गेशे जम्पा -उपन्यास की चौदहवीं व पंद्रहवीं कड़ी

    दिनांक 18-नवंबर-2020
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नीरजा माधव

हमारे भारत देश में तिब्बती शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या है। चीन की विस्तारवादी नीति के परिणामस्वरूप एक अहिंसक धार्मिक देश तिब्बत पराधीन हो गया। 1959 में इसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला जब तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष परम पावन दलाई लामा को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपना देश छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी।  भारत में रह रहा तिब्बती समुदाय तिब्बत में रह रहे चीनी सत्ता से संघर्षरत तिब्बतियों की सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है। 19वीं सदी के अन्त तक तिब्बत स्वतंत्र था। तिब्बत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्न पर छाई वैश्विक चुप्पी को तोड़ने और उन्हें स्वाधीनता दिलाने की जद्दोजहद करता है सुप्रसिद्ध लेखिका नीरजा माधव द्वारा लिखा भारत में हिन्दी का पहला उपन्यास-गेशे जम्पा। प्रस्तुत है इस उपन्यास की चौदहवीं व  पंद्रहवीं कड़ी

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सामने हरी-भरी ढलान के पास एक भव्य इमारत का निर्माण हो गया था। चीनी अधिकारियों के साथ ही लोये के अपने गांव फुन-दो और आसपास के तिब्बती श्रमिक भी काम पर लगे हुए थे। श्यूं शिंगह ने उस दिन लोये को बताया था-यहां पर हम एक बहुत बड़ा प्लांट लगा रहे  हैं। बहुत-से वैज्ञानिक आएंगे यहां काम करने। क्या हमारे यहां के लोग भी? लोये ने सशंकित हो पूछा था। हां, हां, क्यों नहीं? जो जिस योग्य होगा उसे अवश्य ही रखा जाएगा नौकरी में। सरकार यही तो चाहती है कि लोग विकास के साथ जुड़ें। ‘फिर लोग क्यों कहते हैं कि आप लोगों की नीयत ठीक नहीं है’? क्या तुम्हें भी यही लगता है कि मेरी नीयत ठीक नहीं है? नहीं़.़..पता नहीं, मैं क्या जानूं? लोये अपने ही उत्तर मे उलझ गई थी। 
उस दिन श्यू शिंगहू पहली बार एकाएक आकर सामने खड़ा हो गया तो उसका हदय धड़क उठा भय से। वह अपने स्थान पर खड़ी हो गई थी। आप डरिए नहीं। मैं कोई डाकू-लुटेरा नहीं हूं। श्यू शिंगहू नाम है मेरा। सामने कैम्प है हमारा। यहां कहीं आसपास खाने-पीने का सामान मिलता है? उसने अपना मन्तव्य स्पष्ट किया तो लोये की जान में जान आई थी।
फुन-दो में ही मेरे घर के बगल में है। उनके पास ल्हासा से सारा सामान आता है। पूरे गांव के लोग उन्हीं के यहां से खरीदते हैं। आप मुझे दिखा देंगी उनका घर? वह असमंजस में पड़ गई थी। एक दुश्मन परदेसी के साथ उसको देखकर न जाने लोगों की क्या प्रतिक्रिया हो। क्या सोचने लगीं आप? जी कुछ नहीं। आप उधर किनारे-किनारे जाकर फिर दाहिने मुड़ जाइएगा। वहां पहाड़ के बीच से रास्ता जाता है। आप आसानी से पहुंच जाएंगे। वह श्यू शिंगहू को रास्ता समझा रही थी। श्यू शिंगहू के होंठों पर मुस्कराहट खेल रही थी।
ओह, आप चाय-मक्खन की दुकान बता रही हैं या मुझे मंगोलिया भेज रही हैं! वह हंस पड़ा। खिसिया उठी लोये। अपनी झेंप मिटाने के लिए उसने बहाना बनाया। दरअसल मैं आपके साथ अभी नहीं जा सकती। मेरी चमरियों का अभी पेट नहीं भरा है। आप रोज इन्हें लेकर यहीं आती हैं? हां पर क्यों? फिर मैं किसी और दिन आपके साथ चला चलूंगा रास्ता देखने। उसके होंठों पर एक शरारत थी।
ऐ लोये, क्या सोचने लगी री! देख मेरी ओर रही है और मन कहीं और है। पासंग ने एक टिहोका दिया लोये को। वह चौंक उठी। श्यू शिंगहू एकाएक गायब हो गया था। उसने अपने मनोभावों को छिपाते हुए कहा-मैं सोच रही थी कि अगर इस समय तुम्हारे सामने तुम्हारा होने वाला दूल्हा आकर खड़ा हो जाए तो.़..
अच्छा-अच्छा, मेरी छोड़ अपनी सोच। बार-मी आया है तेरे लिए सक्य गांव से। क्या सचमुच? लोये पूछ रही थी। फिर क्या झूठ? अभी लड़के का चाचा घर में ही बैठा है तेरे। वही बार-मी है। नहीं, नहीं मेरा मतलब यह नहीं था। वह तो़.़..! तू यहां सुबह-शाम क्युछु की उपत्यका में चमरियां चरा। चिन्ता किस बात की। पासंग पुन: हंस पड़ी। और सचमुच आनन-फानन में उसका विवाह तय हुआ था। कुंडली मिल गई थी जिग्मे से। लड़के वालों के यहां से कुछ लोग आए थे। रात में नाच-गाना और खाने-पीने के बाद भोर में उसे साथ लिए सभी लोग जिग्मे के गांव सक्य की ओर चले थे। लोये को बताया गया था कि जिग्मे तीन भाई हैं। सबसे बड़ा होने के नाते लोये को पूरे परिवार का ध्यान रखना होगा। क्युछु के किनारे लोये का सारा सामान नाव में चढ़ाया गया था। नदी के दूसरी ओर डोक्-पा लोगों के तंबुओं से धुआं निकल रहा था।
लोये ने चारों ओर दृष्टि दौड़ायी थी। देवदार के बड़े-बड़े वृक्ष मानो उसके स्वागत में खड़े थे। यहीं कहीं श्यू शिंगहू का कैम्प होना चाहिए था। सामने प्लांट की अर्द्धनिर्मित इमारत मानो उसे श्यू शिंगहू की तरह स्नेह से देख रही थी। लोये का हृदय तड़प उठा था। उसके आंसू ढुलक कर गालों पर आ गिरे थे।
रोओ नहीं बेटी। यहीं पास में ही तो है तुम्हारी ससुराल। कुछ देर विश्राम के लिए बारात का काफिला उसी उपत्यका में रुका था। मां और पिताजी क्युछु नदी के किनारे तक उन सबको विदा देने आए थे। सभी के सामने लकड़ी के प्याले में मक्खन मिश्रित चाय आ गई थी। चाय की चुस्की लेते ही उसे श्यू शिंगहू पुन: याद आया। पहली बार मक्खन की दुकान देखने के बहाने वह उसके घर आया था। मां, ये श्यू शिंगहू जी हैं। वो नदी के उस पार जो प्लांट लग रहा है न, उसी में सुपरवाइजर हैं। उसने मां से परिचय कराया था श्यू का। मां ने श्यू पर सशंकित दृष्टि डाली थी। लोये समझ गई थी। अतिथि का अपमान न होने पाए इसलिए तुरंत बोल पड़ी थी-बगल वाली दुकान का रास्ता इन्हें मालूम नहीं था, इसलिए मैं अपने साथ ले आई। अच्छा, अच्छा, बेटा बैठो। मां का स्वर औपचारिकता से भरा हुआ था। आप चाय लेंगे न? लोये ने धृष्टता की थी। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसने श्यू को यहां लाकर उसका अपमान किया हो।
हां, हां, क्यों नहीं? यदि आप सब लेगीं तो। श्यू ने बात संभालते हुए सहज भाव से कहा। मैं अभी लाई। वह भीतर रसोई की ओर मुड़ी थी। श्यू अब तक लकड़ी की चौकी पर बैठ चुका था। मां लोये के पीछे-पीछे रसोई में चली आई। तेरा कैसे परिचय हुआ इससे? यह तो तिब्बती नहीं है? मां ने आंखें तरेरते हुए पूछा। मां, बेचारा भटक रहा था, बस रास्ता बताने के लिए साथ ले आई। पर एक चीनी..? तुम नहीं जानतीं क्या कि अपने समाज वाले इसे किस तरह लेंगे? इज्ज्त धूल में मिलाना चाहती है तू? मां कुछ उग्र हो उठी थीं। क्या सारे चीनी खराब ही होते हैं और सारे तिब्बती अच्छे ही होते हैं? एक विरोधी स्वर मुखर हो उठा। चुप रहो। जुबान लड़ाती हो? 
श्यू और मां के बीच बहुत ही सहज ढंग से वार्तालाप चल रहा था। मां की नाराजगी का दूर-दूर तक पता न था। बीच-बीच में उनकी दृष्टि दरवाजे के बाहर दूर तक दौड़ लगा आती थी-शायद पिताजी की खोज-खबर लेने। श्यू का आत्मीय व्यवहार उन्हें प्रभावित कर गया था। चाय पियो बेटा। लोये दरवाजे से टिककर खड़ी थी। अपना प्याला हाथ में लिए वह ध्यान से श्यू शिंगहू की बातें सुन रही थी। मां जी, कभी आइए मेरे कैंप की तरफ। अपनी मां से दूर हूं। आपसे मिल लेने पर वह कमी पूरी होती-सी लग रही है। श्यू ने एक घूंट लिया था चाय का। मां मुस्करा उठी। आऊंगी बेटा कभी। दरअसल घर से निकलना नहीं हो पाता। वह बता रही थीं।
क्यों, लोये को रोज फुर्सत दे देती हैं आप निकलने की और स्वयं के लिए समय नहीं है? एक दिन इसे घर में रोक लीजिए। लोये ने धीरे-से अपना माथा पीट लिया था। मां के सामने श्यू के साथ अपनी कई मुलाकातों का भेद खुलते ही उसके चेहरे पर घबराहट के साथ लज्जा की लाली दौड़ गई थी। मां की पीठ उसकी ओर थी। श्यू ने लोये की भंगिमा देखी। उसे लग रहा था जैसे लोये ने उसके साथ अपने परिचय के बारे में घर में सभी को बताया होगा। पर लोये द्वारा अपना माथा धीरे-से पीटने का अर्थ उसने लगा लिया था। बात बदलते हुए बोला था-मैं स्वयं किसी दिन आऊंगा मां। अपने साथ ही ले चलूंगा। बगल वाली दुकान से अब तो जरूरत की चीजें लेने के लिए अक्सर आना ही पड़ेगा। बारात के लोग विश्राम के उपरांत पुन: चल पड़े थे सक्य की ओर। सूनी-सूनी नजरों से चारों ओर श्यू शिंगहू की उपस्थिति ढूंढती लोये भी अपनी सजी-संवरी घोड़ी पर बैठ गई थी। मन भर-भर आ रहा था। श्यू उसे इस समय बहुत याद आ रहा था। वह कितने आत्मविश्वास से बोला था उस दिन जब लोये ने अपने घर से लौटकर आने के बाद दूसरे दिन नाराज होकर उससे पूछा-मां के सामने आपने यह क्यों बता दिया कि मैं आपसे पहले भी मिलती रही थी? सब कुछ खोलकर रख देने में जो सुख है, वह छिप-छिपाकर रहने में कतई नहीं। मैं अपने किसी भी संबंध को छिपाकर रखना नहीं चाहता। श्यू ने क्युछु नदी के किनारे उसकी बगल में बैठते हुए कहा। मैं छिपाने के लिए नहीं कह रही हूं। बस, उचित समय देखने की बात कह रही हूं।
कोई भी समय अनुचित नहीं होता। अनुचित तो व्यक्ति का प्रयोजन या कृत्य होता है। मैं नहीं समझता कि मेरा प्रयोजन अनुचित है। मैं तुम्हें पवित्र मन से चाहता हूं और अपने जीवन में स्वीकार करना चाहता हूं। श्यू की बातों से झलक रही दृढ़ता देखकर वह सहम गई थी। आप नहीं जानते मेरे पिताजी को। वे बहुत कट्टर हैं। मुझे मार डालना पसंद करेंगे परंतु किसी चीनी के साथ...उसका स्वर कांप उठा। न चीनी होना मेरा दोष है और न तुम्हें चाहना ही। राजनीतिक परिस्थितियों के कारण हम अपनी आत्मा को क्यों कुचलें? इस जन्म में क्यों घुट-घुटकर जिएं? पर आपकी और मेरी बात को समझेगा कौन? लोये गिड़गिड़ा उठी थी। तुम्हारे पिताजी और मेरी मां।      (जारी...)
दूसरे ही दिन श्यू सुबह-सुबह घर पहुंच गया था। मां का चेहरा सफेद पड़ गया था जब श्यू ने सीधे-सीधे अपना प्रस्ताव पिताजी के सम्मुख रख दिया था-मैं लोये को अपनी जीवन-संगिनी बनाना चाहता हूं पिताजी। उम्मीद है, आप इनकार नहीं करेंगे। पिताजी हतप्रभ से देख रहे थे। कुछ ही देर पहले तो मां ने परिचय कराय था श्यू का-ये श्यू हैं। सुपरवाइजर हैं। क्युछु के उस पार जो प्लांट बन रहा है, उसी में।
अच्छा, अच्छा। यहां कैसे? पिताजी ने आग्नेय नेत्रों से घूरते हुए पूछा था। श्यू ने बिना हिचक अपना प्रस्ताव उनके सम्मुख रख दिया। किवाड़ के पीछे छिपी लोये के हृदय की धड़कनें तेज हो गई थीं। पिताजी एक-एक शब्द चबाते हुए वे बोल रहे थे-अभी तक तो जोर-जबरदस्ती द्वारा ही हम लोगों को खत्म करने का काम तुम लोग कर रहे थे, अब घरों में घुसकर प्रस्ताव भी लाने लगे? पिताजी, मैं हृदय की समस्त पवित्रता के साथ यह प्रस्ताव आपके सम्मुख रख रहा हूं। श्यू की बातों में दृढ़ता थी।
यह तो तुम लोगों की पॉलिसी ही है कि किसी भी तरह से तिब्बतियों की पूरी प्रजाति ही खत्म कर दो ताकि आगे का रास्ता साफ हो। पिताजी के स्वर में घृणा थी। आप गलत समझ रहे हैं पिताजी। मैं लोये को..! बस्स, अब अपनी जुबान पर मेरी बेटी का नाम भी न लाना। मैं लोये को काटकर क्युछु की धारा में फेंक देना ज्यादा अच्छा समझूंगा।...अब जा सकते हो। पिताजी के माथे की सिकुड़नें और गहरा उठी थीं। मां चुप थी। लोये ने अपनी दोनों आंखें मूंद ली थीं। पिताजी का क्रुद्ध चेहरा देख उसके पांव जहां के तहां जम गये थे।
दूसरे दिन पिताजी के बाहर जाते ही थोड़ी देर के लिए वह तेज कदमों से क्युछु के किनारे गई थी। वहां श्यू बेचैन-सा क्युछु के किनारे टहल रहा था। कहा-मुझे पता नहीं क्यों लग रहा था जैसे तुम आज इसी समय जरूर आओगी। मैं रोक नहीं पाई स्वयं को। लोये ने कहा था। वह बिलख पड़ी थी।
नहीं, तुम रोओ नहीं। मैं आज ही जा रहा हूं अपने शहर शिन्हवा। जल्दी ही लौटने का वादा करता हूं। अपनी मां को साथ ले आऊंगा। मेरी प्रतीक्षा करना, यहीं क्युछु के किनारे। अब जाओ तुम। कभी-कभी क्युछु के इस किनारे बैठकर मुझे याद कर लिया करना। ठीक? उसने हंसने का प्रयास किया। जी। उसका गला रूंध गया था।
पर श्यू के आने से पहले ही उसे जिग्मे के साथ बांध दिया गया। मां ने उससे बिरादरी में अपनी इज्जत न गंवाने की दुहाई दी थी तो पिताजी ने देश और संस्कृति की सुरक्षा के लिए उसके एक छोटे-से त्याग की मांग की थी। विवश-सी उसने अपना मौन स्वीकार सौंप दिया।
मीलों लंबी खेती पार कर वे सक्य गांव पहुंचे थे। वहां ध्वस्त मीनारों और खंडहरों को देखने से लग रहा था कि किसी समय यहां बहुत घनी बस्ती रही होगी पर धीरे-धीरे अब वीरान-से हो गए थे घर। लोये ने धीरे से अपनी दृष्टि उठाई थी और गांव को अच्छी तरह से देखने का प्रयास किया। पर कोई विशेश चलहल पहल नहीं दिखाई दे रही थी। लोये को आश्चर्य नहीं हुआ था। तिब्बत में लगभग हर गांव में यही स्थिति होती है। गांव के थोड़े-से भी लोग यदि किसी समारोह आदि में भाग लेने बाहर चले जाते हैं तो गांव उजाड़-सा हो जाता है।
अब बारात दरवाजे पर पहुंच चुकी थी और लोये के मस्तिष्क में अभी तक मंथल चल रहा था। दरवाजे के बाहर की सभी रस्में निभाई जा चुकी थीं। एक भारी-भरकम महिला ने लोये के गले में पांच पवित्र रंगों की छोटी झंडियों में बंधा तीर जैसा पारंपरिक आभूषण पहनाया और उसे सजे मंडप में ले जाकर जिग्मे के दाहिनी ओर बैठा दिया। यह उसकी सास थीं। चेमा खाने की रस्म पूरी हो चुकी थी। लोये की आंखें बार-बार भर आ रही थीं।
आंखों में उस दिन भी खूनी डोरे लिए जिग्मे ने जब छांग के नशे में धुत कमरे में आकर बिस्तर पर पसरते हुए बोला था-देखो, तुम्हें इसलिए ब्याह कर लाया हूं कि तुम हम तीनों भाइयों के साथ अच्छे से रहो। कोई कमी नहीं होने दूंगा। हां, किसी तरह का धोखा दिया तो नाक काटकर फुन-दो भेज आऊंगा।
क्या मेरी इच्छा या अनिच्छा को कोई महत्व नहीं है आपकी दृष्टि में? लोये की आंखों में विद्रोह तैर उठा। क्या, नए ढंग से तुझे अपना रीति-रिवाज समझाऊं? विवाह से पूर्व क्या तुझे ये सब नहीं बताया गया था? जिग्मे का स्वर उद्दंड था।
नहीं। नहीं बताया था किसी ने मुझे, अन्यथा विवाह से इनकार कर देती। लोये तमककर अपने ध्यान में खड़ी हो गई थी। तो क्या उस श्यू शिंगहू के साथ चली गई होती जिसके चक्कर में आज तेरे मां-बाप जेल की हवा खा रहे हैं? जिग्मे ने कानों में जैसे पिघला सीसा उड़ेल दिया था। लोये तिलमिला उठी थी। फुन-दो से छोटा वाला भाई सोनम कल दोपहर में ही भागता आया था।
दीदी, मां और पिताजी को सैनिक ले गए पकड़कर। वह बिलख पड़ा था। लोये का हृदय भय से सूख गया। घर में कोई नहीं था उस समय। सास बगल के घर में गई थी और जिग्मे अपने भाइयों के साथ काम पर गया था। क्यों, क्या हुआ था? लोये ने बिलखते हुए सोनम को झकझोरते हुए पूछा था।
दीदी, वो कल श्यू शिंगहू आया था घर। बहुत गुस्से में था। पिताजी से कह रहा था कि आपने लोये को मुझसे अलग करके अच्छा नहीं किया। हे भगवान! फिर? लोये ने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया था। सोनम सिसकते हुए बता रहा था-पिताजी ने कहा-बेटी मेरी है। मैं चाहे जो निर्णय लूं। क्या उनकी मां भी आई थीं? लोये ने बीच में ही टोका था। कह तो रहा था कि मैं मां को लिवाने ही गया था, ताकि आपको अपनी बेटी के बारे में कोई आशंका न रहे भविष्य को लेकर। घर पर आई थीं कि नहीं उनकी मां? लोये झल्लाकर पूछ रही थी। नहीं। उसके कैंप में ही ठहरी थीं।
फिर क्या हुआ? दोनों में बहस हो रही थी। वह भी बहुत क्रोध में था। एकाएक पिताजी ने बगल में पड़ी कुल्हाड़ी से उसे घायल कर दिया। सोनम रोने लगा डर से।
हे भगवान। क्या करने वाला है तू? वह सिर थामकर जमीन पर बैठ गई थी।
श्यू जीवित हैं न? कुछ देर ठहरकर उसने पूछा था। हां दीदी, उन्हें किसी तरह लादकर ले जाया गया। कुछ ही देर में सैनिक आए थे और मां-पिताजी को बांधकर ले गए। मैं रातभर पड़ोस में चाची के यहां छिपा रहा। सुबह होते ही तुम्हारे पास आया।
शाम होते-होते पूरे सक्य गांव में यह चर्चा फैल गई थी कि जिग्मे के सास-ससुर जेल भेज दिए गए। एक चीनी अधिकारी को मारकर घायल कर दिया था। दूसरे ही दिन जिग्मे द्वारा उस घटना को लेकर कटाक्ष करना लोये को अंदर तक झकझोर गया था। रात के अंधेरे में ही वह छोटे भाई सोनम का हाथ थामे घर से निकल पड़ी थी। एक अनिश्चित गन्तव्य की ओर। श्यू शिंगहू से भी मिलने की कोई इच्छा शेष न थी। माता-पिता को सैनिकों के चंगुल से छुड़ा पाना भी उसके वश में न था। ससुराल में मजबूत सहारा रहा होता तो भी एक बार वह हाथ-पैर मारती। पर नियति को कुछ और ही मंजूर था।
लेटे-लेटे भिक्षुणी लोये दोलमा ने अपने सिर पर हाथ फिराया। मुंडे हुए सिर पर नन्हे-नन्हे बाल हथेलियों में हल्की चुभन-सी पैदा कर रहे थे। सोनम के साथ ही लोये ने भी चीवर धारण कर लिया था। सिर के केश मुंडाते ही मानो श्यू और जिग्मे का बोझा उतर गया था, बस हृदय में बसे मां और पिताजी का स्रेह कभी-कभी आंखों से आंसू बनकर छलक पड़ता।
माई, माई, देखो छुड्ची कह रही है कि मैं अब कभी तिब्बत नहीं जाऊंगा। दौड़ता हुआ ताशी आकर भिक्षुणी दोलमा के बिस्तर पर बैठ गया था। भिक्षुणी अतीत से वापस आ चुकी थी। कुछ न बोलते हुए बस एकटक वह नन्हे ताशी का चेहरा निहार रही थी।
बोलो न, माई। मैं नहीं जाऊंगा अपने मां-पिताजी के पास?
जाओगे तुम। तुड्ची चिढ़ा रही है तुम्हें।
भिक्षुणी का स्वर दुर्बल था।
नहीं, वह तो कह रही थी कि जैसे माई नहीं गई कभी वैसे ही हम लोग भी नहीं जा पाएंगे। ताशी के भोले चेहरे पर अधीरता थी। ऐसा नहीं है बेटा। तुम लोग जरूर जाओगे।       (जारी...)