सियासी हो करके भी गैर सियासी होना, यूं आसान समझते हो मुनव्वर होना

    दिनांक 02-नवंबर-2020
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मुनव्वर राणा, कुछ वर्ष पहले अवार्ड वापसी गैंग का अहम हिस्सा रहे. इस बार उन्होंने फ्रांस के कट्टर मुसलमानों का समर्थन किया

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मुनव्वर राणा का एक शेर है “ कलंदरों को सिखाया है कलंदर होना / यूं आसान समझते हो मुनव्वर होना.” मुनव्वर राणा की कांग्रेस से निकटता रही. उसके पीछे उनका तर्क है कि वह रायबरेली के रहने वाले हैं. फिर वे समाजवादी पार्टी के करीबी रहे. उनके भाई सपा के टिकट पर चुनाव लड़े. मुनव्वर राणा सपा की सरकार में उर्दू अकादमी के अध्यक्ष बनाये गए. उनकी बेटी कांग्रेस पार्टी में हैं. मुनव्वर राणा, कुछ वर्ष पहले अवार्ड वापसी गैंग का अहम हिस्सा रहे. इस बार उन्होंने फ्रांस के कट्टर मुसलमानों का समर्थन किया. जब हर तरफ विरोध होने लगा तो अपने बयान में ‘एक वाक्य’ जोड़कर उस बयान को संतुलित करने का प्रयास किया.
कुछ दिन पहले उर्दू के शायर मुनव्वर राणा ने कहा कि "अगर कोई व्यक्ति मेरे पिता का गंदा कार्टून बनायेगा या फिर मेरी मां के बारे में गन्दा कार्टून बनाएगा तो हम तो उसे मार देंगे."
इधर कुछ वर्षों से मुनव्वर राणा कुछ न कुछ ऐसा बयान जारी करते रहे हैं जिससे सियासी मामलों में एक बहस शुरू हो जाती है. भारत में लॉकडाउन के दौरान कोरोना संक्रमण नियंत्रित हो रहा था मगर तब्लीगी समाज के लोगों ने सरकारी दिशा – निर्देशों का पालन नहीं किया. आंकड़ों के आधार पर भी स्पष्ट है कि तब्लीगी समाज के लोगों की वजह से संक्रमण तेजी से फैला. मगर मुनव्वर राना ने एक शेर ट्वीट किया. उन्होंने लिखा -- जो भी ये सुनता है हैरान हुआ जाता है, अब कोरोना भी मुसलमान हुआ जाता है.” गजल संग्रह ‘बदन सराय’ में एक उनकी गजल का शेर है — ये देख कर छतें भी हैरान हो गईं / अब तो पतंगे भी हिन्दू- मुसलमान हो गईं. कुछ इसी से मिलता – जुलता हुआ शेर उन्होंने कोरोना और मुसलमान को जोड़ कर लिखा और फिर उसे ट्वीट कर दिया.
मुनव्वर राणा बताते हैं कि “ एक बार उनकी मुलाक़ात राजीव गांधी से हुई थी. राजीव गांधी ने उनसे पूछा कि आप किस पार्टी में हैं. मैंने कहा कि मैं ‘टी’ पार्टी में हूं. राजीव गांधी ने कहा कि ये कौन सी पार्टी है. मैंने कहा ‘टी’ का मतलब चाय से है. तब वो हंस पड़े.” मुनव्वर राणा सक्रिय राजनीति में जाने की हमेशा खिलाफत करते रहे हैं. अपने एक शेर में उन्होंने लिखा है कि “ कम-से कम बच्चों के होठों की हंसी की ख़ातिर/ ऐसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊं// शायरी कुछ भी हो रुसवा नहीं होने देती/ मैं सियासत में चला जाऊं तो नंगा हो जाऊं.”
वृद्ध अवस्था, कई बार घुटनों का आपरेशन और फिर कैंसर की बीमारी से जूझ रहे मुनव्वर राना सियासत में सीधे तौर पर कभी शामिल नहीं हुए मगर अप्रत्यक्ष तरीके से राजनीति में एक बहस को हवा देते रहे हैं.