मुनव्वर राणा : जिहाद की महफ़िल का उन्मादी शायर

    दिनांक 02-नवंबर-2020   
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 मुनव्वर राणा की “इंसानियत, सेकुलरिज्म और बुद्धिजीविता” सभी का मुलम्मा उतर रहा है. राम मंदिर फैसले का विरोध, सीएए क़ानून का विरोध, तालिबान का समर्थन, भारत के मित्र देशों से नाराजगी, वैश्विक उम्मा के लिए तड़पता दिल. राणा के “सेकुलरिज्म” की फेहरिस्त लंबी है

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मुनव्वर राणा एक बार फिर अपना दिल लेकर हाजिर हैं. “कोई हमारे माँ-बाप का ऐसा कार्टून बनाता तो हम तो उसका सर काट देते.. किसी को इतना मजबूर न करो कि वो अग्रेसिव हो जाए”. मकबूल फ़िदा हुसैन के चित्रों का विरोध इस शायर को गलत लगता है, लेकिन मुहम्मद के कार्टून को वो “मुसलमानों को हत्या करने के लिए उकसाना” कहते हैं. स्यापा कर रहे हैं कि सिर्फ मुसलमानों को चिढाने के लिए ऐसे कार्टून बनाए जाते हैं. मुनव्वर राणा कहते हैं “आप (फ्रेंच कार्टूनिस्ट) गॉड का कार्टून बनाइये, वो तो आप नहीं बनाते. आप हज़रत ए ईसा (जीसस) का कार्टून बनाइये , आप उनका तो नहीं बनाते, आप सिर्फ मुसलमानों को चिढाने के लिए मुहम्मद साहब का कार्टून बना रहे हैं तो आप क्यूं बनाएँगे ” मजहबी संकीर्णता में फँसे राणा को दुनिया की कोई खबर नहीं है. फ़्रांस समेत सारे यूरोप और अमेरिका में जीसस और बाइबिल पर खूब कार्टून बनते हैं, पचासों सालों से बन रहे हैं. न केवल कार्टून, बल्कि वहाँ की फिल्मों और साहित्य में भी खुलकर ईसाइयत का मज़ाक बनता है. वहाँ के मिशनरी ये सब देखकर जलते-भुनते रहते हैं, लेकिन मन मसोसकर रह जाते हैं.
मुनव्वर राणा ने कहा कि “पूरी दुनिया इस समय (फ़्रांस के जिहादी हमले पर)चीख रही है, लेकिन उसे याद नहीं आ रहा कि जब फ्रांस, अमेरिका जैसे देश इराक, अफगानिस्तान पर हमला करते थे तो कितने लोगों की मौतें हुईं.. अमेरिका और फ़्रांस ने इराक में, अफगानिस्तान में अस्पतालों पर बमबारी की, स्कूलों पर बमबारी की..” अस्पतालों और स्कूलों पर बमबारी? कब हुई? क्या अफगानिस्तान की पहाड़ियों में बने बंकरों में तालिबानी अस्पताल और स्कूल चला रहे थे? लगता है कि मुनव्वर राणा भी जैश ए मुहम्मद, लश्कर ए तय्यबा, इन्डियन मुजाहिदीन, हमास और हिजबुल्ला छाप साहित्य पढ़ते रहे हैं.
राणा के शब्दों पर ध्यान देना चाहिए. “अफगानिस्तान पर हमला?” नाटो सेनाओं का हमला अफगानिस्तान पर हुआ था अफगानिस्तान का खून चूस रहे तालिबान पर? 9/11 के भयंकर आतंकी हमले के जिम्मेदार बिन लादेन को तालिबानियों ने अफगानिस्तान में छिपा रखा था. “हमारे अमीर बिन लादेन को हम काफिरों के हाथ नहीं दे सकते..” ऐसा उनका दो टूक जवाब था. तालिबानी जो बुर्के से हाथ की कलाई दिखने पर महिलाओं को कोड़े से पीटते थे, पीटते हैं. जिन्होंने वहाँ पर सिखों के सर कलम किए. गुरुद्वारे जलाए. वैश्विक धरोहर बामियान बुद्ध की प्रतिमाएँ तोडी. स्कूलों को बारूद से उड़ाया. जो भारत को दुशमन काफिर मुल्क मानते थे, और “कश्मीर को हिंदुओं से आज़ाद करवाने” की घोषणा करते थे. जिन्होंने अगवा करके कंधार में खड़े किए गए भारतीय विमान को छुड़ाने के लिए भारत के सुरक्षाबलों को कार्रवाई नहीं करने दी, बल्कि आतंकी हाईजैकर्स को सुरक्षा देने के लिए क्लाशनिकोव और राकेट लॉन्चर लिए विमान को घेरकर खड़े रहे, उनके खिलाफ अमेरिका-फ़्रांस -ब्रिटेन का सैन्य अभियान मुनव्वर राणा के लिए वो “अफगानिस्तान पर किया हमला “ है.
मुनव्वर राणा सीएए क़ानून की खिलाफत करते हैं. उनके लिए पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं का मारा जाना, उनकी नाबालिग बच्चियों का अपहरण – जबरन निकाह, बाहरी मुल्क का मामला है, जबकि उन लोगों पर ये मुसीबत देश के इस्लाम के नाम पर विभाजन से आई है, लेकिन दुनिया के किसी देश में कोई कार्टून बन रहा है तो वो इनका जातीय और मज़हबी मामला है. राणा से जब सवाल पूछा गया कि क्या मज़हब मातृभूमि से बड़ा है तो गोलमोल जवाब देते हैं कि “ मज़हब बिना मातृभूमि के होता ही नहीं है” ये नहीं कहते कि नहीं मज़हब मातृभूमि से बड़ा नहीं होता. राणा साहब! यदि सचमुच मज़हब मातृभूमि के बिना नहीं होता है तो तो ईरान-ईराक फिलिस्तीन और अफगानिस्तान में होने वाली घटनाओं के लिए आपके मन में इतना आक्रोश क्यों? परदेस की बातों से आपका क्या लेना-देना? आपकी “मातृभूमि” में तो किसी ने ऐसा कोई कार्टून नहीं बनाया.
सवाल पूछा गया कि “पीएम मोदी ने फ़्रांस में हुए हमले को आतंकी घटना कहा है आप इसे आतंकी घटना कहेंगे या नहीं?” खुद को इंसानियत का पाबंद बतलाने वाले राणा ने इसका भी उत्तर नहीं दिया कि ‘हां, ये आतंकी घटना है. बात को घुमाकर राफेल पर ले गए कि हमारे पीएम ने राफेल के लिए फ़्रांस के समर्थन में ये बयान दिया है. ऐसी हास्यास्पद बातें, राणा की समझ का दायरा बतलाती हैं. मुनव्वर साहब! राफेल सौदा हो चुका है. अगर मोदी इस मामले पर चुप रह जाते तो फ्रांस सरकार ये सौदा रद्द नहीं कर देती. कर सकती भी नहीं. प्रधानमंत्री ने फ़्रांस में हुई हत्याओं को आतंकवाद कहा है क्योंकि इन हत्याओं के पीछे वैश्विक जिहाद की विश्व्यापी अवधारणा है. ये अवधारणा इस्लामिक स्टेट, अलकायदा, बोको हराम, इन्डियन मुजाहिदीन , हरकत उल जिहाद अल इस्लामी और पाकिस्तानी फौज में समान रूप से मान्य है. पर मुनव्वर राणा के मुँह से इन जिहादियों के लिए आतंकवादी शब्द नहीं निकलता. उलटे कहते हैं, कि फ़्रांस को खुश करने के लिए इस्लामी मुल्कों का दिल दुखा दिया मोदी साहब ने.
जब हाल ही में रामजन्मभूमि पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया तो मुनव्वर राना ने कहा कि “अदालत से न्याय नहीं मिला. मुसलमानों को भी जमीन में हिस्सा देना था. ..अब प्रधानमन्त्री देवबंद और मदरसों को साथ लेकर बरेली में मस्जिद बनवानी चाहिए..” वही राणा अब कह रहे हैं कि “मजहब एक खतरनाक खेल है. 470 साल पहले बाबरी मस्जिद के सिलसिले में जिन बादशाहों ने गलती की हो. मजहबी मामले में जिसने भी मंदिर तोड़कर मस्जिद बना दी. ऐसे में पूरी कौम को गालियां खानी पड़ीं. मैंने यह कहा कि मजहब एक खतरनाक खेल है. इससे लोगों को दूर रहना चाहिए.” मुनव्वर राणा को “कौम को पड़ने वाली गालियों “ की फ़िक्र है लेकिन राणा ने कभी नहीं कहा कि “बादशाह की गलती” को दुरुस्त करते हुए हिंदुओं को श्रीराम जन्मभूमि लौटा दी जाए.
ऐसा मौक़ा हो और सेकुलर शायरों को इकबाल याद न आएँ ऐसा कैसे हो सकता है. राणा बोले “अल्लामा इकबाल जो शायर ए इस्लाम कहलाते थे वो भगवान् राम को “इमाम ए हिंद” कहते थे..” सच ये है कि इकबाल ये सब तब तक कहते थे जब तक सर पर अखिल इस्लामवाद (पैन इस्लामिज़म) और जिहाद का भूत सवार नहीं हुआ था. भारत के सेकुलरों के प्यारे इकबाल ने ही इस्लाम के आधार पर भारत का विभाजन करके पाकिस्तान बनाने के उन्माद को हवा दी. वैचारिक दुष्प्रचार पैदा किया. और इकबाल ने जिस पाकिस्तान की नींव रखी उस पाकिस्तान ने राम के नाम और उनके मानने वालों के सफाए के लिए खून की नदियाँ बहा दीं.
राणा की बहानेबाजी यहीं नहीं रुकती.“इस मुल्क में हजारों बरस से ऑनर किलिंग हो रही है, कितनों को सजा होती है...तबरेज़ अंसारी हो, अख़लाक़ को मार देते हैं, क्या ये जायज़ है..” यह झूठ भी है, और अधूरा भी. भारत में ऑनर किलिंग (प्रेम विवाह आदि करने पर अभिभावकों द्वारा लड़कियों को मार डालने की घटनाएं) की घटनाएं कुछ दशकों से ही चली हैं. “हजारों सालों से नहीं” दूसरा ऑनर किलिंग के मामले में मुस्लिम समुदाय दुनिया में सबसे आगे है. यहां तक कि यूरोपीय मुसलमान भी हर साल सैकड़ों लड़कियों की ऑनर किलिंग कर रहे हैं. राणा को तबरेज़ और अख़लाक़ ही याद आते हैं, लेकिन हाल ही में दिल्ली में घेरकर मारा गया 18 वर्षीय राहुल राजपूत याद नहीं आता. उत्तर से दक्षिण तक ऐसे कितने ही मनोज राजपूत मारे गए हैं, उनके नाम शायर की जुबान से नहीं निकलते.
भारत में पिछले कुछ दशकों से ख़ास पार्टी और विचार के शायरों-साहित्यकारों को बुद्धिमत्ता का प्रतीक बनाकर पेश किया जाता रहा है. राणा भी उनमें से एक हैं. बोलते हैं “पैगम्बर साहब का कार्टून बनाया बताइये जुर्म किया कि नहीं किया ..” खुद को बड़े ‘दानिश’ की तरह पेश करने वाले मुनव्वर राणा को क़ानून के बारे में कुछ पता नहीं है, या वो पता न होने का दिखावा कर रहे हैं. हर देश का अपना कानून होता है. पैगम्बर का कार्टून बनाना इस्लामी क़ानून में जुर्म है, फ़्रांस के क़ानून में नहीं. वहां पैगम्बर, जीसस, राम, कृष्ण किसी का भी कार्टून बन सकता है. वो इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता परिभाषित करते हैं. पर सेकुलर शायर को इस सबसे मतलब नहीं. वो तो इतना चिढ़ा बैठा है कि कह दिया है कि “कार्टून तो बुरी चीज है..”