धरती हमारी माता विश्व हमारा परिवार

    दिनांक 18-नवंबर-2020
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अविनाश त्रिपाठी की फेसबुक वॉल से 

पूरी पृथ्वी हमारी मां है या पूरा विश्व एक परिवार है, इस विचार के साथ कोई शर्त हमने नहीं लगाई। जैसे कॉमनवेल्थ संगठन का हिस्सा वही देश बन सकते हैं, जो ब्रिटिश द्वारा शासित देश हों।

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 माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या:। (अथर्ववेद)
अर्थात् भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं।

नमो मात्रे पृथिव्ये, नमो मात्रे पृथिव्या:। (यजुर्वेद)
अर्थात् माता पृथ्वी (मातृभूमि) को नमस्कार है, मातृभूमि को नमस्कार है।

भूमि को मां मानने का संस्कार वैदिक काल से लेकर आज तक चला आ रहा है। अंतर यह है कि पहले हम पूरी पृथ्वी को मां मानते थे और आज हमारा विचार संकुचित होकर भारत माता पर आ गया है। हमारे अनुभव ने हमें सिखाया कि चाहे हम वसुधैव कुटुम्बकम् यानी समूचे विश्व को एक परिवार मानें, लेकिन दूसरे भी ऐसा मानेंगे, ऐसा आवश्यक नहीं है। इसलिए सिकंदर से लेकर कारगिल युद्ध तक अपनी स्वतंत्रता को बचाए रखने के लिए हमें उन लोगों से युद्ध करना पड़ा, जिन्हें हम उसी पृथ्वी की संतान मानते हैं, जिसे हम मां कहकर संबोधित करते आए हैं।

पूरी पृथ्वी हमारी मां है या पूरा विश्व एक परिवार है, इस विचार के साथ कोई शर्त हमने नहीं लगाई। जैसे कॉमनवेल्थ संगठन का हिस्सा वही देश बन सकते हैं, जो ब्रिटिश द्वारा शासित देश हों। या इस्लामिक उम्मा का हिस्सा वही बनेंगे, जो इस्लामिक देश हों या कम्युनिस्ट इंटरनेशनल में वही देश शामिल होंगे जो कम्युनिस्ट होंगे। अपनी-अपनी विविधता बनाए रखते हुए भी पूरी पृथ्वी एक परिवार है, ऐसा विचार हमारे पूर्वजों ने हमें दिया।

जिन लोगों ने अपने देश के नाम के आगे ग्रेट लगाया, आधी पृथ्वी को गुलाम बनाया, रंग और नस्ल के आधार पर शासन किया, उनसे अपनी आत्मरक्षा के लिए हमने अपनी बौद्धिक विरासत को जबरदस्ती घटाकर पृथ्वी से संक्षिप्त करके भारत पर केंद्रित किया। अब जबकि हम उनके स्तर पर आने लगे, तो लोग हमें उन्हीं की लिखी हुई पंक्ति से ज्ञान दे रहे हैं।

Patriotism is the last refuge of scoundrels- Samuel Johnson
यानी देशभक्ति बदमाशों की अंतिम शरणस्थली है- सैमुअल जॉनसन
पहले हमें विश्ववाद से राष्ट्रवाद पर आना पड़ा और अब धीरे-धीरे हम धर्म से मजहब जैसे विचार पर सिमट रहे हैं। सवाल है कि हम तो आज भी अपने मूल पर लौटने को तैयार हैं, लेकिन क्या दूसरे लोग ईमान और गैर ईमान वालों के बीच का अंतर छोड़ने के लिए तैयार हैं? 30 इस्लामिक देश, 40 ईसाई देश अपनी मानसिकता से बाहर निकलने को तैयार हैं?