मजहब के मुलम्मे में जहरीली सोच

    दिनांक 19-नवंबर-2020
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आर.एस.एन. सिंह

फ्रांस और आस्ट्रिया में  पिछले दिनों हुए जिहादी हमलों या फिर भारत में सीएए विरोधी प्रदर्शनों के पीछे जिस विचारधारा का हाथ रहा है, दरअसल वह कालबाह्य हो चुकी है। दुर्गंंध से भरी इस सोच के पीछे की प्रेरणा और उसके प्रसारकों को लेकर अब सारी स्थिति स्पष्ट है। इस्लाम के नाम पर दुनिया में और मार-काट अब नाकाबिले-बर्दाश्त
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3 नवम्बर 2020: वियना में जिहाी हमले के बाद घटनास्थल पर तैनात सुरक्षाकर्मी

गत दिनों फ्रांस और फिर वियना में हुए जिहादी हमले बेशक उस सड़ी-गली सोच का अंजाम हैं जिसका दुनिया भर में हर जगह एक ही स्वरूप है। खासकर गैर-इस्लामिक देशों में कट्टरवादी मुसलमानों में अपने वतन, उसकी मिट्टी, उसकी सांस्कृतिक विरासत से नफरत ही देखने में आई है। ऐसे में यह कहना या मानना गलत नहीं होग कि संस्कृतियों में युद्ध कभी थमा ही नहीं था। 

इस्लामिक कट्टरपंथी सोच पर चलने वालों में मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद और तुर्की के राष्ट्रपति एर्रोगन और देम्रान खान जैसे लोग भी शामिल हैं। फ्रÞांस के राष्टÑपति मैक्रां से सहानुभूति रखने की बजाय ये उन्हें ही निशाना बना रहे हैं। मैक्रां ने अपने देश का शिक्षक खोया, बर्बर तरीके से उस शिक्षक सेमुअल पैटी का सर कलम कर दिया गया। हत्यारा अब्दुल्ला अंगारात एक 18 वर्षीय चेचन शरणार्थी था। फ्रÞांस ने उसे पनाह दी थी। ऐसी घटना किसी देश में हो, आखिर उस देश के मुखिया को दुखी और क्रोधित होने का हक है या नहीं? उन्होंने घटना के लिए इस्लामिक कट्टरपंथ और इस्लामिक अलगाववाद को दोषी ठहराया। उन्होंने कहा कि पिछले 40 साल में इस्लामिक दहशतगर्दी के जो शिकार हुए हैं, उसमें 80 प्रतिशत मुसलमान हैं। राष्ट्रपति मैक्रां का वक्तव्य और विश्लेषण कितना सटीक था। फ्रÞांस की घटना के कुछ ही दिनों बाद, यानी 2 नवम्बर को बंदूकधारियों ने काबुल विश्वविद्यालय में हमला किया और दो दर्शन छात्र जिहादी गोलियों के शिकार हुए। मरने वाले और मारने वाले दोनों अफगानी और मुसलमान। आज अगर दुनिया में सबसे ज्यादा इस्लामोफोबिया है तो वह इस्लामिक मुल्कों में है। यह तथ्य 1,400 साल से अटल है। इस सोच को समझने के लिए इतिहास में झांकना समीचीन होगा।

फ्रांस हो या दुनिया के अन्य देश, वहां इस्लाम के संदर्भ में होने वाली किसी भी घटना की गूंज भारत में क्यों सुनाई देती है, इसे समझना अब बहुत मुश्किल नहीं है। 

आज से पांच सौ साल पहले, 1501 में शाह इस्माइल ने साफानिद साम्राज्य की स्थापना की थी। इस हुकूमत ने ईरान पर दो सौ साल शासन किया, जिसका विस्तार अजरबैजान, अरमीनिया, जॉर्जिया, उत्तरी कॉकस, इराक, कुवैत, अफगानिस्तान, सीरिया, तुर्की, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान तक था। शाह इस्माइल ने सारे देश को जबरन सुन्नी से शिया बना दिया। उसने 1508 में बगदाद पर कब्जा जमाया और सुन्नियों का कत्लेआम किया। सब पर शिया विचारधारा को जबरन थोपा गया और सुन्नी मजारों-मकबरों को तोड़ा गया। सुन्नी मस्जिदों को शिया मस्जिद में तब्दील किया गया। सुन्नियों को अपमानित करने के लिए नये-नये तरीके अपनाये गये। दुआ-सलाम में इस्लाम के पहले तीन खलीफा अबु बकर, उमर और उस्मान के  लिए अपशब्द बोलना अनिवार्य बनाया गया। यह तथ्य जानना जरूरी है कि 7वीं  शताब्दी में अरब ने ईरान पर कब्जा कर लिया था और तब से लेकर 16वीं शताब्दी तक, ईरान सुन्नी इस्लाम का मुख्य बौद्धिक केंद्र था। ईरान को शिया मुल्क बनाने के पीछे मुख्य रूप से राजनीतिक कारण थे। तब ईरान चारों तरफ से सुन्नी साम्राज्य से घिरा हुआ था, उसके पश्चिम में ओटोमन साम्राज्य था, पूर्व में मध्य एशिया साम्राज्य। लिहाजा राष्ट्र निर्माण के लिए एक नयी मजहबी पहचान की सख्त जरूरत थी। इसलिए इस्लामिक दुनिया में राजनीति, व्यापार और पहचान मजहब पर हमेशा से भारी रही है। जिन मुसलमानों की अपनी पहचान से मजहब की दूरी बढ़ती जाती है, वह आक्रमक और खूंखार बनते चले जाते हैं।

फ्रांस में पिछले दिनों चेचन युवक ने जो बर्बरता दिखाई वह इसी आक्रामक समाज की परिचायक है। जिन राजनेताओं और बुद्धिजीवियों ने युवक का समर्थन किया है, वे भी उतने ही आक्रामक और खूंखार हैं। आज जो नेता और कट्टर तत्व मैक्रां को उनके दुख और चिंता के लिए बुरा-भला कह रहे हैं, प्रदर्शन कर रहे हैं, वे जरा 2015 की घटना याद करें। उस दृश्य को याद करें जब ‘शार्ली एब्दो’ के दफ्तर में घुसकर जिहादियों ने 12 जानें ले ली थीं।

अक्सर देखा गया है कि जिहादी हमले एक ही वारदात तक सीमित नहीं रहते। एक ही हमले से जिहादियों का दिल नहीं भरता। वे दशहत की अवधि को ज्यादा से ज्यादा लम्बा खींचना चाहते हैं। महातिर मोहम्मद, एर्दोजन, इमरान खान और भारत के कथित शायर मुनव्वर राणा जैसे लोगों से उन्हें प्रेरणा मिलती है। राणा ने सेमुअल पैटी के कत्ल को जायज ठहराया था। अपनी खूनी विचारधारा को सेकुलर रंग देने के लिए उन्होंने कहा कि ‘अगर कोई भगवान राम और सीता के खिलाफ ऐसा करे, तो उसका भी यही अंजाम होना चाहिए’। लेकिन जब एम.एफ. हुसैन ने माता सीता और देवी दुर्गा के अश्लील चित्र बनाये थे, तब राणा ने ऐसी किसी ‘सजा’ की मांग नहीं की थी। ऐसे ही तथाकथित इस्लामिक रहनुमाओं और बुद्धिजीवियों की प्रेरणा से फिर दूसरा, तीसरा हमला होता है। 2015 में ‘शार्ली एब्दो’ हमले के दो दिन बाद ही फ्रांस की एक सुपर मार्केट की घेराबंदी की गई और चार यहूदी बंधकों को मार डाला गया। उसी तरह अभी पैटी का सर कलम करने के कुछ ही दिन बार 31 अक्तूबर को दक्षिण फ्रांस के नीस शहर में एक चर्च पर हमला हुआ और एक महिला सहित तीन फ्रांसीसी नागरिक जिहादियों के शिकार हुए। हमलावर एक 21 वर्षीय ट्यूनीशियन था। फिर कुछ ही दिन बाद, 3 नवम्बर को आस्ट्रिया की राजधानी विएना में जिहादी हमले हुए जिसमें चार जानें गर्इं और 22 घायल हो गए।

यह कोई नई बात नहीं है। आज से 90 साल पहले अंग्रेजी हुकूमत के तहत लाहौर में पंडित चमूपति लाल की लिखी पुस्तक ‘रंगीला रसूल’ छपी थी। प्रकाशक का नाम राजपाल था। उसे लेकर तब काफी हंगामा हुआ था। एक नौजवान इलामुद्दीन गाजी ने एक खंजर खरीदकर राजपाल के सीने में घोंप दिया। उस पर मुकदमा चला। दीन के वकील थे जिन्ना। बहरहाल, उसे फांसी की सजा मिली। उसके जनाजे में बड़े-बड़े सेकुलर बुद्धिजीवी शामिल हुए, जिनमें सबसे प्रमुख थे मोहम्मद इकबाल। इकबाल ने ही उसके मृत शरीर को कब्र के सुपुर्द किया। उन्होंने आंखों में आंसू लिए तब कहा था, ‘‘यह नौजवान हम शिक्षित लोगों को कहीं पीछे छोड़ गया।’’ कई अस्पतालों, सड़कों और पार्कों को दीन का नाम दिया गया। जी हां, यह सप्रू खानदान के वही इकबाल थे जिन्होंने लिखा था-‘‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना...’’ उसी दौरान 1919 में खिलाफत आंदोलन चल रहा था जिसे भारत के मुसलमानों ने छेड़ा था। गांधीजी ने इस आंदोलन को भरपूर समर्थन दिया था। देखते ही देखते इसने हिंदू विरोधी रूप धारण कर लिया। इसमें दो मुस्लिम संगठन सक्रिय थे— खुद्दाम-ए-काबा और सेंट्रल खिलाफत कमेटी। केरल में मुसलमानों ने जिहाद छेड़ा; 2,500 से ज्यादा हिंदू जिहादियों के शिकार हुए। हिंदुओं की संपत्ति लूटी गई, जलाई गई, घर ध्वस्त कर दिए गए। लेकिन इस कट्टरवादी मुस्लिम आंदोलन को गोरखा फौजियों द्वारा कुचल दिया गया। खिलाफत आंदोलन विश्वभर के इस्लाम का आंदोलन था। हमारे यहां वह एक गैर-मुल्की आंदोलन था। भारत की मिट्टी, भारत का समाज, भारत की संस्कृति से उसका कोई वास्ता नहीं था। इस आंदोलन के मुखिया थे शौकत अली, मोहम्मद अली जौहर, हकीम अजमल खान और मौलाना अबुल कलाम आजाद। आजाद जैसी कट्टर सोच वाला व्यक्ति भारत का पहला शिक्षा मंत्री बना और दस साल तक उस ओहदे पर कायम रहा। स्वतंत्र भारत में वैश्विक और भारत के इस्लाम के बीच युद्ध का बीज तो बहुत पहले बोया जा चुका था। इस तरह की वैचारिक खींचतान के बीच आखिर राष्ट्र निर्माण कैसे हो सकता है? हमने दिसंबर-मार्च 2020 में शाहीन बाग में जो देखा, वह भी इसी युद्ध का प्रतीक था। हिन्दुस्थान में जगह-जगह इस्लाम के नाम पर हिंसा मचाई जाती है, प्रदर्शन किए जाते हैं, वे भी इसी का प्रतीक हैं। फ्रांस की घटना के बाद बंगलादेश में हिन्दुओं पर हमला भी इसी का नतीजा था। भारत के मुसलमानों ने अपने ‘राष्ट्रभाव’ और मजहब के बीच रिश्ते पर हमेशा बेखौफ नजरिया रखा है। इस नजरिये को लेकर वे कभी संदेह या असमंजस में नहीं रहते।

फ्रांस हो या दुनिया के अन्य देश, वहां इस्लाम के संदर्भ में होने वाली किसी भी घटना की गूंज भारत में क्यों सुनाई देती है, इसे समझना अब बहुत मुश्किल नहीं है। 
      (लेखक प्रसिद्ध रक्षा विश्लेषक हैं)