सकते क्योकि कोई छात्र , कोई युवा उन स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा को क्यों नुकसान पहुंचाएगा जिन्होंने अपना पूरा जीवन मनुष्य निर्माण के कार्य में -भारत के पुनरुथान के कार्य में लगा दिया हो। जो उत्कृष्ट चरित्र, निर्भीकता , निडरता ,साहस के पर्यायवाची हैं। जिन्होंने भारत को पैर- पैर चलकर जाना , कभी घोड़ा गाड़ी में सफर किया तो कभी कोई ट्रेन की टिकट करवा देता तो उसमें। दिनों - दिनों तक भूखे रहे , कभी पेड़ के नीचे सोए तो कभी बक्से में। भूख ,प्यास , सर्दी , गर्मी का सामना तो किया ही साथ ही साथ जब विदेशों में भारत का प्रतिनिधित्व करने गए तो रंग भेद का सामना भी करना पड़ा था। लेकिन भारत माता के लिए स्वामीजी ने यह सब कुछ हंसते - हंसते सह लिया और 11 सितम्बर 1893 को अमेरिका के शहर शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सभा में भारत को विश्व विजयी बना दिया था। यह उन्हीं स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाया गया था जिनके बारे में बाबा साहेब आंबेडकर ने कहा था कि ''हाल ही की शताब्दियों में भारत में जन्मे सबसे महान आदमी, गांधी नहीं, बल्कि स्वामी विवेकानंद हैं। बाबा साहेब का स्वामी विवेकानंद को सबसे महान बताना उनके स्वामीजी के प्रति सकारात्मक भाव को बताता है। यह वही स्वामी विवेकानंद हैं जिनके बारे में महात्मा गांधी ने कहा था कि “उनके हृदय में दिवंगत स्वामी विवेकानंद के लिए बहुत सम्मान है। उन्होंने उनकी कई पुस्तकें पढ़ी हैं। स्वामी जी को पढ़कर उनका भारत के प्रति और प्रेम बढ़ गया। यह वही स्वामी विवेकानंद हैं जिनसे बाल गंगाधर तिलक , नेताजी सुभाषचंद्र बोस , बिपिन चंद्र पल, योगी अरविन्द और पता नहीं कितने स्वतंत्रता सेनानी प्रभावित थे।
यह वही हैं जिनके प्रशंसक विनोबा भावे , चक्रवर्ती राजगोपालाचारी , सर्वेपल्ली राधाकृष्णन रहे हैं। यह वही स्वामी विवेकानंद हैं जिनसे प्रेरणा पाकर जमशेदजी टाटा ने इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस की स्थापना की। यह वही स्वामी विवेकानंद हैं जिनके कन्याकुमारी में बने स्मारक के निर्माण के लिए समाजवादी नेता श्री राम मनोहर लोहिया , साम्यवादी नेता श्रीमती रेणु चक्रवर्ती द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक या डीएमके) के संस्थापक और तमिलनाडु के प्रथम मुख्यमंत्री अन्नादुराई ने सहयोग भी दिया और स्वामीजी की प्रशंसा भी की। इस स्मारक के निर्माण के लिए मात्र 3 दिन में उस समय दिल्ली में उपस्थित सभी 323 सांसदों ने एक मत के साथ हस्ताक्षर करके समर्थन किया था।
यह वही स्वामी विवेकानंद हैं जिनसे महान वैज्ञानिक निकोला टेस्ला प्रभावित थे , जिनसे मिलने के लिए उस समय के दुनिया के सबसे अमीर आदमी रॉकफेलर मिलना चाहते थे। पता नहीं कितने लेख स्वामी विवेकानंद के मात्र प्रभाव पर ही लिखे जा सकते हैं। और जब ऐसे महान त्यागी , कर्म योगी संन्यासी की प्रतिमा को कोई नुकसान पहुंचाते हैं तो स्वाभाविक है हर भारतीय का खून खौलेगा। लेकिन, फिर स्वामीजी का जीवन याद आ जाता है जिन्होंने अपने पूरे जीवन भर हज़ारों परेशानियों का सामना किया लेकिन लाख परेशानियों का सामना करने के बाद भी स्वामी जी ने किसी को घृणा का शब्द तो दूर की बात कभी किसी की शिकायत तक नहीं की। उन्होंने तो पूरा जीवन मनुष्य निर्माण के कार्य में लगा दिया निस्वार्थ भाव से।
स्वामी विवेकानंद की जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रतिमा के होने का मतलब है हर छात्र में भारत के प्रति , भारतीय संस्कृति के प्रति स्नेह,सम्मान,प्रेम ,लगाव का प्रतिबिंबित होना। हर युवा के अन्दर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होना , अपने ऊपर विश्वास होना, हर विचार को सम्मान देना , निस्वार्थ भाव से कार्य करना और सबसे ऊपर भारत माता जिसने हमें सब कुछ दिया है उसको पुनः विश्व गुरु बनाए के कार्य में लगना क्योकि इस कार्य में शिक्षकों और युवाओं की और छात्रों की सबसे बड़ी भूमिका रहेगी।
( लेखक विवेकानंद केंद्र के उत्तर प्रान्त के युवा प्रमुख हैं  )