वेदों में सौरमण्डल के वैज्ञानिक सन्दर्भ

    दिनांक 19-नवंबर-2020
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प्रो. भगवती प्रकाश

ऋग्वेद में पृथ्वी तथा अन्य ग्रहों की, एक साथ तीन वैज्ञानिक विशेषताओं का उल्लेख किया गया है। इसमें पृथ्वी को ‘अक्षेणेव चक्रिया’ अर्थात अक्ष पर घूमते हुए पहिये की उपमा दी गई है।  जो यह कहते हैं किे वैदिक आर्यों को सौरमंडल, पृथ्वी के गोल होने और उसके अपनी धुरी पर घूमने की जानकारी नहीं थी, वे पहले तथ्यों को जान लें

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इस स्तम्भ में श्याम ऊर्जा के वैदिक सन्दर्भ के अन्तर्गत यह चर्चा की जा चुकी है कि खगोलीय अन्वेषणों के अनुसार ब्रह्माण्ड में 20 खरब से अधिक आकाशगंगाएं हैं, जो 9,300 करोड़ प्रकाशवर्ष से भी अधिक विस्तृत हैं। एक प्रकाशवर्ष 94 खरब कि.मी. से अधिक का होता है। सृष्टि को अन्तरहित बताते हुए लिखा गया है कि मन की गति से विचरण करने पर भी ब्रह्माण्ड का अन्त पाना कठिन है।

पृथ्वी सहित सौरमण्डल के सभी ग्रह सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से बंधे, अपनी-अपनी कक्षा में सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। इसलिए इस मिथ्या आरोप को यहां सप्रमाण निर्मूल किया जाएगा कि ‘वैदिक आर्यों को जानकारी नहीं थी कि पृथ्वी व सौरमण्डल के अन्य ग्रह सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। सूर्य से पृथ्वी आदि ग्रहों की दूरी कितनी है? पृथ्वी व अन्य ग्रह गोल हैं। पृथ्वी अपने अक्ष पर घूम रही है एवं उसका अक्ष झुका हुआ है, प्रति 25,800 वर्षों में पृथ्वी अपना अक्ष बदलती है’आदि। असल में तो ये सारी जानकारियां प्राचीन काल में केवल वैदिक आर्यों को ही थीं।

सूर्य की परिक्रमा और वेद
उल्लेखनीय है कि सूर्य स्वयं भी 7.75 लाख कि.मी. प्रति घण्टे की गति से एक अति भारित कृष्ण विवर (सुपर मेसिव ब्लैक होल) की परिक्रमा कर रहा है। भागवतपुराण के अनुसार, सूर्य एक महासूर्य की परिक्रमा कर रहा है। उसमें में दी गई गति आदि का विवेचन भी आगे कभी किया जाएगा। सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से बन रहे अभिकेन्द्रीय बल (सेण्ट्रीपीटल फोर्स) से ही पृथ्वी सहित सौर मण्डल के सभी ग्रह अपने-अपने सापेक्ष भार एवं भ्रमण की गति के अनुरूप अपनी-अपनी कक्षा में सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। इसका ऋग्वेद में स्पष्ट उल्लेख है। ऋग्वेद में लिखा है कि ‘‘सूर्य ने पृथ्वी और अन्य ग्रहों को आकर्षण के माध्यम से बांधा है और उन्हें अपने चारों ओर ऐसे घुमाता है जैसे कि कोई प्रशिक्षक नए प्रशिक्षित घोड़ों को चलाता है।

सविता यन्त्रै: पृथिवीरम्नदस्कम्भने सविता दमयन्ध।
अश्विनधुक्षधुनिमन्तर मिशनमतौरते बद्धं सविता समुद्रम् क्ष।।  -ऋग्वेद 10.14.9.1
अत: वैदिक ऋषियों को पता था कि पृथ्वी, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, यूरेनस, प्लूटो व नेपच्यून आदि सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं। ऋग्वेद में अन्यत्र भी उल्लेख है कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर रही है। ऋग्वेद में कहा है, ‘‘यह पृथ्वी हाथ और पैरों से रहित है, फिर भी आगे बढ़ती है। सतत गतिमान है, अपनी कक्षा में निरन्तर घूमती रहती है। पृथ्वी की सभी वस्तुएं भी इसके साथ चलती हैं। यह सूर्य के चारों ओर घूमती है।’’ 

अहिस्ता यदपदी वर्धत क्षा: शचिभिर्वेदस्याणाम्।
शुष्णं परिदक्षिणिद्विश्वायवे शि शिशनथ:क्ष।।
                                        -ऋग्वेद 10.22.14
आर्यभट्ट ने भी पृथ्वी की दैनन्दिन गति का उल्लेख किया है। यजुर्वेद के ब्राह्मण ग्रन्थ शतपथ, जो 5,000 वर्षों से कहीं पुरातन है, में भी लिखा है कि पृथ्वी गोल हैै-

परिमंडल उ वा अयं (पृथिवी) लोक: आप्त -शतपथ                     
अर्थात् पृथ्वी परिमण्डल रूप में अर्थात् गोल है। निश्चय ही यह पृथ्वी लोक गोलाकृति में है। शतपथ ब्राह्मण का पूरा श्लोक इस प्रकार है-

व्याममात्री भवति। व्याममात्रो वै पुरुष: पुरुष: प्रजापति:
प्रजापतिरग्निरात्मसम्मितां तद्योनिं करोति परिमण्डला भवति
परिमण्डला हि योनिरथो अयं वै
लोको गार्हपत्य: परिमण्डल उ वा अयं लोक:
                                        -7.1.1.(37)
सूर्य से प्रकाश के धरती पर पहुंचने की सटीक वैदिक गणना:

पृथ्वी से सूर्य की दूरी लगभग 15 करोड़ कि.मी. (14.829 करोड़ कि.मी.) होने से 3 लाख कि.मी. प्रति सेकण्ड की गति से सूर्य से पृथ्वी पर प्रकाश को पहुंचने में 8 मिनट (या ठीक-ठीक कहें तो 8.3 मिनट) लगते हैं। पृथ्वी की भ्रमण की कक्षा की परिधि भी लगभग 15 करोड़ (14.95 करोड़) कि.मी. है, जिसे लगभग 1.08 लाख कि.मी. प्रति घण्टे की गति से भ्रमण करते हुए वर्ष भर में पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर पूरी करती है। सूर्य का व्यास 13.92 लाख कि.मी. होने से सूर्य के व्यास की लगभग 108 गुना सूर्य से पृथ्वी की औसत दूरी है और इतनी ही पृथ्वी की कक्षा की परिधि भी है। अर्थात् पृथ्वी से सूर्य की बीच या पृथ्वी की कक्षा की परिधि में 108 सूर्य समा सकते हैं। वैसे पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी चन्द्रमा के व्यास की लगभग 108 गुनी है। इसी कारण माला के मनकों सहित हिन्दू जीवन पद्धति में सर्वत्र 108 का महत्व है। सूर्य के गुरुत्वाकर्षण व पृथ्वी के भार व उसकी कक्षा में उसकी भ्रमण गति के बीच में अथवा दूसरी स्थिति पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण, चन्द्रमा के भार व चन्द्रमा की उसकी कक्षा में पृथ्वी की परिक्रमा की गति में 0.01 प्रतिशत का कुसमायोजन हो जाये तो या तो पृथ्वी सूर्य से टकरा जाएगी या सूर्य की कक्षा से बाहर निकल जाएगी एवं दूसरी स्थिति में चन्द्रमा पृथ्वी से टकरा सकता है या उसकी कक्षा से बाहर जा सकता है। वस्तुत: ये संतुलन व अनुपात एक बुद्धिमत्तापूर्ण प्ररचना का परिणाम है। इसमें पिछले अंक मे विवेचित श्याम पदार्थ की भी महती भूमिका है।
उपरोक्त आधुनिक गणनाओं के अनुरूप ही ऋग्वेद के अनुसार भी सूर्य से पृथ्वी पर प्रकाश को पहुंचने में 8 मिनट लगते हैं। ऋग्वेद के मंत्र 3.53.8 में स्पष्ट उल्लेख है कि:
‘त्रिर्यद्दिव: परि मुहूर्तमागात् स्वै:’
इस मंत्र में स्पष्ट किया गया है कि एक मुहूर्त अर्थात् 48 मिनट में सूर्य का प्रकाश तीन बार पृथ्वी पर आकर सूर्य तक जा सकता है, अर्थात् सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुंचने में 48/6 अर्थात् 8 मिनट लगते हैं। दिन और रात्रि में कुल 30 मुहूर्त होने से एक मुहूर्त का स्पष्ट मान 48 मिनट आता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण में इसका विस्तृत विवेचन श्लोक क्रमांक 3/10/9 व 3/10/1 में है।
पृथ्वी के घूमने, अक्ष के झुके होने का ऋग्वेद में उल्लेख:
‘पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है।’ ऋग्वेद में इस विवेचन के अतिरिक्त पृथ्वी अपने कक्ष पर 23.43920 डिग्री झुकी हुई है। पृथ्वी पर ऋतुओं का परिवर्तन इस झुकाव का परिणाम है। पृथ्वी के इस झुकाव का भी उल्लेख ऋग्वेद में है-
यो अक्षेणेव चक्रियो पृथिवी भूतधाम्
अर्थात् पृथ्वी अपने अक्ष पर चक्र की तरह घूमती है। पृथ्वी के घूमने की गति भू-मध्य रेखा पर 1674.4 किलोमीटर प्रतिघंटा है। पृथ्वी अपने अक्ष पर 23.43920 झुकी हुई है। ऋग्वेद में बताया गया हैं कि किसी कूबड़ वाले जैसी झुकी कमर जैसी पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर जाती है-
दाधर्थ प्राचीम् ककुभं पृथिव्या:। (ऋग्वेद 7.99.2)
पृथ्वी का अक्ष आगे बढ़ायें तो वह सीधा ध्रुव तारे तक जाता है, जो पृथ्वी से 434 प्रकाश वर्ष दूर है। पृथ्वी के प्रति 25800 वर्ष में अक्ष के परिर्वतन से होने वाले अयन चलन का ज्ञान तो भारत ने ही समग्र विश्व को दिया है। 
वेदों से लेकर अन्य संस्कृत-साहित्य में पृथ्वी आदि लोकों को ‘गोलक’ ही कहा गया है व इसी कारण पृथ्वी को ‘भूगोल’ नाम  दिया गया है। पाश्चात्य जगत तो 17वीं शताब्दी तक अंधविश्वास में डूबा रहा। स्पेन के वैज्ञानिक गैलीलियो ने जब कहा कि ‘पृथ्वी गोल है’, तो यूरोप के न्यायाधीशों ने बाइबिल के सिद्धान्त के विरुद्ध मत प्रस्तुत करने के कारण उसे दस वर्ष की सजा सुनाई, जिस दौरान उसकी मृत्यु हो गई। एक अन्य वैज्ञानिक ब्रूनो को इसी अपराध में तेल छिड़ककर जला डाला गया था।
ऋग्वेद में पृथ्वी तथा अन्य ग्रहों की, एक साथ तीन वैज्ञानिक विशेषताओं का उल्लेख किया गया है। इसमें ‘अक्षेणेव चक्रिया’ अर्थात् अक्ष पर घूमते हुए पहिये की उपमा दी गई है। साथ ही ‘पृथिवी तस्तम्भ’ कहकर आकर्षण सिद्धान्त का रहस्योद्घाटन किया गया है। इस प्रकार वैदिक वाड्मय में सौरमण्डल, पृथ्वी, वर्षा विज्ञान आदि के अनगिनत विवेचन हंै।
(लेखक गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा के कुलपति हैं)