आंकड़ों की रौनक, उम्मीद की खनक

    दिनांक 19-नवंबर-2020
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उमेश्वर कुमार

बाजार के तमाम आंकड़े दर्शा रहे हैं कि देश की अर्थव्यवस्था न सिर्फ तेजी से पटरी पर आ रही है बल्कि आगे के लिए भी इसकी दिशा निर्धारित है। कोरोना के दौर में, दूसरे देशों के उलट खुद को तेजी से पटरी पर लाने में दुनिया के सामने भारत बना उदाहरण

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कोविड-19 महामारी की चुनौती के बीच सुखद संकेत है कि देश की अर्थव्यव्यवस्था तेजी से पटरी पर आ रही है। कोरोना वायरस से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था एक तरह से न सिर्फ ठहर गई बल्कि आर्थिक गतिविधियों के ठप पड़ने से लगातार नीचे जाने लगी। समाज के विभिन्न तबकों पर इसका असर अपने हिसाब से पड़ने लगा। भारत भी इससे अछूता नहीं था। देश के कल-कारखाने बंद, आवाजाही बंद, सामाजिक-आर्थिक गतिविधियां बंद। लोगों की सेहत की रक्षा का एकमात्र तरीका था— लॉकडाउन यानी जान बचाने के लिए एक तरह का कर्फ्यू।

जीएसटी संग्रह का बदलता
आंकड़ा माह  कर संग्रह (रु. में)


फरवरी              1.05 लाख करोड़
मार्च               97,597 करोड़
अप्रैल            32,172 करोड़
मई                62,151 करोड़
जून                90,917 करोड़
जुलाई              87,422 करोड़
अगस्त             86,449 करोड़
सितंबर             95,480 करोड़
अक्तूबर
            1.05 लाख करोड़

अब कड़े कदम उठाने और वृद्धि के एजेंडे को आगे बढ़ाने का समय आ गया है। दुनियाभर की सरकारों में जीवन और आजीविका के संरक्षण के बीच संतुलन बैठाने को लेकर असमंजस रहा। भारत ने सख्त लॉकडाउन लगाया और स्वास्थ्य ढांचे को आगे बढ़ाते हुए लोगों के जीवन को बचाने पर ध्यान केंद्रित किया। हालिया मौद्रिक नीति से साफ है कि सरकार और नियामक अर्थव्यवस्था को मुश्किलों से उबारने और इसे मजबूत करने की हर संभव कोशिश करेंगे।  

8_1  H x W: 0 x-संगीता रेड्डी, अध्यक्ष, फिक्की

   लेकिन इस तरह से असीमित समय तक तो काम नहीं चल सकता था। फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सामने सूत्र रखा-‘जान भी, जहान भी।’ हर महीने कोविड-19 की विषमता और अपनी तैयारी की समीक्षा के बाद लॉकडाउन को चरणबद्ध तरीके से खोलने का सिलसिला शुरू हुआ। लोगों की जान बचाने के लिए सरकार ने जनता को एहतियात बरतने के तरीके बताने शुरू किए और इसी बचाव के साथ आर्थिक गतिविधियों को भी खोलने का सिलसिला शुरू हुआ। इसके शानदार परिणाम निकल कर सामने आ रहे हैं। हमारी अर्थव्यवस्था ने उम्मीद से अधिक गति से रफ्तार पकड़ी है। सरकार के विभिन्न राहत उपायों से समाज के विभिन्न तबकों को कोविड के कारण उत्पन्न आर्थिक समस्याओं से निबटने में मदद मिली। अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी की रफ्तार इतनी तेज है कि सरकार को कोविड के बाद भी इस बात का भरोसा है कि 2024 तक देश को 5,000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा।

   कोविड के दौरान अर्थव्यवस्था में चुस्ती लाने के लिए सरकार ने न सिर्फ तात्कालिक उपाय अपनाए बल्कि इस दौरान ऐसे कई सुधार किए गए जो वर्षों से लंबित पड़े थे। चाहे कृषि क्षेत्र हो या आयकर प्रणाली में सुधार या श्रम सुधार के कदम। देश की अर्थव्यवस्था और कारोबारी सुगमता में इन सभी का सकारात्मक असर लंबे समय तक बरकरार रहेगा।

जीएसटी का मजबूत संकेत
कोरोना काल के महा लॉकडाउन के बाद देश की आर्थिक गतिविधियों के लगभग ठप्प पड़ जाने से न सिर्फ जीडीपी के ग्राफ में जबरदस्त गिरावट आई बल्कि माल एवं सेवा कर (जीएसटी) के संग्रह में भी भारी कमी आई। लेकिन अर्थव्यवस्था की खोलने क्रमवार ढंग से और नीतियों में परिवर्तन के बाद बीते अक्तूबर माह में जीसीटी संग्रह में उछाल आई। अक्तूबर में जीएसटी संग्रह का आंकड़ा 1,05 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया। इस साल फरवरी के बाद पहली बार जीएसटी संग्रह आंकड़ा एक लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच गया है। 31 अक्तूबर तक दाखिल किए गए कुल जीएसटीआर-3बी रिटर्न की संख्या 80 लाख पर पहुंच गई और कुल जीएसटी संग्रह 1,05,155 करोड़ रुपये रहा। अक्तूबर में जीएसटी संग्रह पिछले साल के इसी महीने की तुलना में 10 फीसदी अधिक रहा। पिछले साल अक्तूबर में जीएसटी संग्रह 95,379 करोड़ रुपये रहा था।

वित्त वर्ष 2019-20 के 12 में से आठ महीनों में जीएसटी संग्रह एक लाख करोड़ रुपये से अधिक रहा था। फरवरी में जीएसटी संग्रह 1.05 करोड़ रुपये, मार्च में 97,597 करोड़ रुपये, अप्रैल में 32,172 करोड़ रुपये, मई में 62,151 करोड़ रुपये, जून में 90,917 करोड़ रुपये, जुलाई में 87,422 करोड़ रुपये, अगस्त में 86,449 करोड़ रुपये और सितंबर में 95,480 करोड़ रुपये रहा। जीएसटी संग्रह के आंकड़ों में कोरोना काल में अर्थव्यवस्था में मजबूती के लिए उठाए गए कदमों के सकारात्मक परिणाम स्पष्ट तौर पर परिलक्षित होते हैं कि किस तरह से ‘जान भी, जहान भी’ की अवधारणा को धरातल पर उतारा गया। जीएसटी संग्रह इस बात का स्पष्ट और पुख्ता संकेत है जिससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता।

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खपत में होने लगी बढ़ोतरी
आर्थिक विश्लेषण के क्षेत्र में दुनिया की शीर्ष कंपनियों में शामिल डेलॉयट के वरिष्ठ निदेशक एसएस मनी का कहना है कि आंकड़ों से साफ तौर पर पता चलता है कि खपत में बढ़ोतरी होने लगी है। कर संग्रह का यही रुख जारी रहा तो इससे चालू वित्त वर्ष के लिए रोजकोषीय घाटे को कम करने में मदद मिलेगी। साथ ही, सभी क्षेत्रों में कारोबारी विश्वास में सुधार लाने के लिए एक लंबा रास्ता तैयार हो जाएगा क्योंकि सभी राज्यों में लॉकडाउन खोलने की प्रक्रिया का असर सीधे जीएसटी संग्रह के आंकड़ों के रूप में दिखता है।

राहत उपायों से आ रही तेजी
वित्त सचिव अजय भूषण पाण्डेय का कहना है कि सरकार के कर संग्रह में तेजी आई है और सरकार द्वारा कोविड के मद्देनजर दिए गए प्रोत्साहनों के चलते आर्थिक संकेतकों में सुधार जारी है। वस्तुओं के परिवहन के लिए जरूरी ई-वे बिल को निकालने की संख्या कोविड के पहले के स्तर पर आ गई है और आॅनलाइन भुगतान तेजी से बढ़ा है। वस्तुओं की खपत या सेवा दिए जाने पर लिए जाने वाले वस्तु एवं सेवा कर के संग्रह में लगातार दूसरे महीने तेजी आई है। कर संग्रह के रुझानों से पता चलता है कि पिछले कुछ महीनों से इसमें गिरावट आई है, लेकिन अब यह न सिर्फ सुधार के रास्ते पर है बल्कि इसमें तेजी आ रही है।

विनिर्माण गतिविधियों में सबसे तेज बढ़ोतरी
कोविड से निबटने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने की योजनाएं लगातार बेहतर परिणाम दे रही हैं। वैश्विक स्तर पर कोरोना वायरस के मामलों में फिर से तेजी के चलते दुनिया की कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में एक बार फिर लॉकडाउन की घोषणा की जा रही है। जबकि दूसरी ओर, भारतीय अर्थव्यवस्था कोरोना वायरस के असर की चपेट से निकलती नजर आ रही है। एक ताजा सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है। दरअसल, आईएचएस मार्केट द्वारा जारी निक्की मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स अक्तूबर में 58.9 पर रहा, जो गत सितंबर में 56.8 पर रहा था। इस तरह अक्तूबर, 2020 में भारत की मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई मई 2020 के बाद विनिर्माण गतिविधियों में सबसे तेज वृद्धि को दिखाती है। इस प्रकार विनिर्माण गतिविधियों में लगातार तीसरे महीने वृद्धि देखने को मिली। जानकारी के लिए बता दें कि पीएमआई का 50 से अधिक का आंकड़ा वृद्धि को जबकि उससे नीचे का आंकड़ा संकुचन को दिखाता है।

अप्रैल-जून तिमाही में आर्थिक विकास में 23.9 फीसदी का संकुचन दर्ज करने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह काफी राहत भरी खबर है। भारत सरकार ने वायरस के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए लागू की गई अधिकतर पाबंदियों को अब हटा लिया है, जिसका असर आर्थिक गतिविधियों पर देखने को मिला है।

आईएचएस मार्केट में सहायक निदेशक पॉलियाना डि लीमा ने कहा कि नए आदेश और उत्पादन से भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर कोविड-19 की वजह से दर्ज किए गए संकुचन से बाहर निकलता दिख रहा है। लीमा के अनुसार कंपनियां इस बात को लेकर काफी आश्वस्त दिखीं कि आने वाले समय में बिक्री में तेजी बनी रहेगी।

भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रति उत्साहित विदेशी निवेशक

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने भारतीय बाजारों में बीते अक्तूबर में 22,033 करोड़ रुपये की शुद्ध खरीदारी की। इसके मुख्य कारण आर्थिक गतिविधियों के फिर से शुरू होने के साथ ही कंपनियों के अच्छे तिमाही परिणाम भी रहे। इससे पहले सितंबर महीने में एफपीआई ने 3,419 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की थी। डिपॉजिटरी के आंकड़ों के अनुसार एक अक्तूबर से 30 अक्तूबर के दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने इक्विटी में 19,541 करोड़ रुपये का निवेश किया तो बांड में उनका निवेश 2,492 करोड़ रुपये रहा। इस तरह अक्तूबर में कुल निवेश 22,033 करोड़ रुपये रहा। माना जा रहा है कि दुनिया के अन्य देशों का आर्थिक परिदृश्य ठीक नहीं होने से वैश्विक बाजारों में सरप्लस फंड है और उन्हें भारत के बाजार का भविष्य शानदार नजर आ रहा है जिससे वे भारतीय बाजार को अपना निवेश गंतव्य बना रहे हैं।

र्इंधन की मांग कोविड से पहले के स्तर पर
र्इंधन खपत को अर्थव्यवस्था का बहुत बड़ा और सशक्त संकेतक माना जाता है। र्इंधन की खपत का बढ़ना इस बात को स्पष्ट करता है कि उद्योग के साथ परिवहन ने रफ्तार पकड़ी है। पेट्रोल-डीजल की मांग कोविड से पहले के स्तर पर आ गई है। पहले पेट्रोल की मांग कोविड से पहले के स्तर पर आई, फिर अक्तूबर में डीजल की मांग भी बढ़कर कोविड से पहले के स्तर पर आ गई है। डीजल की मांग अक्तूबर में साल भर पहले की तुलना में 6.6 फीसदी अधिक रही। देशभर में लगाए गए लॉकडाउन के बाद डीजल की बिक्री में इस साल की यह पहली सालाना वृद्धि है। र्इंधन या ऊर्जा के रूप में बिजली का भी भरपूर उपयोग होता है। अनगिनत उद्योग बिजली से चलते हैं। इस क्रम में बिजली की खपत का आंकड़ा भी खास मायने रखता है। देश में बिजली की खपत अक्तूबर में 13.38 फीसदी बढ़कर करीब 111 अरब यूनिट हो गई। इसकी बड़ी बजह औद्योगिक और वाणिज्यिक गतिविधियों में बिजली की मांग बढ़ना है। अर्थव्यवस्था के खुलने से पहले ही विशेषज्ञों ने अक्तूबर में बिजली खपत में दोहरे अंक में बढ़ोतरी का आकलन किया था।

निखर रहा नई भुगतान प्रणाली का चेहरा
कोरोना काल से पहले ही सरकार ने यूपीआई के जरिए इलेक्ट्रॉनिक भुगतान की सेवा शुरू की थी। इस अवधि में न सिर्फ इसकी उपयोगिता बढ़ी बल्कि आने वाले समय में अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण में इसका काफी योगदान रहेगा। ई-भुगतान से समूची अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ती है। कोरोना काल में इस तरह के भुगतान में काफी तेजी आई है। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) के भुगतान प्लेटफॉर्म यूनाइटेड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) पर अक्तूबर महीने में 3.86 लाख करोड़ रुपये के दो अरब से ज्यादा लेन-देन हुए हैं। 2016 में इसे पेश किए जाने के बाद ऐसा पहली बार हुआ है। अक्तूबर के पहले 15 दिनों में लेन-देन के आंकड़े एक अरब के पार पहुंच गए थे।

एनपीसीआई के आंकड़ों से पता चलता है कि अक्तूबर में यूपीआई में 2.07 अरब का लेन-देन हुआ है। यह अक्तूबर 2019 के 1.14 अरब की तुलना में करीब 82 प्रतिशत ज्यादा है। अक्तूबर 2019 में पहली बार लेन-देन के आंकड़े एक अरब पार हुए थे। यूपीआई से एक अरब पर पहुंचने में जहां तीन साल लगे, वहीं एक अरब से दो अरब का लेन-देन महज एक साल बाद ही हो गया। महामारी के कारण हुए लॉकडाउन से अप्रैल में लेन-देन तेजी से गिरा। इस साल अप्रैल में यूपीआई लेन-देन गिरकर 0.99 अरब रह गया। और उसके बाद यह दोगुने से ज्यादा हो गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ई-कॉमर्स प्लेटफॉमों ने यूपीआई लेन-देन में तेजी में अहम योगदान दिया है, खासकर त्योहारों के दौरान। इसके अलावा तमाम लोगों का यह भी कहना है कि अब लेन-देन कार्ड से यूपीआई व अन्य माध्यमों की ओर बढ़ रहा है। जून 2020 से यूपीआई हर महीने नई ऊंचाइयों पर पहुंच रहा है। इसका इस्तेमाल आसान होने और सुरक्षा व्यवस्था के कारण इसकी स्वीकार्यता व्यापक रूप से बढ़ रही है। नई अर्थव्यवस्था में इसकी बड़ी भूमिका रहने वाली है।

बिजली और इस्पात के उत्पादन में बढ़ोतरी
कोर सेक्टर का उत्पादन कोविड से पहले के आंकड़े के आसपास पहुंच गया है। इस साल सितंबर में कोर सेक्टर की विकास दर में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले सिर्फ 0.8 फीसदी की गिरावट रही। इस साल अगस्त में कोर सेक्टर में पिछले साल अगस्त के मुकाबले 7.3 फीसदी की गिरावट आई थी। उल्लेखनीय है कि गत सितंबर में छह महीने के बाद पहली बार स्टील और बिजली के उत्पादन में बढ़ोतरी दर्ज की गई। कोर सेक्टर में आठ प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र कोयला, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, रिफाइनरी उत्पाद, खाद, स्टील, सीमेंट व बिजली शामिल हैं।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस साल फरवरी के बाद पहली बार बिजली के उत्पादन में सकारात्मक बढ़ोतरी रही। सितंबर में बिजली के उत्पादन में पिछले सितंबर के मुकाबले 3.7 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। इस साल अगस्त महीने में बिजली के उत्पादन में पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 1.8 फीसदी की गिरावट आई थी। वैसे ही, इस्पात के उत्पादन में छह महीने के बाद बढ़ोतरी दर्ज की गई जो पिछले साल सितंबर के मुकाबले 0.9 फीसदी रही।
अगस्त में इस्पात के उत्पादन में 1.7 फीसदी की गिरावट आई थी जबकि कोयले के उत्पादन में सितंबर महीने में 21.2 फीसदी का इजाफा रहा। कोयले के उत्पादन में गत अगस्त में भी 3.6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी।

घटा आयात, बढ़ा निर्यात
भारत के विदेश व्यापार के मोर्चें पर एक बड़ा और सकारात्मक परिवर्तन दिखा है। इस साल अप्रैल से सितंबर तक निर्यात के बढ़ने और आयात के घटने से इस अवधि में पहली बार 17 अरब डॉलर की बचत हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस अवधि में निर्यात 221.86 अरब डॉलर रहा जबकि आयात 204.12 अरब डॉलर। पिछले साल इसी अवधि की तुलना में निर्यात में गिरावट सिर्फ 16.66 प्रतिशत रही जबकि आयात में यह गिरावट 35.43 प्रतिशत थी।
सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की जो मुहिम चलाई है उसके परिणाम दिखने शुरू हो गए हैं। खास तौर से चीन से बेलगाम आयात की पुरानी नीति पर कारगर ढंग से नकेल कसी जा चुकी है। भारतीय उद्योग जगत और मुद्रा बाजार में भी पड़ोसी देशों की अप्रत्यक्ष घुसपैठ पर भी नियम बदल चुके हैं। इससे चीन के लिए भारत के बाजार में खुला खेल खेलना अब संभव नहीं होगा। तकनीक और तकनीक आधारित जासूसी का भी अर्थव्यवस्था के साथ सीधा सरोकार है। देर आयद, दुरुस्त आयद। अब हमने चौतरफा अपनी चौकसी बढ़ा दी है। रक्षा उद्योग क्षेत्र में भी काफी सारे नियमों में बदलाव किए गए हैं जिससे कि भारत में ही बने सामान की खपत बढ़ सके और कंपनियां इस तरह के उत्पादों के उत्पादन के लिए आगे आ सकें। देश में बने रक्षा उत्पाद न सिर्फ हमारी जरूरतों के अनुरूप होंगे बल्कि इनकी लागत भी कम होगी, देश की अर्थव्यवस्था में योगदान बढ़ेगा और रोजगार के नए अवसर खुलेंगे। कोविड काल ने दूसरे देशों पर निर्भरता के खिलाफ पूरी दुनिया को नए सिरे से एक सीख दी है।

वाहन बाजार में धूम जारी
आधुनिक अर्थव्यवस्था में वाहनों की बिक्री का आंकड़ा अर्थव्यवस्था का एक बड़ा संकेतक है। वाहन उद्योग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष ढंग से बेशुमार रोजगार पैदा करता है। कोरोना काल में देश में ट्रैक्टरों की बिक्री में रिकॉर्डतोड़ बढ़ोतरी हुई। अन्य वाहनों की बिक्री ने भी अगस्त-सितंबर में बिक्री की रफ्तार पकड़ी। अक्तूबर के जो आंकड़े सामने आए हैं वह भी काफी उत्साहवर्धक हैं। ग्राहकों में खरीदारी धारणा और मांग बढ़ने से देश की दो प्रमुख कार कंपनी मारुति सुजुकी और हुंडई की बिक्री में दोहरे अंक में बढ़ोतरी दर्ज की गई। मारुति की बिक्री में 19.8 फीसदी की बढ़ोतरी रही तो हुंडई की बिक्री में 13.2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। होंडा कारों की घरेलू बिक्री 8.3 फीसदी बढ़ी जबकि टोयोटा किर्लोस्कर मोटर की घरेलू बिक्री में 4.27 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। महिंद्रा एंड महिंद्रा ने अपनी घरेलू बिक्री में एक फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की।

इस तरह से तमाम आंकड़े यही दर्शाते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था न सिर्फ तेजी से पटरी पर आ रही है बल्कि आगे के लिए भी इसकी दिशा निर्धारित है। तय है कि कोरोना के बाद दुनिया को काम करने के तरीके बदल जाएंगे। इस महामारी ने दुनिया में कारोबार का एक नया नजरिया दिया है। दुनिया की अर्थव्यवस्था में वैश्विीकरण तो कम नहीं होगा, लेकिन आत्मनिर्भरता पर खास ध्यान देना होगा। इसमें तकनीक की भूमिका बहुत बड़ी होगी। कोरोना काल में देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के जितने भी कदम उठाए गए हैं, उन सभी का जबरदस्त लाभ कोरोना के बाद के समय में देश को मिलेगा जिससे अर्थव्यवस्था में तेजी की रफ्तार और भी तेज हो सकेगी।

उधर इज आॅफ वर्क और इज आॅफ डूइंग बिजनेस से संबधित कई कानूनों में बदलाव हुए हैं। पुराने कानून वर्क फ्रॉम होम की राह में बाधा थे। उनमें संशोधन कर दिया गया है। कानून में इस बदलाव का लाभ कोविड के बाद आईटी क्षेत्र को अप्रत्याशित रूप से मिलेगा। इसी तरह श्रम कानून में भी परिवर्तन किए गए जिसका लाभ अर्थव्यवस्था को मिलेगा। कोरोना काल में कृषि क्षेत्र में जो सुधार किए गए वह खेती-किसानी के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत करेंगे। कृषि क्षेत्र के ये सुधार न जाने कितने दशकों से लंबित थे। अब किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए मंडी समितियों पर आश्रित रहने की जरूरत नहीं होगी। पहले उनके सामने मंडी समितियों के तय दाम पर उपज बेचने की मजबूरी थी, दूसरे उपज बेचने के लिए उन्हें मंडी शुल्क के रूप में बड़ी राशि चुकानी होती थी। छोटे किसानों को अपनी फसल को मंडियों तक पहुंचाना ही एक चुनौती भरा काम होता था। अब उन्हें विकल्प मिल गया है कि वे चाहें तो अपनी उपज मंडी में बेचें या फिर किसी अन्य व्यक्ति या व्यापारी के पास। अब उपज बेचने के लिए भौगोलिक सीमा की बाध्यता भी खत्म हो गई है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में इस नए नियम से कृषि क्षेत्र में बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा। कोरना काल ने कृषि और तकनीक के क्षेत्र में नवाचार के बड़े द्वार खोले हैं। इन सभी का लाभ कोरोना युग के बाद बड़े पैमाने पर देखने को मिलेगा। (लेखक वरिष्ठ अर्थविश्लेषक हैं)