पटाखों पर प्रतिबंध हिंदू विरोध का विद्वेषी धुआं

    दिनांक 13-नवंबर-2020
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आशीष नरेड़ी
जब भी दीपावली आने वाली होती है, कुछ लोग और संगठन चिल्लाने लगते हैं, ‘‘पटाखे छोड़ने से प्रदूषण बढ़ता है।’’ सच तो यह है कि आज तक किसी भी अध्ययन में यह नहीं कहा गया है कि पटाखों से प्रदूषण फैलता है। इसके बावजूद पटाखों पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है। कहीं इसकी आड़ में कुछ और ‘खेल’ तो नहीं हो रहा

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गत कुछ वर्षों से प्रदूषण की आड़ में दीपावली पर पटाखों पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। हैरानी की बात है कि कठघरे में खड़े पटाखों की वायु प्रदूषण में प्रतिशत भागीदारी के आंकड़े खंगाले जाते हैं तो कुछ नहीं मिलता। प्रदूषण जैसे व्यापक मुद्दे को छोटे से परिप्रेक्ष्य तक सीमित करके कैसे भारतीय रीति-रिवाजों के प्रतीक स्वरूपों को धूमिल किया जा सकता है, इसका विडंबनापूर्ण उदाहरण दीपावली पर उत्सव भाव से छोड़े जाने वाले पटाखों पर लगा प्रतिबंध है। आश्चर्य की बात है कि जिस वैज्ञानिकता की दुहाई देकर आस्था से जुड़ी परंपराओं को पिछड़ापन करार देने का कुचक्र रचा जाता है और जब दीपावली पर पटाखे छोड़ने को प्रदूषणकारक साबित करने की बात आती है तो उन्हीं वैज्ञानिक कसौटियों को हाशिए पर डाल दिया जाता है।
दीपावली पर फोड़े जाने वाले पटाखों की भागीदारी की बात उस वैज्ञानिक रपट के प्रदूषण ग्राफ में भी नहीं दर्ज हुई, जिसमें शून्य दशमलव शून्य (0.0) तक के आंकड़े जुटाए गए। फिर भी चंद लोगों ने न जाने कैसे अदालत से पटाखों पर रोक लगाने का फैसले जारी करवा दिया, जो तथ्यों की कसौटी पर नगण्य आंकड़ा दर्शा रहे थे।
आज बाजारों में दीपावली की खूब चहल-पहल है, लेकिन गली-मुहल्लों में पटाखों का धूम-धड़ाका नहीं, जो 10-15 दिन पहले से दीपावली के उत्सव की रौनक बिखेरने लगते थे। कुछ फीका-सा लगता है। दीयों की जगमगाहट और आतिशबाजी की झिलमिल रोशनी से तरंगित और उधम मचाती आवाज से ही तो सजा करती थी दीपावली। पर आज इस उत्सव की परंपरा पर पर्यावरण से जुड़े सरोकारों की थोथी दलीलों का ग्रहण लग चुका है। अगर पटाखों से प्रदूषण होता तो क्या अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस जैसे देशों ने अपने यहां इस पर प्रतिबंध न लगाया होता? भारतीय त्योहार ऊर्जा से भरपूर उत्सव की पंरपरा का प्रतीक हैं। पर पिछले कुछ बरसों से त्योहारों से जुड़ी समृद्ध परंपरा को खत्म करने के प्रयास के संकेतक इधर-उधर उभरने लगे हैं, जो भारतीयता की पहचान को मिटाने की कवायद में हैं। 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के पटाखों पर लगाए गए प्रतिबंध के बाद हर साल दीपावली पर पसरा मौन इस दर्द को ताजा कर देता है।
अदालतें जो फैसला करती हैं, उनके ठोस आधार होते हैं जो आज के वैज्ञानिक युग में विज्ञानसम्मत तरीके से इकट्ठा किए जाते हैं और जिनकी तर्कसंगत समीक्षा की जाती है। लिहाजा यहां हम आस्था और धर्म की कसौटी से अलग उन आधारों की बात करेंगे, जिन्होंने पटाखों पर प्रतिबंध की भूमिका रची और इस क्रम में मुद्दे से जुड़े हर पहलू और आयाम पर चर्चा होगी।
पटाखों पर प्रतिबंध की यात्रा 5 अक्तूबर, 2015 से शुरू होती है जब दिल्ली में वायु प्रदूषण को लेकर एक याचिका (अर्जुन गोपाल बनाम भारत सरकार) दायर की गई। उसके बाद से सर्वोच्च न्यायालय में विभिन्न चरणों से गुजरते हुए इस प्रकरण का पटाक्षेप 2018 में दीवाली के दौरान पटाखों को प्रतिबंधित करने के साथ होता है। ऐसे में पूरे विषय को कुछ विशिष्ट परिप्रेक्ष्यों में देखने की जरूरत है। उदाहरण के लिए दिल्ली में प्रदूषण के कारक कौन-कौन से हैं, क्या उनमें दीपावली पर पटाखे छोड़ना भी एक कारण है? प्रदूषण को लेकर वैज्ञानिक अध्ययन क्या कहते हैं? प्रदूषण की निगरानी करने वाले केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े क्या कहते हैं? अदालत ने किस आधार पर पटाखों को प्रतिबंधित किया? चलिए इससे जुड़े हर आयाम पर एक-एक करके चर्चा करते हैं।
पटाखों से प्रदूषण ?
विज्ञान का किसी नतीजे पर पहुंचने का अपना एक तरीका होता है। इसका आधार बनते हैं अध्ययन-प्रयोग से निकले आंकड़े, लेकिन पटाखों से प्रदूषण की बात तो कहीं नहीं आई। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि दीपावली से ज्यादा प्रदूषण स्तर तो अन्य दिनों में रहता है।
पटाखों से पैदा प्रदूषण पर होने वाली गर्मागर्म बहस को आज नए सिरे से खंगालने की कोशिश करते हैं। सबसे पहले उन आंकड़ों पर गौर करें जो सर्वोच्च न्यायालय के सामने रखे गए। फैसला सुनाते वक्त सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निकायों की ओर से प्रस्तुत रपट पर विचार किया। जैसे दिल्ली में प्रदूषण के कारणों के बारे में 10 नवम्बर, 2016 को सुनाया गया राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) का निर्णय। दिल्ली में वायु प्रदूषण और ग्रीन हाउस गैसों के बारे में 2016 में दिल्ली सरकार को सौंपी गई आईआईटी कानपुर की रपट, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) का हलफनामा, सर्वोच्च न्यायालय की ओर से सीपीसीबी अध्यक्ष की अगुआई में गठित समिति की रपट, डॉ. अरविंद कुमार और पशुओं के अधिकार से जुड़ी गौरी मौलेखी के हलफनामे, मीडिया रपट और खुद न्यायाधीशों के अनुभव।
12 सितम्बर, 2017 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनाए फैसले के अनुच्छेद 10 में दिल्ली में प्रदूषण के कारणों का उल्लेख किया गया है। एनजीटी के हवाले से दिए गए कारणों में निर्माण गतिविधियां, कचरा जलाना, फसल अवशेषों को जलाना, गाड़ियों से निकलने वाला धुआं, सड़कों की धूल, बिजलीघरों से निकलने वाली ‘फ्लाई ऐश’ समेत औद्योगिक प्रदूषण और हॉट मिक्स संयंत्रों/स्टोन क्रशर से होने वाला प्रदूषण शामिल है। गौरतलब है कि इसमें पटाखों से होने वाले प्रदूषण का उल्लेख तक नहीं किया गया है।
वास्तविक स्थिति
दिल्ली के प्रदूषण पर आईआईटी, कानपुर द्वारा दिल्ली सरकार को सौंपी गई रपट से वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो जाती है। इसमें विभिन्न स्रोतों से हो रहे प्रदूषण का पूरा ब्योरा देते हुए दशमलव शून्य प्रतिशत तक के सूक्ष्म आंकड़ों (0.0%) को भी शामिल किया गया है। आईआईटी की रपट में कहीं इस बात का उल्लेख नहीं है कि पटाखों से प्रदूषण होता है। कम से कम दशमलव के एक अंक बाद तक तो नहीं ही, जिसके बाद की गणना को नगण्य मानकर छोड़ दिया जाता है। आईआईटी ने इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए दिल्ली में सर्दी और गर्मी, दोनों मौसमों के आंकड़े इकट्ठे किए और जिस तरह से दशमलव के एक अंक बाद तक के आंकड़े जुटाए गए, लिहाजा माना जा सकता है कि यह विशुद्ध वैज्ञानिक मानदंडों के आधार पर तैयार की गई एक विश्वसनीय रपट थी।
सीपीसीबी ने दीपावली के दौरान दिल्ली की हवा की गुणवत्ता से संबंधित दाखिल किए हलफनामे में मुख्यत: तीन बातों पर जोर दिया। पहली, सल्फर और नाईट्रोजन के आक्साइड (रड2 और ठड2) सीमा के अंदर रहे। दूसरी, पीएम-10 और पीएम-2.5 के स्तर में दीपावली के दौरान वृद्धि हुई और तीसरी कि दो-तीन दिन के भीतर ही इन दोनों का स्तर फिर पहले जैसा हो गया। इसका सीधा मतलब है कि न तो एनजीटी के पास इस बात का कोई आधार है कि पटाखों के कारण प्रदूषण होता है, न आईआईटी कानपुर को दिल्ली के प्रदूषण में इसकी कोई भूमिका मिली। दिल्ली के कुल प्रदूषण में नगण्य भागीदारी रखने वाले पटाखों के कारण अगर दीपावली के दौरान प्रदूषण हुआ भी तो वह केवल दो दिन का मामला था जिसका पर्यावरण पर कोई दीर्घकालिक प्रभाव नहीं था।
गहन अध्ययन जरूरी
सर्वोच्च न्यायालय ने प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का अध्ययन करने के लिए एक समिति नियुक्त की थी। इसके निष्कर्ष को अदालत ने 2018 में सुनाए फैसले के अनुच्छेद 21 में रखा है। इसमें कहा गया है, ‘‘दीपावली के दौरान वायु की गुणवत्ता में गिरावट आई और पटाखे फोड़ने के कारण आंखों में जलन, खांसी की शिकायत के साथ अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों की संख्या बढ़ी, साथ ही ध्वनि प्रदूषण का स्तर भी बढ़ा। लेकिन आंकड़ों में इसके संकेतक नगण्य रहे। पटाखे स्वास्थ्य पर कैसा दुष्प्रभाव डाल रहे हैं, इसके लिए लंबे और गहन अध्ययन की जरूरत होगी।’’
डॉ. अरविंद ने अदालत को दिए हलफनामे में कहा है कि क्लीनिक में आने वाले मरीजों की संख्या बढ़ी और वैसे ही गौरी मौलेखी ने पशुओं में बेचैनी बढ़ने की बात की। लेकिन ये उनके अपने अनुभव हैं और यह किसी वैज्ञानिक अध्ययन का निष्कर्ष नहीं हैं जिसे आंकड़ों की कसौटी पर कसा जा सके। उदाहरण के तौर पर एनजीटी, आईआईटी और सीपीसीबी के निष्कर्ष अध्ययन से हासिल आंकड़ों पर आधारित हैं और कोई भी नीतिगत फैसला इसी बुनियाद पर लिया जाता है।
हैरान करते हैं सीपीसीबी के आंकड़े
कुछ ऐसे भी तथ्य हैं जो अदालती कार्रवाई में शामिल नहीं हुए, लेकिन हैं बेहद अहम और इस मामले को एक नया आयाम देते हैं। सीपीसीबी ने अदालत को बताया कि दीपावली के दौरान दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बढ़ा। यह सच था, लेकिन सीपीसीबी के ही वर्ष 2015 से 2020 के आंकड़े बताते हैं कि दीपावली की अपेक्षा साल के अन्य दिनों में प्रदूषण का स्तर कहीं अधिक था। कई मामले ऐसे भी मिले जिनमें दीपावली की तुलना में प्रदूषण का स्तर दुगुने से भी अधिक रहा।
यहां यह सवाल जरूर उठता है कि साल के केवल 2-3 दिन की बात करके किसी विषय से न्याय कैसे किया जा सकता है? यह तो सामान्य समझ की बात है कि अगर हमें प्रदूषण की समस्या से ईमानदारी और संजीदगी के साथ निपटना है तो साल के 362 दिन की बात करनी होगी, न कि केवल 2-3 दिन की बात करके अपने कर्तव्य को पूरा मान लेंगे। इस तरह क्या हम कभी भी समस्या के वास्तविक समाधान की स्थिति में आ सकेंगे?
पीएम 2.5 की बात करें तो पिछले पांच साल के दौरान 1,255 दिन ऐसे रहे हैं जब प्रदूषण का स्तर स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकारक और घातक के बीच दर्ज हुआ, लेकिन हम दीपावली के दौरान के मात्र 10 दिन की चिंता में हो-हल्ला मचाते रहे। पीएम 10 के मामले में भी इन पांच वर्ष के दौरान 854 दिन हानिकारक और घातक के बीच दर्ज हुए, लेकिन हमारी नींद मात्र 10 दिन के मसले पर उड़ी रही।
अदालत में हो गया ‘खेल’
सर्वोच्च न्यायालय ने जब पहली बार पटाखों पर रोक लगाई, तब वह एक तात्कालिक कदम था और बाद में जब उसने मामले से जुड़े तथ्यों पर विचार किया तो प्रतिबंध हटा लिया, क्योंकि पटाखों से प्रदूषण का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं था। लेकिन तब याचिकाकर्ताओं ने पीठ ही बदलवा ली।
अदालतों के सामने अमूमन दो तरह की स्थितियां आती हैं- एक, मामले के हर कोण पर विचार करते हुए अंतत: न्याय करना और जब तक न्याय की यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, वैसे तात्कालिक उपाय करना जिससे यथास्थिति में कोई बदलाव न हो जाए। इसी संदर्भ में पटाखों पर सर्वोच्च न्यायालय के दिए फैसलों को भी देखा जा सकता है। साथ ही, यह देखना भी दिलचस्प है कि कद्दावर याचिकाकर्ता जब अदालत से अपने पक्ष में फैसला पाने में असफल रहते हैं तो किस-किस तरह के हथकंडे अपनाते हैं।
पटाखों पर रोक लगाने का फैसला सर्वोच्च न्यायालय ने 11 नवम्बर, 2016 को दिया था और यह तात्कालिक कदम था, क्योंकि अदालत को बताया गया था कि बढ़ते प्रदूषण ने दिल्ली का जीना मुश्किल कर दिया है। तब अदालत ने दिल्ली समेत पूरे एनसीआर में पटाखे बेचने वाली दुकानों के लाइसेंस रद्द करते हुए इनकी बिक्री को अवैध कर दिया। उसके बाद अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को पूरे विस्तार से सुना और लगभग 10 महीने बाद 12 सितंबर, 2017 को सुनाए फैसले में अदालत ने साफ कहा कि उसके सामने जो साक्ष्य रखे गए, उससे कहीं साबित नहीं होता कि दिल्ली में प्रदूषण का कारण पटाखे हैं और ऐसे में उनकी बिक्री पर पूरी तरह रोक लगाने का औचित्य नहीं और यह रोक हटा ली गई। अदालत ने स्पष्ट कहा, ‘‘...भरोसे के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि नवंबर और दिसंबर, 2016 के दौरान दिल्ली में हवा के अत्यधिक खराब होने की वजह दीपावली के आसपास फोड़े गए पटाखे ही हैं, निश्चित रूप से इसके अन्य कारण थे।’’
जब अदालत में किसी पक्ष के खिलाफ कोई फैसला आता है तो उसके सामने दो रास्ते होते हैं- एक, फैसले को स्वीकार कर ले या फिर उसके खिलाफ अपील करे। लेकिन इस मामले में जो रास्ता अपनाया गया वह दर्शाता है कि कुछ कद्दावर लोग हर हाल में अपनी मर्जी का फैसला लेने की कवायद में स्थापित संस्थागत प्रक्रिया का दुरुपयोग करने से भी गुरेज नहीं करते। उपरोक्त मामले में याचिकाकर्ताओं ने खंडपीठ को ही बदलने की अपील कर दी। उसके बाद खंडपीठ तो बदल गई लेकिन अक्तूबर, 2017 में शीर्ष अदालत ने जब इस संबंध में निर्णय सुनाया तो याचिकाकर्ताओं की मंशा पर भी सवाल उठाए। अदालत ने अपने फैसले में कहा, ‘‘याचिकाकर्ताओं ने कोई भी नया तथ्य प्रस्तुत नहीं किया और उनका मुख्य उद्देश्य इस मामले को एक खास खंडपीठ के हाथ से लेकर किसी और को देना है। यह अच्छा आचरण नहीं। हम आधिकारिक रूप से इसकी कड़ी आलोचना करते हैं।’’
बहरहाल, नई पीठ मामले की सुनवाई करती है और इस नतीजे पर पहुंचती है कि 2016 में दिल्ली के प्रदूषण का ‘प्रत्यक्ष और तात्कालिक कारण’ पटाखे ही थे और इसके ‘प्रत्यक्ष साक्ष्य’ मौजूद हैं। इसके साथ ही अदालत ने अपने फैसले में यह भी टिप्पणी की, ‘‘ऐसा लगता है कि समाज इस मुद्दे पर सर्वसम्मत है कि दीपावली के दौरान पटाखे नहीं फोड़ने चाहिए।’’ नई पीठ ने सितंबर, 2017 के फैसले के एक महीने के अंदर और दीपावली से महज एक सप्ताह पहले पटाखे बेचने की इजाजत देने वाले फैसले को पलट दिया। लेकिन जिस तरह यह हुआ, वह और भी दिलचस्प है। नई पीठ ने कहा कि वह सितंबर में दिए गए फैसले की समीक्षा करने नहीं बैठी है और न ही उसे पलट रही है, बल्कि सिर्फ फैसले पर अमल की तारीख में बदलाव कर रही है। नई पीठ ने पिछली पीठ के फैसले के लागू होने की नई तारीख 1 नवंबर, 2017 तय की यानी दीपावली के 12 दिन बाद से। उस साल दीपावली 19 अक्तूबर को थी। इस तरह याचिकाकर्ता की इच्छा तात्कालिक रूप से पूरी हो गई। वैसे खंडपीठ ने यह भी कहा कि दीपावली के दौरान पटाखों पर रोक लगाकर देखना चाहिए कि इसका नतीजा क्या रहता है।
सिद्धांत बनाम पटाखों पर रोक
ऐहतियात के आधार पर फैसले लेने की इजाजत हमारा कानून भी देता है और कार्यपालिका से लेकर न्यायपालिका तक इसका इस्तेमाल करते हैं। पटाखों पर प्रतिबंध के मामले में भी इसी की मदद ली गई, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि इस संदर्भ में अदालत को गुमराह किया गया। जिन दलीलों के जरिए अदालत को भरोसा दिलाया गया कि पटाखों पर रोक लगाने का उद्देश्य लोगों के जीवन की सुरक्षा से जुड़ा है, उस ‘ऐहतियात के सिद्धांत’ पर विचार करना जरूरी है। मोटे तौर पर इस विचार का मूल यही है कि ‘इलाज से बेहतर है रोकथाम’ है जिसके जरिए किसी स्थायी या दीर्घकालिक दुष्प्रभाव का निवारण किया जा सकता है।
जब किसी गतिविधि से पर्यावरण को अपूरणीय और स्थायी क्षति होने की आशंका हो तो इसी ‘ऐहतियात के सिद्धांत’ का सहारा लिया जाता है। उन मामलों में भी इस सिद्धांत को आधार बनाया जाता है जहां संभावित हानि के बारे में कोई वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं होता। फैसला सुनाने की दिशा में यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि दलील किस तरह प्रस्तुत की गई और किस हद तक अदालत का भरोसा जीता गया।
इस बात पर गौर करना होगा कि पटाखों पर रोक के मामले में ‘ऐहतियात के सिद्धांत’ का प्रयोग कितना उचित था, क्योंकि याचिकाकर्ता से लेकर अदालत तक ने माना कि ठोस वैज्ञानिक आधारों के अनुसार पटाखे प्रदूषण और मनुष्य के स्वास्थ्य, दोनों के लिए घातक हैं। अदालत ने 2018 के अपने फैसले के अनुच्छेद 31 में कहा भी, ‘‘ये नतीजे दूसरे पक्ष की इस दलील को खारिज करने के लिए पर्याप्त हैं कि दीपावली के दौरान पटाखों को छोड़ने से होने वाले दुष्प्रभावों के बारे में कोई वैज्ञानिक अध्ययन नहीं है।’’ जाहिर है कि अगर दीपावली के दौरान फूटने वाले पटाखों के दुष्प्रभावों से संबंधित ठोस वैज्ञानिक आधार मौजूद थे तो याचिकाकर्ता और अदालत ने ‘ऐहतियात के सिद्धांत’ का प्रयोग क्यों किया? इसकी जरूरत ही क्या थी? अगर याचिकाकर्ताओं को अपने कथित साक्ष्यों पर इतना ही भरोसा था तो उन्हें ‘ऐहतियात के सिद्धांत’ के पीछे छिपने की जरूरत क्यों पड़ी?
ऐसा महसूस होता है कि शायद याचिकाकर्ताओं की मजबूरी यह रही होगी कि उनके पास अपनी दलील को मजबूती देने के लिए विषय के संबंध में एजेंसियों के आंकड़े, या कोई वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध नहीं होगा। अदालत ने अपना फैसला सुनाते समय माना भी ‘‘याचिकाकर्ताओं की यह दलील सही है कि ‘ऐहतियात के सिद्धांत’ के तहत विषय से संबंधित किसी अध्ययन या तथ्यों को प्रस्तुत करने की जरूरत नहीं। ‘ऐहतियात’ शब्द का मतलब ही ऐसे कदम से है जिसे तथ्यों की कसौटी पर परखे बगैर भी लिया जा सकता है।’’
यह देखना दिलचस्प है कि पटाखों पर रोक लगाने की याचिका में ‘ऐहतियात के सिद्धांत’ को आधार बनाना वस्तुत: कितना तर्कसंगत है। ऐसे सिद्धांत उन स्थितियों में प्रयोग किए जाते हैं जब वैज्ञानिक आधार मौजूद न हों। लेकिन दिल्ली में प्रदूषण के मामले में तो हमारे पास ठोस वैज्ञानिक आधार और आंकड़े उपलब्ध हैं जिन्हें एनजीटी हो या सर्वोच्च न्यायालय, हर जगह तथ्यात्मक ब्योरे के रूप में प्रस्तुत किया जाता है-
दिल्ली/एनसीआर में कुल वायु प्रदूषण में वाहनों से होने वाले प्रदूषण की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत है।
दिल्ली और इसके आसपास के 13 बिजलीघरों से वातावरण में घोला जा रहा सल्फेट और नाइट्रोजन उत्सर्जन क्रमश: 80 प्रतिशत और 50 प्रतिशत है।
पीएम 2.5 प्रदूषण के लिए परिवहन क्षेत्र 41 प्रतिशत, धूल 21.5 प्रतिशत और उद्योग 18.6 प्रतिशत जिम्मेदार हैं।
फिर क्या जरूरी नहीं था कि दिल्ली या देशभर में वायु प्रदूषण में पटाखों के कारण होने वाले प्रदूषण की प्रतिशत हिस्सेदारी का आकलन भी किया जाता? अगर इस मूल सवाल को विमर्श का हिस्सा बनाया जाता तो दीपावली का उत्सव दीयों की जगमगाती रोशनी के साथ आसमान में चटकती आतिशबाजी की रौनक से और सज उठता। साथ ही प्रदूषण के वास्तविक कारणों पर केंद्रित चर्चा शायद अब तक हमें ठोस और उपयुक्त समाधान भी थमा चुकी होती।
याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलीलों से अदालत को गुमराह किया, ‘‘बेशक पटाखे प्रदूषण के अकेले कारण नहीं, फिर भी अगर वे नाममात्र प्रदूषण भी पैदा करते हैं तो पटाखों पर रोक लगाने से पर्यावरण स्वच्छ ही होगा और इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि चाहे यह कितना भी छोटा कारक क्यों न हो। आखिरकार हर बूंद अहम है!’’
इस संदर्भ में नहीं भूलना चाहिए कि संबंधित साक्ष्य प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी यथास्थिति बदलने का प्रस्ताव रखने वाले पक्ष की होती है और ऐसा सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों में स्थापित भी किया गया है। अब पटाखों के संदर्भ में चर्चा करें तो यथास्थिति क्या थी? यही कि भारत में, विशेषकर दीपावली के अवसर पर उत्सव मनाने के क्रम में पटाखे फोड़ने की परंपरा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि जिसने यथास्थिति को बदलने की इच्छा जताई, क्या उसने अपने पक्ष के संबंध में साक्ष्य प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी उठाई? अगर नहीं, तो क्यों?
विदेश में पटाखों से संबंधित नियम
अगर पटाखे पर्यावरण के लिए खतरनाक हैं तो क्या अमेरिका जैसे देशों ने इस पर रोक नहीं लगाई होती? दुनिया में पर्यावरण संरक्षण के सख्त उपायों के लिए मशहूर देशों में भी पटाखों पर प्रतिबंध नहीं है। फिर आखिर हमारी जमीन पर पटाखों से ऐसा दुराव क्यों और किसे खटक रहा है आतिशबाजियों से चमकते त्योहार का नूर?
विकास का हमारा ‘मॉडल’ प्रकृति के साथ समन्वय बनाकर आगे बढ़ता है, जिसमें हम अपनी सुविधा की शर्त प्रकृति पर नहीं थोपते, बल्कि स्वयं को उसके अनुसार ढालते हैं। यही हमारा संस्कार रहा है, लेकिन धीर-धीरे विकास के पश्चिमी ‘मॉडल’ ने पांव पसारना शुरू किया और हम अपने रिवाजों के लिए भी पश्चिम का अनुकरण करने लगे। तो पटाखों को भी क्यों न इसी आधुनिक चलन की कसौटी पर मापें?
भारत में दीपावली के पटाखों पर सालों से जोरदार हंगामा चल रहा है और हर साल दीयों के त्योहार के सारगर्भित रिवाज की महिमा पटाखों और प्रदूषण की शोर मचाती बहसों से फीकी पड़ जाती है। अगर आतिशबाजी इतनी ही बुरी है तो अत्याधुनिक देशों में भी इसे प्रतिबंधित कर दिया जाता? लेकिन नहीं, वहां तो आलम कुछ और है। उदाहरण के लिए इंग्लैंड में दीपावली समेत अन्य उत्सवों पर पटाखे छोड़ने के लिए विशेष छूट दी गई है, जबकि दीपावली उस देश का पारंपरिक त्योहार नहीं है। हमारे यहां दीपावली बुराई पर अच्छाई की जीत के सामाजिक संस्कार को स्थापित करने वाला उत्सव है जिसमें पटाखे कालांतर में उत्साह और खुशी प्रकट करने का जरिया बनकर शामिल हो गए होंगे। लेकिन पिछले कुछ बरसों से धूम मचाती आतिशबाजी मौन पड़ी है।
पूरी दुनिया में उत्सव के दौरान आतिशबाजी का चलन है और इस सिलसिले में चंद नियम-कायदे भी निर्धारित हैं, लेकिन वजह पर्यावरण संरक्षण न होकर सुरक्षा सरोकारों से ज्यादा जुड़ी है। अलग-अलग देशों में पटाखों से संबंधित अलग-अलग नियम हैं और शायद ही कोई देश होगा जिसने इन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया हो। कनाडा के मॉंट्रियल में हर साल पटाखे छोड़ने की बड़ी प्रतियोगिता होती है जो बेहद लोकप्रिय है। फ्रांस में फ्रांसीसी क्रांति को मनाने के लिए 14 जुलाई को हर साल पूरे देश को रोशन किया जाता है और पटाखे छोड़े जाते हैं। जापान के कई शहर अगस्त के पूरे महीने आतिशबाजी में नहाए रहते हैं और लोग इस अवसर पर पारंपरिक वेश-भूषा में सजे रहते हैं। सिंगापुर में राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर हर साल आतिशबाजी का कार्यक्रम रखा जाता है। अमेरिका में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आतिशबाजी की जाती है। आलम यह है कि आज वॉल्ट डिज्नी कंपनी दुनिया में आतिशबाजी कराने वाली सबसे बड़ी कंपनी है।
यहां अमेरिका को विशेष तौर पर ध्यान देने की जरूरत है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर अमेरिका के कानून दुनिया में सबसे सख्त हैं और स्थिति यह है कि अक्सर पर्यावरण संरक्षण उपायों के संबंध में अमेरिका की किसी न किसी देश से ठन जाती है। अगर पटाखे पर्यावरण के लिए घातक हैं तो क्या अमेरिका ने अब तक इसे प्रतिबंधित नहीं किया होता? इसके ठीक विपरीत वह पटाखों का सबसे बड़ा उपभोक्ता है और वहां अमूमन हर साल 10,000 करोड़ रु. के पटाखे छोड़े जाते हैं जो भारत की तुलना में पांच गुना ज्यादा हैं। अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड और जापान जैसे देशों में पर्यावरण संरक्षण के नियम-कानून कहीं अधिक सख्त और संवेदनशील माने जाते हैं, फिर भी इन देशों ने पटाखों पर रोक क्यों नहीं लगाई? वहीं भारत में इस पर रोक क्यों? मन में संदेह के अंकुर कुलबुलाते हैं कि कहीं यह हमारी संस्कृति, हमारी परंपरा के प्रतीक चिन्हों को मिटाने के उद्देश्य से किए जा रहे प्रयास तो नहीं ?
पूजा और प्रतिबंध : एक और आघात
प्रकृति पूजक हिन्दू समाज पर फिर पर्यावरण चिंताओं को लेकर सख्ती हुई है। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 10 नवम्बर को पूरे राज्य में छठ पूजा के जुलूस पर प्रतिबंध लगा दिया। अबसे पूजा में शामिल हर परिवार के केवल दो व्यक्तियों को पूजा, अर्घ्य, अर्पण के लिए जल में प्रवेश करने की अनुमति होगी।
साथ ही, भक्तों को शहर की दो सबसे बड़ी झीलों रवींद्र सरोवर और सुभाष सरोवर में प्रवेश करने से रोक दिया गया है। इससे पहले, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने रवींद्र सरोवर में छठ पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया था। पूर्व में उच्च न्यायालय काली पूजा और छठ पूजा सहित सभी पूजाओं के दौरान पटाखे फोड़ने पर प्रतिबंध लगा चुका है।
 
( लेखक हैदराबाद स्थित ‘सेन्टर फॉर इंटिग्रल’ में सीनियर एसोसिएट हैं )